अल्लाह ने अपने पैगंबरों को कौन-कौन सी निशानियाँ देकर भेजा?
अल्लाह ने जब भी इंसानों की हिदायत और रहनुमाई के लिए अपने पैगंबरों को भेजा तो उन्हे खुली-खुली निशानियों के साथ भेजा है जिन निशानियों को देखकर कोई भी अकल रखने वाला इंसान आसानी से पहचान लेगा कि ये शख्स वाकई अल्लाह का पैगम्बर है।
अल्लाह ने अपने पैगंबरों को तीन तरह की निशानियों के साथ भेजा है।
- एक ऐसी नुमायाँ अलामतें और निशानियाँ जो उनके अल्लाह की तरफ़ से मुक़र्रर किये होने का सुबूत थीं।
- दूसरी, ऐसी रौशन दलीलें जो उनकी पेश की हुई तालीम के हक़ होने का सुबूत दे रही थीं।
- तीसरी, ज़िन्दगी के मसायल और मामलों के बारे में ऐसी साफ़-साफ़ हिदायतें जिन्हें देखकर हर समझदार आदमी ये जान सकता था कि ऐसी पाकीज़ा तालीम कोई झूठा ख़ुदग़रज़ आदमी नहीं दे सकता।
यही वो खुली - खुली निशानियाँ थी जिन्हें अल्लाह के पैगम्बर लेकर आते थे और इन्ही निशानियों का जिक्र अल्लाह ने अपने सब पैगंबरों के लिए कुरआन में किया है-
(i) पैगंबर ईसा (आले०) के बारे में कुरआन ने कहा:
وَ لَمَّا جَآءَ عِیۡسٰی بِالۡبَیِّنٰتِ قَالَ قَدۡ جِئۡتُکُمۡ بِالۡحِکۡمَۃِ وَ لِاُبَیِّنَ لَکُمۡ بَعۡضَ الَّذِیۡ تَخۡتَلِفُوۡنَ فِیۡہِ ۚ فَاتَّقُوا اللّٰہَ وَ اَطِیۡعُوۡنِ
और जब ईसा खुली-खुली निशानियाँ लिये हुए आया था तो उसने कहा था कि “मैं तुम लोगों के पास हिकमत लेकर आया हूँ और इसलिये आया हूँ कि तुमपर कुछ उन बातों की हक़ीक़त खोल दूँ जिनमें तुम इख़्तिलाफ़ कर रहे हो, इसलिये तुम अल्लाह से डरो और मेरी पैरवी करो।"
[कुरआन 43:63]
(ii) पैगंबर यूसुफ (आले०) के बारे में कुरआन ने कहा:
"इससे पहले यूसुफ़ तुम्हारे पास खुली-खुली निशानियाँ लेकर आए थे।"
[कुरआन 40:34]
(iii) पैगंबर मूसा (आले०) के बारे में फ़िरऔन के दरबार से एक ईमानवाले शख्स ने कहा:
"इस मौक़े पर फ़िरऔन के लोगों में से एक ईमानवाला शख़्स, जो अपना ईमान छिपाए हुए था, बोल उठा, “क्या तुम एक आदमी को सिर्फ़ इस वजह से क़त्ल कर दोगे कि वो कहता है, मेरा रब अल्लाह है? हालाँकि वो तुम्हारे रब की तरफ़ से तुम्हारे पास खुली-खुली निशानियाँ ले आया।"
[कुरआन 40:28]
खुली-खुली निशानियों के लिए कुरआन में अस्ल अरबी में लफ़्ज़ बय्यिनात (खुली-खुली निशानियाँ) इस्तेमाल हुआ है, जो अपने अन्दर बहुत से मतलब और मानी रखता है। बय्यिन अरबी ज़बान में ऐसी चीज़ को कहते हैं जो बिल्कुल ज़ाहिर और वाज़ेह हो।
पैग़म्बरों (अलैहि०) के बारे में यह कहना कि वे बय्यिनात लेकर आते रहे, यह मानी रखता है कि:
- एक तो वह ऐसी साफ़ अलामतें और निशानियां लेकर आते थे जो इस बात की खुली गवाही देती थीं कि वे अल्लाह की तरफ़ से भेजे गए हैं।
- दूसरे, वे जो बात भी पेश करते थे बिल्कुल अक़्ल के मुताबिक़ और रौशन दलीलों के साथ पेश करते थे।
- तीसरे, उनकी तालीम में कोई उलझाव न था, बल्कि वह साफ़-साफ़ बताते थे कि हक़ क्या है और बातिल क्या, जाइज़ क्या है और नाजाइज़ क्या, किस राह पर इनसान को चलना चाहिए और किस राह पर न चलना चाहिए।
अल्लाह ने कुरआन में सूरा हदीद आयत 25 में कहा कि:
"हमने अपने रसूलों को साफ़-साफ़ निशानियों और हिदायत के साथ भेजा और उनके साथ किताब और मीज़ान नाज़िल की ताकि लोग इन्साफ़ पर क़ायम हों।"
[कुरआन 57:25]
इस आयत में अल्लाह ने पैग़म्बरों के मिशन का पूरा ख़ुलासा बयान कर दिया गया है, जिसे अच्छी तरह समझ लेना चाहिये। इसमें बताया गया है कि दुनिया में ख़ुदा के जितने पैगम्बर भी अल्लाह की तरफ़ से आए, वो सब तीन चीज़ें लेकर आए थे :
(1) बय्येनात, यानी खुली-खुली निशानियाँ जो साफ़ तौर से बता रही थीं कि ये सचमुच अल्लाह के रसूल हैं, बने हुए लोग नहीं हैं। रौशन दलीलें जो इस बात को साबित करने के लिये बिलकुल काफ़ी थीं कि जिस चीज़ को वो हक़ कह रहे हैं, वो सचमुच हक़ है और जिस चीज़ को वो बातिल ठहरा रहे हैं, वो सचमुच बातिल है। साफ़ हिदायतें जिनमें किसी शक-शुब्हे के बिना साफ़-साफ़ बता दिया गया था कि अक़ीदों, अख़लाक़, इबादात और मामलात में लोगों के लिये सीधी राह क्या है जिसे वो अपनाएँ और ग़लत रास्ते कौन-से हैं जिनसे वो बचें।
(2) किताब, जिसमें वो सारी तालीमात लिख दी गई थीं जो इन्सान की हिदायत के लिये दरकार थीं, ताकि लोग रहनुमाई के लिये उसकी तरफ़ पलटें।
(3) मीज़ान, यानी हक़ और बातिल का वो पैमाना जो ठीक-ठीक तराज़ू की तौल तौलकर वो बता दे कि ख़यालात, अख़लाक़ और मामलात में कमी और ज़्यादती की अलग-अलग इन्तिहाओं के बीच इन्साफ़ की बात क्या है।
इन तीन चीज़ों के साथ पैग़म्बरों को जिस मक़सद के लिये भेजा गया वो ये था कि दुनिया में इन्सान का रवैया और इन्सानी ज़िन्दगी निज़ाम, एक-एक शख़्स के तौर पर भी और इज्तिमाई तौर पर भी, इन्साफ़ पर क़ायम हो। एक तरफ़ हर इन्सान अपने ख़ुदा के हक़, अपने नफ़्स के हक़ और ख़ुदा के उन तमाम बन्दों के हक़, जिनसे उसको किसी तौर पर वास्ता पड़ता है, ठीक-ठीक जान ले और पूरे इन्साफ़ के साथ उनको अदा करे। और दूसरी तरफ़ इज्तिमाई ज़िन्दगी का निज़ाम ऐसे उसूलों पर बनाया जाए जिनसे समाज में किसी तरह का ज़ुल्म बाक़ी न रहे, तमद्दुन तहज़ीब (सभ्यता और संस्कृति) का हर पहलू कमी और ज़्यादती से बचा हुआ हो, इज्तिमाई ज़िन्दगी के तमाम हिस्सों और पहलुओं में सही-सही बैलेंस क़ायम हो, और समाज के तमाम लोग इन्साफ़ के साथ अपने हक़ पाएँ और अपने फ़र्ज़ और अपनी ज़िम्मेदारियाँ अदा करें।
दूसरे अलफ़ाज़ में पैग़म्बरों के भेजे जाने का मक़सद अलग-अलग शख़्स के साथ इन्साफ़ भी था और इज्तिमाई इन्साफ़ भी। वो एक-एक शख़्स की शख़्सी ज़िन्दगी में भी इन्साफ़ क़ायम करना चाहते थे, ताकि उसके ज़ेहन, उसकी सीरत, उसके किरदार और उसके बर्ताव में बैलेंस पैदा हो। और इन्सानी समाज के पूरे निज़ाम को भी इन्साफ़ पर क़ायम करना चाहते थे, ताकि व्यक्ति और समाज दोनों एक-दूसरे को रूहानी, अख़लाक़ी और माद्दी (भौतिक) कामयाबी में रुकावट बनने के बजाय हिमायती और मददगार हों।
जिन लोगों के पैगम्बर की खुली-खुली निशानियाँ देखने के बाद भी उन्हें झुठला दिया तो अल्लाह ने उन लोगों पर इस दुनिया में अजाब भेजा था।
"ये उनका अंजाम इसलिये हुआ कि उनके पास उनके रसूल खुली-खुली निशानियाँ लेकर आए और उन्होंने मानने से इनकार कर दिया। आख़िरकार अल्लाह ने उनको पकड़ लिया। यक़ीनन वो बड़ी क़ुव्वतवाला और सज़ा देने में बहुत सख़्त है।"
[कुरआन 40:22]
"इस अंजाम के मुस्तहिक़ वो इसलिये हुए कि उनके पास उनके रसूल खुली-खुली दलीलें और निशानियाँ लेकर आते रहे, मगर उन्होंने कहा "क्या इन्सान हमें हिदायत देंगे?" इस तरह उन्होंने मानने से इनकार कर दिया और मुँह फेर लिया, तब अल्लाह भी उनसे बेपरवाह हो गया और अल्लाह तो है ही बेनियाज़ और अपनी ज़ात में आप महमूद (बहुत तारीफ़ों वाला)।"
[कुरआन 64:6]
खुली-खुली निशानियाँ आने के बाद पैगंबरों को झुठलाने वाला जहन्नम में जायेगा।
قَالُوۡۤا اَوَ لَمۡ تَکُ تَاۡتِیۡکُمۡ رُسُلُکُمۡ بِالۡبَیِّنٰتِ ؕ قَالُوۡا بَلٰی ؕ قَالُوۡا فَادۡعُوۡا ۚ وَ مَا دُعٰٓؤُا الۡکٰفِرِیۡنَ اِلَّا فِیۡ ضَلٰلٍ
वो पूछेंगे, “क्या तुम्हारे पास तुम्हारे रसूल खुली-खुली निशानियाँ लेकर नहीं आते रहे थे?”
[कुरआन 40:50]
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