Zinah Ka Gunah | Mamooli Amal Ya Gunah e Kabeera

adultery a major sin in Islam


ज़िना


ज़िना

अल्लाह क़ुरान में फ़रमाता है :

وَ لَا تَقۡرَبُوا الزِّنٰۤی اِنَّہٗ کَانَ فَاحِشَۃً ؕ وَ سَآءَ  سَبِیۡلًا ﴿۳۲﴾

और  , (देखो) ज़िना (व्यभिचार) के पास भी ना जाना, बेशक वो बेहयाई है और बुरी राह है

अल-क़ुरआन, सुरह 17 (बनी इस्राइल), आयत 32

वजाहत: इस आयात से इस बात का खुलासा होता है कि ज़िना करना तो बहुत दूर, ऐसे आमाल जिनसे आदमी ज़िना के करीब भी जाता हो, उनसे भी क़ुरआन में रोका गया है।

जब किसी क़ौम में फहशी और बेहयाई आम हो जाए फिर उस क़ौम का नामो निशान तक बाकी नहीं रहता। गुजरे जमाने के किस्सो से हमे बखूबी इस बात का अंदाज़ा होता है कि बहुत सी कौमें सिर्फ एक गुनाह की वजह से हलाक कर दी गईं जैसे कौम ए लूत।

आज जब हम मुस्लिम मुआशरे पर नज़र डालें तो कुछ मुसलमान कहे जाने वाले हज़रात का यही हाल है। आज इस कौम की  नौजवान नस्ल (लड़का हो या लड़की)के लिए ज़िना करना एक फैशन सा हो गया है।

ताज्जुब की बात ये है कि लोग गुनाह को गुनाह ही नहीं समझ रहे हैं। ज़िना जैसा संगीन गुनाह मुआश्रे में तेजी से पैर पसार रहा है बल्कि यूं कहें कि इसे गुनाह समझा ही नहीं जा रहा है।

अगर हम पिछले 40–50 सालों के हालत का जायजा लें तो अंदाजा होता है कि ज़िना समाज का सबसे गंदा और संगीन गुनाह होता था और ज़िना करने वाले को ज़लील और बदकीरदार इंसान समझा जाता था,

मगर आज हालात क्या है ये कहने की जरुरत नही है जब समाज में गंदे और गलीज़ लोगों की तादाद बढ़ जाए, फहशी और बेहयाई को शान शौकत दिखाने का जरिया बना लिया जाए। जब सोचें गंदी हो जाएं, जब कौम की नई नसल डीजे की धुन पर ठुमके लगाए, और कौम के ज़िम्मेदार लोग तमाशा देखें तो ऐसे गुनाह को भी basic need कहकर हया का गला घोंटा जाता है फिर उसे मॉर्डन सोच, खुले विचार आदि नामों से संबोधित किया जाता है।

आइए जानते हैं

ज़िना क्या है???

ज़िना (गैर शरीयती शारीरिक संबंध)  है

अगर कोई मर्द कोई ऐसी औरत से सोहबत/ हमबिस्तरी (sex) करे जो उसकी बीवी नही है तो, ये ज़िना कहलाता है। ज़रूरी नही कि सिर्फ किसी गैर मेहरम के साथ bed share करना ही ज़िना कहलाता है, बल्कि गैर महरम को छूना भी ज़िना है सिर्फ़ सोहबत करना ही ज़िना नहीं है, ज़िना की और भी कई मुख़्तलिफ़ क़िस्मे है जैसे...

 

 जिना की किस्में

1. हाथो का ज़िना !

2-आँखों का ज़िना!

3-कानो का ज़िना!

4-मुँह का ज़िना !

5-सोच का ज़िना !

6-पैरों का ज़िना !


हाथो का ज़िना

हाथों का ज़िना ये है कि

जब कोई मर्द या औरत किसी गैर मर्द या औरत को अपने हाथो से गन्दी सोच रख कर छूता हैं शरीर को हाथ लगता हैं तो इसे हाँथ का ज़िना कहते हैं ।

इसी तरह आज कल social media पर जिस तरह से हमरी नौजवान नस्ल जिस हद तक गैर मेहरम से चैटिंग में मशरूफ है चाहे वो girls ho या boys अगर वो अल्लाह के हुदूद को तोड़ कर अपने अपने नफ्स कि ख्वाहिश पूरी कर रहे हैं तो ये भी ज़िना की categary में ही आएगा ।


आँखों का ज़िना 

आंखों का ज़िना क्या है? (Ankho ka Zina)

समाज में बेहयाई की शुरुआत आंखों से ही होती है। कुरान और हदीस में आंखो की हिफ़ाज़त पर नसीहत की गई है क्यों कि रोज ए महसर इन आंखों को अल्लाह रब्बुल इज़्जत का दीदार होगा।


नबी करीमﷺ फरमाया:

जब जन्नती जन्नत में दाखिल हो जायेंगे तो अल्लाह तआला फरमाएगा: तुम कुछ और चाहते हो तो मैं तुम्हें अता करूं?

वो अर्ज करेगें:(ऐ हमारे रब! तेरी इनायत में पहले ही क्या कमी है)

क्या तुने हमारे चेहरे मुनव्वर नहीं कर दिए?

क्या तुने हमें जन्नत में दाखिल नहीं कर दिया? 

और हमें दोजख से निजात नहीं दे दी?

नबी करीमﷺ ने फरमाया:

इसके बाद अल्लाह तआला(अपने जलवा ए हुस्न से) पर्दा उठा देगा,

तब उन्हें मालूम होगा कि अपने परवरदिगार

के दीदार से बेहतर कोई चीज़ नहीं मिली फिर आपﷺ ने यह आयत तिलावत फरमाई:

{لِلَّذِیْنَ اَحْسَنُوا الْحُسْنٰی وَزِیَادَۃٌ}

ऐसे लोगों के लिए जो नेक काम करते हैं नेक जजा है, बल्कि इज़ाफा भी है,(इज़ाफा से मुराद दिदारे इलाही है)

सही मुस्लिम हदीस न०- 181, 449, 

मुसनद अहमद हदीस न०- 13341

अल्लाह हू अकबर

इर्शाद ए बारी तआला है:

ऐ नबी मोमिन मर्दो से कह दो की वह अपनी नजरे बचाकर रखे। 

[क़ुरआन 24: 29]


नबी करीम (ﷺ) ने फरमाया: "ऐ अली, अजनबी औरत पर एक मर्तबा नजर पड़ जाने के बाद दोबारा मत देखो क्यो कि पहली नजर तो माफ है जबकी दूसरी नजर की तुझे इजाजत नहीं।" 

[अबू दाऊद-2148]


पहली नज़र का मतलब अगर अचानक नजर पड़ जाए तो फौरन हटाने  का हुक्म है न की जान बुझ कर पहली ही नज़र डालना और जी भर के देख लेना।

जब जरीर बिन अब्दुल्लाह (رَضِيَ ٱللَّٰهُ عَنْهُ) ने (गैर औरत पर) अचानक पड़ने वाली नज़र के बारे में रसूलल्लाह (ﷺ) से मसला पूछा तो आप (ﷺ) ने हुक्म फरमाया कि “तुम अपनी नज़र फेर लिया करो।” [सहीह मुस्लिम 2159/45]

आंखों का ज़िना ये है कि:

जब कोई मर्द या औरत अपने नजरों से किसी गैर दूसरे इंसान को बिना कपडे के देखता हैं , गन्दी पोर्न मूवी या वीडियो, तस्वीर देखता हैं ये आँखों के ज़िना में शुमार होता हैं।


कानो का ज़िना 

(Kano Ka Zina) लोग कहते हैं भला कान का ज़िना कैसे मुम्किन है आइए जानें 

जब कोई मर्द या औरत किसी गैर मर्द या औरत से गन्दी गन्दी बाते सुने और उस से लुत्फ उठाएं बार बार उन बातों से attract हो या ऐसी music 🎶 सुने जो उसे  उन बुरी ख्वाहिश की तरफ़ ले जाए जो हराम है उसे कान का ज़िनाह कहते हैं।



मुँह का ज़िना 

(Munh Ka Zina) क्या कोई शख्स मुंह से भी ज़िना करता है??

मुंह से मुराद जुबान से अदा होने वाले अल्फाज़ से है जब  कोई मर्द या औरत किसी गैरमेहरम के साथ बात करते समय गन्दी गन्दी  बाते करते हैं जिससे दिल गुनाह की तरफ़ माइल हो क्यों की बातों में जादू सा असर होता है और इंसानी नफ्स मजीद गुनाह की तरफ़ मुतवज्जेह  हो तो ये मुंह या जबान का ज़िना है। 



सोच का ज़िना    

सोच का ज़िना यानि हमारे mind में चलने वाली बातें जो हमे बुराई या बदकारी की तरह ले जाएं... जब  कोई  मर्द या औरत अपने दिमाग में किसी दूसरे गैर मेहरम के लिए गन्दी  सोच  सोचता हैं या दिमाग में लता हैं तो इसे दिमागी ज़िना या सोच का ज़िना कहते हैं ।


पैरों का ज़िना 

(Pairon Ka Zina) यानी बुराई की तरफ़ ले जानें वाला अमल जो पैरो से चल कर बदकारी में डाल दे, जब कोई मर्द या औरत किसी गैरमेहरम के पास गन्दी सोच रख कर जाने के लिए कदम  बढाता हैं अपने पैरो के जरिये ऐसे संगीन  गुनाह के  लिए फासले तय करता है तो इसे पैरो का ज़िना कहते हैं

और  इन सारे गुनाह का अजाब उतना ही है जितना गैर शरीयती शारीरिक संबंध का।


उसी तरह पेशावर बाज़ारी औरतों और तवाइफों के साथ मुबाशरत को भी ज़िना ही कहा जाएगा । आज कल अक्सर नौजवान मुशरिक और गैर मुस्लिम  लड़कियों के साथ नाजाइज़ तअल्लुकात रखते हैं याद रखें ये ज़िना ही है।


इस्लाम में ज़िनाह की क्या सजा है??


ज़िना को इस्लाम में एक बहुत बड़ा गुनाह माना गया है, और इस्लाम ने ऐसा करने वालो की सज़ा दुनिया में ही रखी है. और मरने के बाद अल्लाह इसकी सख्त सज़ा देगा। 

ज़िना के बारे में कुछ हदीस और क़ुरान की आयत देखिये।


और मोमिन वो है जो अपनी शर्मगाह (private part) की हिफाज़त करते है।  

अल-क़ुरआन, सुरह 70 (माआरिज़), आयत 29


रसूल अल्लाह ﷺ ने फ़रमाया :

मोमिन (मुस्लिम) होते हुए तो कोई ज़िना कर ही नही सकता। *

[सही बुख़ारी, जिल्द 3, सफ़ा, 614, हदीस नंबर: 1714]


आप ﷺ ने फरमाया:

ऐ मुहम्मद की उम्मत के लोगों! देखो इस बात पर अल्लाह से ज्यादा गैरत किसी को नहीं आती, कि उसका कोई बंदा या बंदी ज़िना करे। ऐ उम्मते मुहम्मद! वल्लाह जो कुछ मैं जानता हूं, अगर तुम्हें भी मालूम हो जाए, तो तुम हंसते कम और रोते ज्यादा

 [सही बुखारी, हदीस नंबर: 1044]


रसुलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, :

 उन लोगों के लिए ये हुक्म दिया था, कि जो शादी शुदा ना हों, और ज़िना करें, तो उन्हें 100 कोड़े लगाए जाएं, और एक साल के लिए जिला वतन कर दिया जाए।

सही बुखारी, हदीस नंबर: 2649


ज़िना की सज़ा और अज़ाब:

अगर ज़िना करने वाले शादी शुदा हो तो खुले मैदान में पत्थर मार मार कर मार डाला जाये और अगर कुंवारे हो तो 100 कोड़े मारे जाये

सही बुख़ारी, जिल्द/सफ़ा 615/615,  हदीस नंबर: 1715

 

जिना से कैसे बचा जा सकता है?

 ज़िना से बचने का जरिया है "निकाह"

इस्लाम में ज़िना (निकाह के बिना जिस्मानी ताल्लुकात कायम करना) को बहुत बड़ा गुनाह बताया गया है।

इस गुनाह की शिद्दत बताते हुये नबी सल्ल. ने इर्शाद फरमाया:

जिस वक़्त जानी(ज़िना करने वाला) ज़िना करता है उस वक़्त वो मोमिन नहीं होता।

(मिश्कात उल मसाबीह हदीस न०- 53,बुखारी हदीस न०- 2475 ,

मुस्लिम हदीस न०- 202)


✨नबी सल्ल. ने इस बात का खुलासा इस तरह किया:

जब बन्दा ज़िना करता है तो ईमान उससे निकल कर छतरी की तरह उसके सिर पर आ जाता है, फिर जब वो इस अमल से रुजू कर लेता है तो ईमान उसके तरफ पलट आता है।(मिश्कात 60 ,अबू दाऊद 4690 ,तिर्मिज़ी 2625 की शरह)

और ज़िना से बचे रहने वाले बंदों की तारीफ इस शान के साथ क़ुरआन में आई है:

(रहमान के सच्चे बन्दे वो है)…. जो ज़िना नहीं करते।

अल-क़ुरआन : सूरह 25 (फुरकान) आयत 68

ऐसे लोग जो बेहयाई आम करने के साधन मुहैया करवाते है और ऐसा माहौल पैदा करते है जिससे समाज में ज़िना करना आसान हो जाये उन्हें भी सख्त सजा की खबर दी गयी है:

जो लोग चाहते हैं कि ईमान वालो की जमाअत(गिरोह) में बेहयाई फैल जाये, बेशक उनके लिये दुनिया और आख़िरत में दर्दनाक अज़ाब है और ख़ुदा ख़ूब जानता है और तुम लोग नहीं जानते!!

अल-क़ुरआन : सूरह 24 (नूर)  आयत 19

अल्लाह रब्बुल इज़्जत से दुआ गो हूं कि तमाम अहले इमान को तमाम सगिरा व कबीरा गुनाहों से पाक रखे और जब तक जिन्दगी है इमान पर कायम रहने की तौफीक अता फरमाए

आमीन

-फिरोजा

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