औरतों का गैर मर्दों से मेंहदी लगवाना या चूड़ियाँ पहनना या कोई और अमल करना कैसा है?
ग़ैर महरम (लड़का/लड़की) को छूना (टच करना) हराम है।
आज की नई सोच और फैशन करने वाली मुस्लिम लड़कियां गैर मर्दों से मेंहदी लगवाती हैं, कुछ ख़्वातीन बाज़ारों में जाकर ना महरम दुकानदारों के हाथों से चूड़ियाँ पहनती हैं, कुछ टेलर के पास जा कर उनको अपने कपड़ों का नाप देती है तो कुछ मर्दों से हेयर स्टाइल कराती हैं।
याद रखिये!
यह सख़्त गुनाह की बात है।
मेरी प्यारी बहनों आप को इस बात का जरा सा भी अंदाजा है कि आप कहां जा रही हैं?
ये चमकती हुई दुनियां की रंगीनियां आप की ज़िंदगी को रौशन कर रही है या आप जिस राह पर चल रही है वो आप की दीन और दुनियां दोनों को अंधेरे में डूबो देने वाली हैं?
क्या आप का दिल मुर्दा हो गया है?
क्या आप की गैरत मर चुकी है?
मेरी कौम की बहनों, मै ये नहीं कहती के मेहँदी लगाना गुनाह है पर मेंहदी का ऐसा फैशन जो गैर मर्दों के ज़रिया पूरा किया जाये, जो आपको अल्लाह का नाफ़रमान बना दे, नबी ﷺ की सुन्नत से दूर कर दे, इससे बेहतर तो मौत है।
इस्लाम में किसी भी अजनबी मर्द या गैर मेहरम का किसी औरत के जिस्म का कोई भी हिस्सा छूना या पकड़ना सख़्त तरीन गुनाह और हराम अमल है और इसे हाथों का ज़िना क़रार दिया गया है।
मेरी प्यारी बहनों! जब अकेली अल्लाह तआला के सामने हाज़िर होंगी क्या जवाब दोगी?
अपनी आज की बे-हयाई और फ़हाशी का?
कल क़यामत के दिन रसूल अल्लाह ﷺ से किस मुँह से हौज़े कौसर से पानी मांगेगी?
उम्मुल मोमिनीन अम्मी आयशा और सैय्यदा फ़ातिमा रजी० का किस तरह सामना करेंगी?
ग़ैर मेहरम औरतों को छूने, उनसे मुसाफ़ा करने और उनके साथ मेल जोल रखने के बारे में शरियत में शदीद मुमानिअत आयी है।
नबी करीम ﷺ ने अपनी पूरी ज़िंदगी में किसी ग़ैर मेहरम औरत के हाथ को छूआ तक नही, जब हाथ को छूना हराम है तो सर को छूना भी हराम है।
अम्मी आयशा रज़ि अल्लाहू अन्हा फ़रमाती हैं :
"والله ما مَسَّتْ يَدُهُ يَدَ امْرَأَةٍ قَطُّ في الْمُبَايَعَةِ وما بَايَعَهُنَّ إلا بِقَوْلِهِ"
(صحیح البخاری / کتاب الشروط )
"अल्लाह की कसम!, बेअत करते हुए भी रसूल अल्लाह ﷺ का हाथ मुबारक कभी किसी औरत के हाथ को touch तक नहीं किया रसूल अल्लाह ﷺ औरतों की बेअत सिर्फ़ अपने कलाम मुबारक के ज़रिये फ़रमाया करते थे।"
ये था नबी करीम ﷺ का अमल मुबारक, जिसकी ताकीद उन्होंने अपने मुबारक अल्फ़ाज़ में यू फ़रमायी:
"إِنِّي لَا أُصَافِحُ النِّسَاء"
"मैं औरतों से हाथ नही मिलाता !"
[सुनन निसाई, किताब अल-बेअत, बाब - 12; सुनन इब्ने माजाह, किताब अल-जिहाद, बाब - 43
इमाम अल्बानी रहमतुल्लाह ने फ़रमाया हदीस सहीह है; अस सिलसिला अस सहीहा : 529]
यह अमल आप सल्लल्लाहु ﷺ के लिए ख़ास था, या उनके अपने मुक़ाम का तक़ाज़ा था।
रसूल अल्लाह ﷺ का यह फ़रमान मुबारक, ग़ैर मेहरम औरतों से मुसाहफ़ा करने यानी हाथ मिलाने के गुनाह की शिद्दत समझाने के लिए काफ़ी होना चाहिए। आपने फ़रमाया:
"لأن يَطعَنَ أحدُكُم بِمخيط ٍ مِن حَديدِ خَيرٌ لهُ مِن أن يَمسَ اِمرأة لا تُحلُ لَهُ"
(السلسہ الاحادیث الصحیحہ /حدیث226)
रसूल अल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: "तुम्हारे लिए किसी ग़ैर महरम को छूना (टच) करने से बेहतर है कि तुम अपने सिर (हेड) मे लोहे की कील ठोक लो।"
[सही अल-जामेअ : 5045; अल-तबरानी : 486]
लिहाज़ा ख़्वातीन इस क़बीह तरीन अमल से बचें और मर्द दुकानदार भी इस बात का ख्याल रखें।
अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: "जिसने किसी क़ौम की मुशाबहत की वो उन्ही में से है।"
[सुनन अबु दाऊद : 4031]
आइए कुछ और हदीस पर नज़र डालते हैं
गैर महरमों में आने जाने से बचें!
1. रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
"ना महरम औरतों के पास आने जाने से बचो।"
[सहीह बुखारी-5232]
2. रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
"मर्द किसी औरत के साथ तन्हाई में ना बैठे वरना उनमें तीसरा शैतान होता हैं।"
[सुन्नान तिर्मिज़ी-2165]
उपर्युक्त हदिसों की रोशनी में साबित होता है कि किसी ग़ैर मेहरम औरत को छूना हराम है फिर चाहे ये दम की नियत से छुआ जाये, या प्यार देने की नियत से छुआ जाये या किसी और नियत से छुआ जाये। ऐसे लोगों से दम करवाने से परहेज़ किया जाये जो शरियत की पाबन्दी नहीं करते हों।
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का फ़रमान है
"अलबत्ता जो तौबा कर लें और ईमान ले आए और अच्छे काम करें फिर सीधा चलता रहें उसके लिए मैं बहुत माफ करने वाला हूं।" [क़ुरान 20:82]
इस्लाम जिन्दगी जीने का तरीक़ा सिखाता है। इस्लाम औरतों को ज़ेवरात (jewelry) पहनने, मेकअप करने, मेंहदी लगाने और चूड़ियां पहनने से मना नहीं करता मगर ग़ैर मज़हब की बातों को अनुकरण, बे-हयाई और फ़हाशी, अपनी जीनत की सरे आम नुमाइश करने और गैर मेहरम को छूने से सख़्त मनाही करता है।
मेरी कौम की बहनों आज आपके पास वक्त हैं मगर कल आखिरत में आप को लम्हा बराबर भी वक्त नहीं दिया जाएगा।
उम्मत के प्यारे भाई और बहनों हमे उसी तरीक़े से जीना चाहिये जो तरीक़ा रसूलुल्लाह (ﷺ) का था, ग़ैर क़ौमो का तरीक़ा नही अपनाना चाहिए तभी हम इस दुनिया और आख़िरत में कामयाब होंगे।
अल्लाह से दुआ कि अल्लाह उम्मत की शहजादियों को सिरातल मुस्तकीम पर चलने की तौफीक इनायत फरमा दें।
अल्लाहुम्मा आमीन
आपकी दीनी बहन
फिरोजा
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