पारा (30) अम्मा
इस पारे में सैंतीस हिस्से है-
(2) सूरह (079) अन नाज़िआत
(3) सूरह (080) अबस
(4) सूरह (081) अत तकवीर
(5) सूरह (082) अल इनफ़ेतार
(6) सूरह (083) अल मुतफ्फ़ेफ़ीन
(7) सूरह (084) अल इनशेक़ाक़
(8) सूरह (085) अल बुरुज
(9) सूरह (086) अत तारिक़
(10) सूरह (087) अल आला
(11) सूरह (088) अल ग़ाशिया
(12) सूरह (089) अल फ़ज्र
(13) सूरह (090) अल बलद
(14) सूरह (091) अश शम्स
(15) सूरह (092) अल लैल
(16) सूरह (093) अज़ जुहा
(17) सूरह (094) अल इंशेराह
(18) सूरह (095) अत तीन
(19) सूरह (096) अल अलक़
(20) सूरह (097) अल क़द्र
(21) सूरह (098) अल बय्येना
(22) सूरह (099) अज़ ज़िलज़ाल
(23) सूरह (100) अल आदियात
(24) सूरह (101) अल क़ारेआ
(25) सूरह (102) अत तकासुर
(26) सूरह (103) अल अस्र
(27) सूरह (104) अल हुमज़ा
(28) सूरह (105) अल फ़ील
(29) सूरह (106) अल क़ुरैश
(30) सूरह (107) अल माऊन
(31) सूरह (108) अल कौसर
(32) सूरह (109) अल काफ़िरून
(33) सूरह (110) अन नसर
(34) सूरह (111) अल लहब
(35) सूरह (112) अल इख़लास
(36) सूरह (113) अल फ़लक़
(37) सूरह (114) अन नास
(1) सूरह (078) अन नबा
(i) क़यामत
क़यामत से सम्बंधित काफ़िरों के शक का खंडन किया गया और बताया गया है कि क़यामत का आना यक़ीनी है, क़यामत का नक़्शा खींचा गया है। सरकशों के लिए अज़ाब है जिसमें इज़ाफ़ा होता रहेगा। नेक लोगों के लिए पुरस्कार और सम्मान है। उस दिन फ़रिश्ते मैदान ह हशर में सफ़ बांधे खड़े होंगे। बेग़ैर इजाज़त कोई बोल नहीं सकेगा और कुफ़्फ़ार अपना अंजाम देख कर अफ़सोस करते हुए कहेंगे "काश कि मैं मिट्टी होता" तो मेरा हिसाब किताब न होता। (01 से 05, और 37 से 40)
(ii) अल्लाह के एहसानात
ज़मीन को फ़र्श, पहाड़ों को खूंटियों की तरह गाड़ना, लोगों को जोड़े जोड़े, नींद को सुकून, रात को लिबास, दिन को रोज़ी की तलाश, ऊपर सात मज़बूत आसमान, एक रौशन और चमकता सूरज, बादलों से मूसलाधार बारिश, बारिश के ज़रिए ग़ल्ला, सब्ज़ी और घने बाग़ उगाना, वगैरह (06 से 16)
(iii) बुरे लोगों का अंजाम
जहन्नम घात लगाए हुए है, वही जहन्नम जहां पीने के लिए न तो ठंडा पानी होगा और न कोई स्वाद, उसमें मुद्दतों पड़े रहेंगे, उबला हुआ पानी और ज़ख्मों की गंदगी उनके पीने लिए होगी। (21 से 25)
(iv) नेक लोगों को दी जाने वाली नेअमतें
◆ अंगूर और भिन्न भिन्न बाग़,
◆ नवयुवतियां समान आयु वाली
◆ भरे हुए जाम
◆ निराधार (बकवास) और असत्य बात न सुनेंगे। (31 से 35)
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(2) सूरह (079) अन नाज़िआत
(i) क़यामत
कुफ़्फ़ारे मक्का क़यामत को असंभव (impossible) समझते थे। इसलिये मुख़्तलिफ़ चीज़ों की क़सम खा कर यह यक़ीन दिलाया गया है कि क़यामत भी ज़रूर आ कर रहेगी और दूसरी जिंदगी भी होगी। यह अल्लाह तआला के लिए सिरे से कुछ मुश्किल काम ही नहीं है जिसके लिए बड़ी तैयारी की ज़रूरत हो, केवल एक झटका ही दुनिया के सिस्टम को छिन्न भिन्न कर देने के लिए पर्याप्त होगा। (01 से 14 और 34 से 46)
(ii) झुठलाने वालों का अंजाम
क़यामत के दिन कुफ़्फ़ार के दिल धड़क रहे होंगे, दहशत, ज़िल्लत और नदामत उनपर छा रही होगी, नज़रें झुकी हुई होंगी। फ़िरऔन का उदाहरण देकर यह बताया गया है कि वह भी क़यामत का मुनकिर था। उसका अंजाम याद रखो और जिस दिन यह क़यामत को देखेंगे तो उनको ऐसा मालूम होगा कि सिर्फ़ दिन का आख़िरी हिस्सा या एक पहर दुनिया में रहे। (15 से 26)
(iii) संसार की बनावट और मृत्यु पश्चात जीवन
इंसान की तख़लीक़ ज़्यादा मुश्किल है या आसमान की तख़लीक़, उसकी छत ऊंची उठाई, फिर बैलेंस बनाया, उसकी रात अंधेरी बनाई और दिन को चमकाया, ज़मीन को बिछाया, पहाड़ गाड़ दिए और इंसान और तमाम मख़लूक़ के लिए दाना, चारा, और पानी पैदा किया। (27 से 33)
(iv) ज़मीन का आकार (Shape)
विज्ञान कहता है कि ज़मीन चिपटी नहीं बल्कि गोल है क़ुरआन में यह सूचना पहले से ही मौजूद है
وَٱلۡأَرۡضَ بَعۡدَ ذَ ٰلِكَ دَحَىٰهَاۤ
दुहया دحية शुतुरमुर्ग़ के अंडे को कहते हैं यानी अल्लाह ने ज़मीन को ऐसे फैलाया है कि वह न तो चिपटी है और न पूरी तरह गोल है बल्कि उसका आकार शुतुरमुर्ग़ के अंडे की तरह गोल है।
(30)
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(3) सूरह (080) अबस
(i) अब्दुल्लाह बिन उम्मे मकतूम का वाक़िआ
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक दिन क़ुरैश के सरदारों को दावत देने में मसरूफ़ थे कि एक अंधे सहाबी अब्दुल्लाह बिन मकतूम रज़ियल्लाहु अन्हु आ गए और उन्होंने आप की तवज्जुह अपनी तरफ़ फेरनी चाही जिसे आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नापसंद फ़रमाया, इसी मौक़ा पर सूरह अबस नाज़िल हुई जिसमें उन अंधे सहाबी की दिलजूई की गई और नबी से तवज्जुह देने के लिए कहा गया। (01 से 09 )
(ii) क़ुरआन एक नसीहत है
क़ुरआन नसीहत है,जिस का जी चाहे क़ुबूल करे और जो चाहे इंकार करे। (11, 12, 17)
(iii) जीवन के विभिन्न चरण
नुत्फ़ा से जन्म, जीने की राह आसान की, तक़दीर, मौत, क़ब्र, फिर जब चाहेगा रब दोबारा उठा खड़ा करेगा। हक़ तो यह है कि हक़ अदा न हुआ। बारिश बरसाई, ज़मीन को फाड़ा, ग़ल्ले, अंगूर, तरकारी, ज़ैतून, खुजूर, घने बाग़, अनेक प्रकार के फल और चारा उगाए। (19 से 32)
(iv) कोई किसी के काम नहीं आएगा
भाई भाई से, बेटा मां बाप से, शौहर बीवी से और माता पिता अपनी औलाद से भागेगें, सब को तो बस अपनी ही पड़ी होगी कि किसी तरह बच जाएं। ईमान वालों के चेहरे उस दिन रौशन और मुस्कुराते हुए होंगे जबकि कुफ़्र करने वालों के चेहरे काले पड़ रहे होंगे। (33 से 42)
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(4) सूरह (081) अत तकवीर
(i) क़यामत कब आएगी?
जब सूरज लपेट दिया जाएगा, सितारों से रौशनी ख़त्म हो जाएगी, पहाड़ चलाए जाएंगे, दस माह की गाभिन ऊंटनियाँ अपने हाल पर छोड़ दी जाएंगी, जंगली जानवर समेट कर इकट्ठे कर दिए जाएंगे, और समुद्र भड़का दिए जाएंगे। (1 से 6 )
(ii) आख़िरत
जब जान जिस्म से जोड़ दी जाएगी, ज़िंदा दफ़न की हुई लड़कियों से पूछा जाएगा कि तुझे किस गुनाह में मारा गया, कर्मपत्र खोले जाएंगे, आसमान का पर्दा हटा दिया जाएगा, जहन्नम भड़काई जाएगी, जन्नत को क़रीब लाया जाएगा और प्रत्येक व्यक्ति जान लेगा कि वह क्या कुछ लाया है। (7 से 14)
(iii) रिसालत की गवाही
चार क़समें खा कर क़ुरआन और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि के रसूल होने की गवाही दी गई है कि क़ुरआन लोगों के लिए नसीहत है, यह अल्लाह का कलाम है शैतान मरदूद का नहीं और आप अल्लाह के रसूल हैं पैगाम लाने वाले (जिब्रील) को आप ने अपनी आंखों से देखा है। (15 से 29)
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(5) सूरह (082) अल इनफ़ेतार
(i) क़यामत में कायेनात की हालत
आसमान फट जाएगा, सितारे बिखर जाएंगे, समुंदर फाड़ दिए जाएंगे। (1 से 3)
(ii) आख़िरत के दिन
क़ब्रें खोल दी जाएंगी, हर इंसान को मालूम हो जायेगा कि उसने आगे क्या भेजा था और पीछे क्या छोड़ा है। उस दिन फ़ैसला अल्लाह के हाथ में होगा और बुरे लोगों से पूछा जाएगा कि तुम्हें किस चीज़ ने धोके में डाले रखा। उस दिन नेक लोग नेअमत वाली जन्नत में होंगे और नाफ़रमान लोगो का ठिकाना जहन्नम होगा। (3 से 5, 19)
(iii) रब कौन है?
जिसने पैदा किया, सिर से पांव तक दुरुस्त किया, अंगों को संतुलित किया, जिस सूरत में चाहा उसको जोड़ दिया। (6 से 8)
(iv) किरामन कातेबीन
हर इंसान के साथ दो प्रिय फ़रिश्ते मुक़र्रर हैं जो उसके हर अमल को महफ़ूज़ कर लेते हैं। (13 से 16)
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(6) सूरह (083) अल मुतफ्फ़ेफ़ीन
(i) तबाही व बर्बादी है
जो लोगों से तो पूरा पूरा लेते हैं लेकिन जब ख़ुद किसी को वज़न करके या नाप कर देते हैं तो डंडी मार देते हैं, वह हक़ीक़त में इंसानों के हुक़ूक़ ग़सब करते हैं। (1 से 4)
तबाही व बर्बादी उनके लिए भी है जो आख़िरत के दिन को झुठलाते हैं, हद से गुज़रे हुए और बद अमल लोग हैं, जब आयात सुनाई जाती हैं तो पिछलों की कहानी कह कर रदद् कर देते हैं। (10 से 16)
(ii) इल्लीईन और सिज्जीईन
वह किताब जिसमें नेक लोगों के कारगुज़ारियां लिखी हुई हैं इल्लीईन कहलाती है और वह किताब जिसमें बुरे लोगों के कारगुज़ारियां लिखी हुई हैं सिज्जीईन कहलाती है। (7 से 9 और 18 से 20)
(iii) नेक लोगों का सम्मान
जन्नत में गाऊ तकिये लगाए नज़ारे कर रहे होंगे, उनके चेहरों से ख़ुशी ज़ाहिर हो रही होगी, उन्हें मुश्क की मुहर लगा हुआ सील बंद शर्बत पिलाया जाएगा जिसमें तसनीम मिली हुई होगी (तसनीम मुक़र्र्ब लोगों के लिए एक ख़ास चश्मा है) दुनिया में जो उनका मज़ाक़ उड़ाते और फ़ब्ती कसते थे उनपर वह नेक लोग हंस रहे होंगे। (22 से 36
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(7) सूरह (084) अल इनशेक़ाक़
(i) क़यामत की हौलनाकी
आसमान फट जाएगा, ज़मीन फैलाई जायेगी वह अपना बोझ निकाल कर बाहर फेंक देगी, यह सब रब के आदेश से होगा। (1 से 5)
(ii) नेक और बुरे लोगों का अंजाम
जिनके दाहिने हाथ में आमाल नामा दिया जाएगा उनका हिसाब आसान होगा और वह अपने घर वालों में बहुत ख़ुश होंगे। जिनके पीठ के पीछे से आमाल नामा दिया जाएगा वह मौत को पुकारेंगे, दुनिया में उन्होंने बड़े मज़े किये थे अब जहन्नम में जाएंगे। (7 से 15)
(iii) अल्लाह के यहां सब महफ़ूज़ है
इंसान अपने पालनहार की ओर खिंचता चला जा रहा है, एक हालत से दूसरी हालत में तब्दीली होती है फिर भी यह ईमान नहीं लाते और जब क़ुरआन की तिलावत हो तो सज्दा नहीं करते हालांकि इंसान के तमाम काम महफ़ूज़ (record) किये जा रहे हैं। (06, 16 से 24)
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(8) सूरह (085) अल बुरुज
(i) असहाबुल उख़दूद (खाई वाले)
नजरान में एक लड़का एक जादुगर के पास जादू सीखने जाया करता था। एक दिन उसकी मुलाक़ात एक राहिब से हो गई धीरे धीरे वह उसका शिष्य बन गया और जादू सीखना छोड़ दिया। राहिब के साथ रहने और अल्लाह से लगाव रखने की वजह से वह साहिबे करामत हो गया। राजा के वज़ीर की आंख उसकी दुआ से अच्छी हो गई, राजा को पता चला कि यह लोग अल्लाह पर ईमान रखते है तो उसने राहिब को फिर वज़ीर को आरे से दो टुकड़े करा दिए। फिर उस लड़के को भी मार डालने के मुख़्तलिफ़ हथकंडे अपनाए लेकिन लड़का हर बार महफ़ूज़ रहा। आख़िर लड़के ने ख़ुद राजा से कहा, "अगर तमाम लोगों को एक् मैदान में जमा करके मुझे एक लकड़ी पर सूली दे, मेरे तरकश से एक तीर लेकर कमान के अंदर रख, फिर यह कहकर तीर मार कि अल्लाह के नाम से मारता हूँ जो इस लड़के का मालिक है, तो मुझे क़त्ल कर लोगे" राजा ने ऐसा ही किया। वह तीर लड़के कनपटी पर लगा और उसने अपना हाथ तीर लगने की जगह पर रखा और शहीद हो गया। यह हाल देखकर लोग मुसलमान हो गए और कहा कि हमें तो उस लड़के के मालिक पर पूरा विश्वास है। अब राजा ने उन्हें अपने धर्म से फिरने को कहा। सभी ने इंकार कर दिया तो उन्हें खंदक़ों वाली दहकती आग में डाल दिया गया।
(सहीह मुस्लिम, हदीस 7511. किताबुज़ ज़ुहद वर रक़ाएक)
जिन लोगों ने दहकती हुई खाई में ईमान वालों को डाल कर मारा वास्तव में वह ख़ुद बर्बाद हो गए क्योंकि अल्लाह की पकड़ बहुत सख़्त है उससे कोई बच नहीं सकता। (4 से 8, 12)
(ii) कुछ अहम बातें
◆ ईमान लाने और झुठलाने वालों पर अल्लाह नज़र रखे हुए है। (7)
◆ जिन्होंने मोमिन मर्दों या औरतों को आज़माया और बग़ैर तौबा किये मर गए तो उनके लिए भड़कता हुआ अज़ाब है। (10)
◆ क़ुरआन लौहे महफ़ूज़ में है उसे कोई बदल नहीं सकता। (20 से 22)
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(9) सूरह (086) अत तारिक़
(i) हर जान की हिफ़ाज़त की जाती है
अल्लाह ने आसमान और रात को चमकने वाले सितारे (तारिक़) की क़सम खा कर बताया है कि इस धरती पर कोई ऐसा इंसान नहीं है जिसपर कोई न कोई पहरेदार मुक़र्रर न हो। अब अगर इंसान कोई चाल चलता है तो चले दरअसल उसको दुनिया में ढील दी जा रही है। (1 से 4, 15 से 17)
(ii) इंसान को अपनी तख़लीक़ पर ग़ौर करने की दावत
इंसान उछलते हुए पानी से पैदा किया गया है जो सीने और रीढ़ की हड्डियों के दरमियान से निकलता है तो यह बात भी बिल्कुल तय है और यह कोई मज़ाक़ नहीं है कि उसे अल्लाह दोबारा लौटाने पर भी क़ादिर है। (5 से 14)
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(10) सूरह (087) अल आला
(i) रब की तस्बीह करें
जिसने पैदा किया और उसे आकर्षक बनाया, तक़दीर बनाई, रास्ता दिखाया, पेड़ पौदे उगाए, फिर उनको कूड़ा करकट बना दिया, जो खुले छुपे सबको जनता है। (1 से 10)
(ii) बदबख़्त लोग
जो क़ुरआन की नसीहत को क़ुबूल नहीं करते, दुनिया की ज़िंदगी को ही सब कुछ समझते हैं। उनका ठिकाना आग है जिसमें न तो उन्हें मौत आएगी और न ज़िंदा रहने के क़ाबिल ही रहेंगे। (9 से 13)
(iii) कामयाबी के तीन उसूल
◆ तज़किया,
◆ अल्लाह का ज़िक्र,
◆ नमाज़, पहले आसमानी सहीफ़ों में भी यही है जो इब्राहीम और मूसा पर नाज़िल हुए। (14 से 19)
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(11) सूरह (088) अल ग़ाशिया
(i) क़यामत के दिन दो गिरोह
ग़ाशिया (ढांप लेने वाली) क़यामत का एक नाम है। उसकी सारी हौलनकियां मख़लूक़ को ढांप लेंगी उस दिन कुफ़्फ़ार के चेहरे झुलसे हुए होंगे और खौलते हुए पानी और सूखी घास से उनका स्वागत होगा। जबकि मोमिनों के चेहरे तर व ताज़ा होंगे, उनके लिए चश्मे, ऊंची मसनंदें गाऊ तकिये, सागर और उमदह फर्श होंगे। (1 से 16)
(ii) इंसान को ग़ौर व फ़िक्र की दावत
क्या इंसान नहीं देखता की ऊंट को, कैसे उसकी तख़लीक़ की गई है, आसमान की तरफ़ कैसे बुलंद है, पहाड़ की तरफ़ कैसे नसब किया गया है, और ज़मीन को कैसे फैलाई गई है। (17 से 20)
(iii) नबी दारोग़ा नहीं होते
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से फ़रमाया गया कि आप दारोग़ा बना कर नहीं भेजे गए हैं, आप का काम सिर्फ़ नसीहत करना है और हिसाब लेना हमारी ज़िम्मेदारी है। (21 से 26)
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(12) सूरह (089) अल फ़ज्र
(i) सरकशी का अंजाम तबाही है
फ़ज्र के वक़्त, सम और विषम (even and odd) और दस रातों की क़सम खा कर बताया गया है कि आद, समूद और फ़िरऔन अपनी सरकशी के कारण तबाह व बर्बाद हुए। (1 से 13)
(ii) इंसान के फ़सादी होने का कारण
नाशुक्री, यतीमों के साथ ज़ुल्म व ज़्यादती, मिस्कीनो को न ख़ुद खिलाना न दूसरों को तरग़ीब देना, वरासत का माल हड़प कर जाना, माल की मुहब्बत में अंधा होना। (15 से 20)
(iii) बे वक़्त पछतावा
आख़िरत के दिन इंसान अफ़सोस करेगा "काश मैंने अपनी ज़िंदगी में कुछ कर लिया होता। लेकिन अब कोई फ़ायदा नहीं होगा। दूसरी तरफ़ जो अल्लाह के तमाम आदेश को दिल से मान कर पालन करता रहा वह जन्नत में होगा। (21 से 30)
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(13) सूरह (090) अल बलद
(i) इंसान पूर्णतः आज़ाद नहीं है
इंसान के दिल में यह बात है कि वह जो कुछ करना चाहे कर ले, अपना माल जैसे चाहे रखे, अम्न की जगह का सुकून बर्बाद कर दे हालांकि मां के पेट से मौत तक क़दम क़दम पर उसे कितनी तकलीफ़ से गुज़रना पड़ता है फिर अल्लाह ने दो आंखें, एक ज़बान, और दो होंठ दिए और दो रास्ते भी उसके सामने रख दिया। अब उसके बाद भी जो आयात का इंकार करें वही भड़कती हुई आग में होंगे। (1 से 10, 19, 20)
(ii) असहाबुल मैमना (दुशवार घाटी)
ग़ुलाम आज़ाद करना , क़रीबी, यतीमों और मिट्टी में पड़े हुए मिस्कीनो को खाना खिलाना, ईमान, आपस में हक़ की वसीयत और मुश्किलात में सब्र की वसीयत। (11 से 18)
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(14) सूरह (091) अश शम्स
(i) इंसान को तक़वा इख़्तियार करना चाहिए
सूरज, चांद, धूप, दिन, रात, आसमान, ज़मीन और इंसानी नफ़्स की क़सम खा कर फ़रमाया गया है कि इंसान अपने रब से डरे, तक़वा इख़्तियार करे और अपना तज़किया करे तो वह कामयाब होगा (1 से 9)
(ii) सरकशी का अंजाम तबाही है
जिसने अपने ज़मीर की आवाज़ को दबा कर सरकशी की वह नाकाम हुआ। क़ौमे समुद के एक व्यक्ति ने अपनी सरकशी की वजह से अल्लाह की ऊंटनी की कूंचें काट दी और पूरी क़ौम मौन रहने के कारण अज़ाब का शिकार हो गई। (10 से 15)
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(15) सूरह (092) अल लैल
(i) इंसान की कोशिशें मुख़्तलिफ़ हैं
जो लोगों की मदद करे, तक़वा इख़्तियार करे और भलाई की तस्दीक़ करे, उसके लिए सीधे रास्ते पर चलना आसान हो जाएगा और अल्लाह की रज़ा की तलब हो तो अल्लाह ज़रूर राज़ी होगा। (1 से 7 और 17 से 21)
(ii) जहन्नम का ईंधन कौन बनेंगे
जो कंजूसी करें, लापरवाही करें, हक़ को झुठलाएं, आख़िरत का इंकार करें तो ऐसे लोगों के लिए सीधे रास्ते पर चलना मुश्किल हो जाएगा। रब की नाराज़गी की वजह से ऐसे लोग जहन्नम का ईंधन बनेंगे। (8 से 16)
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(16) सूरह (093) अज़ जुहा
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर अल्लाह का ख़ास एहसान और नसीहत
कुछ समय के लिए वही (وحي) का सिलसिला बंद हो गया था जिस से आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सख़्त परेशान हो गए थे और बार बार यह अंदेशा लग रहा था कि कहीं मुझ से कोई ऐसा क़ुसूर तो नहीं हो गया जिसकी वजह से मेरा रब मुझ से नाराज़ हो गया है, इसपर आप को इत्मीनान दिलाया गया है कि " तुम्हारे रब ने तुमको नहीं छोड़ा, और न वह तुमसे नाराज़ हुआ। आख़िरत निश्चित रूप से तुम्हारे लिए इस संसार से बेहतर है। जल्द ही अल्लाह तुझको इतना देगा की तू सन्तुष्ट हो जायेगा। क्या अल्लाह ने तुमको अनाथ नहीं पाया, फिर तुमको ठिकाना दिया, तुमको रास्ते की तलाश में भटकता पाया और हिदायत दी, तुमको निर्धन पाया और मालदार कर दिया। इसलिए अनाथ पर कठोरता न दिखाओ, मांगने वालों को न झिड़को और अपने रब की नेअमतों का बखान करो। (1 से 11)
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(17) सूरह (094) अल इंशेराह
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर अल्लाह का ख़ास एहसान और नसीहत
इस सूरह का पिछली सूरह अज़ जुहा से गहरा संबंध है। यहां भी अल्लाह ने एहसानात याद दिला कर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को तसल्ली दी है: क्या हमने तुम्हारा सीना तुम्हारे लिए नहीं खोल दिया और वह बोझ उतार दिया जिसने तुम्हारी पीठ झुका दी थी। और तुम्हारे ज़िक्र को बुलन्द कर दिया। तो जान लो कि कठिनाई के साथ आसानी है। निस्संदेह कठिनाई के साथ आसानी है। इसलिए दावत के काम से फ़ारिग़ होने के बाद पूरी तवज्जुह के साथ अपने रब की इबादत करें। (1 से 8)
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(18) सूरह (095) अत तीन
(i) इंसान दुनिया की सर्वश्रेष्ठ मख़लूक़ है
तीन, ज़ैतून, तूरे सीना और शहरे मक्का की क़सम खा कर इंसान को यह बताया गया है कि इंसान को बेहतरीन साख़्त (structure) पर पैदा किया गया है। (1 से 4)
(ii) इंसान दुनिया की बदतर मख़लूक़ भी है
मनुष्य की वह सुंदरता उसी समय तक रहती है जब तक अपने ईमान और नेक अमल के ज़रिए सौन्दर्यकरण किए रखता है। वरना वह अल्लाह का इंकार,आख़िरत का इंकार और अपने बुरे आमल की बदौलत अपनी मानवता खो कर बदतरीन मख़लूक़ बन जाता है। (5 से 8)
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(19) सूरह (096) अल अलक़
(i) पहली वही
शुरू की पांच आयात "इक़रा से मालम यालम" तक पहली वही है जो "ग़ारे हिरा" में नाज़िल हुई कि "पढ़ अपने रब के नाम से जिसने इंसान को लोथड़े से पैदा किया, क़लम के ज़रिए सिखाया और वह सिखाया जो वह न जानता था। (1 से 5)
(ii) अबु जहल के बारे में
जब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के निर्देशानुसार इबादत करते थे, अबु जहल को बहुत नागवार गुज़रता था। एक दिन उसने कहा, इस क्षेत्र में मेरे हिमायती सबसे ज़्यादा हैं और इरादा किया अगर मुहम्मद ने ख़ाना काबा में अपने तऱीके पर इबादत की तो उसकी गर्दन पर पांव रखकर उसका मुंह ज़मीन पर रगड़ दूंगा चुनांचे मुक़ाम ए इब्राहीम में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को नमाज़ पढ़ते देखकर आगे बढ़ा लेकिन अचानक पीछे हट गया। लोगों ने पूछा तो बताया कि मेरे और उनके दरमियान आग की एक ख़न्दक़ और एक हौलनाक चीज़ थी और कुछ पर थे अगर वह क़रीब फटकता तो रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ब क़ौल फ़रिश्ते उसके चीथड़े उड़ा देते। (6 से 19, जामे तिर्मिज़ी 3348, 3349)
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(20) सूरह (097) अल क़द्र
(i) लैलतुल क़द्र
क़ुरआन रमज़ान की एक रात में नाज़िल किया गया उस रात को अल्लाह ने लैलतुल क़द्र का नाम दिया है। (1, 2)
(ii) लैलतुल क़द्र की फ़ज़ीलत
लैलतुल क़द्र हज़ार महीनों से बेहतर है। फ़रिश्ते और रुह (जिब्रील) इसमें रब की अनुमति से हर तरह का आदेश लेकर उतरते हैं। क़द्र की रात यक़ीनन सलामती है भोर होने तक। (3 से 5)
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(21) सूरह (098) अल बय्येना
(i) किताब के साथ रसूल क्यों ज़रुरी है?
◆ अहले किताब हों या मुशरेकीन रसूल के बग़ैर कुफ़्र से निकलना संभव नहीं था,
◆ अल्लाह की किताब को असली और सही सूरत में पेश करे,
◆ ख़ुद अपनी रिसालत पर दलील हो। (1 से 4)
(ii) बदतरीन मख़लूक़
जो अल्लाह की इबादत मुख़्लिस होकर न करे, नमाज़ क़ायम न करे, ज़कात न दे, स्पष्ट दलील के बावजूद सच्चाई क़ुबूल न करे। ऐसे लोगों का ठिकाना जहन्नम है। (5, 6)
(iii) बेहतरीन मख़लूक़
जो अल्लाह की इबादत इख़लास के साथ करें, नमाज़ क़ायम करें, ज़कात अदा करें और सच्चाई को क़ुबूल करें। ऐसे लोग अल्लाह से राज़ी हुए और अल्लाह उनसे राज़ी हुआ। (5, 7, 8)
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(22) सूरह (099) अज़ ज़िलज़ाल
जब ज़मीन अपने रब के हुक्म से पूरी शिद्दत के साथ हिला मारी जायेगी। वह अपना बोझ निकाल कर बाहर डाल देगी। इंसान हैरत से बोल पड़ेगा कि आख़िर इसे हो क्या गया है? उस दिन ज़मीन गुज़रे हुए हालात बयान करेगी। लोग अलग अलग निकलेंगे ताकि उनके आमाल उन्हें दिखाये जाएं। जिस ने कण बराबर भलाई की होगी वह उसको देख लेगा। और जिस ने कण मात्र बुराई की होगी वह भी उसको देख लेगा। (1 से 8)
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(23) सूरह (100) अल आदियात
(i) घोड़ा अपने मालिक का कितना वफ़ादार होता है
घोड़ा फुंकारे मारते हुए दौड़ पड़ता है, टापों से चिंगारियां झाड़ता है, सुबह सवेरे छापा मारता है, धूल और ग़ुबार उड़ाता है फिर दुश्मनों के लश्कर में जा घुसता है। (1 से 5)
(ii) लेकिन इंसान अपने रब का कितना नाफ़रमान है
इंसान माल व दौलत की मुहब्बत में अंधा होकर अपने रब का नाशुक्रा बन जाता है। क्या उसे नहीं पता कि एक दिन क़ब्रें उधेड़ कर जो कुछ है सब बाहर निकाल लिया जाएगा, उसे अपनी नाफ़र्मानियों की सख़्त सज़ा मिलकर रहेगी। (6 से 11)
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(24) सूरह (101) अल क़ारेआ
(i) आख़िरत
जिस दिन लोग बिखरे हुए पतिंगों, और पहाड़ धुनके हुए रंगीन ऊन की तरह हो जाएंगे। उस दिन यह महान घटना (incident) घटित होगी। (1 से 5)
(ii) उस दिन आमाल तौले जाएंगे
जिन की नेकियों का पलड़ा भारी होगा वह मन पसन्द ऐश में और जिनका पलड़ा हल्का होगा वह हाविया (भड़कती हुई आग) में होंगे। (6 से 11)
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(25) सूरह (102) अत तकासुर
माल व दौलत की ज़्यादती इंसान को ऐसा अंधा कर देती है कि क़ब्र में जाने का समय कब आ जाता है एहसास ही नहीं होता। दूसरी बात यह है कि कुछ लोग आख़िरत का इंकार करते हैं जबकि कुछ ऐसे लोग भी हैं जो आख़िरत के क़ायल तो हैं लेकिन जब कोई काम करते हैं तो आख़िरत का तसव्वुर उनके दिल से ग़ायब हो जाता है और यह एहसास नहीं रहता कि जो नेअमतें उन्हें दी गई हैं उनके बारे में भी सवाल होगा। उस दिन आख़िरत और जहन्नम दोनों को वह अपने सामने देख लेंगे (1 से 8)
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(26) सूरह (103) अल अस्र
जिसके अंदर यह चार विशेषताएं पाई जाएं केवल वही नुक़सान में नहीं रहेंगे।
◆ ईमान
◆ नेक अमल
◆ एक दूसरे को हक़ की वसीयत और दावत
◆ और दावत के सिलसिले में पेश आने वाली मुसीबतों पर एक दूसरे को सब्र की नसीहत।
(1 से 3)
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(27) सूरह (104) अल हुमज़ा
तबाही व बर्बादी है
बुरा भला कहने, ग़ीबत करने, माल व दौलत को समेट समेट कर और गिन गिन कर रखने और दुनिया को हमेशा का जीवन समझने वालों के लिए तबाही है और अल्लाह की जलाई हुई आग (हुतमा) भी जो दिलों तक पहुंचेगी और उन्हें उसमें बंद कर दिया जाएगा। (1 से 9)
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(28) सूरह (105) अल फ़ील
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जन्म से 60 दिन पहले हाथी वालों का वाक़िआ पेश आया। अबरहा यमन का राजा था, वह चाहता था कि अल्लाह के घर ख़ाना ए काबा को ढाकर यमन में एक कलीसा तामीर करे और उसे इबादत का केंद्र (Centre) बनाए। चुनांचे वह साठ हज़ार फ़ौज और 13 हाथियों के साथ ख़ाना ए काबा को ढाने के इरादे से चल पड़ा और मक्का से तीन कोस (9 किलोमीटर) दूर "मग़मस" की वादी में ठहरा, वहीं पर अल्लाह ने परिंदों के झुंड भेज कर ख़ाना ए काबा की हिफ़ाज़त की और अबरहा के पूरे लश्कर को खाये हुए भूसे की तरह बना दिया। उस वाक़िआ को इबरत के तौर पर बयान किया गया है। (1 से 5 हवाला अर रहीक़ुल मख़्तूम सफ़ीयुर्रहमान मुबारकपुरी पेज 77, 78)
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(29) सूरह (106) अल क़ुरैश
हाशिम, अब्दे शम्स, मुत्तलिब और नौफ़ल ने आस पास के क़बीलों और राजाओं से व्यपारिक संबंध बनाए उस संबंध को "ईलाफ़" और उन्हें "असहाबुल ईलाफ़" कहते हैं।
क़ुरैश साल में दो व्यापारिक सफ़र करते थे, गर्मी में सीरिया व फ़लिस्तीन और सर्दी में यमन व इथोपिया की ओर जाते थे, उन्हें ख़ाना ए काबा के ख़ादिम होने की वजह से बड़ा सम्मान हासिल था। इसीलिए उन्हें इस घर के रब यानी अल्लाह की इबादत करने को कहा गया जिसने उनको इज़्ज़त बख्शी, भूख में खाना खिलाया और ख़ौफ़ में शांति अता की। (1 से 4)
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(30) सूरह (107) अल माऊन
जो बदले के दिन को झुठलाते हैं वही यतीमों को धक्के मारते हैं, और मिस्कीन को खाना नहीं खिलाते,
उन नमाज़ियों के लिए बर्बादी है जो नमाज़ में डंडी मारते हैं, दिखावा करते हैं, और लोगों को आम (general) इस्तेमाल की चीज़ मांगने पर नहीं देते। (1 से 7)
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(31) सूरह (108) अल कौसर
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बेटे क़ासिम का पहले इंतेक़ाल हो चुका था फिर दूसरे बेटे अब्दुल्लाह का भी इंतेक़ाल हो गया तो आस बिन वायेल, उक़बा बिन मुईत, अबु लहब, और अबु जहल ने ख़ुशी मनाते हुए यह प्रचार शुरू कर दिया कि मुहम्मद की तो जड़ ही कट गई यानी जब उनकी नस्ल ही नहीं चलेगी तो कोई उनका नामलेवा नहीं होगा। उसपर यह सूरह नाज़िल हुई। (तफ़्सीर इब्ने कसीर )
यह क़ुरआन की सबसे छोटी सूरह है।
"हमने आप को कौसर अता किया। आप अपने रब की रज़ा के लिए नमाज़ पढ़िए और क़ुरबानी कीजिए। आप के दुशमन ही जड़ कटे (अबतर) हैं" (1 से 3)
नोट:- कौसर एक नहर है जो आख़िरत में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अता की जाएगी, जिसके दोनों किनारों पर ख़ोलदार मोतियों के डेरे लगे हुए हैं और पीने के बर्तन सितारों की तरह अनगिनत हैं। (सही बुख़ारी 4965)
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(32) सूरह (109) अल काफ़िरून
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को आदेश दिया गया कि आप यह ऐलान कर दें कि मैं अल्लाह के इलावा किसी और की इबादत कदापि नहीं कर सकता जैसा कि तुम करते हो, ईमान और कुफ़्र दोनों अलग अलग हैं। तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन है और मेरे लिए मेरा दीन। (1 से 6)
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(33) सूरह (110) अन नसर
यह आख़िरी मुकम्मल नाज़िल होने वाली सूरह है। इस सूरह के नाज़िल होने के फ़ौरन बाद नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने वह ऐतिहासिक ख़ुत्बा दिया जिसे "ख़ुत्बा ए हज्जतुल वदाअ" कहते हैं। (सही मुस्लिम 7546)
सूरह में अल्लाह की मदद और फ़तह मक्का की ख़ुशख़बरी सुनाई गई है, जब अल्लाह की मदद से फ़तह हासिल होगी तो अधिकतर लोग इस्लाम मे दाख़िल होंगे। लेकिन इस मौक़ा पर मोमिनों को जश्न मनाने के बजाय अल्लाह की हम्द व तस्बीह और इस्तेग़फ़ार करने का आदेश दिया गया है। (1 से 3)
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(34) सूरह (111) अल लहब
इस सूरह में अबु लहब की निंदा की गई है। अबु लहब नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का हक़ीक़ी चचा था लेकिन आप का पक्का दुश्मन था और उसकी बीवी भी दुश्मनी में पेश पेश रहती थी। वह बहुत धनी था लेकिन उसकी दौलत उसको कोई लाभ न पहुंचा सकी, वह दोनों जहन्नम में जलेंगे और उसकी बीवी उम्मे जमील का हाल तो यह होगा कि वह ख़ुद उस आग में ईंधन डाल रही होगी जिसमें वह जल रही होगी और उसके गले में बटी हुई रस्सी होगी। (1 से 5)
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(35) सूराह (112) अल इख़लास
कुफ़्फ़ारे मक्का ने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अल्लाह के नसब के बारे में सवाल पूछा था चुनांचे यह सूरह नाज़िल हुई। (सुनन तिर्मिज़ी 3364)
पूरे क़ुरआन में तीन बुनियादी बात पर ज़ोर दिया गया है, तौहीद, रिसालत, आख़िरत, चूंकि यह सूरह मुकम्मल तैहीद पर निर्धारित है इसलिए इसे एक तिहाई (1/3) क़ुरआन कहा गया है। (सही बुख़ारी 5013)
अब अगर कोई ख़ुदा होने का दावा करता है तो इस सूरह में अल्लाह की पांच विशेषतायें बयान की गई हैं, उसी कसौटी (Litmus test) पर परख कर पता लगाया जाय कि वह अपने दावे में सच्चा है या झूठा। वह कसौटी यह है,
1, अल्लाह एक है,
2, अल्लाह बेनियाज़ है,
3, उसकी कोई औलाद नहीं,
4,वह भी किसी की औलाद नहीं,
5, उसका कोई साझी नहीं है।
(1 से 4)
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(36) सूरह (113) अल फ़लक़
जिन परिवारों के कुछ लोगों ने इस्लाम क़ुबूल कर लिया था उनके दिलों में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ख़िलाफ़ हर वक़्त नफ़रत की भट्टियां सुलगती रहती थीं, घर घर में आप को कोसा जा रहा था, छुप छुप कर क़त्ल के मशविरे हो रहे थे, जादू टोने किये जा रहे थे कि आप को मौत आ जाए، सख़्त बीमार पड़ जाएं या पागल हो जाएं, इंसानी और जिन्नाती शैतान चारों तरफ़ फैल गए थे कि अवाम के दिलों में आप और आप के दीन के ख़िलाफ़ कोई न कोई वसवसा डाल दें जिस से बदगुमान होकर लोग आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से दूर भागने लगें, बहुत से लोगों के दिलों में हसद की आग भी जल रही थी क्योंकि वह अपने या अपने क़बीले के इलावा किसी और का चिराग़ जलते न देख सकते थे। जैसे कि अबु जहल ख़ुद कहता था "हमारा और बनी अब्दे मुनाफ़ का आपस के मुक़ाबला था, उन्होंने खाना खिलाया हमने भी खिलाया, उन्होंने ने सवारियां दीं हमने भी सवारियां दीं, उन्होंने दान (donation) दिए तो हमने भी दान दिया। जब इज़्ज़त और सम्मान में दोनों बराबर हो गए तो अब वह कहते हैं कि हम में एक नबी है जिस पर आसमान से वही उतरती है भला इस मैदान के हम कैसे उनका मुक़ाबला कर सकते हैं? अल्लाह की क़सम हम हरगिज़ उसकी बात नहीं मानेंगे और उसकी तस्दीक़ नहीं करेंगे" (सीरत इब्ने हिशाम जिल्द 1) ऐसे माहौल में रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से फ़रमाया गया कि
"उन लोगों से कह दो कि मैं पनाह मांगता हूं सुबह के रब की मख़लूक़ के शर से, रात के अंधेरे से, गिरहों में फूंकने वाले जादूगरों और जदुगार्नियो के शर से और हासिदों के शर से। (1 से 5)
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(37) सूरह (114) अन नास
सूरह अल फ़लक़ और अन नास में बहुत गहरा संबंध है बल्कि यूं कहा जाए कि सूरह अन नास सूरह अल फ़लक़ की पूरक है। इसीलिए दोनों सूरतों को मिलाकर एक नाम मुअव्वेज़तैन रखा गया है।
"कह दो मैं पनाह मांगता हूं लोगों के पालनहार की,संसार के स्वामी की, इंसानों के माबूद की उस वसवसा डालने वालेशैतान इंसान और शैतान जिन्नात के शर से जो पलट पलट कर आता है और लोगों के दिलों में वसवसे डालता है"। (1 से 6)
"जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लेटते तो अपने हाथों पर फूंकते, मुअव्वेज़ात (सूरह 112 अल इख़लास, सूरह 113, अल फ़लक़, सूरह 114 अन नास) पढ़ते और दोनों हाथ अपने बदन पर फेरते"। (सही बुख़ारी 6319)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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