इस्लाम की दावत किन पर बेनतीजा है?
जो लोग मरने की बाद की जिंदगी पर यकीन नहीं रखते, ऐसे लोगों पर इस्लाम की दावत का कोई असर नहीं होता है क्योंकि इस्लाम की सारी दावत ही मरने के बाद की जिंदगी पर है ये दुनिया तो इंसान के लिए इम्तिहान गाह है और इस दुनिया में किए गए सब आमाल (कर्म) का बदला ही आख़िरत में मिलना है और जो इंसान आख़िरत का ही इंकार कर दें और इसी दुनिया की ज़िंदगी को असल समझें तो उसपर इस्लाम की दावत का कोई असर नहीं होने वाला है। इसलिए ही अल्लाह ने ऐसे लोगों को उनके हाल पर छोड़ने का हुक्म दिया है जब तक कि उन लोगों को आख़िरत का यकीन नहीं हो जाए।
अल्लाह कुरआन में कहता है कि:
"इसलिये ऐ नबी (सल्ल०), जो शख़्स हमारे ज़िक्र से मुँह फेरता है, और दुनिया की ज़िन्दगी के सिवा जिसे कुछ मतलूब नहीं है, उसे उसके हाल पर छोड़ दो।"
[कुरआन 53:29]
यानी जो आख़िरत को नहीं मानता हो तो ऐसे शख्स के पीछे न पड़ो और उसे समझाने पर अपना वक़्त ज़ाए न करो। क्योंकि ऐसा शख़्स किसी ऐसी दावत को क़बूल करने के लिये तैयार न होगा जिसकी बुनियाद ख़ुदा-परस्ती पर हो, जो दुनिया के माद्दी फ़ायदों से बुलंदतर मक़ासिद और इक़्तिदार की तरफ़ बुलाती हो, और जिसमें असल मतलूब आख़िरत की हमेशा की फ़लाह व कामरानी को क़रार दिया जा रहा हो। इस क़िस्म के माद्दा परस्त और ख़ुदा से फिरे हुए इंसान पर मेहनत करने के बजाए तवज्जो उन लोगों की तरफ़ करो जो ख़ुदा का ज़िक्र सुनने के लिये तैयार हों और दुनिया परस्ती के मर्ज़ में मुब्तिला न हों।
"इन लोगों के इल्म की हद बस यही कुछ है, ये बात तेरा रब ही ज़्यादा जानता है कि उसके रास्ते से कौन भटक गया है और कौन सीधे रास्ते पर है।"
[कुरआन 53:30]
यानी ये लोग दुनिया और उसके फ़ायदों से आगे न कुछ जानते हैं न सोच सकते हैं, इसलिये इन पर मेहनत करना बे-नतीजा है।
"और ज़मीन और आसमानों की हर चीज़ का मालिक अल्लाह ही है।...... ताकि अल्लाह बुराई करनेवालों को उनके अमल का बदला दे और उन लोगों को अच्छी जज़ा से नवाज़े जिन्होंने नेक रवैया इख़्तियार किया है।"
[कुरआन 53:31]
दूसरे अलफ़ाज़ में, किसी आदमी के गुमराह या हिदायत के रास्ते पर होने का फ़ैसला न इस दुनिया में होना है न इसका फ़ैसला दुनिया के लोगों की राय पर छोड़ा गया है। इसका फ़ैसला तो अल्लाह के हाथ में है, वही ज़मीन व आसमान का मालिक है, और उसी को ये मालूम है कि दुनिया के लोग जिन मुख़्तलिफ़ राहों पर चल रहे हैं, उनमें से हिदायत की राह कौन सी है और गुमराही की राह कौन सी। इसलिये तुम इस बात की कोई परवाह न करो कि ये मुशरिक और ये काफ़िर तुमको बहका और भटका हुआ आदमी क़रार दे रहे हैं और अपनी जाहिलीयत ही को हक़ और हिदायत समझ रहे हैं। ये अगर अपने इसी झूटे ज़ौम में मगन रहना चाहते हैं तो उन्हें मगन रहने दो। इनसे बहस व तकरार में वक़्त ज़ाए करने और सर खपाने की कोई ज़रूरत नहीं।
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