अल्लाह ने इंसानों में से पैगम्बर क्यों बनाए?
अल्लाह ने अपने पैगामात इंसानों तक पहुंचाने के लिए इंसानों में से ही अपने पैगम्बर चुने है और उनके जरिए ही इंसानों को अपना पैगाम पहुंचा दिया। अल्लाह ने कुरआन में कहा है कि:
ऐ नबी! "हमने तुमसे पहले भी जब कभी रसूल भेजे हैं, आदमी ही भेजे हैं जिनकी तरफ़ हम अपने पैग़ामात वही (Revelation) किया करते थे। अहले-ज़िक्र (ज़िक्रवालों) से पूछ लो अगर तुम लोग ख़ुद नहीं जानते।"
[कुरआन 16:43]
अल्लाह का इंसानों में से ही पैगम्बर भेजने के पीछे जो मकसद था उसे अल्लाह कुरआन में कुछ इस तरह बयान करता है कि:
"पिछले रसूलों को भी हमने रौशन निशानियाँ और किताबें देकर भेजा था और अब ये ‘ज़िक्र’ (यानी कुरआन) तुमपर उतारा है, ताकि तुम लोगों के सामने उस तालीम को खोलकर साफ़-साफ़ बयान करते जाओ जो उनके लिये उतारी गई है। और ताकि लोग (ख़ुद भी) सोच-विचार करें।"
[कुरआन 16:44]
अल्लाह ने इंसान को पैगम्बर बनाकर इसलिए भेजा है ताकि वह अल्लाह के पैगाम को लोगों को खोल खोलकर बता सके और अल्लाह के पैगाम की तशरीह (details) और वज़ाहत कर सके। अल्लाह के पैगाम की तशरीह करना और वजाहत करना सिर्फ़ ज़बान ही से नहीं बल्कि वो पैगम्बर अपने अमल से भी करे और अपनी रहनुमाई में एक पूरी मुस्लिम सोसाइटी बनाकर भी लोगों के सामने वाजेह कर दें कि सही रास्ता और सीधा रास्ता कौनसा है और गलत रास्ता कौनसा है? लोगों को अपने अमल से साफ साफ बता दें कि जिंदगी गुजारने का सिर्फ एक ही तरीका सही है जो अल्लाह की तरफ से मैं लेकर आया हूं। इस रास्ते के सिवा बाकी सब रास्ते गुमराही है और इंसानों के लिए तबाहकुन है। और वह पैगम्बर अल्लाह के ज़िक्र (यानी तालिमात) के मंशा के मुताबिक़ अल्लाह के निज़ाम को चलाकर भी दिखाए।
इस तरह अल्लाह ने वो हिकमत बयान कर दी है जिसका तक़ाज़ा ये था कि लाज़िमन एक इन्सान ही को पैग़म्बर बनाकर भेजा जाए। ज़िक्र (यानी तालिमात) फ़रिश्तों के ज़रिए से भी भेजा जा सकता था। सीधे तौर पर छापकर एक-एक इन्सान तक भी पहुँचाया जा सकता था। मगर सिर्फ़ ज़िक्र भेज देने से वो मक़सद पूरा नहीं हो सकता था जिसके लिये अल्लाह की हिकमत और रहमत व रबूबियत उसके उतारे जाने का तक़ाज़ा कर रही थी। उस मक़सद को पूरा करने के लिये ज़रूरी था कि इस ज़िक्र को एक सबसे ज़्यादा क़ाबिल इन्सान लेकर आए।
वो इसको थोड़ा-थोड़ा करके लोगों के सामने पेश करे।
जिनकी समझ में कोई बात न आए उसका मतलब समझाए।
जिन्हें कुछ शक हो उनका शक दूर करे।
जिन्हें कोई एतिराज़ हो उनके एतिराज़ का जवाब दे।
जो न मानें और मुख़ालिफ़त करें और रुकावट बनें उनके मुक़ाबले में वो उस तरह का रवैया बरतकर दिखाए जो इस ज़िक्र (यानी तालिमात) के माननेवालों की शान के मुताबिक़ है।
जो मान लें उन्हें ज़िन्दगी के हर हिस्से और हर पहलू के बारे में हिदायतें दे, उनके सामने ख़ुद अपनी ज़िन्दगी को नमूना बनाकर पेश करे, और उनको इन्फ़िरादी (व्यक्तिगत) व इज्तिमाई तरबियत देकर सारी दुनिया के सामने एक ऐसी सोसाइटी को मिसाल के तौर पर रख दे जिसका पूरा इज्तिमाई निज़ाम ज़िक्र के मंशा की शरह (व्याख्या) हो। इस तरह अल्लाह ने वो हिकमत बयान कर दी है जिसका तक़ाज़ा ये था कि लाज़िमन एक इन्सान ही को पैग़म्बर बनाकर भेजा जाए।
अल्लाह ने किसी फरिश्ते को पैगम्बर बनाकर क्यों नहीं भेजा?
इसका जवाब अल्लाह ने कुरआन में दिया है कि:
इनसे कहो, “अगर ज़मीन में फ़रिश्ते इत्मीनान से चल-फिर रहे होते तो हम ज़रूर आसमान से किसी फ़रिश्ते ही को उनके लिये पैग़म्बर बनाकर भेजते।”
[कुरआन 17:95]
अल्लाह के पैग़म्बर का काम सिर्फ़ इतना ही नहीं है कि आकर पैग़ाम सुना दिया करे, बल्कि उसका काम ये भी है कि उस पैग़ाम के मुताबिक़ इन्सानी ज़िन्दगी को सुधारे। उसे इन्सानी हालात पर उस पैग़ाम के उसूलों को चस्पाँ करना होता है। उसे ख़ुद अपनी ज़िन्दगी में उन उसूलों को अमली जामा पहनाकर दिखाना होता है। उसे उन अनगिनत अलग-अलग इन्सानों के ज़ेहन की गुत्थियाँ सुलझानी पड़ती हैं जो उसका पैग़ाम सुनने और समझने की कोशिश करते हैं। उसे माननेवालों को एकजुट करना और उनकी तरबियत करनी होती है, ताकि उस पैग़ाम की तालीमात के मुताबिक़ एक समाज वुजूद में आए। उसे इनकार और मुख़ालिफ़त करनेवालों और रुकावट डालनेवालों के मुक़ाबले में जिद्दोजुहुद करनी होती है ताकि बिगाड़ की तरफ़दारी करनेवाली ताक़तों को नीचा दिखाया जाए, और वो सुधार अमल में आ सके जिसके लिये ख़ुदा ने अपना पैग़म्बर भेजा है।
ये सारे काम जबकि इन्सानों ही में करने के हैं तो इनके लिये इन्सान नहीं तो और कौन भेजा जाता?
फ़रिश्ता तो ज़्यादा से ज़्यादा बस यही करता कि आता और पैग़ाम पहुँचाकर चला जाता। इन्सानों में इन्सान की तरह रहकर इन्सान के जैसे काम करना और फिर इन्सानी ज़िन्दगी में अल्लाह की मर्ज़ी के मुताबिक़ सुधार करके दिखा देना किसी फ़रिश्ते का काम न था। इसके लिये तो इन्सान ही मुनासिब हो सकता था।
हर दौर में सच्चाई के इनकार करने वाले लोग ये चाहते है कि फरिश्ते उनके पास आए जिस तरह पैगम्बर के पास आते है या खुद अल्लाह उनसे बात करे तो वह अल्लाह के पैगाम पर ईमान ले आयेंगे।
इसी बात का जवाब कुरआन में अल्लाह ने दिया है कि:
जो लोग हमारे सामने पेश होने का अन्देशा नहीं रखते वो कहते हैं, “क्यों न फ़रिश्ते हमारे पास भेजे जाएँ? या फिर हम अपने रब को देखें।” बड़ा घमण्ड ले बैठे ये अपने आपमें और हद से गुज़र गए ये अपनी सरकशी में।
[कुरआन 25:21]
यानी लोगों का यह कहना कि अगर सचमुच ख़ुदा का इरादा ये है कि हम तक अपना पैग़ाम पहुँचाए तो एक नबी को वास्ता बनाकर सिर्फ़ उसके पास फ़रिश्ता भेज देना काफ़ी नहीं है, हर शख़्स के पास एक फ़रिश्ता आना चाहिये जो उसे बताए कि तेरा रब तुझे ये हिदायत देता है। या फ़रिश्तों का एक झुण्ड आम भीड़ में हम सबके सामने आ जाए और ख़ुदा का पैग़ाम पहुँचा दे। एक दूसरी जगह भी उनके इस एतिराज़ को नक़ल किया गया है-
[क़ुरआन 6:124]
पैगम्बर का इंसान होना लोगों के लिए आजमाइश है।
अल्लाह कुरआन में कहता है कि:
ऐ नबी, "तुमसे पहले जो रसूल भी हमने भेजे थे, वो सब भी खाना खानेवाले और बाज़ारों में चलने-फिरनेवाले लोग ही थे। असल में हमने तुम लोगों को एक दुसरे के लिये आज़माइश का ज़रिआ बना दिया है। क्या तुम सब्र करते हो? तुम्हारा रब सब कुछ देखता है।"
[कुरआन 25:20]
यानी पैग़म्बर और ईमानवालों के लिये हक़ के इनकारी आज़माइश है और इनकार करनेवालों के लिये पैग़म्बर और ईमानवाले। इनकार करनेवालों ने ज़ुल्मो-सितम और जाहिलाना दुश्मनी की जो भट्टी गर्म कर रखी है वही तो वो ज़रिआ है जिससे साबित होगा कि रसूल और उसके सच्चे ईमानवाले पैरोकार खरा सोना हैं। खोट जिसमें भी होगी वो उस भट्टी से सही सलामत न गुज़र सकेगा और इस तरह सच्चे ईमानवालों का एक चुना हुआ गरोह छँटकर निकल आएगा, जिसके मुक़ाबले में फिर दुनिया की कोई ताक़त न ठहर सकेगी। ये भट्टी गर्म न हो तो हर तरह के खोटे और खरे आदमी नबी के आसपास इकट्ठे हो जाएँगे और दीन की शुरूआत ही एक कमज़ोर जमाअत से होगी।
दूसरी तरफ़ इनकार करनेवालों के लिये भी रसूल और रसूल के साथी एक कड़ी आज़माइश हैं। एक आम इन्सान का अपनी ही बिरादरी के दरमियान से यकायक नबी बनाकर उठा दिया जाना, उसके पास कोई फ़ौज-फ़र्रा और माल-दौलत न होना, उसके साथ अल्लाह के कलाम और पाकीज़ा सीरत (आचरण) के सिवा कोई अजूबा चीज़ न होना, उसके शुरू के पैरोकारों में ज़्यादातर ग़रीबों, ग़ुलामों और नई उम्र के लोगों का शामिल होना और अल्लाह का इन कुछ मुट्ठी-भर इन्सानों को मानो भेड़ियों के दरमियान बेसहारा छोड़ देना, यही वो छलनी है जो ग़लत तरह के आदमियों को दीन की तरफ़ आने से रोकती है और सिर्फ़ ऐसे ही लोगों को छान-छानकर आगे गुज़ारती है जो हक़ को पहचाननेवाले और सच्चाई को माननेवाले हों। ये छलनी अगर न लगाईं जाती और रसूल बड़ी शान-शौकत के साथ आकर हुकूमत के तख़्त पर बैठ जाता, ख़ज़ानों के मुँह उसके माननेवालों के लिये खोल दिये जाते और सबसे पहले बड़े-बड़े रईस आगे बढ़कर उसके हाथ पर बैअत (फ़रमाँबरदारी का अहद) करते, तो आख़िर कौन-सा दुनियापरस्त और मतलब का बन्दा इन्सान इतना बेवक़ूफ़ हो सकता था कि उसपर ईमान लानेवालों में शामिल न हो जाता। इस हालत में तो सच्चाई पसन्द लोग सबसे पीछे रह जाते और दुनिया के तलबगार बाज़ी ले जाते।
अल्लाह ने कुरआन की सूरह 57: हदीद आयत 25 में पैगम्बर के इंसान होने की पूरी हिक्मत और मकसद को बता दिया है।
"हमने अपने रसूलों को साफ़-साफ़ निशानियों और हिदायत के साथ भेजा और उनके साथ किताब और मीज़ान नाज़िल की ताकि लोग इन्साफ़ पर क़ायम हों, और लोहा उतारा जिसमें बड़ा ज़ोर है और लोगों के लिये फ़ायदे हैं। ये इसलिये किया गया है कि अल्लाह को मालूम हो जाए कि कौन उसको देखे बग़ैर उसकी और उसके रसूलों की मदद करता है। यक़ीनन अल्लाह बड़ी क़ुव्वत वाला और ज़बरदस्त है।"
[कुरआन 57:25]
यहां अल्लाह ने छोटे से जुमले में पैग़म्बरों के मिशन का पूरा ख़ुलासा बयान कर दिया गया है, जिसे अच्छी तरह समझ लेना चाहिये। इसमें बताया गया है कि दुनिया में ख़ुदा के जितने रसूल भी अल्लाह की तरफ़ से आए, वो सब तीन चीज़ें लेकर आए थे:
(1) बय्येनात, यानी खुली-खुली निशानियाँ जो साफ़ तौर से बता रही थीं कि ये सचमुच अल्लाह के रसूल हैं, बने हुए लोग नहीं हैं। रौशन दलीलें जो इस बात को साबित करने के लिये बिलकुल काफ़ी थीं कि जिस चीज़ को वो हक़ कह रहे हैं, वो सचमुच हक़ है और जिस चीज़ को वो बातिल ठहरा रहे हैं, वो सचमुच बातिल है। साफ़ हिदायतें जिनमें किसी शक-शुब्हे के बिना साफ़-साफ़ बता दिया गया था कि अक़ीदों, अख़लाक़, इबादात और मामलात में लोगों के लिये सीधी राह क्या है जिसे वो अपनाएँ और ग़लत रास्ते कौन-से हैं जिनसे वो बचें।
(2) किताब, जिसमें वो सारी तालीमात लिख दी गई थीं जो इन्सान की हिदायत के लिये दरकार थीं, ताकि लोग रहनुमाई के लिये उसकी तरफ़ पलटें।
(3) मीज़ान, यानी हक़ और बातिल का वो पैमाना जो ठीक-ठीक तराज़ू की तौल तौलकर वो बता दे कि ख़यालात, अख़लाक़ और मामलात में कमी और ज़्यादती की अलग-अलग इन्तिहाओं के बीच इन्साफ़ की बात क्या है।
इन तीन चीज़ों के साथ पैग़म्बरों को जिस मक़सद के लिये भेजा गया वो ये था कि दुनिया में इन्सान का रवैया और इन्सानी ज़िन्दगी निज़ाम, एक-एक शख़्स के तौर पर भी और इज्तिमाई तौर पर भी, इन्साफ़ पर क़ायम हो।
एक तरफ़ हर इन्सान अपने ख़ुदा के हक़, अपने नफ़्स के हक़ और ख़ुदा के उन तमाम बन्दों के हक़, जिनसे उसको किसी तौर पर वास्ता पड़ता है, ठीक-ठीक जान ले और पूरे इन्साफ़ के साथ उनको अदा करे।
और दूसरी तरफ़ इज्तिमाई ज़िन्दगी का निज़ाम ऐसे उसूलों पर बनाया जाए जिनसे समाज में किसी तरह का ज़ुल्म बाक़ी न रहे, तमद्दुन तहज़ीब (सभ्यता और संस्कृति) का हर पहलू कमी और ज़्यादती से बचा हुआ हो, इज्तिमाई ज़िन्दगी के तमाम हिस्सों और पहलुओं में सही-सही बैलेंस क़ायम हो, और समाज के तमाम लोग इन्साफ़ के साथ अपने हक़ पाएँ और अपने फ़र्ज़ और अपनी ज़िम्मेदारियाँ अदा करें।
दूसरे अलफ़ाज़ में पैग़म्बरों के भेजे जाने का मक़सद अलग-अलग शख़्स के साथ इन्साफ़ भी था और इज्तिमाई इन्साफ़ भी। वो एक-एक शख़्स की शख़्सी ज़िन्दगी में भी इन्साफ़ क़ायम करना चाहते थे, ताकि उसके ज़ेहन, उसकी सीरत, उसके किरदार और उसके बर्ताव में बैलेंस पैदा हो। और इन्सानी समाज के पूरे निज़ाम को भी इन्साफ़ पर क़ायम करना चाहते थे, ताकि व्यक्ति और समाज दोनों एक-दूसरे को रूहानी, अख़लाक़ी और माद्दी (भौतिक) कामयाबी में रुकावट बनने के बजाय हिमायती और मददगार हों।
पैग़म्बर के मिशन को बयान करने के फ़ौरन बाद ये अल्लाह का ये फ़रमाना कि हमने लोहा उतारा जिसमें बड़ा ज़ोर और लोगों के लिये फ़ायदे हैं, तो आइए इस बात को समझते है कि आखिर अल्लाह ने लोहे के उतारने का यहां जिक्र क्यों किया है?
'लोहा उतारने' का मतलब ज़मीन में लोहा पैदा करना है, जैसा कि एक दूसरी जगह क़ुरआन में कहा गया है, उसने तुम्हारे लिये मवेशियों की क़िस्म के आठ-नर-मादा उतारे (सूरा ज़ुमर, आयत-6) चूँकि ज़मीन में जो कुछ पाया जाता है वो अल्लाह के हुक्म से यहाँ आया है, ख़ुद-बख़ुद नहीं बन गया है, इसलिये उनके पैदा किये जाने को क़ुरआन मजीद में उतारा जाना कहा गया है।
पैग़म्बर के मिशन को बयान करने के फ़ौरन बाद ये फ़रमाना कि हमने लोहा उतारा जिसमें बड़ा ज़ोर और लोगों के लिये फ़ायदे हैं, ख़ुद-बख़ुद इस बात की तरफ़ इशारा करता है कि यहाँ लोहे से मुराद सियासी (राजनीतिक) और जंगी ताक़त है, और बात का मक़सद ये है कि अल्लाह ने अपने रसूलों को इन्साफ़ क़ायम करने की सिर्फ़ एक स्कीम पेश कर देने के लिये नहीं भेजा था, बल्कि ये बात भी उनके मिशन में शामिल थी कि उसको अमली तौर पर लागू करने की कोशिश की जाए और वो क़ुव्वत जुटाई जाए जिससे सचमुच इन्साफ़ क़ायम हो सके, उसे छिन्न-भिन्न करनेवालों को सज़ा दी जा सके और उसमें रुकावट बननेवालों का ज़ोर तोड़ा जा सके।
लोहे के उतारने का मकसद बताने के बाद फिर अल्लाह ने इंसान को पैगम्बर बनाए जाने की एक और हिक्मत की तरफ इशारा करते हुए कहा कि: ये इसलिये किया गया है कि अल्लाह को मालूम हो जाए कि कौन उसको देखे बग़ैर उसकी और उसके रसूलों की मदद करता है। यक़ीनन अल्लाह बड़ी क़ुव्वत वाला और ज़बरदस्त है।
यानी अल्लाह को इस मदद की ज़रूरत कुछ इस वजह से नहीं है कि वो कमज़ोर है, अपनी ताक़त से ये काम नहीं कर सकता, बल्कि काम का ये तरीक़ा उसने इन्सानों की आज़माइश के लिये अपनाया है और इसी आज़माइश से गुज़रकर इन्सान अपनी तरक़्क़ी और कामयाबी की राह पर आगे बढ़ सकता है।
अल्लाह तो हर वक़्त ये क़ुदरत रखता है कि जब चाहे अपने एक इशारे पर आगे बढ़ सकता है। अल्लाह तो हर वक़्त ये क़ुदरत रखता है कि अपने एक इशारे से तमाम इस्लाम दुश्मनों को हरा दे और अपने रसूलों को उनपर हावी कर दे। मगर इसमें फिर रसूलों पर ईमान लानेवालों का क्या कमाल होगा, जिसकी वजह से वो किसी इनाम के हक़दार हों?
इसीलिये अल्लाह ने इस काम को अपनी ज़बरदस्त क़ुदरत से अंजाम देने के बजाय काम का तरीक़ा ये अपनाया कि अपने रसूलों को बय्येनात और 'किताब' और 'मीज़ान' देकर इन्सानों के बीच भेज दिया। उनको इस काम पर लगाया कि लोगों के सामने इन्साफ़ का रास्ता पेश करें और ज़ुल्म व ज़्यादती के निज़ाम और बेइन्साफ़ी को छोड़ देने की उनको दावत दें।
इन्सानों को इस बात का पूरा इख़्तियार दे दिया कि उनमें से जो चाहे रसूलों की दावत को क़बूल करें और जो चाहे उसे रद्द कर दे। क़बूल करनेवालों को पुकारा कि आओ, इन्साफ़ के इस निज़ाम को क़ायम करने में मेरा और मेरे रसूलों का साथ दो और उन लोगों के मुक़ाबले में जान तोड़ जिद्दो-जुहद करो जो ज़ुल्म व ज़्यादती को बाक़ी रखने पर तुले हुए हैं।
इस तरह अल्लाह ये देखना चाहता है कि इन्सानों में से कौन हैं जो इन्साफ़ की बात को रद्द करते हैं और कौन हैं जो इन्साफ़ के मुक़ाबले में बे-इन्साफ़ी क़ायम रखने के लिये अपनी जान लड़ाते हैं, और कौन हैं जो इन्साफ़ की बात क़बूल कर लेने के बाद उसकी हिमायत और उसकी ख़ातिर जिद्दोजुहद करने से जी चुराते हैं, और कौन हैं जो अनदेखे ख़ुदा की ख़ातिर दुनिया में इस हक़ को ग़ालिब करने के लिये जान-माल की बाज़ी लगा देते हैं। इस इम्तिहान से जो लोग कामयाब होकर निकलेंगे उन ही के लिये आइन्दा तरक़्क़ियों के दरवाज़े खुलेंगे।
अल्लाह की ये सब हिक्मत थी जिसकी वजह से अल्लाह के पैगम्बर का इंसान होना ही जरूरी था।
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