कुरान-मेरी ज़िन्दगी का टर्निंग पॉइंट
अल्लाह तआला का फ़रमान है:
وَ الَّذِیۡنَ جَاہَدُوۡا فِیۡنَا لَنَہۡدِیَنَّہُمۡ سُبُلَنَا ؕ وَ اِنَّ اللّٰہَ لَمَعَ الۡمُحۡسِنِیۡنَ"जो लोग हमारी ख़ातिर जिद्दोजुहुद करेंगे उन्हें हम अपने रास्ते दिखाएँगे(107) और यक़ीनन अल्लाह भले काम करनेवालों ही के साथ है।"
[क़ुरान 29:69]
किसी इंसान को अल्लाह रब्बुल इज़्जत हिदायत देता है तो उसके लिए इल्म के कई दरवाज़े खोलता है। हिदायत के ऐसे ही दरवाजे मेरे लिए खुलते चले गए। मेरी जिन्दगी का ख़ास दिन जब मैंने क़ुरान को तर्जुमा के साथ पढ़ा ये मेरी जिन्दगी का टर्निंग पॉइंट था। ये मोड़ तब आया जब करोना काल में इस्लमोफोबिया जोरो पर रहा। मुसलमानो को बात-बात पर जलील और रुसवा किया जा रहा था। तरह-तरह के इल्जाम लगाए जा रहे थे, न्यूज देख-देख कर मेरा सर फटा जा रहा था। सोच रही थी क्या ये सच हो सकता है? कुछ समझ नहीं आ रहा था। फिर उन्हीं दिनों वसीम रिजवी ने एक पिटीशन दाखिल की ये कह कर की कुरान की 26 आयतों को हटाया जाए जिसमें उसका दावा था की ये आयते आतंकवाद को बढ़ावा देती है और काफिरों को मारने की बात करती हैं, मीडिया इसे नमक मिर्च मिला कर पेश कर रहा था।
मुझे मेरे अल्लाह के कलाम पर कोई शक ना था। मगर दिमाग़ में सावल शोर मचा रहे थे,
- क्या वाकई कुरान मारने की बात करता है?
- ये कैसे हो सकता है? अल्लाह तो रहमान है।
- किसी को उसके घर से निकालने की बात?
इस बारे में मैंने सर्च करना शुरू किया। कई लोगों से पूछा फिर यू ट्यूब पर ज़ाकिर नाइक के ढेर सारे विडियो देखे इस तरह काफ़ी सारे सवालों के जबाव मिले जिससे गैर मुस्लिम सवाल करते हैं। इसी दौरान पर Bed Tet 2011 का बेरोजगारी के खिलाफ़ एक मुहिम के हवाले से एक ट्वीटर अभियान का मैं हिस्सा बनी थी। वहां एक्टिव रहते हुए एक दिन बस यूंही @Muhammad4peace_ के एक ट्वीट कुरान कि एक आयत को रीट्वीट किया जहां इसी कड़ी में ट्विटर दवाह टीम से जुड़ी और अल्लाह के करम से आज आप जैसे दीनी भाई बहनों की रहनुमाई में दीन के इल्म में इज़ाफा होता गया। अल्हम्दुलिल्लाह
ऐसा नहीं था कि मैं दीन से दूर थी, जब मैं 8वी क्लास में थी तभी से पंच वक्त नमाज़ और तहजुद की पाबंद थीं। निकाह के बाद ये पाबंदी थोडी कम हो गई मशरूफियत में अक्सर जुहर की नमाज़ छूट जाती थीं और इशा की भी।
बहरहाल एक नजर वसीम रिज़वी उर्फ़ जितेंद्र त्यागी की कुफ्रिया हरकत और उसके एतराज़ वाली कुछ आयतों पर नजर डालते हैं जिसने मुझे कुरान को तर्जुमा पढ़ने और सीखने के लिए प्रेरित किया। उन 26 आयतों का जिक्र यहां पॉसिबल नहीं है। यहां हम चंद आयतों को रखेंगे जिस पर जिस पर काफ़िर रिज़वी और इस्लाम के दुश्मन इस्लाम को बदनाम करते रहे हैं।
1. क़ुरान-सूरह तौबा (9) आयत 5:
فَاِذَاانْسَلَخَالۡاَشۡهُرُالۡحُـرُمُفَاقۡتُلُواالۡمُشۡرِكِيۡنَحَيۡثُوَجَدْتُّمُوۡهُمۡوَخُذُوۡهُمۡوَاحۡصُرُوۡهُمۡوَاقۡعُدُوۡالَهُمۡكُلَّمَرۡصَدٍ ۚفَاِنۡتَابُوۡاوَاَقَامُواالصَّلٰوةَوَاٰتَوُاالزَّكٰوةَفَخَلُّوۡاسَبِيۡلَهُمۡ ؕاِنَّاللّٰهَغَفُوۡرٌرَّحِيۡمٌ
तर्जुमा: फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएं तो मुशरिकों को जहां कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो. फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।
इस्लाम के दुश्मन इस आयत को तो पढ़ते हैं मगर इसके पहले जो आयत का जिकर है उसे नजर अंदाज़ करते हैं जिससे कुरान को लेकर लोगों में गलतफहमी है।
2. क़ुरान-सूरह तौबा (9) आयत 1:
"बराअत [यानी समझौता ख़त्म करने] का ऐलान है, अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ से उन मुशरिकों को जिनसे तुमने समझौते किए थे।"
3. क़ुरान-सूरह तौबा (9) आयत 2:
"तो तुम लोग मुल्क में चार महीने और चल-फिर लो और जान रखो कि तुम अल्लाह को बेबस करनेवाले नहीं हो, और ये कि अल्लाह हक़ के इनकारियों को रुसवा करनेवाला है।"
4. क़ुरान-सूरह तौबा (9) आयत 3:
"आम इत्तिला है अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ से ‘बड़े हज’ के दिन [ 4]सब लोगों के लिये कि अल्लाह शिर्क करनेवालों से बरी है और उसका रसूल भी। अब अगर तुम लोग तौबा कर लो तो तुम्हारे ही लिये बेहतर है और जो मुँह फेरते हो तो ख़ूब समझ लो कि तुम अल्लाह को बेबस करनेवाले नहीं हो। और ऐ नबी ! इनकार करनेवालों को सख़्त अज़ाब की ख़ुशख़बरी सुना दो।"
5. क़ुरान-सूरह तौबा (9) आयत 4:
"सिवाए उन मुशरिकों के जिनसे तुमने समझौते किए, फिर उन्होंने अपने अहद को पूरा करने में तुम्हारे साथ कोई कमी नहीं की और न तुम्हारे ख़िलाफ़ किसी की मदद की, तो ऐसे लोगों के साथ तुम भी समझौते की मुद्दत तक वफ़ा करो; क्योंकि अल्लाह मुत्तक़ियों [ परहेज़गारों] ही को पसन्द करता है।"
वजाहत: इसका पसमंजर यह है के अल्लाह के रसूल ने गजवा तबूक से वापस आकर मुश्रिकीन को एक लास्ट वार्निंग दी थी क्यों कि यह लोग बार बार समझौता तोड़ रहे थे इसलिए उन्हें 4 महीने की आखरी मोहलत दे दी के अब इस बार तुमने संधि तोड़ी है अब तैयार हो जाओ जंग के लिए। [हवाला तफसीर इब्ने कसीर]
इसी आयत का खुलासा डॉ ज़ाकिर नायक एक गैर मुस्लिम भाइ के सावल का जवाब कुछ यूं देते हैं: ये जंग के हालात थे मक्का के मुशरिक और मुसलमानो के बीच एक सुलह (संधि) हुई थी जिसे मुश्रिकों ने तोड़ दी और मुसलमानो पर हमला कर दिया।
सवाल: डॉ ज़ाकिर नायक कहते हैं कि अगर आज की तारीख में कोई दुश्मन किसी आर्मी जनरल और उसकी सेना पर हमला करे तो वो क्या आदेश देगा?
जवाब: जाहिर है की वो अपनी सेना से कहेगा कि "लड़ो और मारो"।
मुशरिकों ने संधि तोड़ दी फिर अल्लाह की तरफ से ये आयत नाजिल हुई। इस्लाम के दुश्मन इस्लाम के खिलाफ़ प्रोपगेंडा करते हैं ताकि इस्लाम को बदनाम किया जाए।
अरुण शौरी ने इस में अहम भूमिका निभाई उसने एक क़िताब लिखी World of fatwah वो surah तौबा की आयत 5 के बाद सीधे 7 पर छलांग लगाता है।
अगर दुश्मन ए इस्लाम आयात 6 भी पढ़ते तो उनके ज़हर का इलाज हो जाता।
आइए सूरह तौबा की आयत 6 देखते है अल्लाह ताला फरमाते हैं:
"और अगर मुशरिकों में से कोई आदमी पनाह माँगकर तुम्हारे पास आना चाहे [ताकि अल्लाह का कलाम सुने] तो उसे पनाह दे दो, यहाँ तक कि वो अल्लाह का कलाम सुन ले। फिर उसे उसकी महफ़ूज़ जगह तक पहुँचा दो। ऐसा इसलिये करना चाहिए की ये लोग इल्म नहीं रखते।" [सूरह तौबा (9) आयत 6]
मेरे मुसलमान भाइयों और बहनों!
कुरान एक नेमत है इस पर गौर करो और समझ कर पढ़ने की कोशिश करो।
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने हम इंसानों को ऐसी मुकद्दस किताब दी जिसका वजन उठाने की ताकत पहाड़ो में भी नहीं है।
कलाम ए इलाही में इंसान के हर सवाल का ज़बाब है ।
कुरान का हर लफ़्ज़ सुकून से भरा हुआ है जिसकी तलाश में हर इंसान भटकता रहता है।
हमें गौर करना चाहिए कि हम इस अज़ीम नेमत और मुकद्दश क़िताब पर कितना अमल करते हैं।
अब ये हम पर डिपेंड करता है, हमारी choice है कि हम कुरान मजीद को सिर्फ अरबी में पढ़ कर, रट्टा मार कर एक कपड़े में लपेटकर रख दें या फिर हम कुरआन को तर्जुमे से पढ़े उसे समझें उस पर अमल करें और कुरआन को अपनी जिंदगियों का हिस्सा बना कर कामयाब हो जाये।
अल्लाह ने हम इंसानों को अपनी इबादत के लिय पैदा किया है अगर दुनियां और आखिरत में कामयाब होना है तो क़ुरान को तर्जुमा के साथ पढ़ना और समझना ही होगा तभी हम अल्लाह के बताए रास्ते पर चल सकते हैं ।
जिस किसी ने भी ये लाइनें लिखीं हैं बेहतरीन और सच लिखीं हैं:
"क़ुरान की खूबी यह है कि आप उसका पैगाम नहीं बदल सकते, लेकिन उसका पैग़ाम आप को पूरी तरह से बदल सकता है और कामयाब बना सकता है यहां दुनियां में भी और आखिरत में भी।"
👉 क़ुरान में इंसान की परवरिश से लेकर उसकी शादी शुदा जिंदगी का system है।
👉 क़ुरान में तिजारत (bussiness) का सिस्टम है।
👉क़ुरान में Financial economics (वित्तीय अर्थशास्त्र) का सिस्टम है
👉क़ुरान में मेडिकल साइंस है ।
👉क़ुरान दुनिया का सबसे बेहतरीन कानून हैं।
और सबसे बड़ी बात
👉क़ुरान पूरी कायनात के बनाने वाले एक रचयिता ( अल्लाह) का कलाम है।
👉क़ुरान सिर्फ मुसलमानो के लिए ही नहीं है बल्कि पूरी इन्सानियत के लिए है।
👉क़ुरान एक जिंदा आसमानी किताब है ।
👉क़ुरान एक चमत्कार है हम सारे इंसानो के लिए।
कभी कभी जिन्दगी में मुश्किलात और परेशानियां इतनी आती हैं कि इंसान अपना हौसला खो देता है ऐसा नहीं कि नमाज़ और क़ुरआन आपके हालात बदल दें हां मगर ये ज़रूर है कि आप को उन हालात मे अच्छे तरीक़े से रहना सिखा देते हैं।
अल्लाह की आज़माइश सिर्फ़ दीन पर चलने से नही आती बल्कि जो आज़माइश और कठिनाइयां आपके के नसीब में लिख दिए गए हैं वह आपको हर हाल में मिल कर ही रहेंगे।
अब रही बात नमाज़ और क़ुरआन से दूरी की तो बस इतना ही होगा कि आप इस दुनियां में आने का मकसद भूल कर जिन्दगी की मुश्किलों में ही उलझे रहेंगे और बाज दफा ये मुश्किलें और परेशानियां आपको पागल कर देंगी।
हम मुस्लिमों का ये हाल है कि हम अपने मतलब और सलाहियत के हिसाब से कुरान को लेते हैं कुछ लोगों के लिए कुरान सिर्फ़ एक क़िताब है जिसे वो अल्लाह का कलाम मानते तो हैं मगर एक कपड़े में लपेट कर घर में रखा हुआ है, कुछ लोग रोज़ पढ़ते हैं मगर सिर्फ़ मुर्दों को सबाब पहुंचाने और बक्शिश के लिए।
आज हमारी नई नस्ल सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं जहां एक नहीं बल्कि कुरान की सौ आयतें तर्जुमा के साथ गुजर जाती है मगर कोई फ़र्क नहीं पड़ता। किसी इंसान के लिए एक आयत ही काफ़ी है उसकी जिंदगी बदलने के लिए और दुसरी तरफ कोई सारा कुरान रट्ट कर भी वहीं खड़ा रह जाता है।
क़ुरआन का क़रीब रहना उससे जुड़े रहना आपको हर मुश्किल से निकलने का रास्ता दिखाता रहेगा। इसलिए कुरान से हर हाल में जुड़े रहें कुरान पढ़ें कुरान सुनें, तर्जुमा पढ़ें, तफसीर पढ़ें और कुरान को दिल से लगाए रखें। अल्लाह पाक से दुआ है हमारी आमल को कुबूल फरमाए और दीन ए हक पर डटे रहने की तौफीक अता फरमाए।
आमीन
आपकी दीनी बहन
फिरोज़ा खान
1 टिप्पणियाँ
Very nice article
जवाब देंहटाएंकृपया कमेंट बॉक्स में कोई भी स्पैम लिंक न डालें।