Israel kaise wajood mein aaya? | Promished Land kise kehte hain?

इज़राइल - शुरुआत से अंत तक


आपको जातिगत पक्षपात का वक़्ती फायदा मिल सकता है, लेकिन आने वाली पीढ़ियां इसकी भारी कीमत चुकाएंगी।

अरब फिलिस्तीनियों को यह समझ में आ गया होगा।

यहूदी अक़ीदे के मुताबिक़ एक ज़मीन ईश्वर ने उन्हें भेंट की थी, इसे प्रॉमिस्ड लैंड कहा गया। 

यह प्रॉमिस्ड लैंड फिलहाल यहूदिओं के लिए ख्वाब जैसी थी, क्योंकि वह जिस जमीन को प्रॉमिस्ड मानते थे वहां तो अरब रहते थे। 

यह ज़मीन यहूदियों की बेचैनी की सबसे बड़ी वजह थी और दूसरी तरफ यूरोप और रूस के ईसाइयों से उनका इख़्तेलाफ़ चलता रहता था, वह इसे लेकर मुत्मइन नही थे औऱ न रूस औऱ यूरोप में रह कर खुश थे।

लेकिन इस जमीन की चाह यहूदियों को बेचैन रखे हुए थी, दूसरे यूरोप और रूस के ईसाइयों से उनका इख़्तेलाफ़ चलता रहता था, वह कम्फर्टेबल नही थे न ही वे रूस या यूरोप में रहकर खुश थे।

29 अगस्त, 1897 को स्विट्ज़रलैंड के बेसल शहर में वर्ल्ड ज़ायनिस्ट ऑर्गनाइज़ेशन की एक मीटिंग हुई। इसे पहली ज़ायनिस्ट कांग्रेस कहा गया। ज़ायनिज़म उस आंदोलन को कहते हैं जिसके तहत यह तै किया गया कि यहूदी फिलिस्तीन की ज़मीन खरीदेंगे और बसना शुरू करेंगे। 

Israel kaise wajood mein aaya? | Promished Land kise kehte hain?


इसके तहत उन्होंने एक फैसला किया के ज़मीनो की बहुत ऊंची कीमत दी जाए जिसे कोई और न दे सके और अरबों को सौदा करने में कोई ऐतराज़ भी न हो। 

अरबों को शक न हो इसलिए उन्होंने शहर के बाहर की जमीनें खरीदनी शुरू की जहां खेती की जा सके। 

इसके लिए इन्होने एक फंड बनाया गया जिसमें दुनिया के हर अमीर तरीन यहूदियों ने बड़ी भारी रकम दान में दी। 

यह सब बाकायदा एजेंडे के तहत हुआ, लेकिन अरब उस वक़्त के यहूदियों के मज़ाक उड़ाते, पीठ पीछे उन्हें बेवकूफ समझ कर अट्टहास करते रहे और किसी साज़िश को नही भांप सके। 

यहूदी श्रेणी बद्ध हो कर फिलिस्तीन गए। यानी लहर की तरह जिसका हिब्रू में आलिया कहा जाता है। 

इस तरह यहूदियों ने लहरों में आकर फिलिस्तीन में बसना शुरू कर दिया। 

1914 में पहला विश्वयुद्ध छिड़ गया। कई देशों ने इसमें शिरकत की। 

तुर्की, जर्मनी के साथ हो कर लड़ा और हार गया।

लड़ाई के बाद तुर्की से जीती हुई ज़मीन को छः हिस्सों में बांट दिया गया- तुर्की, सीरिया, जॉर्डन, इराक़, लेबनान और फिलिस्तीन। 

नए स्वतंत्र देशों के लिए ट्रस्टी बनाए गए, जो इन नए देशों को एक देश के रूप में स्थापित करने की व्यवस्था कर सकते थे।

फिलिस्तीन और सीरिया के ट्रस्टी इंग्लैंड को बनाया गया। 

इंग्लैंड ने सीरिया में जो हुकूमत मान्यता दी वह अल्पसंख्यक नुसेरी शिया से ताल्लुक रखती थी, जबकि बहुसंख्यक सुन्नी को दूर रखा गया। 

ज़ाहिर सी बात है कलेश होना तै था और वह हुआ। वह आग जो लगाई गई वह आज तक नही बुझी है और लाखों लोगों के भविष्य, ख्वाब, शांति, ज़िन्दगियों को रोज़ ब रोज़ निगलती रही है। 

इसी तरह, फिलिस्तीन को आज़ाद करके अरबों को देना था, लेकिन इंग्लैंड के ट्रस्टी ने रॉटसचाइल्ड नाम के एक यहूदी नेता से वादा किया कि एक अलग यहूदी राज्य (यहूदी का एक अलग मुल्क) बनाया जाएगा।

तीस साल तक यह कशमकश चलती रही, मामला UN पहुंचा पर नही सुलझ सका। 

इस तरह मुसलमानों और यहूदियों की समानांतर सरकार की स्थापना हुई।

यहूदी सरकार की अपनी शिक्षा, अर्थ व्यवस्था यहां तक फौज भी बनाई गई जो उस वक़्त के जदीद हथियारों से लैस थी, इस काम मे रसूखदार यहुदिओं ने योरोप से मदद दिलवाई। 

जबकि अरब फिलिस्तीन ऐसी कोई व्यवस्था खड़ी नही कर सके, वह शायद आसमान से आने वाली नुसरत के सहारे हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे, अपनी महंगी ज़मीने बेच कर आये मोटी रकम से जिंदगी की अशायशे खरीदने में मशगूल रहे। हालांकि अब तक मुसलमानो को यहुदिओं के इरादों का बखूबी अहसास हो चुका था पर फिर भी वह निष्क्रिय रहे। 

1929 में पहला यहूदी-मुस्लिम दंगा हुआ, उसके बाद कई दंगे हुए। 

प्रत्येक दंगे में अरबों ने जान-माल का नुकसान उठाये।

15 मई, 1948 को ब्रिटेन ने घोषणा की कि वह बिना कोई हल निकाले फिलिस्तीन से हट जाएगा।

एक दिन पहले ही यहूदिओं ने एक आज़ाद मुल्क की घोषणा कर दी, मुल्क का नाम इज़राइल रखा गया, जिसका जिक्र यहूदी अक़ीदे के मुताबिक उनकी किताबों में पाया जाता है। 

जहाँ यहूदियों और ईसाइयों की बड़ी साजिशों ने इस देश को बनाने में कामयाबी हासिल की वहीं दूसरी तरफ, अरबों ने अपने स्वार्थ, शालीनता, लापरवाही की भारी कीमत चुकाई है और लंबे समय तक यह कीमत चुकाते रहेंगे।

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