Nabaligh Bachche Ke Peeche Namaz

 

Kya nabaligh bachche ke peeche namaz padhan jayaz hai?


क्या ना बालिग़ बच्चे के पीछे नमाज़ पढ़ना जायज़ हैं?

 आज हम इस विषय पर चर्चा करेंगे किसी ना बालिग बच्चे के पीछे नमाज़ पढ़ना कैसा है?

हमारे मुआशरे में ये ग़लतफ़हमी है के नाबालिग़ के पीछे नमाज़ क़ुबूल नहीं होती, जिस वजह से कई जगह मस्जिदों में जो लोग देर से आते हैं और अगर उनके सामने कोई नाबालिग लड़का नमाज़ की नियत बांधे खड़ा मिलता है तो बाज़ लोग उस लड़के को खींच कर पीछे करने की कोशिश करते हैं और कर भी देते हैं, जिससे उसकी नमाज़ भी डिस्टर्ब होती है और आस पास वालों की भी और बेवजह आगे घुसने की कोशिश में रहते हैं। ला शऊर बच्चों के अलावा बाज़ लोग 8 -10 साल के लड़के जो माशाअल्लाह अभी अभी दीन के शुरूआती मकाम पर होते हैं और तक़वे की बेहतरीन हालत में होते हैं। उनको नमाज़ के एहकाम अच्छी तरह पता होते हैं। इस अंदाज़ से उन नाबालिग लड़कों की नमाज़ के साथ साथ उनके ज़हन पर भी गलत असर पड़ता है। 

 इस मोज़ू के मुतालिक एक मशहूर हदीस  आपके सामने पेश ऐ खिदमत  कर रहा हूं। 

 ▪️सैयदना सलिमा बिन क़ैस जुर्मी रज़ि अन्हु (सहाबी कबीर) के बेटे सय्यदना उमरो इब्ने सलिमा जुर्मी रज़ि अन्हु (सहाबी सगीर /तक़रीब उत तहज़ीब 5042) से रिवायत हैं


 जब मेरे वालिद अपने वफ्द के साथ नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के पास से आए तो कहा

फिर जब (मदीना) से वापस आए तो कहा कि मैं अल्लाह की क़सम एक सच्चे नबी के पास से आ रहा हूँ। उन्होंने फ़रमाया है कि फ़ुलाँ नमाज़ इस तरह फ़ुलाँ वक़्त पढ़ा करो और जब नमाज़ का वक़्त हो जाए तो तुममें से कोई एक शख़्स अज़ान दे और इमामत वो करे जिसे क़ुरआन सबसे ज़्यादा याद हो। लोगों ने अन्दाज़ा किया कि किसे क़ुरआन सबसे ज़्यादा याद है तो कोई शख़्स उन के क़बीले मैं मुझसे ज़्यादा क़ुरआन याद करने वाला उन्हें नहीं मिला। क्योंकि मैं आने जाने वाले सवारों से सुन कर क़ुरआन मजीद याद कर लिया करता था। इसलिये मुझे लोगों ने इमाम बनाया। हालाँकि उस वक़्त मेरी उमर छः या सात साल की थी और मेरे पास एक ही चादर थी। जब मैं (इसे लपेट कर) सजदा करता तो ऊपर हो जाती (और पीछे की जगह) खुल जाती। इस क़बीले की एक औरत ने कहा,  तुम अपने पढ़नेवाला का पीठ तो पहले छिपा दो। आख़िर उन्होंने कपड़ा ख़रीदा और मेरे लिये एक क़मीस बनाई  मैं जितना ख़ुश इस क़मीस से हुआ इतना किसी और चीज़ से नहीं हुआ था।

सहीह बुखारी  4302



 ~इस हदीस से मालूम हुआ कि ना बालिग़ हाफिज ए कुरान नमाज की इमामत करा सकता है

~ अगर कोई शख्स कहे कि इस सहाबी कि शर्मगाह तो हालत ऐ नमाज में नंगी हो जाती थी


 तो इसके चार जवाब है

  1. यह वाकिया जानबूझकर नहीं बल्कि कभी कबार मजबूरी और हालात ऐ इज़तरार (बे इख़्तियारी ) में हो जाता था। 
  2. बाद में सैयदना उमरो जुर्मी रज़ि अन्हु को जब चादर मिल गई तो शर्मगाह के ला इलमी व इज़तरारी हालत मे नंगा हो जाने वाला मसला भी ख़त्म हो गया। 
  3. जानबूझकर हालत ऐ नमाज में शर्मगाह नंगी करना किसी हदीस से साबित नहीं है। 
  4. ला इलमी और इज़तरारी हालत के अलावा अगर शर्मगाह के नंगा करने का जवाज़ कोई अगर कोई तकलीदी फ़क़ीहा कहीं से ढूंढ भी निकाले तो अर्ज़ हैं कि सहीह बुखारी (367) कि हदीस कि

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने समाअ (wrapping ones body with a garment so that one cannot raise its end or take ones hand out of it) कि तरह कपड़ा बदन पर लपेट लेने से मना फरमाया और इससे भी मना फरमाया कि आदमी एक कपड़े में एहतबा (sitting on buttocks with knees close to abdomen and feet apart with the hands circling the knees) करें और उसकी शर्मगाह पर अलैहदा कोई दूसरा कपड़ा ना हो.

इस हदीस कि रू से ये अमल मंसूख (जिस पर अमल नहीं किया जाता )


दलील 02

▪️सय्यदना अबू सईद खुदरी रज़ि अन्हु से रिवायत हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया

जब (नमाज़ पढ़ने वाले) तीन  हों तो उन  में से एक उनकी इमामत कराए और उनमें से इमामत का ज़्यादा हक़दार वो है। जो उनमें से ज़्यादा (क़ुरआन) पढ़ा हो

सहीह मुस्लिम 672


 इस हदीस से पता चला कि जिसे सबसे ज्यादा कुरान याद हो वह इमामत कराये चाहे वह  छोटा ही क्यों ना हो


▪️हज़रत अबू-मसऊद अंसारी (रज़ि०) से रिवायत की, कहा :

 रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया :

लोगों की इमामत वो कराए जो उन  में से किताबुल्लाह को ज़्यादा पढ़ने वाला हो। 

सहीह मुस्लिम 673


▪️ इमाम अबू अब्दुल्ला मोहम्मद बिन इदरीस शाफई रहिमाउल्लाह ने फ़रमाया :-

अगर ना बालिग़ कारी जो नमाज जानता हो बालिगो को नमाज़ पढ़ा दे तो जाएज़ हैं और (बेहतर ये हैं के ) बालिग़ की इमामत को  इख़्तियार करना चाहिए। 

किताब उल उम जिल्द 1सफा 166


अल्लाह दीन समझने की तौफ़ीक़ दे। 


दुआओ मे याद रखें

आपका दीनी भाई
मुहम्मद

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