पहली मुलाक़ात
जब निकाह मुकम्मल होता है तो अल्लाह की रहमत नाजिल होती है और दो अजनबी एक नई बंधन में बंध जाते हैं फिर एक नई जिंदगी की शुरुआत होती है।
जब दूल्हा दुल्हन कमरे में दाख़िल हो तो बेहतर है एक दूसरे से प्यार मोहब्ब्त से पेश आए एक दूसरे के जज़्बात को समझने की कोशिश करें इस्लाम चाहता है कि इंसान इस दुनियां की हर नेमत से लुत्फ उठाए , जायज़ और हलाल चीजों का इस्तमाल करे, तो जिस किसी मुसलमान की जिंदगी में ये खुबसूरत लम्हा आए तो उसे चाहिए की वो अल्लाह का शुक्र अदा करें अच्छा होगा की वजू करें और दो रकात शुक्राने की नमाज़ अदा करे।
हज़रत अब्दुल्लाह इब्न मसऊद (रजि.) फ़रमाते हैं : "एक शख़्स ने उनसे बयान किया कि मैंने एक जवान लड़की से निकाह कर लिया है और मुझे अंदेशा है कि वह मुझे पसंद नही करेगी।"
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रजि) ने फरमायाः "मुहब्बत व उलफत अल्लाह की तरफ से होती है । और नफरत शैतान की तरफ से जब तुम अपनी बीवी के पास जाओ सब से पहले उससे कहो कि वह तुम्हारे पीछे दो रकअत नमाज़ पढ़े, इंशाअल्लाह तुम उसे मुहब्बत करने वाली और वफा करने वाली पाओगे।" [मुसन्नफ इब्ने अबी शैबा जिल्द 03 सफा 402]
दो रकात शुक्राने की नमाज़:
ध्यान रहे ये नफिल नमाज़ है मुस्तहब है ज़रूरी नहीं है नमाज़ का तरीक़ा ये है कि दूल्हा दुल्हन दोनों एक सफ़ में खड़े नहीं होगें बल्कि दूल्हा आगे होगा और दुल्हन पिछे फिर दोनों नियत करेंगे।
नमाज की नीयतः दो रकअत नमाज़ नफ़्ल शुक्राने अल्लाह तआला की रज़ा के लिए दिल में इरादा करें "अल्लाहु अकबर"
Note : नीयत दिल के इरादे का नाम है तो अल्फाज़ की अदायगी ज़रूरी नहीं।
फिर जिस तरीक़े से दूसरी नमाज़ अदा की जाती है वैसे ही नमाज़ मुकम्मल करेंगे। नमाज़ के बाद अल्लाह रब्बुल इज़्जत की बारगाह में हाथ उठा कर मियां बीबी दोनों अपनी ज़िंदगी को पुरसुकून बनाने, दुनियां और अखिरत दोनों में भलाई और अल्लाह का शुक्र अदा करें कि उसने इतनी खुबसूरत ज़िंदगी अता की और नबी करीम صلى الله عليه وسلمकी सुन्नत पर अमल करने की तौफीक अता फरमाई!
नबी करीमصلى الله عليه وسلم इरशाद फरमाते हैं : “जब कोई शख्स निकाह करे और पहली रात को अपनी दुल्हन के पास जाए तो नर्मी के साथ उसकी पेशानी के थोड़े बाल अपने सीधे हाथ में लेकर ये दुआ पढ़े।"
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ خَيْرَهَا وَخَيْرَ مَا جَبَلْتَهَا عَلَيْهِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّهَا وَمِنْ شَرِّ مَا جَبَلْتَهَا عَلَيْهِ،
[अबु दाऊद 2160]
इस दुआ की खूबी और फजीलत बयान की गई कि अल्लाह त'आला इस दुआ के ज़रिए शौहर और बीवी के बीच शफकत और बरकत नाजिल करेगा ताकि शौहर और बीवी में मुहब्बत और उलफत कायम हो,अगर कोई बुराई हो तो अल्लाह उसे दूर कर देगा बीवी अपने शौहर की वफादार और फ़रमाँबरदार हो जायेगी।
एक अहम बात ये भी है कि अल्लाह रब्बुल इज़्जत इस दुआ के ज़रिए इंसान को ये पैग़ाम देना चाहते हैं कि वो कभी भी यादें इलाही से गाफिल न हो और हर हाल में दुआ ए खैर किया करे। इसके बाद अपनी खुशहाल ज़िंदगी की शुरुआत करें।
अल्लाह के रसूल (صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया : जब कोई शख़्स अपनी बीवी के पास आता है यानी हमबिस्तरी का इरादा करता है और ये दुआ पढ़े :
بسم الله اللهم جنبنا الشيطان وجنب الشيطان ما رزقتنا
"अल्लाह के नाम से शुरु करता हूं, ऐ अल्लाह! हमसे शैतान को दूर रख और जो कुछ तू हमें (औलाद) दे उसे भी शैतान से दूर रख!"
फिर अगर उसके यहां औलाद पैदा हो तो शैतान उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता। [बुख़ारी :6/141, हदीस:141, मुस्लिम :2/1028, हदीस:1434]
दुआ पढ़ने का मकसद:
जब इंसान दुआ नहीं पढ़ता तो शैतान शामिल होता है और अपनी चालें चलता है।
नबी करीमصلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया: जब बंदा एक बार जिमा कर ले और दोबारा जिमा करना चाहता है तो उसे चाहिए कि वजू कर ले क्यों कि एक बार जिमा करने के बाद दोनो जुनूबी(impure)हो जाते हैं और उन दोनों पर गुसल वाजिब हो जाता है। एक और हदीस में नबी करीमصلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया वजू करने से तरोताज़गी और ताक़त पैदा होती है ये एक अच्छी बात है क्यों कि वजू भी एक इबादत है और ये अल्लाह को राज़ी करने के लिए किया जाता है।
अम्मी आयशा फरमाती हैं कि, "मै और नबी صلى الله عليه وسلم हालत ए जनाबत में एक ही बरतन से गुसल किया करते थे।" [अबू दाऊद 220, मिश्कात 454, इब्न ए माजाह 587, बुखारी 263]
अल्लाह तआला कुरान में फरमाता है:
"तुम्हारी औरतें तुम्हारी खेतियाँ हैं। तुम्हें अधिकार है, जिस तरह चाहो अपनी खेती में जाओ मगर अपने मुस्तक़बिल की फ़िक्र करो और अल्लाह की नाराज़गी से बचो, ख़ूब जान लो कि तुम्हें एक दिन उससे मिलना है। और ऐ नबी ! जो तुम्हारी हिदायतों को मान लें उन्हें कामयाबी और ख़ुशक़िसमती की ख़ुशख़बरी सुना दो।" [क़ुरआन 2 :223]
वजाहत:
यहां इस आयत में बीवी को खेती कहा गया है जिस पर अक्सर ना समझ और कम अक्ल लोग सवाल करते हैं कि इस्लाम में औरत को खेती कहा कहा गया है मतलब औरत को कोई एहमियत नहीं है ।हम इस आयत की एहमियत को वाजेह करेगें साथ ही इसके नाजिल होने के हवाले से चंद अहादीस भी बयान करेंगे।
तुम्हारी औरतें तुम्हारी खेतियाँ:
इसकी तफसीर में जनाब मौदूदी लिखते हैं:
"फितरन अल्लाह ने औरतों को मर्दों के लिए सैरगाह नहीं बनाया बल्कि इन दोनों के बीच खेत और किसान का सा रिश्ता है। खेत में किसान सिर्फ़ तफ़री करने नहीं जाता बल्कि इस लिय जाता हैं कि इससे पैदावार हासिल करे।"
खेत और किसान के रिश्ते से तो आप में से बहुत लोग वाकिफ होंगें किसान अपने खेत से बहुत मुहब्बत करता है उसकी देख भाल में कोई कसर नहीं छोड़ता मैं खुद एक किसान फैमिली से हूं मैंने किसान और खेत के बीच के संबंध को करीब से देखा और जाना है दिन रात जी तोड़ मेहनत समय पर जुताई, बुआई में आला दर्जे के बीज का इस्तेमाल फिर निराई गुड़ाई, खाद और फिर सर्दी गर्मी के थपेड़ों को सहते हुए रात भर जाग कर सिंचाई करना कितनी फ़िक्र होती हैं किसान को अपने खेत की फिर जब खेत में फ़सल उग आती है तो अपने लहलहाते खेत को देख कर प्रफुल्लित हो उठता है दिल को सुकुन हासिल होता है ठीक वही हाल मर्द का अपनी बीवी के पास जानें से होता है उसकी केयर उसकी हिफाज़त करना एक मर्द का फ़र्ज़ बनता है।
औरत की भी उसी तरह देख भाल करनी चाहिए जैसे खेत की जाती है अगर खेत को यूंही छोड़ दिया जाय तो क्या होगा खेत बंजर हो जायेगा फिर लोग जैसे चाहेंगे उसे इस्तमाल करेगें ठीक वैसे ही औरत भी है जब सही देख भाल न मिले तो बिल्कुल खेत की तरह बंजर हो जाती है फिर लोगों को पता हो कि इसका कोई रखवाला नहीं तो लोग बुरी नज़रें जमाए रहते हैं।
उपर बयान की गई आयत के नाजिल होने की वजह:
हज़रत जाबिर रजी ०बयान करते हैं कि, "यहुदी कहा करते थे कि अगर आदमी अपनी बीवी से इसके पीछे से फर्ज़ (कुबुल) मुबाशरत करे कि जब वो पेट के बल लेटी हुई हो, तो इससे औलाद बैंगा पैदा होती है।"
तो अल्लाह ने ये आयत नाजिल फरमाई:
तुम्हारी औरतें तुम्हारी खेतियाँ हैं। तुम्हें अधिकार है, जिस तरह चाहो अपनी खेती में जाओ।
[सुनन अबू दाऊद 2163]
जिस तरह अपने खेतियों में जाओ: अल्लाह तआला ने मर्दों को जायज़ तरीके से अपनी बीवी से मिलने की इजाज़त दी है जिस तरह से जाओ का मतलब ये नहीं की अपनी मनमानियां करो शरीयत की हद पार करने की इजाज़त इस्लाम कतई नहीं देता, मर्द को औरत के जज़्बात का ख्याल रखना चाहिए, ये न हो कि दरिंदगी पर उतर आए।
बीवी से हमबिस्तर होते वक्त पोजीसन कोई भी हो मगर जायज़ जगह से ही सेक्स की इजाज़त दी गई है यानि औरत के बच्चा पैदा होने की जगह।
मुस्तक़बिल की फ़िक्र:
मुस्तकबिल का फ़िक्र यानि आने वाली ज़िंदगी की भी और दीन और दुनियां दोनों खुबसूरत बनाने की जिद्दोजेहद करनी है सिर्फ़ ये नहीं की दुनियां में ही लगे रहें और मजे उड़ाते रहे बल्कि आखिरत की भी तैयारी करनी है अल्लाह की इबादत से गाफिल नहीं होना चाहिए। और दुनियां में आने वाली नस्ल का भी इंतजाम करना है और ये बीवी से मिल कर ही हासिल हो सकती है।
अल्लाह की नाराज़गी से बचो:
यानि अल्लाह चाहता है इंसान की जिंदगी पुसुकून हो अब ज़रा सोचें कि अगर किसी मर्द को ये पता हो की मुझे अपने बीवी के मामले में अल्लाह को जवाब देना है, फिर कौन मर्द होगा जो अपनी बीवी के साथ ज्यादती करेगा।
इंसान को अपने बीवी के मामले में अल्लाह से डरते रहना चाहिए वरना अल्लाह नाराज़ होगा तो क्या कोई शख्स ऐसा करेगा की अपनी बीवी को तकलीफ़ दे। हरगिज़ नहीं जो तकवा और परहेजगारी से काम लेते हैं वो हर रिश्ते में अदल व इंसाफ़ कायम करते हैं।
मोमिनों के लिए खुशखबरी दी गई है अगर वो हक़ अदा करे अल्लाह के कानून को बरक़रार रखे तो उसे दुनियां और आखिरत में भी खुशखबरी की बशारत दी गई है। शादी जिम्मेदारी निभाने का नाम है और बीवी भी इस तरह रहे की शौहर का हक़ अदा हो उसे खुश रखे।
औरत को हुक्म है कि अपने शौहर को खुश रखे
नबी करीम صلى الله عليه وسلمने फरमाया:
नबी करीम صلى الله عليه وسلم ने फ़रमाया:
"कयामत के दिन अल्लाह के पास सबसे बदतरीन लोग वो हैं जो आदमी अपनी बीवी से जिमा करे और फिर तमाम लोगों में इसका इज़हार करे। और यही हुक्म औरत के लिए भी है।" [मिशकात शरीफ़: 3190]
इसलिए ऐसे बदतरीन ऐब से बचना चाहिए बाज़ मर्द ऐसे होते हैं जो अपनी बीवी की बातें अपने दोस्तों में, अपनी भाभियों से बताते हैं यह निहायत ही जाहिलाना और बेशर्मी की बात है।
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हम सब को दीन की सही समझ अता फरमाए।
आमीन
फ़िरोज़ा
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