हिजाब मर्द का ज़ोर या औरत का अपना इंतखाब
Criticisms से हिजाब तक का सफ़र आसान है या मुश्किल ये तय करना ज़रूरी नहीं लेकिन मेरे हिजाब लगाने के पीछे मेरी तालीम और तरबियत का अहम किरदार है लेकिन मैंने इसे बहुत आसानी से नहीं अपनाया बल्की दो नजरियों के बीच दो तरह से मेरी तालीम और तरबियत चर्चा बनी फिर मेरे लिए राहें हामवार हुईं। मेरी तालीम का आगाज़, जैसा कि इस्लाम कहता है: मां की गोद बच्चों की पहली दरसगाह है। मेरी अम्मी ने ये फ़र्ज़ बाखूबी निभाया।
हम लोगों को बचपन में कभी कोई गड़ी हुई कहानियां नहीं सुनाई बल्कि अम्बिया इकराम और सहाबा इकराम की सीरत को बताया और मेरे अब्बा हर जुम्मा जो खुत्बा सुनते थे वो हम लोगों को बताते थे और हम लोगों का दाखला भी मदरसा में करवाया। नाच गाना क्या होता है? मैने ज़िंदगी के एक हिस्से तक जाना ही नहीं। मेरे वालीदैन हम लोगों को साथ (जमात इस्लामी हिंद) JIH के प्रोग्राम में ले जाते थे जहां से हम ने इस्लाम को थोड़ा बहुत जाना।
JIH की तरफ़ से Islamic Summer classes होता था तो 2007 से वहां जाने लगी। 2011 के प्रोग्राम में एक स्कॉलर को मेरा concept clear लगा तो उन्होंने मुझसे सवाल पूछा कि अम्मी या अब्बा की तरफ़ से है तो जवाब में उन्हें पता चला कि मेरे घर वालों का तालुक JIH से रहा है तो उन्होंने मुझसे कहा जब घर माहौल ऐसा है तो बहुत ज़्यादा ना सही थोड़ा बहुत पर्दा का एहतमाम किया करें जबकि उस वक्त तक मैं 10th भी pass out नहीं थी और ना ही मेरी dressing वक्त और उम्र के लिहाज़ से बुरी थी लेकिन तालीम और तरबियत के ऐतबार से नहीं थी। Islamic Summer classes के नातीजे वाले दिन sir ने मुझे मौलाना अबुल आला मौदूदी की किताब "पर्दा" एक बुजुर्ग के ज़रिए दिया उस किताब से मैंने वो नसीहत नहीं हासिल की जिस मक़सद से मुझे दी गई थी।
2012 में, एक islamic quiz हुआ जिसमें topic पूरा इस्लाम था यहां तक कि Islamic history भी और सिर्फ पांच सवाल पूछे गए सवालों के जवाब दे कर मैं सिर्फ़ winner ही नहीं बल्कि तांकीद का निशाना भी बनी लोग मेरे भाई से कहते थे जब आपकी बहन को इतना कुछ इस्लामी मालूमात है तो फिर वो नकाब क्यों नहीं लगाती हैं? लेकिन तब भी मुझ पर लोगों की बातों का असर नहीं हुआ। जब मैं लोगों को हक़ और बातिल में फ़र्क समझाने की या शिर्क बिद्अत से रोकने की कोशिश करती थी तो लोग मुझसे कहते थे तुम नकाब क्यों नहीं लगाती, ये नहीं पढ़ा है क्या? एक बार मुझे कुछ ज़्यादा ही बातें सुनाई गई तो मेरी तरफ़ से एक teacher ने कहा कि बेशक वो नकाब नहीं पहनती है लेकिन उसकी dressing भी ऐसी नहीं जो बेपर्दगी के दायरे में शुमार हो।
ये था एक नज़रिया👆🏻
दूसरा नज़रिया:- दूसरे नजरिए वालों से मेरी मुलाक़ात graduation में हुई जहां ज़्यादा तर गैर मुस्लिम थे वो हमारी dressing पे तबसरा तो करते थे लेकिन कभी troll नहीं किया लेकिन हां! एक सोच के असीर ज़रूर थे और अब भी ये लोग हैं भी कि मुस्लिम औरतें अगर ख़ुद को पोशीदा रखती हैं तो अपने घर के मर्दों (male relatives) के दबाव में। ये किस हद तक सच है आगे बात करेंगे, बहरहाल, मैं institute जाती तो वहां मेरी बहुत सी लड़कियों से दोस्ती हुई जो मेरी dressing पे बहुत बाते करती थीं यहां तक बोलती थी कि मेरी dressing/style 17th century की है। लेकिन अब तक मुझपे किसी भी नजरिए का असर नहीं हुआ और ना मैंने उन लड़कियों से मरासिम बढ़ाए।
एक साल बाद मैं school में पढ़ाने जाने लगी। मैंने Van में male teacher के बगल में बैठने से इंकार कर दिया तो मुझे समझाने की कोशिश की गई मैंने भी अपना नज़रिया समझाया फिर मुझे वहां से निकाल दिया गया कुछ दिनों के बाद मुझे फिर बुलाया गया मैं अपने उसी attitude के साथ गई। तब तक मैं सिर्फ़ सिर पे दुपट्टा रखती थी तो उस स्कूल की principle बोलती थी सिर से पल्लू हटाओ तो मेरा जवाब होता था की ma'am बाल पे चॉक गिरती है, वो हटा देती। मैं फिर रख लेती थी उसे ये अमल बहुत नागवार लगा तो उसने बोला dress (साड़ी) लगा देते हैं सारी teachers राज़ी भी हो गईं बची मैं अकेली तो मैंने director sir से बात किया उन्होंने बोला आपको पहनना भी नहीं चाहिए। principle को मेरा ये अमल भी नागवार लगा। तो सोचा होगा मैं कम उम्र हूं तो वो मुझे प्यार कायल कर लेंगी लेकिन मुझ पे अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का करम हुआ मैं उसकी बातों को सुनती और सिर्फ़ मुस्कुराती थी।
प्रिंसिपल ने दूसरी टीचर्स से बोला आप लोग अपने तरीके से इसे (मुझे) समझाए फिर सब ये पूछने लगे आप साड़ी पहन लोगी तो आपका या घर वालों का क्या बिगड़ जायेगा? आप लोग अपनी मर्ज़ी से कपड़े भी नहीं पहनती हैं? उस वक्त मेरे पास इस तरह के सवालों का माकूल जवाब नहीं था तो सिर्फ़ ख़ामोशी और बर्दाश्त से काम लेती थी मेरी तरबियत और अकीदा की बहुत बुरी तरह आलोचना करते थे हद ये थी कि इस बिनाह पे मुझे आतंकवादी और पाकिस्तानी तक कहा गया मैंने इन बातों का जवाब बातों से ना दे कर बल्कि हिजाब लगाना शुरू कर दिया reaction में जो हुआ वो बहुत ही गलत था फिर भी मैं अपने फैसले पर कायम रही। मैं हर बात अपने घर वालों के साथ share करती थी तो मेरे वालीदैन मुझे सिर्फ सब्र की तलकीन करते थे और समझाते थे कि ये दीन हम तक इतनी आसानी से नहीं पहुंचा बल्कि सब्र-तहम्मूल और हिक्मत ऐ अमली से यहां तक आया और हमनें भी अपने अमल के साथ इन बातों का ख्याल रखते हुए, दीन ऐ इस्लाम से बेखबर लोगों तक इस दीन को पहुंचाना है। लेकिन उम्र के हिसाब से ये सब आसान नहीं था तो मैंने school change कर दिया दूसरे school में शुरु में सब कुछ ठीक रहा लेकिन कुछ दिनों बाद वहां भी यही सब शुरु हो गया अब तक मुझ में बना लावा फूट पड़ा मैंने भी उसी अंदाज़ में सवाल किया (किसी बात ख्याल किए बिना कि कौन बड़ा या कौन senior) आप लोगों के नज़दीक औरत की आज़ादी का क्या मयार (standard) है?
क्या औरत सिर्फ साड़ी पहनने तक ही आज़ाद या कुछ भी ना पहनने तक? कहीं ना कहीं आप लोग भी line draw करते हो, तो जब दूसरा ये तय कर रहा और जिसका वो मुहाफिज तो आप को क्या मसला है? आप औरतों को काम के पैसे दे देते हो साथ ये तय भी कर रहे हो की आपकी dressing क्या होगी, क्या ये औरत की अपनी मर्ज़ी है?
पुर असर तरबियत
वही तरबियत पुर असर होती जो अमल से दी जाए। बच्चियों को, बच्ची समझ कर कभी उन्हें बेहुदा लिबास ना पहनाए क्योंकि पहले बच्चे आदतों के फिर तरबियत के असीर बनते हैं।
बेशक मैंने आलोचनाओं के जवाब में हिजाब लगाना शुरू किया, लेकिन हो सकता है कि कोई दूसरा होता तो वो उन लोगों की बातों में आ जाता। लेकिन मुझे जो किताब (पर्दा) मिली थी, बेशक मैंने उससे वो नसीहत नहीं हासिल किया था लेकिन वो मेरे लिए एक याद दिहानी थी/है। और जब हम लोग अपने dress लेने अपने अब्बा के साथ जाते थे तो अगर कोई dress माहौल के हिसाब(according to fashion) से दिखाता तो मेरे अब्बा उसे इस तरह मना करते मानो कोई बुरी चीज़ देख लिया हो।
बेटी की तरबियत में बाप का किरदार
आपने अक्सर ये सुना होगा कि बेटियों की तरबियत में मां का अहम किरदार होता है लेकिन मेरा मानना है कि बाप का भी अहम किरदार होता है क्योंकि बाप बेटियों से और बेटियां बाप से ज़्यादा प्यार करती हैं। और बाप बीटियों का protective shield होते हैं और वो घर के बहार ही रहते हैं तो उन्हें अंदाज़ा होता है कि हमें अपनी बेटियों को किन-किन चीजों protection देना है। तो बाप को चाहिए कि वो समाज में क्या हो रहा है उससे अपनी बेटियों को अगाह करें ज़रूरी नहीं है कि वो बात आ कर बताए बल्कि उसी पसेमंज़र में उनकी तरबियत करें जिससे वो समाज की बुराइयों से ख़ुद महफूज़ रख पाए। मेरे अब्बा ने कभी ये नहीं कहा ये ना पहनो या इनसे ना मिलो या यहां ना जाओ। बस इस तरह का माहौल बनाया कि बिना कहे हम लोगों ने नकाब और हिजाब लगाना शुरू किया। सिर्फ़ नकाब और हिजाब की ही पाबंदी नहीं करते हैं बल्कि उसके मक़सद को भी समझा।
हिजाब क्यों ज़रूरी
इसे भी मैं अपने ज़ाती ख्यालात से समझाने की कोशिश करूंगी इंशा अल्लाह.....
जब मैं कम उम्र थी तो मां-बाप की तरबियत की पाबंदी की लेकिन जब थोड़ा बड़ी हुई तो अपने जानिब उठने वाली नज़रों को देख के ये समझ आने लगा कि पर्दा कितना ज़रूरी है। (ये समझ आना भी पुर असर तरबियत का नतीजा है।)
अक्सर आपने शायरों और कुछ लोगों, औरतों की तुलना चांद से करते हुए सुना होगा जिसे लोग हसरत भरी निगाहों से देखते हैं जिसकी शान क़सीदे पढ़े जाते हैं। तो मैं कहती हूं क्यों ना औरत ख़ुद को सूरज के मानिंद बनाएं जिसकी जानिब उठने वाली नज़रे ख़ुद बा ख़ुद झुक जाए आप ख़ुद ही सोचे आपकी dressing या बनाओ सिंगार ऐसा क्यों हो जिससे कोई और गफलत में मुबताला हो जाय और गुनाहगार आप हो।
हिजाब में घुटन
कुछ लोगों का ये सवाल होता है कि हिजाब में घुटन नहीं होती है?
तो उन्हें बता दें कि ये हुक्म मेरे रब का है जो हमारा खालिक है वो हमें हमारी फितरत के मुताबिक अपने हुक्म का पाबंद बनाया। हिजाब सिर्फ़ बाहर निकलने या किसी गैर महरम के सामने है जो हमें बुरी नज़रों और बेहूदा ख्यालात से महफूज रखता है। जैसे: bird's egg जिसपे calcium carbonate की membrane होती है। क्योंकि उसका embryonic development out side the body होता है और वो उसे out side के environment से protection देती है। क्या hard shell में developing embryo घुट के मर जाता है?
Animal kingdom में ऐसे बहुत से animals हैं जो बहुत ही नाज़ुक होते हैं लेकिन उनपे calcium carbonate या chitin की membrane होती है जो उनकी हिफाज़त करती है।
हिजाब का म'यार (standard)
हिजाब का मतलब पर्दा/आड़, यानि मर्द (नामहरम) और औरत के दरमियान। तो पर्दा ऐसा होना चाहिए कि जो इस मक़सद पूरा करता हो। हमनें देखा कि बहुत सी लड़कियां नकाब/हिजाब ऐसा पहनती हैं कि वो मक़सद को नहीं पूरा करता है। तो फिर पहनने का कोई मतलब नहीं। जैसे:- अपनी आंखों को मेकअप करना, बालों का जुड़ा बना के ऊंचा उठाना उसपे हिजाब लगाना और गैर मर्द से महेंदी लगवाना, फिर पूरा ख़ुद को पोशीदा रखने का कोई मतलब नहीं होगा। हमें अपनी तरफ़ कोई लापरवाही नहीं होने देना है। ऐसा पर्दा करें जो फरमाने इलाही को पूरा करता हो। जब फंक्शन में जाए तो भी इन बातों का ख्याल करें। क्योंकि फंक्शन में सब से ज़्यादा बेहयाई होती है और हमें कहीं पे भी हिजाब के मयार को नहीं गिरने देना है। हां ये सच है, समाज में जिस तरह का माहौल है इन बातों का ख्याल रखना आसान नहीं लेकिन जब दिल में खौफ ऐ खुदा होगा तो हमें ये मुश्किल भी नहीं लगेगा।
आवाज़ का पर्दा
आवाज़ का पर्दा तो नहीं है लेकिन किसी गैर महरम से बात करते वक्त अपने लहजे को थोड़ा तल्ख़ रखें (औरत की आवाज़ भी पुर काशिश (attractive) होती है।) ऐसा इस लिए कहा गया है क्योंकि आपका ऐसा कोई इरादा ना हो लेकिन सुनने वाला गफलत में मुबताला हो सकता है और सिर्फ़ हसबे ज़रूरत (according to need) ही बात करें।
क्या हिजाब मर्द का ज़ोर जबरदस्ती है?
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने जिस भी जानदार को जिस फितरत पे क़ायम रखा है उसे, उस तरह की सलाहियत बख्शी है यही हाल आदम की बेटियों का भी है अगर बचपन में उन्हें, उनकी फितरत और इज़्ज़त और अस्मत (honor and integrity) से शनासायी (acquaintance) करवाया जाए तो एक उम्र के बाद उनमें ये सलाहियत ख़ुद बा ख़ुद बेदार हो जाएगी की वो अपने जानिब उठने वाली नज़रों के पीछे की नियत को जान सकें और फिर उसके मुताबिक बुरी नज़र और नियत से ख़ुद को बचा सकें। आप ख़ुद ही गौर करें ऐसी बहुत सी लड़कियां होती हैं जिनकी तारीफ़ की जाए तो वो बहुत खुश होती हैं और दूसरी तरफ ऐसी भी लड़कियां होती हैं जिनकी तारीफ़ की जाती है तो वो उसे नज़र अंदाज़ करती और तारीफ़ करने वालो से बचती हैं।
अब आप ख़ुद ही तय करें की हिजाब क्या है? क्यों ज़रूरी है? और क्या वाकई मुस्लिम औरतें मर्दों (male relative) के दबाव में लगती हैं?
अपनी दास्तां बताने का मक़सद
आज हिजाब के ज़रिए मुस्लिम औरतो को ही नहीं बल्कि हमारी पुरी को कौम को टारगेट किया जा रहा है। जैसे कि हिजाब की वजह से school और college में दाख़िल नही होने दिया जा रहा है जब हवा हर सिम्त से हमारे खिलाफ़ बह रही है तो हमें उसका रुख अपने जानिब मोड़ना आना चाहिए। हमें चाहिए कि हम अपनी बेटियों के लिए स्कूल और कॉलेज बनवाए जहां वो इस्लामी हुदूद में रहते हुए दीनी और असरी तालीम हासिल कर सकें और दुश्मानने इस्लाम को कम अज़ कम हमें टारगेट करने के लिए हमारी बहन और बेटियों का कंधा ना इस्तेमाल करना पड़े। इसी लिए हमने अपनी दास्तां बयां किया, हो सकता हो हया की पसदारी में कुछ बहनों को मुश्किलें दर पेश आई हो और उन्होंने छोड़ दिया। मुश्किलों में ही तो इंसान निखरता है।
जीना यहीं है मरना यहीं है।
फिर इन अहलो से डरना क्यों?
बिनते अहमद जावेद बज़्मी
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