Tayamum kaise aur kab karna hai

क्या सर्दियों में ठण्ड से बचने के लिए वुज़ू की जगह तयम्मुम किया जा सकता है ? तयम्मुम करके नमाज़ पढ़ने की क्या शर्तें हैं और क्या तरीका है।  आइये जानते हैं -


Tayammum kab aur kaise karna hai uski kya sharte hain aur tayammum kaise karte hain hindi me



तयम्मुम का हुक्म

तयम्मुम की तारीफ :-

तयम्मुम लुगत मे क़सद और किसी चीज़ की तरफ मुतावज्जा होने को कहते हैं


तयम्मुम शरीयत की इस्तेलाह में :-

अल्लाह की इबादत की खातिर पाकी की गरज़ (हासिल ) से चेहरे और हाथो को पाक मिट्टी के साथ मसाह करने को कहते हैं |


तयम्मुम क्यों किया जाता है? 

पानी ना होने की सूरत में जब पानी का इस्तेमाल मौतज़र हो तो उस वक़्त तयम्मुम करना वाज़िब है | और जिस चीज़ के लिए तयम्मुम मुस्तहब (Optional ) हो उसके लिए तयम्मुम भी मुस्तहब होता है। तयम्मुम इस उम्मत की खुसूसियत में से एक खासियत है। तयम्मुम तहारत हासिल करने के लिए पानी के बदले में है। जिसे हदस ए असगर या हदस ए अकबर लाहिक हो जाये और उसे पानी का इस्तेमाल दुश्वार हो।  पानी मौजूद न हो या पानी के इस्तेमाल से बीमारी में इज़ाफ़ा होने डर हो और पानी इस्तेमाल करने से आजिज़ हो तो पाक मिट्टी से तयम्मुम करना वाज़िब होता है।। मगर सिर्फ सर्दी की वजह से पानी होने के बावजूद तयम्मुम वाजिब नहीं है। ज़्यादा ठण्ड है ज़ुखाम हो जायेगा ऐसे कोई वजह से तयम्मुम वाजिब न होगा।  

यानि जब आप ऐसी जगह पर हो जहाँ आपको पानी ना मिल सके तो पाक मिट्टी से तयम्मुम करना वाज़िब होता है।  आइये हम देखते हैं तयम्मुम कैसे किया जाता है और इसका हुक्म कब हुआ


तयम्मुम का हुक्म कब हुआ?

हज़रत आयशा रज़ि अन्हा बयान करती हैं

(मुझसे) असमा (रज़ि०) का एक हार गुम हो गया तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने कुछ सहाबा (रज़ि०) को उसे तलाश करने के लिये भेजा। इधर नमाज़ का वक़्त हो गया। न लोग वुज़ू से थे और न पानी मौजूद था इसलिये वुज़ू के बग़ैर नमाज़ पढ़ी गई। इसपर अल्लाह ने तयम्मुम की आयत नाज़िल की।

[सहीह बुखारी 4583]


और वो तयम्मुम के नुज़ूल वाली आयत मुलाहिज़ा फरमायें-

یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡۤا اِذَا قُمۡتُمۡ  اِلَی الصَّلٰوۃِ فَاغۡسِلُوۡا وُجُوۡہَکُمۡ وَ اَیۡدِیَکُمۡ  اِلَی الۡمَرَافِقِ وَ امۡسَحُوۡا بِرُءُوۡسِکُمۡ وَ اَرۡجُلَکُمۡ  اِلَی الۡکَعۡبَیۡنِ ؕ وَ اِنۡ کُنۡتُمۡ جُنُبًا فَاطَّہَّرُوۡا ؕ وَ اِنۡ کُنۡتُمۡ مَّرۡضٰۤی اَوۡ عَلٰی سَفَرٍ  اَوۡ جَآءَ  اَحَدٌ مِّنۡکُمۡ  مِّنَ الۡغَآئِطِ اَوۡ لٰمَسۡتُمُ النِّسَآءَ  فَلَمۡ  تَجِدُوۡا مَآءً فَتَیَمَّمُوۡا صَعِیۡدًا طَیِّبًا فَامۡسَحُوۡا بِوُجُوۡہِکُمۡ وَ اَیۡدِیۡکُمۡ مِّنۡہُ ؕ مَا یُرِیۡدُ اللّٰہُ لِیَجۡعَلَ عَلَیۡکُمۡ مِّنۡ حَرَجٍ وَّ لٰکِنۡ یُّرِیۡدُ لِیُطَہِّرَکُمۡ وَ لِیُتِمَّ نِعۡمَتَہٗ عَلَیۡکُمۡ لَعَلَّکُمۡ تَشۡکُرُوۡنَ ﴿۶


ऐ ईमान वालो! जब तुम नमाज़ के लिये उठो तो अपने चेहरे और कोहनियों तक अपने हाथ धो लो, और अपने सरों का मसह करो, और अपने पाँव (भी) टख़्नों तक (धो लिया करो)। और अगर तुम जनाबत (नापाकी) की हालत में हो तो सारे जिस्म को (ग़ुस्ल के ज़रिये) ख़ूब अच्छी तरह पाक करो। और अगर तुम बीमार हो या सफ़र पर हो या तुम में से कोई क़ज़ा-ए-हाजत (पेशाब पाख़ाने की ज़रूरत पूरी) करके आया हो, या तुम ने अ़ौरतों से जिस्मानी मिलाप किया हो और तुम्हें पानी न मिले तो पाक मिट्टी से तयम्मुम करो, और अपने चेहरों और हाथों का उस (मिट्टी) से मसह कर लो। अल्लाह तुम पर कोई तंगी मुसल्लत करना नहीं चाहता, लेकिन यह चाहता है कि तुमको पाक साफ़ करे, और यह कि तुम पर अपनी नेमत पूर्ण कर दे, ताकि तुम शुक्रगुज़ार बनो।

[सूरह मायदा 06]


तयाम्मुम करने का तरीक़ा क्या है?

नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम का जो तरीका तयाम्मुम सहीह आहदीस से साबित है वो यूँ है | कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक दफा मिट्टी पर दोनों हाथ मारते फिर चेहरे पर फेरते और हथेलियों पर मल लेते, इसके खिलाफ नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम से कुछ साबित नहीं |


दलीले मुलाहिज़ा फरमायें :-

अम्मार बिन यासिर रज़ि अन्हु बयान करते हैं

मुझे रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने किसी काम के लिये भेजा था। सफ़र में मुझे ग़ुस्ल की ज़रूरत हो गई  लेकिन पानी न मिला। इसलिये मैं मिट्टी मैं जानवर की तरह लोट-पोट लिया। फिर मैंने रसूलुल्लाह (सल्ल०) से उसका ज़िक्र किया। तो आप (सल्ल०) ने फ़रमाया कि तुम्हारे लिये सिर्फ़ इतना करना काफ़ी था। और आप ने अपने हाथों को ज़मीन पर एक मर्तबा मारा फिर उन को झाड़ कर बाएँ हाथ से दाहिने की पीठ को मल लिया या बाएँ हाथ का दाहिने हाथ से मसह किया। फिर दोनों हाथों से चेहरे का मसह किया। अब्दुल्लाह ने उसका जवाब दिया कि आप उमर को नहीं देखते कि उन्होंने अम्मार की बात पर क़नाअत नहीं की थी। और यअला इब्ने-उबैद ने आमश के वास्ते से शक़ीक़ से रिवायत में ये ज़्यादती की है कि उन्होंने कहा कि मैं अब्दुल्लाह और अबू-मूसा की ख़िदमत में था और अबू-मूसा ने फ़रमाया था कि आप ने उमर से अम्मार का ये क़ौल नहीं सुना कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने मुझे और आप को भेजा। इसलिये मुझे ग़ुस्ल की ज़रूरत हो गई और मैंने मिट्टी मैं लोट-पोट लिया। फिर मैं रात रसूलुल्लाह (सल्ल०) की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और आप (सल्ल०) से सूरते-हाल के मुताल्लिक़ ज़िक्र किया तो आप (सल्ल०) ने फ़रमाया कि तुम्हें सिर्फ़ उतना ही काफ़ी था और अपने चेहरे और हथेलियों का एक ही मर्तबा मसह किया।

[सहीह बुखारी 357 ]


सहीह बुखारी हदीस 338 मे ये अल्फाज़ भी हैं

फिर मैंने नबी करीम (सल्ल०) से उसका ज़िक्र किया तो आप (सल्ल०) ने फ़रमाया कि तुझे बस उतना ही काफ़ी था और आपने अपने दोनों हाथ ज़मीन पर मारे फिर उन्हें फूँकना और दोनों से चेहरे और पहुँचूँ का मसह किया।


ये वो तरीक़ा है जिसकी तालीम नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अम्मार बिन यासिर रज़ि अन्हु को दी | इसमें जमीन पर एक बार हाथ मारने का जिक्र और चेहरे और हथेलियों पर फेरने का सबूत है |

नवाकिस ए तयम्मुम 

किन से तयम्मुम ख़तम हो जायेगा -

1. पानी मिल जाये 
2. उज़्र ज़ाइल (खत्म) हो जाये मसलन मर्ज़ ठीक हो जाये 
3. नवाकिस ए वुज़ू (जिनसे वुज़ू टूट जाता है उनसे तयम्मुम भी टूट जाता है )

 


अल्लाह दीन समझने कि तौफ़ीक़ दे

आपका दीनी भाई

मुहम्मद

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