Islam mein mard aur aurat ki ek dusre par fazilat

Islam Mein Mard Aur Aurat Ki Ek Dusre Par Fazilat

इस्लाम में मर्द और औरत की एक दूसरे पर फ़ज़ीलत 


अगर मर्द ने अपनी जिम्मेदारी कुरान और सुन्नत की रोशनी में निभाई होती तो औरत यूं चार दीवारी से जो बाहर ना आई होती ......

अल्लाह तआला फरमातें हैं:

"मर्द औरतों पर क़व्वाम  [ मामलों के ज़िम्मेदार] हैं,  इस बुनियाद पर अल्लाह ने उनमें से एक को दूसरे पर फ़ज़ीलत दी है। और इस बुनियाद पर कि मर्द अपने माल ख़र्च करते हैं। इसलिये जो नेक और भली औरतें हैं वो फ़रमाँबरदार होती हैं और मर्दों के पीछे अल्लाह की हिफ़ाज़त और निगरानी में उनके हक़ों की हिफ़ाज़त करती हैं।और जिन औरतों से तुम्हें सरकशी का डर हो उन्हें समझाओ, अपने बिस्तर अलग कर लो ,और ना मानें तो मारो, फिर अगर वो तुम्हारी बात मानने लगें तो बिला वजह उन पर हाथ चलाने के बहाने तलाश न करो। यक़ीन रखो कि ऊपर अल्लाह मौजूद है जो बड़ा और बालातर [सर्वोच्च] है।" [क़ुरान 4:34]


तफ्सीर:

मर्द औरतों पर कव्वाम है: कव्वाम उस शख्स को कहते हैं जो किसी फर्द या इदारे या निज़ाम के मामलात को दुरुस्त हालत में चलाने और इसकी हिफाजत और निगरानी करने और उसकी जरूरत पूरी करने का जिम्मेदार है।

अल्लाह ताला ने उनमें से एक दूसरे को  फजीलत दी है: यहां फजीलत का मतलब सर्फ, करामत और इज्जत नहीं है जैसा कि एक आम और खास आदमी  इस लफ्ज़  का मतलब लेगा यहां यह लफ्ज़ इस मायने में इस्तेमाल हुआ है कि इसमें से एक सिंफ (यानी मर्द को) कुछ ऐसी खुशुसियत और कुबतें अता की है जो दूसरी सिंफ यानी औरत को नहीं दी या इस से कम दी है इस बुनियाद पर खानदानी निजाम में मर्द ही कवाम होने की अहलि यत रखता है  और औरत फितरतन ऐसी बनाई गई है कि इसे खानदानी जिंदगी में मर्द की हिफाजत और खबरगिरी के तहत रहना चाहिए

उनके हुकूक की हिफ़ाज़त करती है: हदीस में आया है कि नबी करीम सल्लल्लाहो अलेही वाले वसल्लम ने फरमाया  बेहतरीन बीवी वह है की जब तुम उसे देखो तो तुम्हारा जी खुश हो जाए ,जब तुम उसे किसी बात का हुक्म  दो तो वह तुम्हारी इताआत करें और जब तुम घर में न हो तो वह तुम्हारे पीछे तुम्हारे माल और अपने नफ्स की हिफाजत करें यह हदीश इस आयत की बेहतरीन तकरीर बयान करती है  मगर यहां यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि औरत पर अपने सौहर की तरफ से ईकदाम अपने अल्लाह की इता यत है लिहाजा अगर कोई शौहर खुदा की माशियत का हुक्म दे या खुदा के आयद किए हुए किसी फर्ज से बाज रहने की कोशिश करें तो इसकी इताअ त से इंकार कर देना औरत का फर्ज है इस सूरत में वह उसकी बात मानेगी तो गुनाहगार होगी बखिलाफ इसके अगर शौहर अपनी बीवी को नफील नमाज़ या नफल रोजे तर्क करने के लिए कहे तो लाजिम है कि वह उसकी इताअत करें इस सूरत में अगर वह नवाफिल अदा करेगी तो मकबूल ना होंगे।

ख्वाबगाह अलग कर लो और मारो: यहां यह मतलब नहीं है कि तीनों काम एक वक्त में ही कर डाले जाएं बल्कि मतलब यह है कि नुसुज की हालत में इन तीनों तदवीरों की इजाजत है अब रहा इन पर अमल दरामद तो बहर हाल उसमें कसूर और सजा के दरमियान तनाशुब होना चाहिए और जहां हल्की नरमी से बात बन जाए वहां शक्ति से काम ना लेना चाहिए नबी करीम सल्लल्लाहो अलेही वाले वसल्लम ने बीवियों को मारने की जब कभी इजाजत दी तो बिना दिल से और बासाख्ता (अवांछित) दी।

और फिर भी इसे नापसंद ही फरमाया,

मगर कुछ औरतें ऐसी होती हैं जो पीटे बगैर दुरुस्त ही नहीं हो सकती। इसी हालत में नबी करीम सल्लल्लाहो अलेही वाले वसल्लम ने हिदायत फरमाया है कि "मुंह पर न मारा जाए, बेरहमी से न मारा जाए और किसी ऐसी चीज़ से ना मारा जाए कि जिस्म पर निशान छोड़ जाए।"

अल्लाह के कलाम पर अमल ही इमान का हिस्सा है अल्लाह हमें सही रास्ते पर चलने की तौफीक अता फरमाए आमीन 

अबू हुरैरा राज़ी° रिवायत करते हैं की रसूलुल्लाह सल्लाह अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:-

"सबसे कामिल मोमिन वो है जिसके अखलाक सबसे बेहतर हो और तुम में सबसे बेहतर वो है जो अपनी बीवियों के लिए बेहतर हों" [तिर्मिज़ी: किताब अल रीजा, 1162]

इतना तो अंदाजा होगा ही कि वह खुद बहार ना आई उसे इस मुकाम पर लाने वाला भी मर्द ही है।

लाचारी और बेबसी में जब घर की दहलीज से निकलकर बाहर आई तो तागूत ने भी उसे हक दिलाने के नाम पर हाथों हाथ लिया।

कभी महिला सशक्तिकरण के नाम पर, कभी तीन तलाक के नाम पर तो कभी शिक्षा के नाम पर।

हमने अपनी बच्चियों को जंगली जानवरों के हवाले खुद ही कर दिया है।

अपनी बच्चियों को दुनियावी तालीम के साथ दीनी तालीम से  जोड़े, वर्ना हालत और भी बद से बदतर होंगे।

अल्लाह सुबहान व ताला अमल की तौफीक अता फरमाए, अमीन।


मुसन्निफ़ा (लेखिका): फिरोज़ा खान


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