शौहर की फ़र्माबरदारी किन कामों में की जाएगी?
शौहर की फ़र्माबरदारी किन कामों में करनी है और किन कामों में नहीं। इस बात पर चर्चा करने से पहले हम ये जान लेते है कि इस्लाम औरत को शौहर की फ़र्माबरदारी को लेकर क्या हुक्म देता है। आइए हदीस के ज़रिए जानते है:
रसूलुल्लाह ﷺ से पूछा गया, कौन सी औरत बेहतर है?
आप ﷺ ने फ़रमाया, "वो जो अपने शौहर को ख़ुश कर दे जब वो उसे देखे और जब उसे हुक्म दे तो वो उसकी इताअत करे और अपने माल और जान में शौहर की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ऐसा काम न करे जो उसे नापसन्द हो।" [सुनन निसाई 3233, मिश्कात : 3272]
इन हदीसों से पता चला कि हर औरत पर अपने शौहर की फ़र्माबरदारी करना फ़र्ज़ है और जो औरत अपने शौहर की फ़र्माबरदारी नहीं करती वह गुनहगार है। इसलिए औरतों को चाहिए कि अपने शौहर की इताअत व फ़र्माबरदारी को अल्लाह और उसके प्यारे रसूल ﷺ की इताअत समझकर उसमें सबकत करें, अगर उन्होंने ये काम दिल सोज़ी, ख़ुलूस और यकसूई से कर लिया तो न सिर्फ़ अख़लाक़ी उमूर में ख़ुशगवारी पैदा होगी और घरेलू ज़िंदगी प्यार व मुहब्बत और बरकत से मालामाल होगी बल्कि एक बीवी के लिए अपनी आख़िरत बनाने और अल्लाह को ख़ुश करने का भी यही ज़रिआ है।
शौहर का मुक़ाम और मर्तबा
शौहर का मुक़ाम और मर्तबा बयान करते हुए नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया, "अगर मैं किसी को किसी के लिये सजदा करने का हुक्म देता तो मैं औरत को हुक्म देता कि वो अपने शौहर को सजदा करे।" [जामे तिर्मिज़ी : 1159]
वहीं दूसरी तरफ़ जो औरतें अपने शौहर को तकलीफ़ देती है, परेशान करती है उनके तअल्लुक़ से नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया, "जो औरत भी अपने शौहर को दुनिया में तकलीफ़ पहुँचाती है। तो (जन्नत की) बड़ी आँखों वाली हूरों में से इस की बीवी कहती है: तू इसे तकलीफ़ न दे अल्लाह तुझे हलाक करे ये तो वैसे भी तेरे पास बस मुसाफ़िर है। जल्द ही ये तुझे छोड़ कर हमारे पास आ जाएगा।" [जामे तिर्मिज़ी : 1174]
नबी ﷺ ने फ़रमाया, "जब शौहर बीवी को अपने बिस्तर पर बुलाए और वो न आए और शौहर ग़ुस्से में रात गुज़ार दे तो फ़रिश्ते इस बीवी पर सुबह होने तक लानत करते रहते हैं।" [सुन्न अबु दाऊद : 2170]
इसलिए हर औरत को चाहिए कि वह अपने शौहर की ख़िदमत करके उन्हें राज़ी करें और उनके जायेज़ हुक्म पर अमल करके फ़र्माबरदार बने।
शौहर की फ़र्माबरदारी किन कामों में करनी है?
अब बात करते है एक अहम मसाइल पर जो कि बहुत आम होता जा रहा है। शौहर उपर की हदीसें पेश करके अपनी बीवी पर हक़ जताते हैं और कहते है कि औरत को अपने शौहर की हर काम में फ़र्माबरदारी करनी है यही इस्लाम का हुक्म है।
शौहर जो भी हुक्म दे, बीवी पर मानना फ़र्ज़ है। अगर न मानेंगी तो गुनहगार होगी, चाहें हुक्म गै़र शरई ही क्यों न हो। जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। शौहर से ज़्यादा हक़ अल्लाह ने वालदेन का बताया है कुरआन में अल्लाह ने अपने हुक़ूक़ के फ़ौरन बाद ही वालदेन के हुक़ूक़ का ज़िक्र किया है। वालदेन में से जहां बाप को जन्नत का दरवाज़ा बताया गया है वही मां का हव बाप से तीन दर्ज ज़्यादा बताया गया है। और वालदेन की फ़र्माबरदारी करके इंसान से जन्नत का वादा भी किया है लेकिन उसी कुरआन में अल्लाह ने ये भी बता दिया है कि वालदेन का हुक्म भी तब तक मानना है जब तक वह इस्लाम की हुदूद में रहकर कोई हुक्म दें। अगर वालदेन कोई गैर शरई काम का हुक्म दें तो अल्लाह ने उनकी बात मानने को मना कर दिया है। कुरआन में अल्लाह ने कहा है;
وَوَصَّيۡنَا ٱلۡإِنسَٰنَ بِوَٰلِدَيۡهِ حُسۡنٗاۖ وَإِن جَٰهَدَاكَ لِتُشۡرِكَ بِي مَا لَيۡسَ لَكَ بِهِۦ عِلۡمٞ فَلَا تُطِعۡهُمَآۚ إِلَيَّ مَرۡجِعُكُمۡ فَأُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ
"हमने इन्सान को ताकीद की कि अपने माँ-बाप के साथ अच्छा सुलूक करे। लेकिन अगर वो तुझपर दबाव डालें कि तू मेरे साथ किसी ऐसे (माबूद) को शरीक ठहराए जिसे तू (मेरे शरीक की हैसियत से) नहीं जानता तो उनका कहना न मान। मेरी ही तरफ़ तुम सबको पलटकर आना है, फिर मैं तुमको बता दूँगा कि तुम क्या करते रहे हो।" [कुरान 29:8]
وَوَصَّيۡنَا ٱلۡإِنسَٰنَ بِوَٰلِدَيۡهِ حَمَلَتۡهُ أُمُّهُۥ وَهۡنًا عَلَىٰ وَهۡنٖ وَفِصَٰلُهُۥ فِي عَامَيۡنِ أَنِ ٱشۡكُرۡ لِي وَلِوَٰلِدَيۡكَ إِلَيَّ ٱلۡمَصِيرُ
"और ये हक़ीक़त है कि हमने इन्सान को अपने माँ-बाप का हक़ पहचानने की ख़ुद ताकीद की है। उसकी माँ ने कमज़ोरी-पर-कमज़ोरी उठाकर उसे अपने पेट में रखा और दो साल उसका दूध छूटने में लगे। (इसीलिये हमने उसे नसीहत की कि) मेरा शुक्र कर और अपने माँ-बाप का शुक्र अदा कर, मेरी ही तरफ़ तुझे पलटना है।" [कुरान 31:14]
وَإِن جَٰهَدَاكَ عَلَىٰٓ أَن تُشۡرِكَ بِي مَا لَيۡسَ لَكَ بِهِۦ عِلۡمٞ فَلَا تُطِعۡهُمَاۖ وَصَاحِبۡهُمَا فِي ٱلدُّنۡيَا مَعۡرُوفٗاۖ وَٱتَّبِعۡ سَبِيلَ مَنۡ أَنَابَ إِلَيَّۚ ثُمَّ إِلَيَّ مَرۡجِعُكُمۡ فَأُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ
"लेकिन अगर वो तुझपर दबाव डालें कि मेरे साथ तू किसी ऐसे को साझी ठहराए जिसे तू नहीं जानता तो उनकी बात हरगिज़ न मान। दुनिया में उनके साथ अच्छा बर्ताव करता रह, मगर पैरवी उस शख़्स के रास्ते की कर जिसने मेरी तरफ़ रुजू किया है। फिर तुम सबको पलटना मेरी ही तरफ़ है, उस वक़्त मैं तुम्हें बता दूँगा कि तुम किस तरह के काम करते रहे हो।" [कुरान 31:15]
इन आयतों से साफ़ पता चलता है कि अल्लाह ने वालदैन का हुक्म भी तब तक मानने का हुक्म दिया है जब तक वह कोई ग़ैर शरई हुक्म न दें। तो शौहर का कोई ग़ैर शरई हुक्म मानना कैसे जायज़ हो जायेगा?
अल्लाह के रसूल ﷺ की एक हदीस से बात वाज़ेह हो जायेगी जिसमे नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया, "अल्लाह की नाफ़रमानी में मख़लूक़ की इताअत नहीं की जाएगी।" [सहीह अल जामें : 7520]
इस्लाम बीवी को शौहर की हर बात मानने का हुक्म नहीं देता है बल्कि शौहर का शरई हुक्म मानना जाइज़ है। हुक्म गै़र शरई हो तो बीवी इन्कार कर दे। मिसाल के तौर पर:
• शौहर बीवी को कहता है कि मग़रिब की तरज़ का लिबास पहना करो। जो नामुनासिब हो तो बीवी पर ये हुक्म मानना फ़र्ज़ नहीं। हाँ शौहर की ख़ुशी के लिए कमरे में पहन सकती है। लेकिन बाहर नहीं, जहाँ कोई ग़ैर मेहरम दिखे।
• बीवी पर्दा करती है। और उसका शौहर उस को पर्दा करने से रोकता है। कि अपने रिश्तेदारों वगै़रा के सामने पर्दा करने से मना करता है तो शौहर का ये हुक्म भी ग़ैर शरई है। जिस काम का हुक्म अल्लाह तआला ने दिया है, और जिस काम से अल्लाह ने मना किया है। अगर शौहर अल्लाह के हुक्म के ख़िलाफ़ दे, तो ऐसा हुक्म बीवी पर मानना फ़र्ज़ नहीं है। क्योंकि खा़लिक़ के हुक्म के आगे मख़लूक़ का हुक्म नहीं माना जा सकता।
• अगर बीवी शौहर का ग़ैर शरई हुक्म मान लेती है तो उस ग़लत काम का गुनाह शौहर और बीवी दोनों पर होगा।
लिहाजा़ मर्द हज़रात बीवी को ऐसा हुक्म न दें, जो ग़ैर शरई हो और जिससे बीवी इन्कार कर दे और उससे उसके शौहर को भी शर्मिंदा होना पड़े।
शौहर के लिए हिदायत
जहां एक तरफ़ इस्लाम ने बीवी पर शौहर की फ़र्माबरदारी को फ़र्ज़ क़रार दिया है वहीं दूसरी तरफ़ शौहर को भी बीवी के साथ हुस्न ए सुलूक करने की हिदायत की है।
• इस्लाम ने मर्द को अपनी बीवी के साथ सबसे ज़्यादा हुस्न ए सुलूक और बेहतरीन अख़लाक़ से पेश आने का हुक्म दिया है।
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया, "ईमान में सबसे कामिल मोमिन वो है जो सबसे बेहतर अख़लाक़ वाला हो, और तुम में सबसे बेहतर वो है जो अख़लाक़ में अपनी औरतों के हक़ में सबसे बेहतर हो।” [जामे तिर्मिज़ी : 1162]
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया, "औरत बाँई पसली की हड्डी की तरह है, अगर तुम उसे सीधा करना चाहोगे तो तुम उसे तो तोड़ दोगे (यानी जुदाई की नौबत आ पहुँचेगी) और अगर तुम औरत से फ़ायदा उठाना चाहो तो तुम्हें उसका टेढ़ापन बर्दाश्त करते हुए उसकी ख़ूबियां से फ़ायदा उठाना होगा।" [सहीह बुख़ारी: 5184]
इसी लिए अल्लाह तआला ने क़ुरआन में मर्दों को ख़ास ज़ोर दिया है कि अपनी बीवीयों के साथ भले तरीक़े से ज़िन्दगी गुज़ारो।
"उनके (बीवियों के) साथ भले तरीक़े से ज़िन्दगी गुज़ारो। अगर वो तुम्हें नापसन्द हों तो हो सकता है कि एक चीज़ तुम्हें पसन्द न हो मगर अल्लाह ने उसी में बहुत कुछ भलाई रख दी हो।" [कुरान 4:19]
[तफसीर : तफ़हीमूल कुरआन]
अगर औरत ख़ूबसूरत न हो या उसमें कोई ऐसी कमी हो जिसकी वजह से वो शौहर को पसंद न आए तो ये मुनासिब नहीं है कि शौहर फ़ौरन बददिल होकर उसे छोड़ देने को तैयार हो जाए। जहाँ तक हो सके उसे सब्र और बर्दाश्त से काम लेना चाहिए। कभी-कभी ऐसा होता है कि एक औरत ख़ूबसूरत नहीं होती, मगर उसमें कुछ दूसरी ख़ूबियाँ ऐसी होती हैं जो इज़्दिवाजी ज़िन्दगी (दाम्पत्य जीवन) में शक्ल-सूरत की ख़ूबसूरती से ज़्यादा अहमियत रखती हैं। अगर उसे अपनी उन ख़ूबियों को ज़ाहिर करने का मौक़ा मिले तो वही शौहर जो शुरू में सिर्फ़ उसकी शक्ल-सूरत की ख़राबी की वजह से बददिल हो रहा था उसकी सीरत और किरदार के हुस्न पर फ़िदा हो जाता है। इसी तरह कभी-कभी इज़्दिवाजी ज़िन्दगी की शुरुआत में औरत की कुछ बातें शौहर को नापसन्द होती हैं और वो उससे बददिल हो जाता है, लेकिन अगर वो सब्र से काम ले और औरत की सभी ख़ूबियों को उभरने का मौक़ा दे तो उसपर ख़ुद साबित हो जाता है कि उसकी बीवी बुराइयों से बढ़कर ख़ूबियाँ रखती है। इसलिये ये बात पसन्दीदा नहीं है कि आदमी शादी के तअल्लुक़ को तोड़ने में जल्दबाज़ी से काम ले। तलाक़ बिलकुल आख़िरी रास्ता है जिसको बिलकुल मजबूरी की हालतों में इस्तेमाल करना चाहिए।
अल्लाह तआला ने दुनिया में सबसे पहले जो रिश्ता बनाया है, वो मियां बीवी का है। और फिर सारे रिश्ते बाद में बनाऐ। मियां बीवी का रिश्ता तो है ही ऐसा कितनी भी धूप छाँव,सुख दुख आऐ,इस रिश्ते में एक दुसरे के बिना गुजा़रा भी नहीं है। बीवी की ख़ुशियों ओर ख़्वाहिशों का ख़्याल रखना शौहर की ज़िम्मेदारी है,क्योंकि वो आपके अलावा किसी से नहीं कह सकती। शौहर का प्यार व वक़्त ओर तवज्जुह बीवी के लिए सबसे बहतरीन तोहफ़ा है।
कुरान ने मियां बीवी को एक दूसरे का लिबास क़रार दिया है, लिबास न सिर्फ़ ऐब को छुपा कर पर्दा पोशी करता है। बल्कि उसके हुस्न व ख़ूबसूरती में इज़ाफ़े का बाईस भी बनाता है। मियां बीवी का रिश्ता सिर्फ़ कागज़ तक महदूद नहीं होता, इस रिश्ते की ख़ासियत ये है कि अपने हमसफ़र की तकलीफ़ ओर परेशानी व थकावट को ख़ुलूस दिल से समझे। ये रिश्ता सिर्फ़ दुनिया तक महदूद नहीं जन्नत तक का भी साथ होता है।
दुनिया में अल्लाह तआला ने सबसे बहतरीन रिश्ता मियां बीवी का बनाया है, उन दोनों में प्यार व रहमत रख दी । ताकि वो दोनों मुहब्बत से रहें। शौहर को चाहिए, कि वो बीवी को दीन की बुनियादी बातें सिखाऐ या उस का एहतमाम करे। उस के साथ हुस्न ए सुलूक से पेश आऐ। नरमी के साथ गुफ़्तगू करे, मुम्किन हो तो घर के कामों मे उसका हाथ बटाऐ, जैसा ख़ुद खाए, वैसा उसे खिलाए, जैसा ख़ुद पहने, उसे पहनाए, उसे बुरे अल्फ़ाज़ न कहे और उसके ऐब छुपाए।
जिन रिश्तों को अल्लाह तआला ने इन्सान के लिए सुकून बनाया है, आजकल लोग उन्हीं रिश्तों में चालाकियां और मक्कारियां करते है। और फिर रोते फिरते हैं, कि हमारी ज़िंदगी में सुकून नहीं है। जबकि अल्लाह का इरशाद है:
وَمِنۡ ءَايَٰتِهِۦٓ أَنۡ خَلَقَ لَكُم مِّنۡ أَنفُسِكُمۡ أَزۡوَٰجٗا لِّتَسۡكُنُوٓاْ إِلَيۡهَا وَجَعَلَ بَيۡنَكُم مَّوَدَّةٗ وَرَحۡمَةًۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَٰتٖ لِّقَوۡمٖ يَتَفَكَّرُونَ
"और उसकी निशानियों में से ये है कि उसने तुम्हारे लिये तुम्हारी ही जिंस से बीवियाँ बनाईं ताकि तुम उनके पास सुकून हासिल करो और तुम्हारे बीच मुहब्बत और रहमत पैदा कर दी। यक़ीनन इसमें बहुत सी निशानियाँ हैं उन लोगों के लिये जो ग़ौर और फ़िक्र करते हैं।" [कुरान 30: 21]
इस आयत की तफ़सीर में मौलाना अबुल आला मौदूदी रह० लिखते है कि:
मुहब्बत से मुराद यहाँ जिंसी मुहब्बत (Sexual Love) है जो मर्द और औरत के अन्दर एक-दूसरे की तरफ़ खिंचने और एक-दूसरे के साथ रहने की शुरुआती वजह बनती है और फिर उन्हें एक-दूसरे से जोड़े रखती है और रहमत से मुराद वो रूहानी तअल्लुक़ है जो शौहर-बीवी की ज़िन्दगी में धीरे-धीरे उभरता है जिसकी बदौलत वो एक-दूसरे के ख़ैर-ख़ाह, हमदर्द और दुख-सुख के साथी बन जाते हैं, यहाँ तक कि एक वक़्त ऐसा आता है जब जिंसी मुहब्बत पीछे जा पड़ती है ओर बुढ़ापे में ये जीवन-साथी कुछ जवानी से भी बढ़कर एक-दूसरे के लिये रहमदिल और मेहरबान साबित होते हैं. ये दो ऐसी ताक़तें हैं जिनके अच्छे नतीजे सामने आते हैं और इन्हें पैदा करनेवाले अल्लाह ने उस शुरुआती बेचैनी की मदद के लिये इनसान के अन्दर पैदा की हैं जिसका ज़िक्र ऊपर गुज़रा है वो बेचैनी तो सिर्फ़ सुकून चाहती है और उसकी तलाश में मर्द और औरत को एक-दूसरे की तरफ़ ले जाती है. इसके बाद ये दो ताक़तें आगे बढ़कर उनके बीच मुस्तक़िल दोस्ती का ऐसा रिश्ता जोड़ देती हैं जो दो अलग माहौलों में पले-बढ़े हुए अजनबियों को मिलाकर कुछ इस तरह एक-दूसरे से जोड़ देता है कि उम्र भर वो ज़िन्दगी के मंझदार में अपनी नाव एक-साथ खींचते रहते हैं. ज़ाहिर है कि ये मुहब्बत और रहमत जिसका तजरिबा करोड़ों इनसानों को अपनी ज़िन्दगी में हो रहा है, कोई माद्दी (भौतिक) चीज़ नहीं है जो नाप-तौल में आ सके, इनसानी जिस्म जिन चीज़ों से मिलकर बना है उनमें भी कहीं इसकी निशानदेही नहीं की जा सकती कि ये चीज़ उनसे हासिल हुई है, न किसी लेबॉरेट्री में इसकी पैदाइश और इसके पलने-बढ़ने की वजहों की खोज लगाई जा सकती है। इसकी कोई वजह इसके सिवा नहीं बयान की जा सकती कि एक हिकमतवाले ख़ालिक़ ने पूरे इरादे के साथ एक मक़सद के लिये पूरी अनुकूलता के साथ इसे इनसान के नफ़्स में रख दिया है।
निशा यासीन
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