ईद की सुन्नतों पर बाप बेटे की गुफ़्तगू
[एक प्यारे से छः साल के बच्चे ज़ैद बिन मुहम्मद (हिफ़्ज़ ए क़ुरान का तालिब ए इल्म) और उसके वालिद मुहम्मद बिन शाहिद (एक आम इंसान जो क़ुरान ओ हदीस का इल्म रखता है) के दरमियान ईद की सुन्नतों की गुफ्तगू पढ़तें है जो की सारी बातें सहीह हदीस की रौशनी में हैं।]
(ईद का चाँद देखने के बाद)
अल्हम्दुलिल्लाह रमज़ान के 29 रोज़े पूरे हो गए और आज चाँदरात है मुहम्मद ने इतना ही कहा था के उसका बेटा ज़ैद बोल पड़ा,
ज़ैद: बाबा अगर आज और कल दोनों दिन चाँद न दिखता तो क्या करते?
मुहम्मद: बेटा अगर आज चाँद न दिखता तो हम कल भी रोज़ा रखते और फिर परसों ईद मानते। रसूलुल्लाह (ﷺ) फ़रमाया, चाँद ही देख कर रोज़े शुरू करो और चाँद ही देख कर रोज़ा मौक़ूफ़ करो और अगर बादल हो जाए तो तीस दिन पूरे कर लो।" [बुखारी 1909]
कभी रमजान का चाँद 29 का होता है तो कभी 30 का। अक्सर आसमान में बादल छा जाने की वजह से 29 का चाँद नज़र नहीं आता ऐसी सूरत में अपने शहर के काज़ी के ऐलान का इंतजार करना चाहिए अगर उन्हें इस तालुक से कोई शरई गवाह हासिल हुआ तो वो ऐलन करेंगे नहीं तो हमें रमज़ान का पूरा 30 करना चाहिए।
ज़ैद: मतलब ये कि 30 के बाद ईद होनी तय है।
मुहम्मद: जी। क्या आपको पता है सदक़ा ए फ़ित्र या सदक़ा ए रमजान हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है। रसूल अल्लाह (ﷺ) ने फरमाया, "सदक़ा ए फितर या सदक़ा ए रमज़ान मर्द औरत, आजाद और गुलाम सब पर फ़र्ज़ करार दिया। ईद-उल-फितर के लिए घर से निकले से पहले सदकत-उल फितर अदा करना चाहिए। [बुखारी 1503; 1511]
ज़ैद: मेरे दोस्त ज़कात के बारे में बात कर रहे थे पर मुझे कुछ समझ नहीं आया ये क्या है, बाबा आप मुझे समझायें?
मुहम्मद: बेटा, ज़कात उस माल को कहते हैं जिसे इंसान अल्लाह के दिए हुए माल में से उसके हक़दारों के लिए एक मख़सूस रक़म निकालता है। इसका माना "बढ़ने और पाक" होने से है।
ज़ैद: बाबा थोड़ी और वजा़हत करें प्लीज़...
मुहम्मद: ज़कात इस्लाम का तीसरा रुक्न (स्तम्भ/Pillar) है, तौहीद और नमाज़ के बाद सबसे ज़्यादा अहमियत ज़कात को दी गई है। इसे ज़कात इसीलिए कहा गया है कि इससे इंसान का माल पाक भी होता है और सवाब में बढ़ता भी है।
क़ुरआन में लफ़्ज़ "ज़कात" 83 बार इस्तेमाल हुआ है और ज़्यादातर नमाज़ के साथ साथ ज़कात का ज़िक्र हुआ है। कहीं कहीं ज़कात की जगह पर "सदक़ा/इंफ़ाक़" लफ़्ज़ का इस्तेमाल हुआ है।
ज़ैद: मतलब हम अपने पैसों पर ज़कात देंगे, है ना बाबा?
मुहम्मद: सिर्फ पैसे नहीं और भी चीज़े हैं जिनपर ज़कात है जैसे,
- 1. नक़दी
- 2. सोना
- 3. चांदी
- 4. तिजारत का सामान
- 5. जमीन की पैदावार
- 6. ऊंट
- 7. बकरी या भेड़
- 8. दफ़ीना (ज़मीन से निकलने वाली धातु या ज़मीन में दबाया गया माल)
ज़ैद: अल्हम्दुलिल्लाह, मुझे समझ आ गया लेकिन बाबा। मेरे दोस्त अरबाज़ के बाबा नहीं है उसकी अम्मी बड़ी मुश्किल से घर का खर्च उठाती है तो वो कैसे ज़कात देंगी?
मुहम्मद: बेटा उन पर ज़कात नहीं है बल्कि ज़कात की रकम से उनकी मदद करनी चाहिए। सिर्फ ज़कात से ही नहीं ऐसे भी उनकी मदद करते रहना चाहिए।
ज़ैद: जी बाबा इन शा अल्लाह, मैं उसकी मदद किया करूंगा। बाबा मुझे ये बताये किन लोगों को ज़कात देनी चाहिये?
मुहम्मद: बेटा, कुछ लोग हैं जिनपर ज़कात फ़र्ज़ है, जैसे-
- 1. मुसलमान होना
- 2. बालिग़ होना
- 3. आक़िल होना
- 4. आज़ाद होना
- 5. निसाब का मालिक होना माल का
- 6. निसाब के मालिक के क़ब्ज़े में होना
- 7. निसाब के मालिक के ज़िम्मे क़र्ज़ न हो
- 8. निसाब के मालिक के पास बुनियादी ज़रूरतों से ज़्यादा हो
- 9. निसाब के माल की मुद्दत
ज़ैद: जज़ाक अल्लाह ख़ैर बाबा, अब ये बताएँ इस माल (ज़कात और सदक़ा ए फितर) को हम किन लोगों को दे सकते हैं?
मुहम्मद: व इय्याक बेटा। बेटा ज़कात व सदक़ात के हक़दार ग्यारह तरह के लोग हैं यानी हम इन लोगों को देंगे-
- 1. क़रीबी रिश्तेदार, दोस्त और पड़ोसी
- 2. यतीम
- 3. मिस्कीन
- 4.फुक़रा
- 5. ज़कात और सदक़ात की वसूली करने वाले
- 6. तालीफ़े क़ल्ब
- 7. क़ैदियों को छुड़ाने के लिए
- 8. क़र्ज़दारों की मदद करने में
- 9. अल्लाह के रास्ते में
- 10. मुसाफ़िर
- 11. सवाल करने वाले
ज़ैद: ज़कात तो समझ आ गया पर सदक़ा ए फ़ित्र किन चीज़ों में निकाली जाती है?
मुहम्मद: रसूल रसूल अल्लाह (ﷺ) के ज़माने मे ये चीज़ें सदक़ा ए फ़ित्र में निकाली जाती थी-
- 1 खुजूर
- 2 किशमिश या मुनक्का
- 3 पनीर
- 4 जौ
- 5 गेंहू
ज़ैद: तब तो कल हम ये सारी चीज़ें लेकर ईदगाह चलेंगे नमाज़ बाद वही जरूरतमंद लोगों में बाट देंगे।
मुहम्मद: नहीं, ईदगाह में पहुँच कर सदकत-उल फितर अदा करना सही नहीं है, बल्कि इसे नमाज़-ए ईद के लिए निकाले से पहले अदा करना चाहिए। रसूलुल्लाह (ﷺ) ने रोज़े को फ़ुज़ूल और बेकार और ना मुनासिब बातों (के गुनाह) से पाक करने के लिये और मिसकीनों को खाना खिलाने के लिये सदक़ा-ए-फ़ित्र मुक़र्रर फ़रमाया। जिसने नमाज़ (ईद) से पहले ये अदा कर दिया, उसका ये क़बूल हुआ सदक़ा है और जिसने नमाज़ के बाद अदा किया, तो वो तो एक आम सदक़ा है (सदक़ा-ए-फ़ित्र नहीं।) [इब्न माजा 1827] और अल्हम्दुलिल्लाह मै पहले ही अदा कर चुका हूँ।
ज़ैद: बाबा ईदगाह से ध्यान आया, क्या ईद की नमाज़ वाजिब है?
मुहमम्मद: मर्द और औरतों सब पर ईद की नमाज़ वाजिब है। रसूल अल्लाह (ﷺ) हमेशा ईद की नमाज पढ़ते रहे और पढ़ने का हुकुम दिया और औरतों को भी ईदगाह जाने और नमाज में शरीक होने का हुकुम फरमाया। और अगर किसी वजह से न पढ़ पाए तो उसकी कजा पढ़े या तन्हा पढ़े। रसूल अल्लाह ﷺ ने ख्वातीन को मस्जिद आने की इजाज़त दी है और मर्दो को हुकुम दिया है के वो अपनी औरतों को मस्जिद जाने से न रोके। [सही बुखारी 824]
ज़ैद: बाबा, मेरे ज़ेहन में दो सवाल उठ रहे है, पहला ये कि अम्मी भी मस्जिद जा सकती है? दूसरा ये कि फ़र्ज़ नमाज़ छूट जाने पर हम उसकी क़ज़ा पढ़ते है तो अगर किसी की ईद की नमाज़ छूट जाये तो क्या वो इसकी क़ज़ा पढ़ेगा?
मुहम्मद: हाँ बेटा जा सकती हैं। अव्वल तो आपकी अम्मी भी ईदगाह में हमारे साथ नमाज पढ़े। पर हमारे मुल्क़ में औरतों के लिए इंतेज़ाम नहीं है इसलिए वो घर में पढ़ती हैं। उम्मे अतिया رَضِيَ ٱللَّٰهُ عَنْهَا से रिवायत है, हमें हुक्म हुआ कि हम ईद के दिन हायज़ा और पर्दा नशीं औरतों को भी बाहर ले जाएँ। ताकि वो मुसलमानों के इज्तिमाअ और उन की दुआओं में शरीक हो सकें।अलबत्ता हायज़ा औरतों को नमाज़ पढ़ने की जगह से दूर रखें। एक औरत ने कहा, या रसूलुल्लाह! हम में कुछ औरतें ऐसी भी होती हैं जिनके पास (पर्दा करने के लिये) चादर नहीं होती। आप (सल्ल०) ने फ़रमाया कि उसकी साथी औरत अपनी चादर का एक हिस्सा उसे उढ़ा दे। [बुखारी 351] इन शा अल्लाह जब हमारे यहाँ इंतेज़ाम हो जायेगा तब हम उन्हें भी साथ ले जाया करेंगे। ये रहा आपके पहले सवाल का जवाब।
और दूसरे सवाल का जवाब ये है कि अगर किसी को जमात से ईद की नमाज ना मिले तो फिर दो रकात पढ़े। इस तरह औरतें और वो लोग जो घरों और देहातो में रहते हैं वो भी 2 रकात पढ़े, क्यूँकि रसूल अल्लाह (ﷺ) का इरशाद है, "ऐ अहले इस्लाम ये हमारे ईद का दिन है।" अनस-बिन-मालिक (रज़ि०) के ग़ुलाम इब्ने-अबी- उत्बा ज़ाविया नामी गाँव में रहते थे। उन्हें आप ने हुक्म दिया था कि वो अपने घर वालों और बच्चों को जमा कर के शहर वालों की तरह नमाज़े-ईद पढ़ें और तकबीर कहें। [बुखारी: 987 तफ़सीर]
अच्छा चलें अब ईशा की तैयारी करते हैं अज़ान होने वाली है, जल्दी सोना है ताकि आप सुबह जल्दी उठ जाये। ग़ुस्ल करके नमाज़ पढ़ने जाना है मेरे बच्चे।
ज़ैद: बाबा क्या अम्मा भी ग़ुस्ल करके ईद की नमाज़ पढेंगी?
मुहम्मद: ईद के दिन मर्द और औरत सब पर ग़ुस्ल वाजिब (फ़र्ज़) नहीं बल्कि मुस्तहब (अफज़ल) है। ईद-उल-अज़ह हो या ईद-उल-फितर हो ग़ुस्ल करना मर्द और औरत सबके लिए मुस्तहब है। इब्न अब्बास (رَضِيَ ٱللَّٰهُ عَنْهُ) से रिवायत मिलती है, रसूल अल्लाह (ﷺ) ईद-उल-फितर और ईद-उल-ज़ुहा के दिन ग़ुस्ल करते। [इब्न माजाः 1315] साथ ही हज़रत अली (رَضِيَ ٱللَّٰهُ عَنْهُ) फरमाते हैं, जुमा, अरफा, कुर्बानी और ईदुल फितर के दिन ग़ुस्ल करना चाहिए। [बैहाक़ी 3/278]
ज़ैद: फिर तो मै ज़रूर ग़ुस्ल करके एक सुन्नत अदा करूँगा। और हम नए कपड़े भी पहनेंगे पर बाबा मेरे दोस्त के पास नए कपड़े नहीं हैं तो वो क्या करेगा? क्या मै अपना एक जोड़ा उसे दे दूं?
मुहम्मद: बेटा ये ज़रूरी नहीं कि हम ईद के दिन नए कपड़े ही पहने। हमारे पास जो कपड़े मोजूद हो उन में से सब से अच्छे कपड़े पहनना चाहिए। बस ध्यान रहे आदमी और लड़कों को रेशम के कपड़े नहीं पहनने चाहिए। रसूल अल्लाह (ﷺ) इसके इस्तेमाल से मना किया क्यूंकि ये उन लोगो का लिबास है जिनका आख़िरत में कोई हिस्सा नहीं। [बुखारी 948]
ज़ैद: फिर तो मैं कभी रेशम के कपडे नहीं पहनूंगा।
मुहम्मद: बेटा अब हमें चलना चाहिए वरना आपके सवालों के चक्कर में जमात छूट जाएगी।
ज़ैद: हा हा हा! जी चलते हैं।
(ईद के दिन की सुबह)
ज़ैद: (सो कर उठने के बाद) अस्सलामु अलैकुम बाबा।
मुहम्मद: वा अलैकुम अस्सलाम बेटा।
ज़ैद: बाबा रात मेरे दोस्त कह रहे थें आज भी हमे रोज़ा रखना होगा पर सिर्फ नमाज़ होने तक।
मुहम्मद: नहीं बेटा, आज हम सुन्नत पर अमल करते हुए खजूर खा कर जाएंगे क्यूंकि रसूलुल्लाह (ﷺ) ईदुल-फ़ित्र के दिन न निकलते जब तक कि आप (ﷺ) कुछ खजूरें न खा लेते और आप (ﷺ) ताक़ गिनती खजूरें खाते थे। [बुखारी 953]
ज़ैद: अम्मी जल्दी खजूरें लायें और बाबा की टोपी भी, हम लेट हो रहे हैं।
आयशा: ये लें आपकी खजूरें, मुहम्मद ये रही आपकी टोपी।
मुहम्मद: चलो बेटा चलते है।
ज़ैद: बाबा रुकें! अज़ान तो हो जाने दें।
मुहम्मद: बेटा आज अज़ान नहीं होगी।
ज़ैद: लेकिन क्यूँ?
मुहम्मद: क्यूंकि ईदुल-फ़ित्र और ईदुल-अज़हा की नमाज़ की अज़ान नहीं होती। नबी करीम (ﷺ) और ख़ुलफ़ाए-राशेदीन के अहद में अज़ान नहीं दी जाती थी। [बुखारी 960] इसलिए ईदुल-फ़ित्र की नमाज़ बिन अज़ान के होती है।
ज़ैद: अल्हम्दुलिल्लाह मैं समझ गया ये हमारे नबी (ﷺ) की सुन्नत है।
मुहम्मद: अच्छा मैं आपको एक नई बात बताता हूं, रसूलुल्लाह (ﷺ) ईद और जुमे में सूरह आला (سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى) और सूरह ग़ाशिया (هَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ الْغَاشِيَةِ) पढ़ते। और अगर ईद और जुमा एक ही दिन इकट्ठे हो जाते तो आप यही दो सूरतें दोनों नमाज़ों में पढ़ते थे। [मुस्लिम 878] और आज हम यही दोनों सूरतें पढ़ेंगे।
ज़ैद: ईद और जुमा अगर एक दिन हो तो क्या करे?
मुहम्मद: ईद और जुमा अगर एक दिन हो तो जो चाहे वो जुमा की नमाज अदा करे और जो चाहे वो अदा ना करे।ऐसी सूरत में हमें जुहर की नमाज अदा करनी होगी। रसूल अल्लाह (ﷺ) के ज़माने में दो ईद (ईद और जुमा) एक साथ हो गई, तो आप ने लोगों को ईद पढ़ाई, फिर फरमाया जो जुमा के लिए आना चाहे वो आये, जो ना चाहे ना आए। [इब्ने माजाः 1312, सहीह] दूसरी रिवायत हज़रत अबू हुरैरा رَضِيَ ٱللَّٰهُ عَنْهُ से है रसूल अल्लाह ﷺ ने फरमाया, "आज के दिन दो ईद (ईद और जुमा) इकट्ठी हो गई है, जो शख्स सिर्फ ईद पढ़ना चाहते हैं तो वह काफी है, लेकिन हम (ईद और जुमा) दोनो पढ़ेंगे" [अबू दाऊद: 1070-1071, 1073]
ज़ैद: इन शा अल्लाह कभी ईद जुमा के दिन पड़ी तो हम भी दोनों ईद की नमाज़ें पढ़ेंगे। बाबा ईद की नमाज़ से मुताल्लिक़ और कुछ भी बतायें?
मुहम्मद: अच्छा, तो क्या आपको पता है, ईद (सलात अल-ईद) की नमाज़ में तकबीरात की तदाद कितनी होगी?
ज़ैद: नहीं।
मुहम्मद: इस नमाज़ में 12 ज़ायद (एक्स्ट्रा) तकबीरें होती हैं। 7 तकबीरें पहली रकत में और 5 दूसरी रकत में। इन्हें तकबीरें "तकबीरातें ज़वायद" कहते हैं। हमें भी 12 ज़याद तकबीरें पढ़नी है क्यूंकि रसूल अल्लाह (ﷺ) ने ईद की पहली रकत में सात (7) तकबीरें और दूसरी रकत में पांच (5) तकबीरें कही। [तिर्मिज़ी 536] पर ये सुन्नत है, फ़र्ज़ या वाजिब नहीं है। इनके छूट जाने से भी नमाज़ हो जाएगी।
ज़ैद: ओह्ह! बाबा मुझे नमाज़ का मुख़्तसर तरीक़ा बताये।
मुहम्मद: (ज़ैद को नमाज़ का तरीका बताया।) मेरे बच्चे मुझेउम्मीद है आपको समझ आ गया होगा।
[जानने के लिए लिंक पर क्लिक करें ⇨ ईद की नमाज़ का तरीक़ा]
ज़ैद: जी अल्हम्दुलिल्लाह।
मुहम्मद: चले अब मेरे साथ बुलंद आवाज़ में तकबीर कहें क्यूंकि ईदगाह को जाते हुए बुलंद आवाज से तकबीर कहना चाहिए, اللہ أکبرکبیراً، اللہ أکبرکبیراً، اللہ أکبر وأجل اللہ أکبر وللہ الحمد
ज़ैद: बाबा, क्या बुलंद आवाज़ में तकबीर कहना भी सुन्नत से साबित है?
मुहम्मद: इस सिलसिले में कोई मरफू हदीस तो साबित नहीं लेकिन सहाबा और ताबयीन से ये अमल मिलता है, वो ईदगाह जाते वक़्त बुलंद आवाज़ से तकबीर कहते थे [सुनन कुबरा लिल बहिएक़ी 03/279]
हज़रत इब्ने अब्बास रज़ि° अन्हुमा इन अल्फाज़ के साथ तकबीर कहते थे,
اللہ أکبرکبیراً، اللہ أکبرکبیراً، اللہ أکبر وأجل اللہ أکبر وللہ الحمد
(अल्लाहु अकबर कबीरन अल्लाहु अकबर कबीरन अल्लाहु अकबर व अजअल अल्लाहु अकबर वलिल्लाहिलहम्द) [मुसन्नफ इब्ने अबी शेयबा 02/168]
इसलिए हम भी कहेंगे, اللہ أکبرکبیراً، اللہ أکبرکبیراً، اللہ أکبر وأجل اللہ أکبر وللہ الحمد
ज़ैद: اللہ أکبرکبیراً، اللہ أکبرکبیراً، اللہ أکبر وأجل اللہ أکبر وللہ الحمد
(मस्जिद में दाखिल हो कर)
मुहम्मद: जी। आ जायें मेरे बगल में बैठे, अभी नमाज़ में थोड़ा वक्त है।
ज़ैद: बाबा अभी खुतबा होगा क्या?
मुहम्मद: नहीं बेटा, पहले नमाज़ होगी फिर खुतबा।
ज़ैद: लेकिन जुमा की नमाज़ में पहले खुतबा होता है फिर नमाज़ तो ईद में ऐसा क्यूँ जब कि दोनों मे दो रकात और सूरतें भी ये दोनों पढ़ी जाती है?
मुहम्मद: जी, आपकी ये बात तो सही है पर रसूलुल्लाह (ﷺ) ईदुल-अज़हा और ईदुल-फ़ित्र की नमाज़ पहले पढ़ते फिर नमाज़ के बाद ख़ुतबा देते। [बुखारी 957] इसलिए हमें भी ऐसा ही करना है।
ज़ैद: जज़ाक अल्लाह ख़ैर बाबा
मुहम्मद: वा इय्याक बेटा।
ज़ैद: बाबा हम यूँ ही बैठे है क्यूँ ना हम नफिल नमाज़ें पढ़ लें?
मुहम्मद: नहीं बेटा, नबी करीम (ﷺ) ने ईदुल-फ़ित्र के दिन दो रकअतें पढ़ीं न उन से पहले कोई नफ़ल पढ़ी न उन के बाद। [बुखारी 964] इसलिए हम भी क्यूँ पढ़ें जब हमारे प्यारे नबी (ﷺ) ने नहीं पढ़ी।
चलें खड़े हो जायें इमाम साहब आ गए।
ज़ैद: (नमाज़ अदा करने के बाद) बाबा अब खुतबा होगा।
मुहम्मद: जी बेटा, अब ख़ामोशी और ध्यान से खुतबा सुनें।
ज़ैद: जी, इन शा अल्लाह।
मुहम्मद: "तक़ब्बल्लाहु मिन्ना वा मिंकुम" (تَقَبَّلَ اللهُ مِنَّا وَمِنكُم) (अपने बेटे को मुबारक़बाद देते हुए कहता है) ईद के दिन जब सहाबा एक दूसरे से मिलते तो ये दुआ पढ़ते थें जिसका मतलब है "अल्लाह ताला हमारी और आप सबकी नमाज़, ज़कात और दीगर सारी जानी और माली इबादतों को क़ुबूल फरमाये और हम सबकी मगफिरत फरमाये। आमीन [फत-उल-बारी, 2/446]
ज़ैद: बाबा मुझे ये दुआ नहीं याद और अभी मुझे अपने दोस्तों को मुबारकबाद देना है तो मई क्या करू (रोनी सी सूरत में)
मुहमम्मद: कोई बात नहीं बीटा बेटा, ईद मुबारक कहना भी जायज़ है पर दुआ कहना रसूल अल्लाह (ﷺ) और सहाबाओं की सुन्नत है।
ज़ैद: बाबा कोई दूसरी दुआ नहीं पढ़ सकते क्या? जो मुझे याद हो।
मुहम्मद: जी पढ़ सकतें हैं सूरह अल हश्र (59) आयत 10, मा शा अल्लाह जो आपको याद भी है।
الَّذِيۡنَ جَآءُوۡ مِنۡۢ بَعۡدِهِمۡ يَقُوۡلُوۡنَ رَبَّنَا اغۡفِرۡ لَـنَا وَلِاِخۡوَانِنَا الَّذِيۡنَ سَبَقُوۡنَا بِالۡاِيۡمَانِ وَلَا تَجۡعَلۡ فِىۡ قُلُوۡبِنَا غِلًّا لِّلَّذِيۡنَ اٰمَنُوۡا رَبَّنَاۤ اِنَّكَ رَءُوۡفٌ رَّحِيۡمٌ
"या अल्लाह, हमारे और हमारे भाईयो के जो हमसे पहले ईमान लाए हैं, के गुनाह माफ़ फरमा और मोमिनो की तरफ से हमारे दिल में कीना (हसद) पैदा न होने दे, या रब तू बड़ा शफ़क़त करने वाला और मेहरबान है।"
ज़ैद: जज़ाक अल्लाह खैर बाबा। इन शा अल्लाह मैं रसूल अल्लाह (ﷺ) की दुआ आज ही याद कर लूंगा फिर अपने दोस्तों को भी याद कराऊंगा। अभी मै दादा जी को मुबारकबाद देके आता हूँ।
(सबको मुबारकबाद देने के बाद घर की तरफ रुख करते ही)
ज़ैद: बाबा हम इधर से क्यों क्यों जा रहे हैं?
मुहम्मद: क्यूंकि ऐसा करना सुन्नत ए रसूल (ﷺ) है बेटा। जब ईद का दिन होता रसूल अल्लाह (ﷺ) रास्ता तबदील करते यानी एक रास्ते से जाते तो वापसी के वक्त दूसरा रास्ता इख्तियार करते। [बुखारी 986]
ज़ैद: मतलब, ईद की नमाज़ के लिए जिस रास्ते से जाएं उस रास्ते से ना लौटें बल्कि दूसरे रास्ते से घर आए। अगर कोई दूसरा रास्ता ना हो तो रास्ते से लौटाएं, सही कहा न बाबा?
मुहम्मद: जी बेटा मा शा अल्लाह।
ज़ैद: बाबा आज मुझे बहुत सी नई बातें पता चली है, मै इन्हे अपने दोस्तों को बताऊंगा ताकि अगले साल हम सब मिल कर सुन्नत के मुताबिक ईद मनाये।
मुहम्मद: इन शा अल्लाह बेटा। मा शा अल्लाह बातों बातों में हम इतनी जल्दी घर आ गए पता ही नहीं चला।
ज़ैद: (घर पहुँचते है अपने दादी, वालिदह और छोटे भाई अब्दुर्रहमान को देखते ही) अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु, "तक़ब्बल्लाहु मिन्ना वा मिंकुम"।
उम्मीद है आपको इस छः साला बच्चे की ज़ुबानी ईद की सुन्नतें समझ आई होंगी। उम्मीद करती हूँ हर वालिदैन अपनी औलाद की तरबीयत इसी तरह करने की कोशिश करेंगे। बच्चा वही करता है जो अपने अपनों/बड़ों को करता देखता है या यूँ कहूं के बच्चे कोरे क़ाग़ज़ की तरह होते है अब ये आप पर है आप उस पर क्या लिखते है और इसके लिए आपको एक खास कलम चाहिए जिसे कहते हैं "अख़लाक़" और इसकी स्याही आपके अपने "अमल"। "जितनी अच्छी स्याही होगी उतनी अच्छी लिखावट"।
जितनी भी अहादीस का हवाला दिया गया है सब सहीह हदीस से साबित है और रिफरेन्स नंबर लिखने में काफ़ी एहतियात बरती गयी है फिर भी अगर कोई गलती हुई हो तो अहले इल्म से गुजारीश है कि हमारी इस्लाह करें।
जज़ाक अल्लाहुम्मा खैरन कसिरा
By: Islamic Theology
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