Kaynaat aur insan ke wajood se maut ke baad ki zindagi ki daleel

 

Kaynaat aur insan ke wajood se maut ke baad ki zindagi ki daleel

इंसान के वजूद में और कायनात में मौत के बाद की ज़िंदगी के दलाईल

اَوَ لَمۡ یَتَفَکَّرُوۡا فِیۡۤ اَنۡفُسِہِمۡ ۟ مَا خَلَقَ اللّٰہُ السَّمٰوٰتِ وَ الۡاَرۡضَ وَ مَا بَیۡنَہُمَاۤ اِلَّا بِالۡحَقِّ وَ اَجَلٍ مُّسَمًّی ؕ وَ اِنَّ کَثِیۡرًا مِّنَ النَّاسِ بِلِقَآیِٔ رَبِّہِمۡ لَکٰفِرُوۡنَ
"क्यों इन्होंने कभी अपनी आपमें ग़ौर-फ़िक्र नहीं किया? अल्लाह ने ज़मीन और आसमानों को और उन सारी चीज़ों को जो इनके बीच हैं बरहक़ और एक मुक़र्रर मुद्दत ही के लिये पैदा किया है। मगर बहुत से लोग अपने रब की मुलाक़ात के मुनकिर हैं।"
[कुरआन 30:8]


इंसान के वजूद से दलील

ऊपर की आयत में अल्लाह का यह कहना कि क्यों इन्होंने कभी अपने आप में ग़ौर-फ़िक्र नहीं किया? आख़िरत पर बजाए ख़ुद एक मुस्तक़िल ज़ोरदार दलील है। इसके मायने ये हैं कि अगर ये लोग बाहर किसी तरफ़ निगाह दौड़ाने से पहले ख़ुद अपने वजूद पर ग़ौर करते तो उन्हें अपने अन्दर ही वो दलीलें मिल जातीं जो मौजूदा ज़िन्दगी के बाद दूसरी ज़िन्दगी की ज़रूरत साबित करती हैं। 

इनसान की तीन ख़ूबियाँ ऐसी हैं जो उसको ज़मीन की दूसरी मौजूदा चीज़ों से अलग करती हैं।

1. एक ये कि, ज़मीन और उसके माहौल की बेशुमार चीज़ें ऐसी हैं जो सिर्फ़ उसके लिये पैदा की गई हैं, और उन पर उसका क़ब्ज़ा उसको दे दिया गया है।

2. दूसरे, ये कि इसे अपनी ज़िन्दगी की राह में फ़ैसले लेने के लिये आज़ाद छोड़ दिया गया है। ईमान और कुफ़्र, इताअत और नाफ़रमानी, नेकी और बदी की राहों में से जिस राह पर भी जाना चाहे जा सकता है। हक़ और बातिल, सही और ग़लत, जिस तरीक़े को चुनना चाहे चुन सकता है। हर रास्ते पर चलने के लिये उसे तौफ़ीक़ दे दी जाती है और उस पर चलने में वो ख़ुदा के फ़राहम किये हुए ज़रिए को इस्तेमाल कर सकता है। चाहे वो ख़ुदा की इताअत का रास्ता हो या उसकी नाफ़रमानी का रास्ता।

3. तीसरे, ये कि उसमें पैदाइशी तौर पर अख़लाक़ की समझ रख दी गई है जिसकी बिना पर वो आमाल के इख़्तियार और ग़ैर-इख़्तियार आमाल में फ़र्क़ करता है, आमाल के इख़्तियार पर नेकी का हुक्म लगाता है, और एहतियात के तौर पर ये राय क़ायम करता है कि अच्छा अम्ल जज़ा का और बुरा अम्ल सज़ा का मुस्तहिक़ होना चाहिए।

ये तीनों ख़ूबियाँ जो इन्सान के अपने वजूद में पाई जाती हैं, इस बात की निशानदेही करती हैं कि कोई वक़्त ऐसा होना चाहिए जब इन्सान से हिसाब लिया जाए। जब उससे पूछा जाए कि जो कुछ दुनिया में उसको दिया गया था, उस पर इख़्तियारात को उसने किस तरह इस्तेमाल किया? जब ये देखा जाए कि उसने अपनी चुनने की आज़ादी को इस्तेमाल करके सही रास्ता चुना या ग़लत? जब उसके इख़्तियार व आमाल की जाँच की जाए और नेक अमल पर जज़ा और बुरे अमल पर सज़ा दी जाए। ये वक़्त लामुहाला इन्सान का कारनामा-ए ज़िन्दगी ख़त्म और उसका दफ़्तरे-अमल बन्द होने के बाद ही आ सकता है न कि उससे पहले। और ये वक़्त ज़रूर उसी वक़्त आना चाहिए जबकि एक फ़र्द या एक क़ौम का नहीं बल्कि तमाम इन्सानों का दफ़्तरे-अमल बन्द हो। क्योंकि एक फ़र्द या एक क़ौम के मर जाने पर उन असरात का सिलसिला ख़त्म नहीं हो जाता जो उसने अपने आमाल की बदौलत छोड़े हैं। उसके छोड़े हुए अच्छे या बुरे असरात भी तो उसके हिसाब में शामिल होने चाहिएँ। ये असरात जब तक पूरी तरह ज़ाहिर न हो लें, इंसाफ़ के मुताबिक़ पूरा हिसाब करना और पूरी जज़ा या सज़ा देना कैसे मुमकिन है ? इस तरह इन्सान का अपना वजूद इस बात की गवाही देता है, और ज़मीन में इन्सान को जो हैसियत हासिल है वो आप-से-आप इस बात का तक़ाज़ा करती है कि दुनिया की मौजूदा ज़िन्दगी के बाद एक दूसरी ज़िन्दगी ऐसी हो जिसमें अदालत क़ायम हो, इन्साफ़ के साथ इन्सान के कारनामा-ए ज़िन्दगी का हिसाब किया जाए, और हर शख़्स को उसके काम के लिहाज़ से जज़ा दी जाए।


कायनात से दलील

अल्लाह ने इंसान के अपने वजूद से मौत के बाद की ज़िंदगी की दलील देने के बाद फरमाया कि:

अल्लाह ने ज़मीन और आसमानों को और उन सारी चीज़ों को जो इनके बीच हैं बरहक़ और एक मुक़र्रर मुद्दत ही के लिये पैदा किया है।

इस फिक़रे में आख़िरत की दो मज़ीद दलीलें दी गई हैं, इसमें बताया गया है कि अगर इन्सान अपने वजूद से बाहर की कायनात के निज़ाम को ग़ौर से देखे तो उसे दो हक़ीक़तें बिल्कुल साफ़ नज़र आएँगी।  

1. एक ये कि, ये कायनात हक़ के साथ बनाई गई है, ये किसी बच्चे का खेल नहीं है कि महज़ दिल बहलाने के लिये उसने एक बे-ढंगा सा घरौंदा बना लिया हो, जिसका बनाना और बिगाड़ना दोनों ही बेमाना हों। बल्कि ये एक संजीदा निज़ाम है जिसका एक-एक ज़र्रा इस बात पर गवाही दे रहा है कि उसे हिकमत के कमाल दर्जे पर बनाया गया है जिसकी हर चीज़ में एक क़ानून काम कर रहा है, जिसकी हर चीज़ एक मक़सद के तहत है, इन्सान का सारा ध्यान और उसकी पूरी मईशत (अर्थव्यवस्था) और उसके तमाम उलूम व फ़ुनून ख़ुद इस बात पर गवाह हैं। दुनिया की हर चीज़ के पीछे काम करने वाले क़ानून को खोजकर और हर चीज़ जिस मक़सद के लिये बनाई गई है उसे तलाश करके ही इन्सान यहाँ ये सब कुछ बना सका है। वरना बे ज़ाब्ता और बे मक़सद खिलोने में अगर एक पुतले की हैसियत से उसको रख दिया गया होता तो किसी विज्ञान और किसी तहज़ीब और तमद्दुन का तसव्वुर तक न किया जा सकता था, अब आख़िर ये बात तुम्हरी अक़्ल में कैसे समाती है कि जिस हकीम ने इस हिकमत और मक़सदियत के साथ ये दुनिया बनाई है और उसके अन्दर तुम जैसी एक मख़्लूक़ को आला दर्जे की ज़हनी और जिस्मानी ताक़तें देकर, इख़्तियारात देकर, चुनने कि आज़ादी देकर, अख़लाक़ की तमीज़ देकर अपनी दुनिया का बेशुमार सरो सामान तुम्हारे हवाले किया है, उसने तुम्हें बे मक़सद ही पैदा कर दिया होगा। तुम दुनिया में तामीर व तहज़ीब और नेकी व बदी, और ज़ुल्म व इंसाफ़, और अमानतदारी और ग़ैर-अमानतदारी के सारे हंगामे बरपा करने के बाद बस यूँ ही मर कर मिट्टी में मिल जाओगे। और तुम्हारे किसी अच्छे या बुरे काम का कोई नतीजा न होगा, तुम अपने एक-एक अमल से अपनी और अपने जैसे हज़ारों इन्सानों की ज़िन्दगी पर और दुनिया के बहुत सारे संसाधनों पर बहुत से फ़ायदेमन्द या नुक़सानदायक असरात डाल कर चले जाओगे। और तुम्हारे मरते ही ये सारा काम यूँ ही लपेट कर दरिया में फेंक दिया जाएगा।

2. दूसरी हक़ीक़त जो इस कायनात के निज़ाम का मुताला करने से साफ़ नज़र आती है वो ये है कि, यहाँ किसी चीज़ के लिये भी हमेशगी नहीं है, हर चीज़ के लिये एक उम्र तय है जिसे पहुँचने के बाद वो ख़त्म हो जाती है। और यही मामला मजमूई हैसियत से पूरी कायनात का भी है। यहाँ जितनी ताक़तें काम कर रही हैं वो सब एक हद में हैं, एक वक़्त तक ही वो काम कर रही हैं और किसी वक़्त पर उन्हें अपने आप ख़र्च हो जाना और इस निज़ाम को ख़त्म हो जाना है। पुराने ज़माने में तो इल्म की कमी की वजह से उन दार्शनिकों और वैज्ञानिकों की बात कुछ चल भी जाती थी जो दुनिया को हमेशा रहने वाली क़रार देते थे। मगर मौजूदा विज्ञान ने दुनिया के ख़त्म होने की बहस में, जो एक लम्बे अर्से से ख़ुदा के माननेवालों और न माननेवालों के बीच चली आ रही थी, क़रीब क़रीब पूरी तरह से अपना वोट ख़ुदा के माननेवालों के हक़ में डाल दिया है। अब ख़ुदा के न माननेवालों के लिये अक़्ल और हिकमत का नाम लेकर ये दावा करने की कोई गुंजाइश बाक़ी नहीं रही है कि दुनिया हमेशा से है और हमेशा रहेगी, और क़ियामत कभी नहीं आएगी। पुरानी माद्दा-परस्ती (भौतिकवाद) का सारा दारोमदार इस ख़्याल पर था कि माद्दा (Matter) ख़त्म नहीं हो सकता, सिर्फ़ सूरत बदली जा सकती है। मगर हर तब्दीली के बाद माद्दा माद्दा ही रहता है, और इसकी मात्रा (quantity) में कोई कमी नही होती। इस बिना पर ये नतीजा निकाला जाता था कि इस दुनिया की न कोई शुरुआत है न कोई आख़िर। लेकिन अब परमाणु ऊर्जा (Atomic Energy) की खोज ने इस पुरे ख़्याल की बिसात उलट कर रख दी है। अब ये बात खुल गई है कि क़ुव्वत (Energy) माद्दे (Atom) में बदलती है, और माद्दा फिर क़ुव्वत में बदल जाता है। यहाँ तक कि न सूरत बाक़ी रहती है न ख़ाका। अब ऊष्मा गति के दूसरे क़ानून (Second law of Thermo dynamic) ने ये साबित कर दिया है कि ये माद्दी (भौतिक) दुनिया न तो सदा से हो सकती है और न ही सदा के लिये हो सकती है। इसको लाज़िमन एक वक़्त शुरू और एक वक़्त ख़त्म होना ही चाहिये। इसलिये साइंस की बुनियाद पर अब क़ियामत का इनकार मुम्किन नहीं रहा है। और ज़ाहिर बात है कि जब साइंस हथियार डाल दे तो फ़लसफ़ा किन टाँगों पर उठकर क़ियामत का इनकार करेगा?


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