दुनिया मे बेशुमार सभ्यताऐ आयी और खत्म हो गयी लेकिन इस्लामी सभ्यता का इतिहास उस समय से शुरू होता है जब से इन्सान ने पृथ्वी पर कदम रखा
इस्लामी सभ्यता को स्थापित रखने के लिए बेशुमार पैगंबर दुनिया मे आये जिनकी कढ़िया हमेशा इस्लामी सभ्यता से जुड़ी रही शायद ही ऐसी कोई कौम गुजरी हो जो इस्लामी सभ्यता से खाली रही हो
इस्लामी सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि वो एकेश्वरवाद (तौहीद) के अकीदे पर कायम हुई है ये एक मात्र सभ्यता है जो एक अल्लाह की आज्ञा की मानवता को दावत देती है और उसी की इबादत पर जोर देती है इस आस्था का इस्लामी सभ्यता पर इतना जबरदस्त प्रभाव पड़ा कि बाकि सभी सभ्यताओ से इस्लामी सभ्यता श्रेष्ठ हो गयी।
इस्लामी सभ्यता की विशेषता ये है कि ये हक व इंसाफ और न्याय के आधार पर ऐसी सोसाइटी की स्थापना करती है जहा जात पात ऊंच नीच छूत छात और नस्ल के भेदभाव को खत्म करके सम्पूर्ण मानव-जाति के हितो के लिए सोचा गया है इस्लाम न्याय का आदेश देता है और तमाम इन्सानो के साथ सद्दव्यवहार का आदेश देता है इसमे मुस्लिम व गैर मुस्लिम का कोई अंतर नही बल्कि सभी इन्सानो के लिए दयाभाव है प्यारे नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया ➖ दया करने वालो पर वह दयावान (अल्लाह) दया करेगा। धरती वालो पर दया करो , आसमान वाला तुम पर दया करेगा (तिरमिज़ी, अबुदाउद)
हर इन्सान आदम की संतान होने के कारण हमारा भाई है और भाई के साथ हमारा जो व्यवहार होना चाहिए वही व्यवहार हमारा इन्सानो के साथ होना चाहिए हमे सब पर दया करनी चाहिए कठिनाई के समय सबकी सहायता करनी चाहिए
इन्ही शिक्षाओ के कारण गैर मुस्लिम विद्वानो ने भी बाकि सभ्यताओ से इस्लामी सभ्यता को श्रेष्ठ कहा है ,
भारत मे नये इस्लाम की शुरूआत
"उन्होने अपने उलेमा और दर्वेशो को अल्लाह के सिवा अपना रब बना लिया है" (सूरह तौबा कुरआन :31)
अक्सर मुसलमानो ने रहबानियत का रास्ता अख्तियार कर लिया है दीन मे इबादत के नाम पर नई चीजे ईजाद कर ली है ज्यादातर फिरको मे रहबानियत का तसव्वुर पाया जाना लगा है मुसलमानो का बड़ा तबका आसमानी शरीयत से कट चुका है जिनके नजदीक अल्लाह की किताब से अफजल अपने-अपने फिरको की किताबे अफजल हो गई है जिस शिर्क को अल्लाह ने न माफ करने वाला गुनाह करार दिया वो मुसलमानो मे आम हो चुका है बर्रे सगीर मे इस्लाम अजनबी हो चुका है जिसके अव्वलीन जिम्मेदार खुद उलेमा ए सू है
पाकिस्तान के बाद भारत मे ऐसे लोग पाये जाने लगे जो खत्मे नबूवत का इंकार करते है और नया फितना हदीस का इंकारी बडे पैमाने पर मुसलमानो को अपनी चपेट मे ले रहा है मस्जिदो मे मौजू (मनगढ़ंत) हदीसो के खुलेआम दर्स हो रहे
जबकि मुसलमानो को अल्लाह ने जिम्मेदारी दी है वो एक-दूसरे को हक की नसीहत करते रहे (सूरह अस्र)
नबी-ए-करीम सल्ल○ ने भी बुराईयो के खिलाफ संघर्ष करने की काफी तलकीन की है फिर चाहे बुराई ताकत से रोको या फिर जबान से (मुस्लिम)
हकीकी मुस्लिम वो नही है जो सिर्फ अपनी इस्लाह करके मुतमईन हो जाए और खुद मे ही मगन रहे समाज मे बुराइयाँ और गुमराही को फैलता देखकर खामोश बैठा रहे बल्कि हकीकी मुस्लिम वो है जिसे अपनी इस्लाह के साथ-साथ अपने आस-पास रहने वाले इंसानो की इस्लाह की भी फिक्र हो कुरआन की सूरह अस्र मे अल्लाह इंसानो को यही तल्कीन करता है कि दूसरो को अच्छी बातो की तल्कीन करते रहे और जो लोग समाज व इंसानियत को नुकसान पहुंचा रहे है उनके रोकथाम के लिए संघर्ष करते रहे
उम्मत ए मुस्लिमा को ये अहसास होना चाहिए कि अल्लाह ने उसे बेहतरीन उम्मत का खिताब दिया है
" तुम बेहतरीन उम्मत हो जो लोगो के लिए बरपा किए गये हो तुम भलाई का हुक्म देते हो और बुराईयो से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो " (कुरआन सूरह आले ईमरान :110)
दुनिया के बदलते हुए हालात को देखकर उलेमा को चाहिए फिकही मसाईल पर गिरोह बंदी छोड़कर इस उम्मत के इत्तेहाद को कायम रखे और फिकही मसाईल पर इख्तिलाफ की वजह आम लोगो पर वाजेह करे मसलकी और फिक्री इख्तिलाफ के बावजूद एक-दूसरे का ताअऊन करे और इत्तेहाद कायम रखे
मसलकी इख्तिलाफ के बावजूद मुसलमानो का बाहमी (आपसी) ताल्लुक और एक-दूसरे की मदद करना इस उम्मत के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद साबित होगा दुनियाभर के यहूदी,ईसाई, और हिन्द के मुशरिकीन आज एकजुट होकर इस्लाम व मुसलमानो की जड़े उखाड़ने मे व्यस्त है ऐसे मे मुसलमानो का आपसी इख्तिलाफ बहुत नुकसानदेह साबित हो रहा है मुसलमानो को चाहिए मसलकी इख्तिलाफ मे उलझकर एक-दूसरे की टांगे ना खींचे और न दूसरी जमातो व संगठनो के खिलाफ भड़काऊ बयानबाजी करे
आपसी इख्तिलाफ को दरकिनार करके एक-दूसरे का ताअऊन करे
मुसलमान एक-दूसरे के खिलाफ बोलकर इस्लाम विरोधी लोगो के हाथो मे अपना गिरेबान न दे वरना ये लोग एक के बाद एक सभी मुस्लिम संगठनो को बैन करेंगे और मुसलमान खामोश तमाशबीन बनकर खड़ा देखता रह जायेगा
कुरआन हर इंसान के लिए रहनुमा किताब है अक्सर लोगो को नही पता कि आसमानी शरीयत इंसानो की किस जरूरत को पूरा करती है
दरहकीकत कुरआन गौरो फिक्र का दाई है अक्सर मज़हबो मे गौरो फिक्र का कोई दखल नही है लेकिन कुरआन मजीद ने बार-बार इंसान को गौरो फिक्र की दावत दी है ताकि इंसान अक्ल व शऊर से सही-गलत हक व बातिल मे फर्क कर सके
कुरआन हक व बातिल और सही-गलत के दरमियान कसौटी है किसी भी चीज को इस पर परख के फैसला किया जा सकता है कि इसमे कितना हक है और किस कदर बातिल की मिलावट है
कुरआन मजीद से हिदायत न पाने वालो की लिस्ट मे जहा गैर-मुस्लिम लोग मौजूद है वही एक बड़ी तादाद ऐसे मुसलमानो की भी है जो कुरआन की शिक्षाओ से ना वाकिफ है जो दरहकीकत आसमानी हिदायत से महरूम है जबकि नबी-ए-करीम सल्ल○ की मुबारक जिन्दगी चलता-फिरता कुरआन मजीद थी {आप सल्ल○} ने अपने इर्शादात से कुरआन मजीद की तशरीह फरमाई और अमल करके एक माॅडल भी छोड़ा
जबकि मुसलमानो की बड़ी तादाद जानबूझकर कुरआन से दूर है जो कुरआन को समझना चाहते ही नही ऐसे लोगो के लिए अल्लाह साफ कहता है
" क्या ये लोग कुरआन पर गौर नही करते या (इनके) दिलो पर ताले लगे हुए है { कुरआन :47: 24}
कुरआन मे बेशुमार आयतो से वाजेह होता है कि कुरआन पर गौर करना और उससे हिदायत हासिल करना न सिर्फ मुसलमानो के लिए लाजिम है बल्कि गैर-मुस्लिमो के लिए भी जरूरी है वरना हजरत मुहम्मद सल्ल खुद कहेंगे 👇
" (कयामत के दिन) पैगंबर (हजरत मुहम्मद सल्ल○) कहेंगे कि ऐ मेरे परवरदिगार! मेरी कौम ने इस कुरआन को छोड़ रखा था {कुरआन :25:30}
मौलाना अशरफ अली थानवी इसका मतलब ब्यान करते हुए फरमाते है 👉 इसमे (कुरआन मे) गौर न करना और सोच समझकर न पढना भी छोड़ देना है इसके हुक्मो पर अमल न करना और इसकी मना की हुई बातो से न बचना भी छोड़ देना है
सच तो ये कि मुसलमान कुरआन पर गौरो फिक्र न करके अल्लाह की इस हिदायत से महरूम हो चुके है जबकि नबी-ए-करीम सल्ल ने हज के मौके पर इस उम्मत को साफ साफ लफ्ज़ो मे बताया था कि 👉 मैने तुम्हारे बीच एक ऐसी चीज छोड़ दी है जिसको अगर तुम मजबूती से थामे रहोगे तो उसके बाद कभी गुमराह न होगे और वह चीज खुदा की किताब (कुरआन) है ( मुस्लिम )
कुरआन हदीस मे साफ तौर से बता दिया है कि कुरआन के मआनी और मतलब को समझना उन पर गौर करना और उसकी हिदायत पर अमल करना कामयाबी और निजात के लिए लाजिम है
और आखिर मे यही कहूँगा मुसलमान भाईयो आप कुरआन जैसी नेमत की कद्र करे वरना नाकद्री की सूरत मे मरने के बाद पूछ-गूच्छ भी उतनी ही सख्त होगी कुरआन की नाकद्री के जुर्म मे सख्त सजा भी मिलेंगी
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