Khulasa e Qur'an - Para 2 (Sayaqool)| Surah Baqarah

Khulasa e Qur'an - Para 2 (Sayakool)| Surah Baqarah

क़ुरआन सारांश [खुलासा क़ुरआन]
दूसरा पारा - सयक़ूल
[सूरह अल बक़रह]


بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
(अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील, अत्यन्त दयावान है)


 पारा (02) सयक़ूल


(i) तहवीले क़िब्ला:

मदीना की तरफ़ हिजरत करने के बाद 16 या 17 महीने तक बैतुल मुक़द्दस ही क़िब्ला रहा। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ख़्वाहिश थी कि ख़ाना ए काबा क़िब्ला हो। अल्लाह तआला ने यह ख़्वाहिश पूरी कर दी। (144)


(ii) बीच की उम्मत:

यह उम्मत बीच की उम्मत है इसलिए यह लोगों पर गवाह है और रसूल इस उम्मत पर गवाह है। (143)


(iii) आयाते बिर और अबवाबे बिर:

لَّيْسَ الْبِرَّ أَن تُوَلُّوا وُجُوهَكُمْ

(सूरह 2 अल बक़रह आयत 177)

यह आयत आयते बिर कहलाती है। इसमें तमाम अहकामात, अक़ाएद, इबादात, मुआमिलात, मुआशिरत और अख़लाक़ का संक्षेप में वर्णन है। आगे अब्वाबे बिर में विस्तार पूर्वक वर्णन है-

(1) सफ़ा मरवा की सई (हल्की दौड़) 
(2) हराम क़रार दिया गया मुर्दार, खून, सुअर का मांस, और जिस पर अल्लाह के इलावा किसी और के नाम लिया गया हो, 
(3) क़िसास (बदला), 
(4) वसीयत, 
(5) रोज़े, 
(6) एतेकाफ़, 
(7) हराम कमाई, 
(8) क़मरी (चांद की) तारीख़ 
(9) जिहाद 
(10) हज्ज 
(11) इनफ़ाक़ फ़ी स बीलिल्लाह, (अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करना 
(12) हिजरत, 
(13) शराब और जूआ, 
(14) मुशरेकीन से निकाह, 
(15) हैज़ में संभोग, 
(16) ईला (बीवियों से अलग रहने की क़सम खाना), 
(17) तलाक़, 
(18) इद्दत, 
(19) रज़ाअत (दूध पिलाने की मुद्दत), 
(20) महर 
(21) हलाला, 
(22) इद्दत गुज़ारने वाली औरत को निकाह का पैग़ाम देना।


(iv) मोमिनों की आज़माइश और सब्र:

जन्नत की मंज़िल आसान नहीं है, ईमान लाने वाले यह न समझें कि उन्हें दुनिया में ऐसे ही छोड़ दिया जाएगा बल्कि खौफ़, भूख, जान, माल और और रोजगार में घाटा डाल कर उन्हें आज़माया जाएगा। इनसे पहले के लोगों को ऐसी तकलीफ़ और परेशानियों में डाला गया, और उन्हें इस क़दर हिला मारा गया कि रसूल और उनके मानने वाले पुकार उठे कि अल्लाह की मदद कब आएगी? लेकिन उन संगीन हालात में जो सब्र और नमाज़ से मदद ले उसे जन्नत की ख़ुशख़बरी भी सुनाई गई है और मोमिन तो वास्तव में वही है जो हर मुसीबत और ग़म पर إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّآ إِلَيۡهِ رَٰجِعُونَ (इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजेऊन = हम अल्लाह ही के हैं और अल्लाह ही की तरफ़ पलटकर जाना है) पढ़े। (153 से 156)


(v) क़ुरआन के पैग़ाम को छुपाने वालों पर अल्लाह की लानत:

"जो लोग अल्लाह की रौशन तालीमात [खुली शिक्षाओं] और हिदायतों को छुपाते हैं उन पर अल्लाह भी लानत करता है और सभी लानत करने वाले भी उनपर लानत करते हैं। इसके इलावा जो लोग मुख़्तलिफ़ तरीक़ा से क़ुरआन की आयतों का व्यपार करते हैं वह अपने पेट मे आग भरते हैं। (आयत 159 और 174)


(vi) अल्लाह अपने बंदों से बहुत क़रीब है:

मेरे बन्दे अगर तुमसे मेरे बारे में पूछें तो उन्हें बता दो कि मैं उनसे क़रीब ही हूँ। पुकारने वाला जब मुझे पुकारता है, मैं उसकी पुकार सुनता और जवाब देता हूँ। (आयत 186)


(vii) तलाक़ के नियम:

◆ तीन तलाक़ तीन बार में है। दो बार तीन मासिक धर्म के अंदर रूजूअ किया जा सकता है। तीसरी बार में रुजूअ की कोई गुंजाइश बाक़ी नहीं रहती, 
◆ तलाक़ मासिक धर्म में नहीं बल्कि पाकी को हालत में दी जाय, 
◆ एक बार में एक तलाक़ दी जाय, 
◆ एक तलाक़ के बाद, 'इद्दत तीन मासिक धर्म होगी। 
◆ पहले और दूसरे तलाक़ के बाद इद्दत के दौरान बीवी अपने शौहर के साथ ही रहेगी ताकि वह दोनों अगर चाहें तो रुजूअ कर सकें। 
◆ रुजूअ करने में बीवी को किसी भी किस्म की तकलीफ़ पहुंचाना हरगिज़ मक़सूद न हो, 
◆ अगर रुजूअ न किया हो तो भी इद्दत गुज़रने के बाद उन्हें अख़्तियार होगा कि वह चाहें तो दोनों दोबारा निकाह कर सकते हैं, 
◆ तीन तलाक़ के बाद शौहर और बीवी दोनों का निकाह नहीं हो सकता जबतक कि उस औरत का निकाह किसी और मर्द से बग़ैर किसी शर्त के हो और वह तलाक़ दे दे या उसकी मृत्यु हो जाय तो फिर उस औरत का निकाह पहले शौहर से हो सकता है, 
◆ एक बार में तीन तलाक़ देना वास्तव में शरीअत का मज़ाक़ उड़ाना है, 
◆ हलाला का मौजूदा रायेज तरीक़ा हराम है क्योंकि शर्तिया शादी इस्लाम में हराम है। शर्तिया निकाह के कारण ही मुतआ हराम है। 
◆ इद्दत के दौरान गर्भ को औरतें न छुपाएं क्योंकि अगर गर्भ है तो बच्चा पैदा होने के बाद ही किसी से निकाह हो सकता है। 

(227 से 232)


(viii) क़िस्सा तालूत:

बनी इस्राईल में इस क़दर बिगाड़ आ गया था कि एक नबी के अपने दरम्यान मौजूद होते हुए उनसे एक बादशाह बनाने की मांग कर रहे थे लेकिन जब तालूत को बादशाह बना दिया गया तो बहुत कम लोगों ने तालूत की बात मानी लेकिन उन्होंने तादाद में कम होने के बावजूद अल्लाह के हुक्म से जालूत के लश्कर को परास्त कर दिया। (246 से 251)।


(ix) और इब्राहीम की दुआ क़ुबूल हो गई:

इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने जो दुआ की थी कि "ऐ रब ! इन लोगों में ख़ुद इन्हीं की क़ौम से एक ऐसा रसूल उठा" वह दुआ क़ुबूल हो गई और अल्लाह ने इस्माईल अलैहिस्सलाम की नस्ल क़ुरैश में उन्हीं में से मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को आख़िरी नबी बना कर भेजा

"हमने तुम्हारे बीच ख़ुद तुम में से एक रसूल भेजा, जो तुम्हें हमारी आयतें सुनाता है, तुम्हारी ज़िंदगियों को सँवारता है, तुम्हें किताब और हिकमत [तत्वदर्शिता] की तालीम देता है, और तुम्हें वह बातें सिखाता है जो तुम न जानते थे" (आयत 151)


आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
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