Zakat (islam ka tisra rukun/pillar) ki ahmiyat

Zakat (islam ka tisra rukun/pillar) ki ahmiyat


ज़कात का अर्थ बढ़ने और पाक होने के हैं। शरीअत में ज़कात उस माल को कहते हैं जिसे इंसान अल्लाह के दिए हुए निर्धारित माल में से उसके हक़दारों के लिए एक मख़सूस रक़म निकालता है। उसे ज़कात इसीलिए कहा गया है कि इससे इंसान का माल पाक भी होता है और सवाब में बढ़ता भी है।


ज़कात का महत्व (अहमियत)

ज़कात की अहमियत का अनुमान ऐसे लगाया जा सकता है कि केवल क़ुरआन में यह शब्द "ज़कात" 83 बार इस्तेमाल हुआ है और ज़्यादातर नमाज़ के साथ साथ ज़कात का ज़िक्र हुआ है। ज़कात के स्थान पर "सदक़ा" लफ़्ज़ का भी जगह जगह प्रयोग किया गया है। और क़ई जगह "इंफ़ाक़" का लफ़्ज़ भी इस्तेमाल हुआ है।


ज़कात इस्लाम का तीसरा स्तंभ है, तौहीद और नमाज़ के बाद सबसे ज़्यादा अहमियत ज़कात को दी गई है। हदीस में है।

بُنِيَ الْإِسْلَامُ عَلَى خَمْسٍ شَهَادَةِ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّهِ وَإِقَامِ الصَّلَاةِ وَإِيتَاءِ الزَّكَاةِ وَالْحَجِّ وَصَوْمِ رَمَضَانَ

"इस्लाम की बुनियाद पांच चीज़ों पर है। तौहीद (अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के सच्चे रसूल हैं) नमाज़ क़ायम करना, ज़कात अदा करना, हज्ज करना और रमज़ान के रोज़े रखना।"

[सही बुख़ारी हदीस नंबर 08/ किताबुल ईमान इस्लाम की बुनियाद पांच चीज़ों पर है]


क़बीला नजद का एक व्यक्ति आया और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से इस्लाम के बारे में सवाल किया आपने जवाब दिया; इस्लाम दिन रात में पांच नमाज़ पढ़ना है। उसने कहा बस इसके इलावा तो कोई और नमाज़ नहीं। नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया नहीं, हां अगर नफ़्ल पढ़ना चाहो तो और बात है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फिर फ़रमाया रमज़ान के रोज़े रखना है उसने कहा कि बस और तो कोई रोज़ा नहीं। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया नहीं, मगर नफ़्ल रोज़े अगर रख सको। फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उससे ज़कात का ज़िक्र किया। उसने कहा बस और तो कोई सदक़ा नहीं, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, नहीं मगर यह कि तुम नफ़ली सदक़ा कर सको। वह व्यक्ति पीठ मोड़ कर चला और यूं कहता जा रहा था क़सम अल्लाह की, न मैं इसमें बढ़ाऊंगा न घटाऊंगा। नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया अगर यह सच्चा है तो अपनी मुराद को पहुंच गया।

(सही बुख़ारी हदीस नंबर 46/ किताबुल ईमान, ज़कात देना इस्लाम में दाख़िल है)


सूरह अल मुमिनून में मोमिन की 6 सिफ़ात बताई गई हैं उनमें तीसरी सिफ़त ज़कात की अदायगी है।

وَٱلَّذِينَ هُمۡ لِلزَّكَوٰةِ فَـٰعِلُونَ 

"ज़कात देना ईमान वालों की सिफ़त है अगर उनको दुनिया में हुकूमत मिल जाए तो वह नमाज़ क़ायम करते हैं और ज़कात की अदायगी करते हैं।"

ٱلَّذِينَ إِن مَّكَّنَّـٰهُمۡ فِى ٱلۡأَرۡضِ أَقَامُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَوُاْ ٱلزَّڪَوٰةَ وَأَمَرُواْ بِٱلۡمَعۡرُوفِ وَنَهَوۡاْ عَنِ ٱلۡمُنكَرِ‌ۗ وَلِلَّهِ عَـٰقِبَةُ ٱلۡأُمُورِ

(सूरह 22 अल हज्ज आयत 41)


"सब को छोड़ कर ख़ुलूस के साथ सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह की इबादत, नमाज़ क़ायम करना और ज़कात की अदायगी ही सही व दुरुस्त दीन है।"

وَمَآ أُمِرُوٓاْ إِلَّا لِيَعۡبُدُواْ ٱللَّهَ مُخۡلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ حُنَفَآءَ وَيُقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُؤۡتُواْ ٱلزَّكَوٰةَ‌ۚ وَذَٲلِكَ دِينُ ٱلۡقَيِّمَةِ

(सूरह 98 अल ब्ययेना आयत 05)


सूरह अल बक़रा की तीसरी आयत में ईमान, नमाज़ और अल्लाह के दिये हुए माल में से ख़र्च करने को हिदायत और कामयाबी की ज़मानत बताया गया है ।

ٱلَّذِينَ يُؤۡمِنُونَ بِٱلۡغَيۡبِ وَيُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَمِمَّا رَزَقۡنَـٰهُمۡ يُنفِقُونَ

(सूरह 02 अल बक़रा आयत 03)


अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया; मुझे हुक्म दिया गया है कि लोगों से उस वक़्त तक जंग करूं जब तक कि वह इस बात का इक़रार न कर लें कि अल्लाह के इलावा कोई माबूद नहीं और यह कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के सच्चे रसूल हैं और नमाज़ अदा करने लगें और ज़कात दें। जिस वक़्त वह यह करने लगेंगे वह मुझसे अपने जान-माल को महफ़ूज़ कर लेंगे सिवाए इस्लाम के हक़ के कि उनका हिसाब अल्लाह के ज़िम्में है।

عَنْ ابْنِ عُمَرَ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ أُمِرْتُ أَنْ أُقَاتِلَ النَّاسَ حَتَّى يَشْهَدُوا أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّهِ وَيُقِيمُوا الصَّلَاةَ وَيُؤْتُوا الزَّكَاةَ فَإِذَا فَعَلُوا ذَلِكَ عَصَمُوا مِنِّي دِمَاءَهُمْ وَأَمْوَالَهُمْ إِلَّا بِحَقِّ الْإِسْلَامِ وَحِسَابُهُمْ عَلَى اللَّهِ

(सही बुख़ारी हदीस नंबर 25 / किताबुल ईमान, अगर काफ़िर तौबा करे नमाज़ क़ायम करे और ज़कात अदा करे तो उन्हें उनके रास्ते पर छोड़ देने का बयान)


नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जब मुआज़ बिन जबल रज़ियल्लाहु अन्हु को यमन का हाकिम बनाकर भेजा तो फ़रमाया कि तुम उन्हें इस कलमा (لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ , وَأَنِّي رَسُولُ اللَّه) की गवाही की दावत देना कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और यह कि मैं (मुहम्मद) अल्लाह का रसूल हूं। अगर वह लोग यह बात मान लें तो फिर उन्हें बताना कि अल्लाह तआला ने उन पर रोज़ाना पांच नमाज़ें फ़र्ज़ की हैं। अगर वह लोग यह बात भी मान लें तो फिर उन्हें बताना कि अल्लाह तआला ने उनके माल पर कुछ सदक़ा (ज़कात) फर्ज़ किया है जो उनके मालदार लोगों से लिया लिया जाएगा और उनके मोहताजों में तक़सीम किया जाएगा।

 عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بَعَثَ مُعَاذًا رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ إِلَى الْيَمَنِ فَقَالَ ادْعُهُمْ إِلَى شَهَادَةِ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَأَنِّي رَسُولُ اللَّهِ فَإِنْ هُمْ أَطَاعُوا لِذَلِكَ فَأَعْلِمْهُمْ أَنَّ اللَّهَ قَدْ افْتَرَضَ عَلَيْهِمْ خَمْسَ صَلَوَاتٍ فِي كُلِّ يَوْمٍ وَلَيْلَةٍ فَإِنْ هُمْ أَطَاعُوا لِذَلِكَ فَأَعْلِمْهُمْ أَنَّ اللَّهَ افْتَرَضَ عَلَيْهِمْ صَدَقَةً فِي أَمْوَالِهِمْ تُؤْخَذُ مِنْ أَغْنِيَائِهِمْ وَتُرَدُّ عَلَى فُقَرَائِهِمْ

(सही बुख़ारी हदीस नंबर 1395/ किताबुज़ ज़कात, ज़कात के फ़र्ज़ होने का बयान)


इन शा अल्लाह अगली किस्त में "ज़कात का निसाब" के बारे में जानेंगे।


आपका दीनी भाई
आसिम अकरम अबु अदीम फ़लाही

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