Nikah (Part-1) Allah Ki Nishani aur Ambiya e kiram Ki Sunnat

Nikah (Part-1) Allah Ki Nishani aur Ambiya e kiram Ki Sunnat


निकाह: अल्लाह की निशानी और अम्बिया ए किराम की सुन्नत


अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने ये दुनिया एक मक़सद के तहत और महदूद वक्त (कयामत) तक के लिए खल्क किया और इस दुनिया में इंसानों को खलीफा बना कर भेजा।


"और जब तेरे रब ने फरिश्तों से कहा कि मैं जमींन में खलीफा बनाने वाला हूं तो उन्हों ने कहा कि ऐसे शख़्स को क्यों पैदा करता है जो जमीन में फसाद और खून बहाए? हम तेरी तस्बीह और पाकीज़गी बयान करने वाले हैं। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने फ़रमाया जो मैं जानता हूं तुम नहीं जानते।" [क़ुरआन 2:30]


अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने फरिश्तों पे हमें (इंसानों) फौकियत दी और इस दुनिया में हमें सिर्फ़ खलीफा बना कर ही नहीं बल्कि एक खूबसूरत निजामें ज़िंदगी के साथ भेजा। कुंबे और कबीले के तौर पर हमें अलग पहचान दिया।


"ऐ लोगों! तुम सब को एक ही मर्द और औरत से पैदा किया और इस लिए कि तुम आपस में एक मर्द दूसरे को पहचानो कुंबे और कबीले बना दिए हैं।" [क़ुरआन 49:13]


इस दुनिया को महदूद वक्त तक, चलाने के लिए इंसानी नस्ल का परवान चढ़ाना ज़रूरी है और इंसानी नस्ल को बढ़ाने के लिए एक मर्द और औरत का किसी रिश्ते में जोड़ना ज़रूरी था।


"और हमनें तुम्हें जोड़े (मर्द और औरत की शक्ल) में पैदा किया।" [क़ुरआन 78:8]


अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने इंसानों  को जोड़े में और जोड़े से पैदा किया।


ऐ लोगों! "अपने परवरदिगार से डरो, जिसने तुम्हें एक जान से पैदा किया इसी से इसकी बीवी को पैदा करके इन दोनों से बहुत से मर्द और औरतें फैला दिए, इस अल्लाह से डरो जिसके नाम पर एक दूसरे से मांगते हो और रिश्ते नाते तोड़ने से भी बचो बेशक अल्लाह तुम पर निगहबान है।" [क़ुरआन 4:1]


अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने इस आयत में सिर्फ़ रिश्तों की ही नही बल्कि उसकी अहमियत को भी बताया यानि रिश्ते नाते तोड़ने से भी बचो बेशक अल्लाह तुम पर निगहबान है। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त तो हमारा निगाहबान है ही और वो तो हमारी शहरग से भी ज़्यादा क़रीब है फिर भी अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त इसे ख़ास तौर पे कहा तो इससे पता चलता है ये रिश्ता कितना अहम है।


नई जिंदगियों की आमद और रिश्तों की शुरुआत निकाह से होती है तो निकाह को समझे हैं:-


निकाह:


"और हर चीज़ को हमनें जोड़ा जोड़ा पैदा किया है, ताकि तुम नसीहत हासिल करो।" [क़ुरआन 51:49]


अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने इंसानों के जोड़े (मर्द और औरत) को जिस के ज़रिए एक किया वो निकाह है।

निकाह का लगवी माना (meaning) मिलना और मिलाने से है। 

अहले अरब कहते हैं: जैसे बारिश का पानी जमीन में मिल जाता है, नींद आंखों से मिल जाती है। इसी तरह निकाह एक अनजान इंसान को दूसरे अनजान इंसान से जोड़ कर एक रिश्ते (शौहर और बीवी) में बांध देती है।


 अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त फरमाता है:

"तुम में से जो मर्द और औरत बेनिकाह के हों इनका निकाह कर दो और अपने नेक बख़्त गुलाम और लौंडियों का भी अगर वो मुफलिस भी होंगे तो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त इन्हें अपने फजल से गनी (माल दार) बना देगा अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त कुश्दगी वाला और इल्म वाला है।" [क़ुरआन 24:32]


निकाह करना हुक्मे इलाही है और अगर हुक्म है तो इसे अदा करना इन्सानों का फ़र्ज़ है।


"हम आप (ﷺ) से पहले भी बहुत से रसूल भेज चुके हैं और हमनें इन सब को बीवी बच्चों वाला बनाया था किसी रसूल से नहीं हो सकता कि कोई निशानी बाग़ैर अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की इजाज़त के ले आए हर मुकर्राह वादे की एक लिखत है।" [क़ुरआन 13:38]


इस आयत में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त काफिरों के जवाब में नबी करीम ﷺ को मुखातिब करके कह रहें हैं, आप (ﷺ) से पहले बाक़ी रसूल की भी बीवियां थीं और ये सब मेरी इजाज़त से। 

यानि निकाह अल्लाह की निशानी और तमाम अम्बिया ए किराम की सुन्नत है।


नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:

"निकाह मेरी सुन्नत है और जो मेरी सुन्नत पे अमल नहीं करता वह हम में से नहीं।" [सुन्न इब्ने माजा:1846]


निकाह नबी करीम ﷺ की सुन्नत है और नबी करीम ﷺ सुन्नत की अहमियत का अंदाजा इस आयत से लगाए:


अल्लाह फरमाता है:-

"ऐ नबी! लोगों से कह दो कि “अगर तुम हक़ीक़त में अल्लाह से मुहब्बत रखते हो तो मेरी पैरवी करो, अल्लाह तुमसे मुहब्बत करेगा और तुम्हारी ग़लतियों को माफ़ कर देगा। वो बड़ा माफ़ करनेवाला और रहम करनेवाला है।" [क़ुरआन 3:31]


निकाह का मक़सद:-


हमनें अपनी बात का आगाज़ मक़सद से ही किया है इंसानी जोड़े को एक करने मक़सद यही है कि  इंसानी नस्ल को रहती दुनिया तक कायम रखना। और इंसानों को उनकी नफसीयती ख्वाहिशात के गलबे से महफूज़ रखना।

एक आदमी नबी करीम ﷺ के पास आया और कहने लगा: एक दर्जा और हुस्न वाली पाई है, लेकिन वो औलाद नहीं पैदा कर सकती, क्या मैं उससे निकाह कर लूं? नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया  नहीं, उसने नबी करीम ﷺ से तीन बार पुछा तीसरी बार में नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:

"उन औरतों से निकाह करो जो ज़्यादा मोहब्बत करने वाली और ज़्यादा बच्चे पैदा करने वाली हों।" [सुन्न अबु दाऊद:2050]

इस हदीस में पोशीदा मक़सद की वजाहत करती दूसरी हदीस:


नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:

"मैं तमाम अम्बिया ए किराम पे अपनी उम्मत की कसरत (number) पे फख्र करूंगा।" [Al Mo'jam Al Awsat Hadith no. 5099]


निकाह निगाहों को नीचा रखती है। जिससे इंसान ख़ुद पाकदामन रख सकता है।

नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया: "ऐ नौजवानों की जमात! अगर तुम्हारे पास इस्तेताअत है तो निकाह कर लो ये निगाहों को नीचा रखने में तुम्हारी मदद करती है।" [सहीह बुखारी:1905]


इस्लाम ने औरत को मोहसिना बताया है। 


निकाह की अहमियत और फ़ायदे:-


निकाह एक बा बरकत अमल है और निकाह इबादत है। आईए इसकी और अहमियत और फ़ायदे को जान लेते हैं:

नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:

"जिसने निकाह किया उसने अपना आधा ईमान मुकम्मल किया।" [सुन्न तिर्मीज: 2521]


अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने निकाह के ज़रिए दो अनजान लोगों में सुकून, मोहब्बत और हमदर्दी क़ायम कर रखा फिर उससे इंसानी नस्ल को परवान चढ़ाया फिर एक इंसान को दूसरे इंसानों से किसी ना किसी रिश्ते से जोड़ दिया।

अल्लाह फरमाता है:

"और इसकी निशानियो में से है कि तुम्हारी ही जींस से बीवियां पैदा किय ताकि तुम इनसे आराम पाओ इसने तुम्हारे दरमियान मोहब्ब्त और हमदर्दी क़ायम कर दी यक़ीनन गौर करने वालों के लिए इस में बहुत सी निशानियाँ हैं।" [कुरआन 30:21]


दुनिया में हर रिश्ते की शुरुआत निकाह से हुई और हर रिश्ते को एक अलग मुकाम भी हासिल है।

निकाह नस्ब को क़ायम रखती है। अगर कोई बिना निकाह के औलाद पैदा करे तो क्या कोई रिश्ते की कोई पहचान होगी? आज हम मगरिबी ममालिक (western countries) को देख लें वहां बच्चों को  रिश्तेदारो की पहचान, तो दूर उन्हें अपने बाप का पता नहीं होता। और ऐसे बच्चे ही जुर्म को अंजाम देते हैं।

आज हमारे समाज को आज़ादी के नाम पर ऐसा ही बनाने की कोशिश की जा रही है। समझने के लिए बस इतना ही कहेंगे:

यही दर्स देता है हर शाम का सूरज,

मगरिब की तरफ़ जाओगे तो डूब जाओगे


औलाद निकाह के मक़सद से हासिल होती है और नेक औलाद एक सदका जारिया है,

नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:

"इंसान के मर जाने के बाद उसके अमल का सिलसिला खत्म हो जाता है सिवाए तीन वजहों के, जिसमें से एक नेक औलाद अगर उसके लिए दुआ करे।" [सहीह मुस्लिम: 4223]


अल्लाह रब्बुल इज़्जत से दुआ करती हूं कि अल्लाह हमें दीन पर अमल करने की तौफीक दे

आमीन या रब-उल आलमीन 

जज़ाक अल्लाह खैर

-अहमद बज़्मी

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