Haram (makka) mein 20 rakat taraweeh kyun padhai jaati hai?

Haram (makka) mein 20 rakat taraweeh kyun padhai jaati hai?


हरमेन मक्का मदीना में 20 रक़ात तरावीह

कुछ लोग हरमेन मक्का मदीना का अमल पेश करते हैं कि वहां पर 20 रकात तरावीह होती हैं। 

मक्का मदीना में 20 रकात तरावीह होती है। 

हरमेन में 20 रकात तरावीह का जो तरीक़ा है वो ये की वहां 20 रकात तरावीह एक इमाम नहीं पढ़ाते बल्कि दो इमाम पढ़ाते हैं पहला इमाम 10 रकात पढ़ाके हट जाता है और और एक वित्र अलग पढ़ लेता है इससे वो इमाम 11 रकात ही अदा करता है। 

फिर दूसरा इमाम वहां आता है बाकी 10 रकात को पूरी कराकर एक रकात वित्र पढता है यानी दोनों इमाम 11, ही रकात अदा करते हैं और पीछे वाले मुक़्तदी की भी 20 रकात अदा हो जाती है इससे भाईचारा भी बना रहता है और इमाम सुन्नत भी अदा कर लेते हैं। 

लेकिन हाल ही में सऊदी सरकार ने इस अमल पर बैन लगा दिया है अब वहां 11 ही रकात होती है। 


ये तो हो गई हरमेन मक्का मदीना की 20 रकात तरावीह की अब जानते हैं हमारे मुल्क के लोगों की क्या राय रहती है वहां की तरावीह पर-

(01) अफसोस ही बात है कुछ लोग रमजान में मक्का मदीना के अइम्मा और वहां के अमल को इस कदर अहमियत देते हैं कि इसे मुसल्लम दलील के ज़ुमरे में शुमार करते हैं। लेकिन यह लोग रमजान के अलावा मक्का मदीना के आइम्मा के अमल को दलील जानना तो दूर की बात है इनको मुसलमान भी नहीं मानते बल्कि सरेआम फतवे देते हैं कि इनके पीछे सिरे से नमाज ही नाजायज है। 

आखिर ये केसा उसूल है कि रमजान में एक सुन्नत नमाज़ में इन अइम्मा का अमल दलील व हुज्जत क़रार पाए और ग़ैर रमज़ान में सुन्नत को दर किनार उनकी तरफ से फर्ज नमाज की भी कोई हैसियत ना रहे और इनके पीछे नमाज पढ़ना भी जायज नहीं। 


(02) तमाम एहनाफ़ (हंफी) अपनी क़ुतुब में दलाईल की सिर्फ 4 क़िस्में बयान करते हैं कुरान, हदीस, इजमा, कयास। 

अब सवाल यह है रमजान में एक पाँचवी दलील का इज़ाफा कैसे हो गया जाहिर है कि जब इनके यहां भी यह मुसल्लम है के हरमेन का अमल कोई दलील नहीं है तो ख्वाह म ख्वाह सिर्फ रमजान में इसे दलील की हैसियत से पेश करना कहाँ की इंसाफ़ी है?


(03) कुरान और हदीस में कहीं भी इस बात की जमानत नहीं दी गई है कि हरमेन में जो अमल भी होगा वो हुज्जत व दलील क़रार पायेगा बल्कि बल्कि एक वक्त था कि खुद खाना काबा में बुतो की पूजा होती थी लेकिन ये क़तन इस बात की दलील नहीं बन सकती के बुतो की पूजा भी जाएज़ है मज़ीद बाद में एक दौर गुज़रा है की हरम में 04 मुसल्लो की बिदअत जारी हुई थी, इसे भी हरम की वजह से सनद ना मिल सकी बल्कि एक वक्त आया कि इस बिदअत को जड़ से उखाड़ फेंका गया वल्हम्दुलिल्लाह


(04) हरमेन में शुरू में जो अमल था वो 11 रकात का ही था अल्लाह के नबी सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम ने 3 दिन तरावीह पढ़ाई उसमें 11 रकात ही पढ़ाई हजरत उमर के दौर में जब बा ज़ाब्ता मस्जिद में एक जमात से तरावीह अदा की गई तो में भी 11 रकात ही पढ़ी जाती थी लेकिन बाद में दूसरी अदाद (20 रकात ) का कोई ऐतिबार नहीं। 


(05) हरमेन में पूरे माह सिर्फ 20 रकात ही नहीं पढ़ी जाती बल्कि आखिरी अशरे में मज़ीद रकात का इज़ाफ़ा होता है जब के एहनाफ इसे दलील नहीं बनाते। 


(06) हरमेन में और भी बहुत से आमाल होते हैं लेकिन एहनाफ़ इन्हें दलील नहीं जानते बल्कि हरमेन का हवाला देतें हैं लेकिन हरमेन की तराविह में जो रकात के अलावा दूसरे औसाफ हैं इनके लिए ये हज़रात दलील नहीं बनाते

मसलन: हरमेन की तरावीह में रफा यदेन, बुलंद आवाज़ से आमीन का अमल सवाल ये है की अगर रकात हरमेन की तरावीह का हिस्सा है तो क्या ये औसफ हरमेन की तरावीह का हिस्सा नहीं है?


हरमेन में और भी बहुत से आमाल है जो एहनाफ़ के खिलाफ हैं लेकिन एहनाफ कभी भी अपने खिलाफ हरमेन की इन आमाल को दलील नहीं शुमार करते, ज़ैल (Given Below ) में होने वाले 20 आमाल पेश खिदमत है जिन्हे हँफी दुरुस्त नहीं समझते। 

सबसे पहले हम उन आमाल को गिनाते हैं जो हरमेन की तरावीह ही में अंजाम दिए जाते हैं:-

1. यहाँ रुकू से जाते और रुकू से सर उठाते वक़्त के बाद भी रफा यदेन होता है। 

2. यहां नमाज में आमीन बुलंद आवाज से कही जाती है। 

3. यहाँ क़ुनूत में रफा यदेन नहीं होता। 

4. यहाँ शबीना यानी एक रकात में ख़त्म क़ुरआन का अमल नहीं है। 

यह वह आमाल है जो खास हरमेन की तरावीह के हैं अब अगर हरमेन की तरावीह कि तादाद हुज्जत है तो हरमेन ही में होने वाले ये आमाल हुज्जत क्यू नहीं?

5. यहां जुबान से रोजे की नियत नहीं होती

6. यहां वक्त के हिसाब से सेहरी में देरी और इफ्तार में जल्दी की जाती है जैसा की हदीस है लेकिन हंफी इसकी मुख़ालीफत करते हैं। 

7. यहां नमाज अव्वल वक्त में अदा की जाती है लेकिन हम भी इसके खिलाफ करते हैं। 

8. यह नमाज़ फज्र से पहले भी एक अजान कहीं जाती है लेकिन हनफी का इस पर अमल नहीं। 

9. यहाँ अजान से पहले और बाद में बनाया हुआ दुरुद नहीं पढ़ा जाता। 

10. यहाँ तकबीर इकहरि कही जाती है। 

11. यहां नमाज ए फजर अंधेरे में अदा की जाती है जबकि हनफी उजाले में नमाज़ फज्र अदा करते हैं। 

12. यह औरतों को मस्जिद में आने की इजाजत है लेकिन हनफी अपनी औरतों को मस्जिद आने से रोकते हैं। 

13. यह असर की नमाज किसी चीज का साया उसके मिसल हो जाए तो अदा की जाती है। 

14. यहां नमाज की नियत जुबान से नहीं की जाती जबकि हनफी के यहां नियत जुबान से होती है। 

15. यह नमाज मगरिब से पहले 2 रकात सुन्नत पढ़ी जाती है जबकि हनफी के यहां यह बिदअत पाई जाती है। 

16. यहां फ़र्ज़ नमाज के बाद इस्तेमाई दुआ नहीं की जाती जबकि हनफी इस पर अमल करते हैं। 

17. यहां पर ईद के खुद पर से पहले कोई वाज़ व नसीहत नहीं की जाती जबकि हनफी इसके अप अपोजिट करते हैं। 

18. यह मस्जिद में नमाज ईदेंन में कुल 12 तकबीर कही जाती है लेकिन हनफी हजरात ईदेन में सिर्फ 6 तकबीर कहते है। 

19. यहां मस्जिद में नमाज जनाजा पढ़ी जाती है जबकि हनफी इसे ग़ैर दुरुस्त करार देते हैं। 

20. यहां जनाजे में सूरह फातिहा पढ़ी जाती है जबकि हनफी इसके मुनकर है


आपका दीनी भाई 
मुहम्मद

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