इश्क, मोहब्ब्त, प्यार और वेलेंटाइन डे
इरशाद ए बारी तआला है:
गलन भरी सर्दी की रूखसती और ठंडी हवाओं के झोंके के साथ फरवरी की आमद या फिर यूं कहें कि कुछ जवां दिलों की धड़कन!
न्यू जनरेशन का एक बड़ा तबका फरवरी का बेसब्री से इंतज़ार करता है अगर मैं कहूं कि आज हालात कुछ यूं हैं कि सिर्फ़ नई पीढ़ी ही नहीं बल्कि हर उम्र के लोग इस शैतानी और खुराफ़ाती अमल में सामिल होने लगें हैं।
सोशल मीडिया से लेकर आम जिन्दगी में देखें तो एक क्रेज़ नज़र आता है जहां इस वैलेंटाइन डे के लिए ना कोई उम्र की सीमा हैं न कोई बंधन।
अफ़सोस की बात है कि मुस्लिम मुआशरा भी चाहे लड़का हो या लड़की इस पश्चिमी वबा के ज़द में हैं, फरवरी माह का दूसरा सप्ताह जो आज उम्मते मुहम्मदिया के एक बड़े तबके को गुमराह कर रहा है लोग बिना जाने समझे इस सप्ताह को सेलिब्रेट कर रहे हैं, सेलिब्रेशन भी ऐसा कि मेहरम और ना मेहरम का कोई फ़र्क नहीं।
अगर आप मौजूदा हालात पर नज़र डालें तो बहुत से मुसलमान भी वक़्त के धारे में बहकर इसे गुनाह नहीं समझ रहे हैं बल्कि अपनी जिंदगी का खुबसूरत हिस्सा समझ लिया है, मुहब्बत के नाम पर ज़िनाकारी को प्रमोट किया जा रहा है। एक सप्ताह तक चलने वाले फ़हश और बेगैरत काम को स्पेशल वीक यानी....
- रोज डे,
- प्रपोज़ डे
- चॉकलेट डे
- टेडी डे
- प्रॉमिस डे
- किस डे
- हग डे
- वैलेंटाइन डे
इन सारे दिनों को मिला दें तो बनता है बेहयाई डे।
एक ऐसी बेहयाई का दिन जिसने मुस्लिम समुदाय की नई पीढ़ी को अपने ज़द में कुछ यूं जकड़ा है कि न तो कुछ दिखाई देता है न ही सुनाई। बेहयाई के इस दल दल में हमारी नई नश्ल धंसती जा रही है और हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं बल्कि इसे मुहब्बत का नाम देकर नई सोच, तालीम, तरक्की और आजाद-ख्याली के तौर पर आम किया जा रहा है।
बात करेंगे वेलेंटाइन डे के हवाले से इस्लामी नज़रिए की मगर इस से पहले इस दिन को सेलिब्रेट करने के हवाले से इसके एतिहासिक पहलू पर पर एक नजर डालते चलें-
वैलेंटाइन डे का इतिहास:
वैलेंटाइन डे एक रोमन त्योहार है। इस त्योहार की कहानी कुछ यूं बताई जाती है कि:
वैलेंटाइन एक पादरी का नाम था जो 270 ईसवी में रोम में रहता था। तत्कालीन इतिहास के परिप्रेक्ष्य में देखें तो उस समय रोम का राजा क्लॉडियस (Claudius) था, वह एक महत्वाकांक्षी राजा था। वह एक शक्तिशाली राज्य बनाना चहता था, इसके लिए उसने अपनी सैन्यशक्ति को मजबूत करने और साम्राज्य का विस्तार के लिए सैनिको के प्रेम संबंधों पर प्रतिबंध लगा दिया। उसका मानना था कि इससे सैनिकों का ध्यान भंग होता है जिसके कारण उसका राज्य शक्तिशाली नहीं बन सकता।
दुसरी तरफ, पादरी संत वैलेंटाइन प्रेम संबंधों को बढ़ावा दे रहा था, यही नहीं चुपके चुपके जो प्रेमी युगल उसके पास अपनी फ़रियाद लेकर आता वह उनका विवाह भी करवाने लगा। राजा को यह बात पता चली तो उसने संत वैलेंटाइन को जेल भिजवा दिया। जेल में रहते हुए भी संत ने प्रेम विवाह करवाना जारी रखा। ऐसा कहा जाता है कि जेल में ही उसे जेलर की बेटी से प्रेम हो गया। उसने अपनी प्रेमिका के नाम लव लेटर लिखा जिसमें उसने आखिर में लिखा "from your valentine" चूकि सेंट वेलेंटाइन ने राजा के प्रतिबंधों का उलंघन किया था अतः उसे मृत्यु दण्ड दिया गया।
जिस दिन उसे फांसी दी गई 14 फरवरी का दिन था, तब से संत वैलेंटाइन की याद में उसके समर्थकों ने 14 फरवरी को वैलेंटाइन डे के रुप में मनाना शुरू कर दिया।
कहानी चाहे कुछ भी रही हो अल्लाह बेहतर जानता है लेकीन पश्चिमी देशों का यह फेस्टिवल पुरी दुनियां के लोगों पर नशा बन कर छाया हुआ है जो बेहयाई और फहाशि को बढ़ावा दे रहा है, जिसकी वजह से निकाह जैसी पाक नेमत को छोड़ कर लोग "लिव इन रिलेशनशिप" की ओर माइल होते जा रहे हैं। अल्लाह ने इंसान को बाशउर पैदा किया है इसे ज़िंदगी जीने का तरीक़ा दिया है।
अगर हम दुनियां के किसी भी समाज और धर्म को देखें तो पाते हैं कि हर धर्म में जिन्दगी जीने के लिए शादी विवाह का एक सिस्टम बनाया गया है, इंडिया के विभिन्न समाज और धर्म का अध्ययन करें तो पाएंगे कि वहां विवाह जैसा सिस्टम काम कर रहा है फिर चाहे वो Hinduism, Buddhism Sikhism, या Jainism हो, नाजायज संबंध का सख्ती से निषेध करता है। मगर आज भारत सरकार भी "live in relationship", वेश्यावृत्ति, और समलैंगिकता जैसे गुनाहों को कानूनी मान्यता देकर बेहयाई को आम करने पर तुली हुई है।
मै अक्सर लड़कियों को देखती हूं गैर मेहरम के लिए सजती संवरती, अकेले में मिलती हैं उन्हें अपना कीमती समय देती है ऐसी लडकियां सिर्फ़ अपने शर्म व हया का सौदा करती हैं। अपनी इज़्जत का सौदा करती हैं।
अगर हम इस्लामी तालिमात पर गौर व फ़िक्र करें तो ये बात समझ में आती है कि,
"हर वो अमल जो गुनाह की ओर ले जाए, फहाशि और बेहयाई को आम करे मोमिन के दिल से ईमान को चुरा लेता है।"
ईरशाद ए बारी ताला है:
"और ज़िना के क़रीब भी न जाओ! बेशक वो बुराई और बुरी राह है।
[अल-इसरा आयत 32]
इस आयत से पता चलता है कि ज़िना (व्यभिचार) बहुत बडा गुनाह है।
हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है कि वो बेहयाई से बचे
बेहयाई एक ऐसी बुराई है जिसे आज के वक़्त में बुराई ही नहीं माना जा रहा है, तो फिर सोचें कि वैलेंटाइन डे के नाम नाजायज़ मुहब्बत को जो हवा दी जा रही है क्या वो सही है या फिर अल्लाह के कानून की खिलाफ़वर्जी? क्या मोहब्बत किसी दिन या डेट की मोहताज है?
अक्सर लोग एक दूसरे से पूछते हैं, क्या आप ने कभी सच्चा प्यार किया है?
ये सवाल मुझे अजीब लगता है, आप में से बहुत सारे लोगों की इस विषय पर अलग अलग राय होगी और मेरी बातों से इख्तिलाफ़ भी। मगर मेरा मानना ये है कि मुहब्बत सच्ची और झूठी नहीं होती और ना तो वो पहली और आखिरी। "मुहब्बत- सिर्फ़ मुहब्बत होती है।"
ये तो एक रूहानी जज़्बा है जो हर एक इंसान में होता है।
मुहब्बत एक फिरती जरुरत है जो रूहानी सुकून का जरिया है। इस रू ए ज़मीन पर कोई शख़्स ऐसा नहीं जिसे मुहब्बत न हो, मुहब्बत कोई गुनाह नहीं है बशर्ते कि वो पाक हो।
यूं तो मुहब्बत जैसे जज्बे के कई खुबसूरत रूप होते हैं जैसे मां बाप, भाई बहन, औलाद और दोस्त और दीगर अहल व अयाल की मुहब्बत। मगर मुहब्बत का सबसे खुबसूरत रूप हसबैंड और वाइफ के बीच की है और दुनियां का सबसे खुबसूरत रिश्ता भी यही है जो निकाह के जरिए वजूद में आता है।
अगर मैं कहूं कि मुहब्बत का इज़हार एक दिन क्यों हर पल हर लम्हा क्यूं नहीं? जैसे हम अपने हर रिश्ते को अलग अलग तरीके से मुहब्बत का इज़हार करें-
वालदेन से मुहब्बत का इज़हार: रोज़ शाम कुछ पल उनके पास बैठें कुछ बातें करें, थोड़ी उनकी खिदमत करें ताकि अल्लाह भी राजी हो।
मुहब्बत का इज़हार अपने शरीक ए हयात से: शौहर का अपनी बीवी से मुहब्बत का इज़हार जायज़ भी है हलाल भी है और सदका ए जरिया भी। दिन भर की भाग दौड़ से थोड़ा वक्त निकाले उसे थोड़ा वक्त दें। इसकी छोटी मोटी जरूरतों का ख्याल रखें, खाश कर उसके जज़्बात का, सप्ताह में एक बार उसे कहीं घुमाने ले जाएं, उसके पसंद का कोई तोहफ़ा पेश करें फिर देर किस बात की सुन्नत को आम करें, निकाह करें! फिर अपनी बीवी को रोज़ एक Red Rose पेश करें!
इसी तरह बीवी को भी चाहिए कि वो अपने शौहर से मुहब्बत का इज़हार करे। उसकी पसंद और नापसंद का ख्याल रखें, शौहर बाहर से थक हार कर आए तो उसे पानी, चाय या काफी पेश करे, अगर किचन का काम ज़रूरी भी है तो उसे कुछ देर के लिए रोक दे, थोड़ा बन संवर कर मुस्कुरा कर इस्तक़बाल करे, आते ही शिकायतों का पिटारा न खोल ले।
अल्लाह रब्बुल इज़्जत ने अपने आखिरी हिदायत की क़िताब कुरान में तमाम इंसानो को बेहयाई और बेशर्मी के कामों से रोकने का हुक्म कई बार दिया है। आइए एक नजर डालते हैं-
अल्लाह का फ़रमान है:
"बेशक अल्लाह तआला अद्ल-इन्साफ़ और एहसान और रिश्ते जोड़ने का हुक्म देता है और बुराई और बेहयाई और ज़ुल्म व ज़्यादती से मना करता है। वो तुम्हें नसीहत करता है, ताकि तुम सबक़ लो।"
قُلْ إِنَّمَا حَرَّمَ رَبِّىَ ٱلْفَوَٰحِشَ مَا ظَهَرَ مِنْهَا وَمَا بَطَنَ
ऐ नबी ﷺ ! "इनसे कहो कि मेरे रब ने जो चीज़ें हराम की हैं (उनमें से एक है) बेशर्मी के सारे काम चाहे खुले हुए हों या छिपे हुए।"
[सूरह आराफ़ 7:33]
उपर्युक्त आयतों में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने हमें हर तरह की बुराई और बेहयाई से दूर रहने की तालीम फरमाई है। मगर अफ़सोस आज हम वेलेंटाइन डे के नाम पर अल्लाह के हुदूद को तोड़ कर खुद के लिए जहन्नम खरीद रहे हैं।
क्या किसी मुसलमान के लिए ये काफ़ी है कि वो उर्दू नाम वाला है?
क्या कलमा पढ़ लेना काफ़ी है?
मुसलमान घर में पैदा हो जाना, दोनों ईदों की खुशियां मना लेना, नए कपड़े पहन लेना जुम्मा को मस्जिद में हाजरी लगा लेना, बस इसी से आप मुसलमान हो जाते हैं?
बस इतना ही फर्ज़ है आप का?
नहीं!
बल्कि पूरे के पूरे इस्लाम में होना दाखिल होना ज़रूरी है। इसके साथ-साथ अल्लाह की हुदूद की हिफ़ाज़त करना भी ज़रूरी है और वह हुदूद अल्लाह की हराम की हुई चीज़े हैं।
इस्लाम इस बात की इजाज़त कभी नहीं देता कि कोई लड़का लड़की निकाह से पहले घूमें, फिरें रोमांस करें, रोमानवी बातें करें, दूसरे को टच करने की इजाज़त नहीं है ये एक हराम अमल है जिसे ज़िना कहा गया है। अल्लाह के रसूलﷺ ने फ़रमाया:
[तिर्मिज़ी: 2165]
अल्लाह माफ़ करें हम ना जानें कितना वक्त ना मेहरम मर्द और औरत के साथ गुजार देते हैं इस बात का ना एहसास है न ही कोई अफ़सोस क्या होगा हमरा? जब हम अल्लाह के सामने हाज़िर होंगे।
अल्लाह रब्बुल इज़्जत ने बेहयाई को सिर्फ़ करने को ही हराम नहीं किया बल्कि उसे रोकने का भी हुक्म फरमाया है।
बेहयाई के खात्मे की शुरुआत अपने घर खानदान से
आइए कुछ और आहदीस पर गौर करें-
समाज में हर शख्स की जिम्मेदारी बताते हुए मुस्तफा ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
मर्द अपने घर वालों का निगहबान है, और उससे उसकी रिआया के बारे में सवाल होगा और औरत अपने शौहर के घर वालो और उसके बच्चों की निगहबान है, और उससे उनके बारे में सवाल होगा।
[सहीह बुख़ारी 7138, सहीह मुस्लिम 1829]
रसूलल्लाह ﷺ ने खबर दी:
[सहीह मुस्लिम 177/49]
नबी करीम ﷺ ने खबरदार किया कि:
यानी वो बेगैरत शख्स जो अपने घर में बुराई देखता है लेकिन उसे बरकरार रखता है।"
[मुसनद अहमद 9975/5372]
वजाहत:
ऊपर बयान की गई अहदीसों से ये बात स्पष्ट होती है कि इस्लाम सबसे पहले अपने घर को और अपने अहल व अयाल को बुराइयों से पाक रखने की नसीहत देता है।
बहुत ही अफ़सोस का मक़ाम है गैरों के हाथ को हम कितना मजबूत कर रहे हैं। आज हाल ये है की अल्लाह और रसूल ﷺ को, क़ुरान को, दीने इस्लाम को मानने वाले भी, आँखे बंद किये हुए चल रहे हैं, और शैतानी चाल कामयाब हो रही है।
गैर कौमों की नक़ल करने वाले के लिए कुरान और हदीस में क्या आया है इसे भी देखते चलें। अल्लाह तआला फ़रमाता है:
"आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दींन मुकम्मल कर दिया और अपनी नेंअमत तुम पर पूरी कर दी और इस्लाम को बाहैसियत दींन तुम्हारे लिए पसंद कर लिया।"
[सूरह मयदा: 3]
अल्लाह तआला का शुक्र है कि उसने हमारे लिए दीन-ए-इस्लाम की राह मुक़र्रर की है फिर भी हम गैर कौमों के तरीक़े पर चल कर अपनी दुनियां आखिरत दोनों ही तबाह कर रहे हैं। अल्लाह माफ़ फरमाए।
अल्लाह हू अकबर
अल्लाह तआला ने गवाही दे दी है के हमारा दींन मुकम्मल हो चुका है और हमारे लिए इस्लाम को अल्लाह ने पसंद किया है।
एक इल्तिज़ा मुस्लिम बहनों से:
सुनो ऐ बिंत-ए-हव्वा! सर्दी और गर्मी से बचने का इंतज़ाम तो हम और आप करते हैं पर जहन्नम की आग से बचने के लिए अल्लाह के हदों को क्यों तोड़ कर अपनी आखिरत खराब कर रहे हैं?
मेरी इल्तिज़ा है बहनों से कि किसी भी गैर मेहरम से दूर रहें आप का वक्त और इज़्ज़त दोनों कीमती है। मेरी बहनों हर मर्द भरोसे के काबिल नहीं होता। आप की जरूरत बस उन्हें तब तक होती है जब तक उसकी हवस पुरी न हुई हो, हवस पुरी होते ही वो आप से पल्ला झाड़ लेगा। एक वक्त आता है जब आप उसके लिय कोई अहमियत नहीं रखती, जब उसका जी भर जाता है फिर वही प्रेमी अपने दस दोस्तों के बीच बैठ कर आप का मज़ाक उड़ता है, आप के किरदार पर उंगली उठाता है, जहनी टेंशन देता है।
सच कहूं तो सच्चा मर्द वो होता है जो किसी लड़की को दिल से मुहब्बत करे। उसकी इज़्जत करने वाला हो, उसे सर्द-गर्म हवाओं से बचा कर अपनी पनाह में लेने वाला हो, जब मुहब्बत करे तो निकाह करे उसे अपने खानदान में एक वजूद बख्शे।
होटल के कमरे में ले जा कर अपनी तृष्णा शांत करने वाला कभी सच्चा नहीं हो सकता।
मेरी बहनों नादानी और बेवकूफी की हरकतें मत करो। आप को ये बात समझनी चाहिए कि मर्द सिर्फ़ उस औरत से मुहब्बत करता है जिसे वो हलाल तरीके से निकाह में लाता है बाकी सब तो सिर्फ दिल बहलाने की चीज़ होती हैं।
मेरी कौम की बहनों यकीन जानों अल्लाह के यहा जर्रे-जर्रे का हिसाब तुमकों देना पड़ेगा। अब भी वक्त है अपने गुनाहों से तौबा कर लो।
इल्तेज़ा भाइयों से:
मेरे भाइयों बड़े ही गौर करने का मकाम है कि आज हमारी कौम गुमराह हो गई है, बेहयाई और फहाशि इसका नसीब बनता जा रहा है। मेरी आप से इल्तेजा है की हराम रिश्ते से बचें, दूसरे की बहन बेटियों की इज्ज़त वैसे ही करें जैसा आप अपनी बहन बेटियों की करते हैं। मुहब्बत करें तो हलाल रिश्ता कायम करें, निकाह करें किसी भी लड़की के जिस्म और जज़्बात से न खेलें।
अल्लाह से दुआ है कि उम्मत को गफलत से बाहर आने और सिरातल मुस्तकीम पर कायम रहने की तौफीक इनायत फरमाए, साथ ही शहज़ादे और शहजादियों को हिदायत अता फरमाए।
अल्लाहुम्मा आमीन
फ़िरोज़ा
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