निकाह में ताखीर के असबाब, नुक्सानात और फ़िज़ूल खर्ची
शादी के नाम पे फ़िज़ूल खर्ची:
फ़िज़ूल खर्ची, हक़तल्फी करने पे अमादाह करता है, इसीलिए अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने फ़िज़ूल खर्ची करने से मना किया और साथ ही हक़ अदा करने का हुक्म दिया।
"और रिश्ते दारो का और मुसाफिरो का हक़ अदा किया करते रहो और इसराफ और बेजा खर्च से बचो।" [क़ुरआन 17: 26]
बेजा खर्च करने वाले को अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने शैतान का भाई बताया।
"बेजा खर्च करने वाले शैतान के भाई हैं और शैतान अपने परवरदिगार का बड़ा ना शुक्रा है।" [क़ुरआन 17: 27]
फ़िज़ूल खर्ची तो वैसे भी अल्लाह को बिल्कुल नहीं पसंद और शादी के नाम पे ये शैतानो वाले काम कर रहे हैं जबकि हमें शैतान की मुखालिफत करनी है।
ईमान वालों! "इस्लाम में पुरे पूरे दाख़िल हो जाओ और शैतान के कदमों की ताबेदारी ना करो वो तुम्हारा खुला दुश्मन है।" [[क़ुरआन 2: 208]
हमारा दुश्मन (शैतान) कब चाहेगा कि हम वो काम करे जिससे बहुत सी बुराइयों (जिना, ना जायज़ तलुकात, फ़िज़ूल खर्ची, फ़िज़ूल रस्मोआत, जहेज़ और निकाह में ताखीर वगैरा वगैरा) को लगाम लग जाय और फिर हमें अपने रब की अता की हुई नेमतों का हिसाब भी तो देना है।
"फिर इस दिन तुमसे ज़रूर बिल ज़रूर नेमतों का हिसाब होगा।" [क़ुरआन 102: 8]
अपने रब के सामने रुसवा होने से बहुत बेहतर है कि आप उसी तरह से निकाह करे जिसे बेहतर बताया गया है।
"बेहतरीन निकाह वो है जो आसानी के साथ हो जाय।" [सुन्न अबु दाऊद 2117]
अगर हम शादी की जगह सिर्फ़ निकाह लफ्ज़ का इस्तेमाल करे और इसे ही आम करे तो शायद इन फ़िज़ूल कामों और खुराफात पे भी लगाम लगाया जा सकता है क्योंकि शादी लफ्ज़ इस्लाम में कहीं नहीं इस्तेमाल हुआ है बल्कि ये फारसी लफ्ज़ है जिसका माना खुशी होता है और इसके लफ्ज़ी माना को अमली जामा पहनाने में लोग इस्लाम की तमाम हुदूद भूल जाते हैं।
निकाह में ताखीर के असबाब:
जो देखा समझा और महसूस किया वो यही है कि लड़की और लड़के के इंतेखाब का मयार वो नहीं जिनका ज़िक्र हमनें इस्लाम की रोशनी में किया इसकी वजह यही है की लोगों ये पता ही नहीं,
निकाह क्या है?
इसका मक़सद क्या है?
और कब कर लेनी चाहिए?
अगर लोगों पता हो तो लोग निकाह के लिए वो मयार ही ना बनाएं जो आम तौर पे निकाह में ताखीर का सबब है, जैसे-
1- लड़का well educated and settled होना चाहिए। फिर चाहे उसमें दीन और इखलाक हो या ना हो।
2- लड़के भी चाहते हैं कि पहले वो well settled हो जाय फिर निकाह करेंगे। जबकि रिज्क का वादा तो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने किया ही है और जो भी आएगा अपने हिस्से की रोज़ी साथ ले कर। नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
"दुनिया की तलब में ऐतदाल का तरीक़ा अपनाओ इसलिए कि जिस चीज़ के लिए आदमी पैदा किया गया है वो उसे मिल कर रहेगी।" [सुन्न इब्ने माजा: 2142]
3- लड़की खूबसूरत और खूबसूरती का मयार भी गोरा रंग होता है। कितनी educated है? और कितना जहेज़ ले के आएगी? (जहेज़ पे इंशा अल्लाह अलग से बात करेंगे)
नोट:- ये मयार सिर्फ़ निकाह में ताखीर का ही सबब नहीं बल्कि शादीशुदा ज़िन्दगी (married life) में भी बहुत खतरनाक साबित हो सकता है, क्योंकि ये शादीशुदा ज़िन्दगी में रोमानियत, अहसास और मोहब्बत को बेदार ही नहीं होने देगा बल्कि सिर्फ़ ज़रूरतों तक ही महदूद रखता है।
4- जात बिरादरी भी एक बहुत बड़ी वजह बन गई है। अफसोस तो इस बात का है कि दीनदार लोग भी इस क़ैद से आज़ाद नहीं होना चाहते हैं। (ये सिर्फ़ निकाह में ताखीर का ही सबब नहीं बल्कि मुस्लिम उम्मत को और backward बनाती है।)
5- Well educated लड़कियों को 33-35 सालों तक निकाह का ख्याल ही नहीं आता, ऐसे लोगों को कहते हुए सुना होगा, शादी ज़िंदगी नहीं सिर्फ़ ज़िंदगी का हिस्सा है यही तो हम कह रहें हैं जब ज़िंदगी का हिस्सा है तो ज़ाहिर उसका कोई ना कोई मक़सद भी है और हमनें उसे भी समझा है तो अगर वक्त रहते निकाह नहीं किया तो बे मक़सद होगा।
वो कैसे देखते हैं?
निकाह में ताखीर के नुक्सानात:
1. सबसे बड़ा नुक्सान तो यही है कि बुराई (जिना और फहश) को बढ़ावा मिलता है।
2. दूसरे ये कि अज़दावाजी ज़िंदगी की रूमानियत और अहसास खत्म हो जाता है।
3. सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक नुक्सान ये है कि निकाह के मक़सद को असर अंदाज़ होता है।
आईये देखते कैसे?
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त औरत को जिस्मानी तौर पे, जिस फितरत पे क़ायम रखा है वो मां बनना। और हमनें नबी करीम ﷺ की हदीस को देखा जिसमें नबी करीम ﷺ ने बताया कि किस तरह की औरत से निकाह करो?
साइंस के मुताबिक माँ बनने की उम्र:
Female में reproductive cells (ova) बनने की शुरुआत fetus life (during embryonic development) में हो जाती है यानि मादा भ्रूण के विकास के समय ही प्रारम्भ (2 - 3 million primordial germ follicles में meiosis cell division शुरू हो के prophase first में meiosis arrest हो जाती है और ये जन्म के समय 60-80 हज़ार ही बचती और puberty के समय से हर माह एक एक follicles विकसित हो कर ovum बनाता है) में हो जाता है। और कोई औरत 33 या 35 साल के बाद baby plan करती है तो उसके होने वाले बच्चे में chromosomal disorders होने की संभावना रहती है क्योंकि जिस follicles से ovum बनने की प्रक्रिया fetus life से ही शुरु हो गई थी और meiosis prophase first में arrest रहती है जो ovum बनने के वक्त भी पुरी नहीं होती बल्कि meiosis division एक बार फिर arrest होती है (metaphase phase में) जो fertilisation (fusion of sperm and ovum) के समय पुरी होती है। 33/35 सालों तक meiosis division दो बार arrest होने की वजह से non disjunction (during gametes formation) हो जाता है यानि chromosomes 23/23 अलग अलग haploid cell में नहीं divide हो पाते।
इसी तरह chromosomal disorders होते हैं और ये Homologous chromosomes (1 to 22) में भी हो सकता है जैसे: (46+1=47) Edward's syndrome, down's syndrome and patau's syndrome etc. इस तरह के बच्चे भी sterile होते हैं और इनका morphological features भी नहीं विकसित हो पाता है और Allosomal disorders (sex chromosomes/gender dermining) में भी,
जैसे: klinfelter's syndrome (44+XXY=47)
Turner's syndrome (44+X0=45)
इस तरह के divison से ही बच्चों में gonads (reproductive organs) विकसित नहीं हो पाते हैं। आम तौर पे इंसान में chromosomes की संख्या 46 होती है। और मान लें आपने ऐसे बच्चे को जन्म से पहले ही मार देगें तो एक कत्ल का गुनाह होगा दूसरे ये मारेंगे तो ज़ाहिर abort करके जो बहुत ही danger है आपकी अपनी सेहत के लिए क्योंकी 12-14 weeks के बाद ही amniocentesis test होता है और तब तक embryo mother womb से placenta के ज़रिए जुड़ चुका होता है।
ये तहरीर लिखने का हमारा मक़सद:
हम जिस दीन पे ईमान रखते हैं क्या उस दीन को जानते भी हैं?
यकीनन नहीं जानते हैं तभी ख़ुद के ही बनाए रस्म और रिवाज में उलझ कर असानियो को ख़ुद दूर कर के ये सोचते हैं कि ज़िंदगी कितनी मुश्किल है? जबकि दीने इस्लाम (way of life) ज़िंदगी के हर शोबे में हमें असानियां फराहम करता है। इस्लाम रस्मों रिवाजों और त्योहारों का दीन नहीं।
निकाह में भी अल्लाह ने आसानी रखी है लेकिन हमनें रस्मों, रिवाजों और जहेज़ और बरात के ज़रिए एक अज़ीम अमल में मुश्किलात पैदा कर दी और जिन बुराइयों से निकाह रोकता उसे आम कर दिया। ला इल्मी की वजह से तलाक़ आम हो रहा है और इस बिना पे दुश्मने इस्लाम हमें रुसवा करने का कोई मौक़ा हाथ से नहीं जाने देता है।
इन बातों और पुरी तहरीर से हमारा मक़सद समझ आ गया होगा। तो अब से हम अज्म करते हैं, नबी करीम ﷺ की सुन्नत को ज़िंदा करते हैं और जिना को खत्म करने की कोशिश करते हैं।
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
"तुम में से जो शख्स किसी बुराई को देखे तो उसे अपने हाथ से रोके अगर इसकी ताक़त ना हो तो अपनी ज़ुबान से रोके, फिर अगर इसकी भी ताक़त ना हो तो दिल में ही उसे बुरा जाने और ये ईमान का सबसे कमज़ोर दर्जे है।" [सहीह मुस्लिम: 177]
इस सीरीज को यहीं विराम देते हैं।
अल्लाह रब्बुल अलामीन हमें सही समझने-समझाने, कहने सुनने और लिखने पढ़ने से ज़्यादा अमल की तौफीक अता करे।
अमीन या रब्बुल अलामीन 🤲🏻
जज़ाक अल्लाह खैर
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