Paigambar ko bheje jaane ko barish se tashbeeh karna

Paigambar ko bheje jaane ko barish se tashbeeh karna


पैगंबरों के भेजे जाने को बारिश से तशबीह

क़ुरआन में कई जगहों पर पैग़म्बरी और किताब के उतरने को बारिश की बरकतों से मिसाल दी गई है, क्योंकि इन्सानियत पर उसके वही असरात पड़ते हैं जो ज़मीन पर बारिश के पड़ा करते हैं। जिस तरह मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन रहमत की बारिश का एक छींटा पड़ते ही लहलहा उठती है, उसी तरह जिस देश में अल्लाह की रहमत से एक पैग़म्बर भेजा जाता है और वह्य और किताब का उतरना शुरू होता है, वहाँ मरी हुई इन्सानियत यकायक जी उठती है। उसके वो जौहर (छिपे हुए गुण) खुलने लगते हैं जिन्हें एक लम्बे अरसे से जाहिलियत ने मिटटी में दबाए रखा था। उसके अन्दर से बेहतरीन अख़लाक़ के चश्मे (स्रोत) फूटने लगते हैं और भलाइयों और नेकियों के बाग़ लहलहाने लगते हैं।

अल्लाह कुरान में फरमाता है:


وَ ہُوَ الَّذِیۡ یُرۡسِلُ الرِّیٰحَ بُشۡرًۢا بَیۡنَ یَدَیۡ رَحۡمَتِہٖ ؕ حَتّٰۤی اِذَاۤ اَقَلَّتۡ سَحَابًا ثِقَالًا سُقۡنٰہُ لِبَلَدٍ مَّیِّتٍ فَاَنۡزَلۡنَا بِہِ الۡمَآءَ فَاَخۡرَجۡنَا بِہٖ مِنۡ کُلِّ الثَّمَرٰتِ ؕ کَذٰلِکَ نُخۡرِجُ الۡمَوۡتٰی لَعَلَّکُمۡ تَذَکَّرُوۡنَ
"और वो अल्लाह ही है जो हवाओं को अपनी रहमत के आगे-आगे ख़ुश-ख़बरी लिये हुए भेजता है, फिर जब वो पानी से लदे हुए बादल उठा लेती हैं तो उन्हें किसी मुर्दा ज़मीन की तरफ़ चला देता है और वहाँ पानी बरसाकर [उसी मरी हुई ज़मीन से] तरह-तरह के फल निकाल लाता है। देखो, इस तरह हम मुर्दों को मौत की हालत से निकालते हैं, शायद कि तुम इस मुशाहिदे से सबक़ लो।"
[कुरआन 7:57]


وَ الۡبَلَدُ الطَّیِّبُ یَخۡرُجُ نَبَاتُہٗ بِاِذۡنِ رَبِّہٖ ۚ وَ الَّذِیۡ خَبُثَ لَا یَخۡرُجُ اِلَّا نَکِدًا ؕ کَذٰلِکَ نُصَرِّفُ الۡاٰیٰتِ لِقَوۡمٍ یَّشۡکُرُوۡنَ
"जो ज़मीन अच्छी होती है, वो अपने रब के हुक्म से ख़ूब फल-फूल लाती है और जो ज़मीन ख़राब होती है, उससे ख़राब पैदावार के सिवा कुछ नहीं निकलता। इसी तरह हम निशानियों को बार-बार पेश करते हैं उन लोगों के लिये जो शुक्रगुज़ार होनेवाले हैं।"
[कुरआन 7:58]


यहाँ एक लतीफ़ (सूक्ष्म) मज़मून बयान हुआ है जिससे ख़बरदार हो जाना अस्ल मक़सद को समझने के लिये ज़रूरी है। बारिश और उसकी बरकतों के ज़िक्र से इस मक़ाम पर ख़ुदा की क़ुदरत का बयान और मरने के बाद ज़िन्दगी का साबित करना भी मक़सद है और इसके साथ-साथ मिसालों के अन्दाज़ में पैग़म्बरी और उसकी बरकतों का और उसके ज़रिए से अच्छे और बुरे में और पाक व नापाक में फ़र्क़ नुमायाँ हो जाने का नक़्शा दिखाना भी पेशे-नज़र है। रसूल के आने और ख़ुदाई तालीम व हिदायत के उतरने को बारिश की हवाओं के चलने और रहमत के बादल के छा जाने और अमृत भरी बूँदों के बरसने से तशबीह (उपमा) दी गई है। 

फिर बारिश के ज़रिए से मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन के यकायक जी उठने और उसके पेट से ज़िन्दगी के ख़ज़ाने उबल पड़ने को उस हालत के लिये बतौर मिसाल पेश किया गया है जो नबी की तालीम व तरबियत और रहनुमाई से मुर्दा पड़ी हुई इंसानियत के यकायक जाग उठने और उसके सीने से भलाइयों के ख़ज़ाने उबल पड़ने की सूरत में ज़ाहिर होती है। 

फिर ये बताया गया है कि जिस तरह बारिश के बरसने से ये सारी बरकतें सिर्फ़ उसी ज़मीन को हासिल होती हैं जो हक़ीक़त में ज़रख़ेज़ (उपजाऊ) होती है और महज़ पानी न मिलने की वजह से जिसकी सलाहियतें दबी रहती हैं, इसी तरह रिसालत की इन बरकतों से भी सिर्फ़ वही इंसान फ़ायदा उठाते हैं जो हक़ीक़त में सालेह (नेक और भले) होते हैं और जिनकी सलाहियतों को महज़ रहनुमाई न मिलने की वजह से नुमायाँ होने और काम करने का मौक़ा नहीं मिलता। 

रहे शरारत-पसन्द और बुरे इंसान तो जिस तरह बंजर ज़मीन बारिश से कोई फ़ायदा नहीं उठाती, बल्कि पानी पड़ते ही अपने पेट के छिपे हुए ज़हर को काँटों और झाड़ियों की शक्ल में उगल देती है, इसी तरह पैग़म्बरों के आने से उन्हें भी कोई फ़ायदा नहीं पहुँचता, बल्कि इसके बरख़िलाफ़ उनके अन्दर दबी हुई तमाम ख़बासतें और ख़राबियाँ उभरकर पूरी तरह काम करने लगती हैं।

कुरआन ने बहुत-सी आयतों में लगातार तारीख़ी गवाहियाँ पेश करके वाज़ेह किया गया है कि हर ज़माने में नबी के भेजे जाने के बाद इंसानियत दो हिस्सों में बँटती रही है। एक अच्छा और पाकीज़ा हिस्सा जो पैग़म्बर की तालीम की बरकतों से फला और फूला और अच्छे फल-फूल लाया, दूसरा ख़राब और नापाक हिस्सा जिसने कसौटी के सामने आते ही अपनी सारी खोट नुमायाँ करके रख दी और आख़िरकार उसको ठीक उसी तरह छाँटकर फेंक दिया गया जिस तरह सुनार चाँदी-सोने के खोट को छाँट कर फेंकता है।


وَ ہُوَ الَّذِیۡۤ اَرۡسَلَ الرِّیٰحَ بُشۡرًۢا بَیۡنَ یَدَیۡ رَحۡمَتِہٖ ۚ وَ اَنۡزَلۡنَا مِنَ السَّمَآءِ مَآءً طَہُوۡرًا لِّنُحۡیِۦَ بِہٖ بَلۡدَۃً مَّیۡتًا وَّ نُسۡقِیَہٗ مِمَّا خَلَقۡنَاۤ اَنۡعَامًا وَّ اَنَاسِیَّ کَثِیۡرًا وَ لَقَدۡ صَرَّفۡنٰہُ بَیۡنَہُمۡ لِیَذَّکَّرُوۡا ۫ ۖفَاَبٰۤی اَکۡثَرُ النَّاسِ اِلَّا کُفُوۡرًا
"और वही है जो अपनी रहमत के आगे-आगे हवाओं को ख़ुशख़बरी बनाकर भेजता है। फिर आसमान से पाक पानी बरसाता है। ताकि एक मुर्दा इलाक़े को उसके ज़रिए से ज़िन्दगी दे और अपनी मख़लूक़ में से बहुत-से जानवरों और इन्सानों को सैराब करे।
इस करिश्मे को हम बार-बार उनके सामने लाते हैं ताकि वो कुछ सबक़ लें, मगर ज़्यादातर लोग (ख़ुदा का) इनकार और (उसकी) नाशुक्री के सिवा कोई दूसरा रवैया अपनाने से इनकार कर देते हैं।"
[कुरआन 25:48-50]


तौहीद की दलील, आख़िरत की दलील और सूखे मौसम से जाहिलियत की और रहमत की बारिश से वही और पैग़म्बरी की मिसाल, इन तीन पहलुओं को निगाह में रखकर देखा जाए तो आयत का मतलब ये है कि- 


1. पहला पहलू:

तौहीद की दलील के नज़रिये से देखा जाए तो आयत का मतलब ये है कि लोग आँखें खोलकर देखें तो सिर्फ़ बारिश के इन्तिज़ाम ही में अल्लाह के वुजूद और उसकी सिफ़ात और उसके सारे जहानों के अकेले रब होने पर दलील देनेवाली इतनी निशानियाँ मौजूद हैं कि सिर्फ़ वही उनको पैग़म्बर की तालीम तौहीद के सच्चे होने का इत्मीनान दिला सकती हैं। मगर बावजूद इसके कि हम बार-बार इस बात की तरफ़ ध्यान दिलाते हैं और बावजूद इसके कि दुनिया में पानी बाँटने के ये करिश्मे नित नए अन्दाज़ से एक के बाद एक उनकी निगाहों के सामने आते रहते हैं, ये ज़ालिम कोई सबक़ नहीं लेते। न हक़ और सच्चाई को मानकर देते हैं, न अक़ल और फ़िक्र की उन नेमतों का शुक्र अदा करते हैं जो हमने उनको दी हैं और न इस एहसान के लिये शुक्रगुज़ार होते हैं कि जो कुछ वो ख़ुद नहीं समझ रहे थे, उसे समझाने के लिये क़ुरआन में बार-बार कोशिश की जा रही है।


2. दूसरा पहलू:

आख़िरत की दलील के नज़रिये से देखा जाए तो इसका मतलब ये है कि हर साल हक़ के इन इन्कारियों के सामने गर्मी और सूखे से अनगिनत जानदारों पर मौत छा जाने और फिर बरसात की बरकत से मुर्दा पेड़-पौधों और कीड़ों-मकोड़ों के जी उठने का मंज़र आता रहता है, मगर सब कुछ देखकर भी ये बेवक़ूफ़ मौत के बाद की ज़िन्दगी को नामुमकिन ही कहते चले जाते हैं। बार-बार इन्हें हक़ीक़त की इस खुली निशानी की तरफ़ ध्यान दिलाया जाता है, मगर कुफ़्र और इनकार की बर्फ़ है कि किसी तरह नहीं पिघलती, अक़ल और देखने की ताक़त की नेमत की नाशुक्री है कि किसी तरह ख़त्म नहीं होती और याद दिलाने और तालीम देने की नाशुक्री है कि बराबर हुए चली जाती है।


3.  तीसरा पहलू:

सूखे मौसम से जाहिलियत की और रहमत की बारिश से वही और पैग़म्बरी की मिसाल को निगाह में रखकर देखा जाए तो आयत का मतलब ये है कि इन्सानी इतिहास के दौरान में बार-बार ये मंज़र सामने आता रहा है कि जब कभी दुनिया नबी और अल्लाह की किताब की नेमत से महरूम हुई, इन्सानियत बंजर हो गई और फ़िक्र और अख़लाक़ (सोच और अमल) की ज़मीन में काँटेदार झाड़ियों के सिवा कुछ न उगा। और जब कभी वह्य और पैग़म्बरी का अमृत इस सरज़मीन को मिल गया, इन्सानियत का चमन लहलहा उठा। जहालत और ला-इल्मी की जगह इल्म ने ले ली। ज़ुल्म-ज़्यादती की जगह इन्साफ़ क़ायम हुआ। बुराइयों और गुनाहों की जगह अख़लाक़ी ख़ूबियों के फूल खिले। जिस कोने में जितना भी उसका फ़ायदा पहुँचा, बुराई कम हुई और भलाई में इज़ाफ़ा हुआ। नबियों का आना हमेशा एक ख़ुशगवार और फ़ायदेमंद फ़िक्री (वैचारिक) और अख़लाक़ी इंक़िलाब ही की वजह बना है, कभी इससे बुरे नतीजे ज़ाहिर नहीं हुए। और नबियों की हिदायत से महरूम होकर या उससे मुँह फेरकर हमेशा इन्सानियत ने नुक़सान ही उठाया है, कभी इससे अच्छे नतीजे नहीं निकले। ये मंज़र इतिहास भी बार-बार दिखाता है और क़ुरआन भी इसकी तरफ़ बार-बार ध्यान दिलाता है, मगर लोग फिर भी सबक़ नहीं लेते। एक आज़माई हुई हक़ीक़त है जिसकी सच्चाई पर हज़ारों साल के इन्सानी तजरिबे की मुहर लग चुकी है, मगर इसका इनकार किया जा रहा है और आज ख़ुदा ने नबी (पैग़म्बर) और किताब की नेमत से जिस बस्ती को नवाज़ा है, वो इसका शुक्र अदा करने के बजाए उलटी नाशुक्री करने पर तुली हुई है।


اَللّٰہُ الَّذِیۡ یُرۡسِلُ الرِّیٰحَ فَتُثِیۡرُ سَحَابًا فَیَبۡسُطُہٗ فِی السَّمَآءِ کَیۡفَ یَشَآءُ وَ یَجۡعَلُہٗ کِسَفًا فَتَرَی الۡوَدۡقَ یَخۡرُجُ مِنۡ خِلٰلِہٖ ۚ فَاِذَاۤ اَصَابَ بِہٖ مَنۡ یَّشَآءُ مِنۡ عِبَادِہٖۤ اِذَا ہُمۡ یَسۡتَبۡشِرُوۡنَ وَ اِنۡ کَانُوۡا مِنۡ قَبۡلِ اَنۡ یُّنَزَّلَ عَلَیۡہِمۡ مِّنۡ قَبۡلِہٖ لَمُبۡلِسِیۡنَ فَانۡظُرۡ اِلٰۤی اٰثٰرِ رَحۡمَتِ اللّٰہِ کَیۡفَ یُحۡیِ الۡاَرۡضَ بَعۡدَ مَوۡتِہَا ؕ اِنَّ ذٰلِکَ لَمُحۡیِ الۡمَوۡتٰی ۚ وَ ہُوَ عَلٰی کُلِّ شَیۡءٍ قَدِیۡرٌ
"अल्लाह ही है जो हवाओं को भेजता है और वो बादल उठाती हैं, फिर वो इन बादलों को आसमान में फैलाता है जिस तरह चाहता है और उन्हें टुकड़ियों में तक़सीम करता है, फिर तू देखता है कि बारिश के क़तरे बादल में से टपके चले आते हैं। ये बारिश जब वो अपने बन्दों में से जिनपर पर चाहता है बरसाता है तो यकायक वो ख़ुश व ख़ुर्रम हो जाते हैं हालाँकि उसके नाज़िल होने से पहले वो मायूस हो रहे थे। देखो अल्लाह की रहमत के असरात कि मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन को वो किस तरह जिला उठाता है, यक़ीनन वो मुर्दों को ज़िन्दगी बख़्शनेवाला है और वो हर चीज़ पर क़ादिर है।"
[कुरआन 30:48-50]


यहाँ जिस अन्दाज़ से नुबूवत और बारिश का ज़िक्र एक के बाद एक किया गया है उसमें एक बारीक इशारा इस हक़ीक़त की तरफ़ भी है कि नबी या पैग़म्बर का आना भी इन्सान की अख़लाक़ी ज़िन्दगी के लिये वैसी ही रहमत है जैसी बारिश का आना उसकी माद्दी (भौतिक) ज़िन्दगी के लिये रहमत साबित होता है। जिस तरह आसमानी बारिश के पड़ने से मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन यकायक जी उठती है और उसमें खेतियाँ लहलहाने लगाती हैं, उसी तरह आसमानी वह्य का उतरना अख़लाक़ और रूहानियत की वीरान पड़ी हुई दुनिया को जिला उठाता है और उसमें नेकियों और भलाइयों के बाग़ लहलहाने शुरू हो जाते हैं। ये इनकार करनेवालों की अपनी बदक़िस्मती है कि ख़ुदा की तरफ़ से ये नेमत जब उनके यहाँ आती है तो वो उसकी नाशुक्री करते हैं और उसको अपने लिये रहमत की ख़ुशख़बरी समझने के बजाय मौत का पैग़ाम समझ लेते हैं।


اِعۡلَمُوۡۤا اَنَّ اللّٰہَ یُحۡیِ الۡاَرۡضَ بَعۡدَ مَوۡتِہَا ؕ قَدۡ بَیَّنَّا لَکُمُ الۡاٰیٰتِ لَعَلَّکُمۡ تَعۡقِلُوۡنَ
"ख़ूब जान लो कि अल्लाह ज़मीन को उसकी मौत के बाद ज़िन्दगी बख़्शता है, हमने निशानियाँ तुमको साफ़-साफ़ दिखा दी हैं, शायद कि तुम अक़्ल से काम लो।"
[कुरआन 57:17]


यहाँ जिस मुनासिबत और अनुकूलता से ये बात कही गई है उसको अच्छी तरह समझ लेना चाहिये। क़ुरआन में कई जगहों पर पैग़म्बरी और किताब के उतरने को बारिश की बरकतों से मिसाल दी गई है, क्योंकि इन्सानियत पर उसके वही असरात पड़ते हैं जो ज़मीन पर बारिश के पड़ा करते हैं। जिस तरह मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन रहमत की बारिश का एक छींटा पड़ते ही लहलहा उठती है, उसी तरह जिस देश में अल्लाह की रहमत से एक पैग़म्बर भेजा जाता है और वह्य और किताब का उतरना शुरू होता है, वहाँ मरी हुई इन्सानियत यकायक जी उठती है। उसके वो जौहर (छिपे हुए गुण) खुलने लगते हैं जिन्हें एक लम्बे अरसे से जाहिलियत ने मिटटी में दबाए रखा था। उसके अन्दर से बेहतरीन अख़लाक़ के चश्मे (स्रोत) फूटने लगते हैं और भलाइयों और नेकियों के बाग़ लहलहाने लगते हैं। इस हक़ीक़त की तरफ़ जिस ग़रज़ के लिये यहाँ इशारा किया गया है वो ये है कि कमज़ोर ईमानवाले मुसलमानों की आँखें खुलें और वो अपनी हालत पर ग़ौर करें। 

पैग़म्बरी और वह्य की रहमत भरी बारिश से इन्सानियत जिस शान से नए सिरे से ज़िन्दा हो रही थी और जिस तरह उसका दामन बरकतों से मालामाल हो रहा था, वो उनके लिये कोई दूर की दास्तान न थी। वो ख़ुद अपनी आँखों से सहाबा किराम (रज़ि०) के पाकीज़ा समाज में इसको देख रहे थे। रात-दिन इसका तजरबा उनको हो रहा था। जाहिलियत भी अपनी तमाम ख़राबियों और बिगाड़ों के साथ उनके सामने मौजूद थी, और इस्लाम से पैदा होनेवाली ख़ूबियाँ भी उनके मुक़ाबले में अपनी पूरी बहार दिखा रही थीं। इसलिये उनको तफ़सील के साथ ये बातें बताने की कोई ज़रूरत न थी। बस ये इशारा कर देना काफ़ी था कि मुर्दा ज़मीन को अल्लाह अपनी रहमत भरी बारिश से किस तरह ज़िन्दगी देता है, उसकी निशानियाँ तुमको साफ़-साफ़ दिखा दी गई हैं, अब तुम ख़ुद अक़्ल से काम लेकर अपनी हालत पर ग़ौर कर लो कि इस नेमत से तुम क्या फ़ायदा उठा रहे हो।


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