क़ुरआन को एक दिन मे मुकम्मल पढ़ना कैसा है?
आज हम इस बात को जानेंगे कि 1 दिन मे पूरा कुरान पढ़ना कैसा है?
लेकिन उससे पहले आइए हम कुछ बातें निकाती कर लेते हैं दीन को समझने के लिए सबसे पहले हमें यह देखना चाहिए कि जो अमल हम कर रहे उस पर नबी सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम और साहबा का अमल था या नहीं?
जिस अमल को आप चाहे बेहतर ही क्यों ना समझ रहे हो अगर उस अमल पर नबी और सहाबा की मुहर ना लगी हो तो वह अमल बिदात है।
मिसाल: अगर कोई इंसान नमाज़ में दो सजदे की बजाय तीसरा सजदा इसलिए कर दे कि इसमें अल्लाह की हम्द और सना ज़्यादा होगी तो मुझको सवाब मिलेगा।
तो ऐसा अमल बिदात और नबी की मुखालिफत होगी।
जैसा कि नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने फरमाया:
"مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ فِيهِ فَهُوَ رَدٌّ"
''जिसने हमारे दीन में से ख़ुद कोई ऐसी चीज़ निकाली जो उसमें नहीं थी तो वो रद्द है।" [बुखारी 2697]
कुछ मिसाल आपके सामने क़ुरआन से और एक हदीस से रख रहा हुँ-
पहली आयत: अल्लाह तआला फरमाता हैं :-
"ऐ ईमान वालो! अल्लाह और उसके रसूल के आगे न बढ़ा करो, और अल्लाह से डरते रहो। अल्लाह यक़ीनन सब कुछ सुनता, सब कुछ जानता है।" [सुरह हुजरात 01]
इस आयत मे कहा गया हैं रसूल से आगे ना बढ़ो यानी दीन के हर मामले में नबी सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम को अपना आईडियल मानना है उसके (आइडियल) हुकुम के अलावा अपनी तरफ से कुछ इजाफा कर दें तो वह आयत के तहत होगा कि रसूल के आगे ना बढ़ो।
इससे अगली आयत मे अल्लाह फरमाता हैं :-
"ऐ ईमान वालो! अपनी आवाज़ें नबी की आवाज़ से बुलन्द मत किया करो, और न उनसे बात करते हुए इस तरह ज़ोर से बोला करो जैसे तुम एक-दूसरे से ज़ोर से बोलते हो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे आमाल बरबाद हो जायें और तुम्हें पता भी न चले।" [सुरह हुजरात 02]
इस आयत से वाज़ेह हो रहा हैं नबी अलैहिस्सलाम कि आवाज़ से बुलंद आवाज़ ना की जाए अगर ऐसा किया तो आमाल बर्बाद हो जायेंगे।
बाज़ उलेमाओ ने ज़ाहिरी माना भी लिया हैं यानी नबी कि मौजूदगी मे उनसे बुलंद आवाज़ ना करो बाज़ ने कहा हैं नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जितना बताया हैं दीन मे उससे आगे ना बढ़ो।
इमाम बुखारी इस आयत कि तफसीर मे एक हदीस लाए हैं-
हदीस मुलाहिज़ा फ़रमाए,
क़रीब था कि वो सबसे बेहतर लोग तबाह हो जाएँ यानी अबू-बक्र और उमर (रज़ि०) उन दोनों हज़रात ने नबी करीम (सल्ल०) के सामने अपनी आवाज़ बुलन्द कर दी थी। ये उस वक़्त का वाक़िआ है जब बनी-तमीम के सवार आए थे (और नबी करीम (सल्ल०) से उन्होंने दरख़ास्त की कि हमारा कोई अमीर बना दें) उन में से एक (उमर (रज़ि०)) ने मुजाशेअ के अक़रअ-बिन-हाबिस के इन्तिख़ाब के लिये कहा था और दूसरे (अबू-बक्र (रज़ि०)) ने एक-दूसरे का नाम पेश किया था। नाफ़ेअ ने कहा कि उन का नाम मुझे याद नहीं। इस पर अबू-बक्र (रज़ि०) ने उमर (रज़ि०) से कहा कि आपका इरादा मुझसे इख़्तिलाफ़ करना ही है। उमर (रज़ि०) ने कहा कि मेरा इरादा आप से इख़्तिलाफ़ करना नहीं है। इस पर उन दोनों की आवाज़ बुलन्द हो गई। फिर अल्लाह तआला ने ये आयत उतारी يا أيها الذين آمنوا لا ترفعوا أصواتكم ''ऐ ईमान वालो! अपनी आवाज़ को नबी की बुलन्द आवाज़ से न किया करो" الخ। अब्दुल्लाह-बिन-ज़ुबैर (रज़ि०) ने बयान किया कि इस आयत के नाज़िल होने के बाद उमर (रज़ि०) नबी करीम (सल्ल०) के सामने इतनी आहिस्ता-आहिस्ता बात करते कि आप साफ़ सुन भी न सकते थे और दोबारा पूछना पड़ता था। उन्होंने अपने नाना यानी अबू-बक्र (रज़ि०) के मुताल्लिक़ इस सिलसिले में कोई चीज़ बयान नहीं की। [सहीह बुखारी 4845]
पता चला कि नबी अलैहिस्सलाम कि मुख़ालिफत करना इसी हुक्म मे आएगा कि नबी से आगे बढ़के अपनी शरीयत बना देंगे।
अब आते हैं एक दिन मे क़ुरआन पूरा पढ़ना कैसा?
इस पर वाज़ेह हुक्म मौजूद हैं कि नबी अकरम (सल्ल०) ने फ़रमाया :
"उसने क़ुरआन समझा ही नहीं जिसने तीन दिन से कम मुद्दत में क़ुरआन ख़त्म कर डाला।" [तिरमिज़ी 2949]
इमाम तिरमिज़ी कहते हैं: ये हदीस हसन सही है।
इस हदीस से वाज़ेह पता चला कि तीन से पहले जिसने क़ुरआन पढ़ा उसने इसका हक़ ही अदा ना किया।
अब अगर कोई एक दिन मे क़ुरआन पढ़े तो,
- क्या वो नबी अलैहिस्सलाम से आगे बढ़ना ना होगा?
- ये नया काम नहीं होगा?
- ये एक ऐसा काम ना होगा जिसपे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का हुक्म ना हैं और ना ही सहाबा का हुक्म क्या ये नया काम नहीं हैं?
- क्या ये क़ुरआन का एक दिन मे पढ़ना नबी के साहबाओ को नहीं पता था?
- उन्होंने आज तक क्यूं एक दिन मे क़ुरआन नहीं पढ़ा? क्या सहाबा को इसकी फ़ज़िलत पता नहीं थी?
नहीं बल्कि वो जानते थे जितना नबी अलैहिस्सलाम ने बताया हैं उतना ही हमको करना हैं उनसे आगे बढ़ना आमाल बर्बाद करने जैसा हैं।
अल्लाह दीन समझने कि तौफ़ीक़ दे
मुहम्मद
2 टिप्पणियाँ
माशा अल्लाह बहुत खूब
जवाब देंहटाएंआमीन
जवाब देंहटाएंकृपया कमेंट बॉक्स में कोई भी स्पैम लिंक न डालें।