रमज़ान का आखिरी जुमा (अलविदा)
{इस दिन के मुताल्लिक कुछ ग़लत फेहमीयां}
बाज़ लोगों में यह गलतफहमियां पाई जाती हैं कि रमजान के आखिरी जुमा को 5 नमाजे वित्र के साथ पढ़ ली जाए तो सारी उम्र की कजा नमाज अदा हो जाती है।
ये क़तन बातिल ख्याल हैं रमज़ान की खुसूसीयात फज़ीलत व अज्र व सवाब कि ज़्यादती अपनी जगह लेकिन एक दिन की क़ज़ा नमाज़े पढ़ने से एक दिन ही की अदा होंगी सारी उम्र की नहीं।
बात को लंबा ना करते हुए मैं उन हदीसो को पेश करूंगा जिसकी वजह से इस दिन को खास इबादत का माना जाता है।
1. हदीस: 70 साल की फौतशुदा नमाज़ो का इज़ाला
''من قضی صلوٰۃ من الفرائض فی اخر جمعۃ من رمضان کان ذلک جابرا لکل صلوٰۃ فائتۃ فی عمرہ الی سبعین سنۃ''
जिसने रमजान के आखिरी जुमा में एक फर्ज नमाज अदा कर ली इससे इसकी 70 साल की फौतशुदा नमाज़ो का इज़ाला हो जाएगा
मुल्ला अली क़ारी इस हदीस के बारेँ में कहते हैं-
٭قال علي القاري في موضوعاته الصغرى والكبرى حدیث *''من قضی صلوٰۃ من الفرائض فی اخر جمعۃ من رمضان کان ذلک جابرا لکل صلوٰۃ فائتۃ فی عمرہ الی سبعین سنۃ'' باطل قطعياً، لأنه مناقض للإجماع على أن شيئاً من العبادات لا يقوم مقام فائتة سنوات، ثم لا عبرة بنقل صاحب النهاية ولا بقية شراح الهداية لأنهم ليسوا من المحدثين ولا أسندوا الحديث إلى أحد المخرجين، انتهى*
मुल्ला अली क़ारी मोज़ूआत ए कबीर में कहते हैं जिसने रमजान के आखिरी जुमा में एक फर्ज नमाज अदा कर ली इससे इसकी 70 साल की फौतशुदा नमाज़ो का इज़ाला हो जाएगा यकीनी तौर पर बातिल है क्योंकि इस इजमा के मुख़ालिफ़ हैं कि इबादत में से कोई शय साबिक़ा (पिछली ) सालो कि फोतशुदा इबादत के क़ायम मक़ाम नहीं हो सकती। [अल आसार ए मरफूआ फी अल अख़बारुल मोज़ूआत सफा 85]
पता चला ये हदीस मनगढ़त हैं।
इमाम इब्ने हजर की तोहफा शरह मिन्हाजुल इमाम नववी में फिर अल्लामा जुरक़ानी शरह मवाहिब इमाम क़स्तालानी रहीमल्लाह में फरमाते हैं-
اقبح من ذلک مااعتید فی بعض البلاد من صلوٰۃ الخمس فی ھذہ الجمعۃ عقب صلٰوتھا زاعمین انھا تکفر صلٰوۃ العام اوالعمر المتروکۃ و ذلک حرام لوجوہ لا تخفی
इससे भी बदतर वो तरीका हैं 2 शहरों में इजाद कर लिया गया है की जुमा के बाद पांच नमाजे इस गुमान से अदा कर ली जाए कि इससे सालिया पिछले तमाम उम्र की नमाज़ो का कफ़्फारा है और यह अमल इसी वजह की बुनियाद पर हराम है जो निहायत ही वाज़ह हैं। [शरह ज़ुरक़ानी अलल मवाहिब दुन लदुन्नीया 07/110]
2. एक झूठी हदीस: क़यामत तक बेइंतेहा इबादत का सवाब हासिल करने वाली नमाज़
रमजान के आखिरी जुमा को जोहर की नमाज के बाद 2 रकात नमाज पढ़े पहली रकात में सूरह फातिहा के बाद सूरह जलजला एक बार सूरह इखलास 10 बार दूसरी में सूरह फातिहा के बाद सूरह काफीरुन 3 बार पढे सलाम के बाद 10 बार दुरूद पढ़ें। [पाकिस्तानी पंसूरह ]
यह तरीका दुनिया की किसी हदीस की किताब से साबित नहीं यह अपनी तरफ से खुद बनाकर गढ़ लिया गया है | जिस अमल पर नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम की मोहर ना हो वह अमल मरदूद है।
हजरत आयशा रजि° अन्हा फरमाती है, "नबी सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम ने फरमाया ए आयेशा जो मेरे इस दीन में कोई नया तरीका जारी करेगा अगर उस पर मेरा हुकुम ना हो वह अमल रद्द है।" [बुखारी 2697]
मुहम्मद
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