दज्जालियत और आदिल बादशाह की बादशाहत
- अल्लाह की नेअमत का शुक्र
- आखिरत के सवाब के लिए बादशाहत
- तौहीद और इंसाफ़
- अपराधिक मामलों का कम नहीं होना
- तागूती निज़ाम में लीडरशिप की तमन्ना
- क्योंकि हर उरूज को ज़वाल है
- तौहीद और बादशाहत
- इस्लाम में इक्तेदार और ज़िम्मेदारी
- दज्जाल का इस किस्से से ताल्लुक
सूरह कहफ़ के पसमंजर में हम पढ़ सकते हैं कि जब मक्का में मुसलमानों का रहना मुश्किल हो गया तब ऐसे ही हालात में सूरह कहफ़ नाज़िल हुई।
असल में तो मुशरिक़ीन के सवालों के जवाब में सूरह कहफ़ नाज़िल हुई थी।लेकिन इसमें जो तीन वाक़ियात बयान किए गए हैं इन तीनों वाक़ियात में अल्लाह ने अपने बंदों के लिए मुस्तक़बिल के बारे में निहायत बलीग़ इशारात है।
ज़ुलक़रनैन के लफ़्जी मायने दो सींगों वाले के हैं। ये नाम या तो इसलिए पड़ा कि उसने मशरिक़ और मग़रिब दुनिया के दोनों किनारों पर पहुंचकर सूरज की क़िरन यानि उसके शआओं को देखा।
कुछ कहते हैं कि उसके सिर पर बालो की दो लटे थी। क़िरन बालों की लट को भी कहते हैं।
पिछली तफसीरो में सिकंदर ए आज़म को ज़ुलक़रनैन समझा गया था और फिर मौलाना अबुल कलाम आज़ाद मरहूम ने इस पर तहक़ीक़ की।
ज़ुलक़रनैन अल्लाह को मानने वाला और आख़िरत को मानने वाला एक बादशाह था। वो माल दौलत का भी हरीस नहीं था। और उनकी फतूहात मशरिक और मगरिब तक फैली हुई थी।
मौलाना साहब की तहक़ीक़ के मुताबिक फ़ारस का वो अज़ीम हुक्मरान जिसे यूनानी साइरस, एलेग्जेंडर, इबरानी खोरस, साइरस दी ग्रेट और अरब में कैकसरो के नाम से पुकारते हैं। इस दौर की हुक्मरानी 539 ई.पू.है।
ज़ुल क़रनैन के वाक़िये में चन्द ख़ास बातों के भी इशारे हैं -
- ज़मीन अल्लाह की है वो अपने बंदों में से जिसको चाहता है उसका वारिस बना देता है।
- कामयाबी सिर्फ़ और सिर्फ़ ईमान की राह में है कुफ्र की राह में नहीं।
- अल्लाह ताला हर दौर में ऐसे अफ़राद खड़े करता रहता है जो मजबूर और मक़बूर इंसानों को उस दौर के याजूज माजूज ( एक क़ौम)से निजात दिलाते रहते हैं।
- ये कि अल्लाह के स्वालेहा लोग (righteous people) ही ज़मीन की विरासत के सबसे ज़्यादा हक़दार हैं।
- आदिल बादशाह की तरफ़ हिजरत के इशारे सूरह कहफ़ के नुज़ूल के बाद सूरह ज़ुमर आयत 10 में बताया गया कि अल्लाह की ज़मीन तंग नहीं है।
आखिरी वाकिये में अल्लाह ने ज़िल क़रनैन जो मुत्तक़ी तौहीद पर क़ायम एक बादशाह है उनका कुछ ज़िक्र किया है। जैसा कि आयत से ही वाज़ेह है
"और ऐ नबी! ये लोग तुमसे ज़ुल-क़रनैन के बारे में पूछते हैं। इनसे कहो: मैं उसका कुछ हाल तुमको सुनाता हूँ।" [सूरह कहफ़ 18:83]
ज़ुल क़रनैन के वाकियात में से कुछ हाल ही अल्लाह ने हिदायत और नसीहत के लिए क़ुरआन में बयान किया है ذِكۡرًا के मायने नसीहत के भी है कि इनके किरदार में सभी के लिए खासकर हुक्मरानों के लिए हिदायत और इबरत का सामान है बशर्ते कि वो हिदायत लेना चाहें।
ज़ुल क़रनैन के क़िस्से का आख़िर में होना ये भी वाज़ेह करता है कि दज्जाल के फितने के ख़त्म हो जाने के बाद याजूज माजूज को दीवार के गिर जाने पर निकाला जाएगा। और ये अहादीस से भी साबित है।
उससे पहले, तौहीद, हिजरत, मादा परस्ती और इल्म के फितने फैल चुके होंगे।
बहरहाल आने वाले फितने का ज़िक्र और उनसे हिफ़ाज़त की तदबीरें भी सूरह कहफ़ में ही मिलती है।
अगर कोई ये कहता है कि हज़रत सुलेमान अ. को अल्लाह ने नबूवत भी दी, वो भी तौहीद पर क़ायम बादशाह थे। ज़ुलकरनैन भी एक दूसरी मिसाल है वो बहादुर बादशाह थे लेकिन नबी नही थे। अल्लाह ने उन्हें खास हुक्म के साथ किसी क़ौम की तरफ़ नहीं भेजा था।
उन्होंने जो मुहिमें की उस दौरान सूरज के निकलने और डूबने की जगह तक पहुंचे। उनकी मुहिम पर वहां क़ौमे मिली जहां उन्होंने भलाई और इंसाफ़ क़ायम किया।
अल्लाह की नेअमत का शुक्र
ज़ुल क़रनैन ने अल्लाह की तरफ़ से अता सारे वसाईल और इख्तियार का इस्तेमाल किया। यही अल्लाह की नेअमत का असल शुक्र है।
वो एक खुदापरस्त और आदिल फरमानरवा बादशाह थे और क़ुरआन भी इनकी इन्हीं खसूसियात को नुमायां करता है क्योंकि उन्होंने ज़ुल्म ख़त्म किया।
आखिरत के सवाब के लिए बादशाहत
ताक़त के नशे में बादशाह में किब्र आ जाता है वो जनता के साथ ज़ुल्म भी करता है।असल में इंसाफ़ पर क़ायम रहने वाला बादशाह ही जनता के दिलों में भी राज करता है और आखिरत में भी बेहतरीन अजर पाता है।
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का इरशाद है:
हमने कहा, “ऐ ज़ुल-क़रनैन! तुझे ये क़ुदरत भी हासिल है कि उनको तकलीफ़ पहुँचाए और ये भी कि इनके साथ अच्छा सुलूक करे।”
अल्लाह ने आज़माईश के सबब उनको ये इख्तियार दिया। मगर वो ज़ालिम को सज़ा देने वाला और मासूम रिआया पर नर्मी और अहसान करने वाला बादशाह थे।
उसने कहा, “जो इनमें से ज़ुल्म करेगा हम उसको सज़ा देंगे। फिर वो अपने रब की तरफ़ पलटाया जाएगा और वो उसे और ज़्यादा सख़्त अज़ाब देगा और जो उनमें से ईमान लाएगा और भले काम करेगा, उसके लिये अच्छा बदला है और हम उसको नर्म हिदायतें देंगे।” [सूरह कहफ़ 87-88]
नेक हुक्मरानों की खूबी भी यही है कि वो ये अक़ीदा रखते हैं कि रियाआ के साथ ज़ुल्म करेंगे तो आखिरत में भी सज़ा भुगतेंगे।
ज़ुल्म से मुराद कुफ्र और शिर्क भी है और दूसरों के साथ ज़्यादती करना, मारपीट करना ,सारे मुजरिमों वाले काम अंज़ाम देना भी है । और बादशाह अपनी रियाआ को ज़ुल्म करने की सज़ा देकर उन्हें आख़िरत की याद दिलाने वाला भी होता है कि ज़्यादती करने वाले आख़िरत में भी बड़ा अजा़ब पाते हैं।
तौहीद और इंसाफ़
एक इंसाफ़ और खुदापरस्त बादशाह के मुल्क में ही अमन-चैन कायम होता है। अल्लाह की बरकतें आती हैं,अपराधिक मामले कम होते हैं। अगर कहीं भी अपराधिक मामले बढ़ते ही जा रहें हों तो ज़रूर वहां के इंसाफ़ में भी कमी होती है। वहां मुजरिमों को कोई सज़ा नहीं दी जाती होगी और निर्दोष , बेकसूरों को जेलों में डाल दिया जाता होगा क्योंकि उन्हें जवाबदेही का डर भी नहीं होता।
अपराधिक मामलों का कम नहीं होना
अपराधिक मामलों के लिए हुकूमत ही ज़िम्मेदार है और गुनाहगारों को अल्लाह दुनिया में भी सज़ा देगा और आखिरत में भी वो बड़ी सख्त सज़ा भुगतेंगे। इन्शाअल्लाह।
अल्लाह ताला फ़रमाता है,
"यहाँ तक कि जब दो पहाड़ों के बीच पहुँचा तो उसे उनके पास एक क़ौम मिली जो मुश्किल ही से कोई बात समझती थी।"
किस तरह उनमें बातचीत हुई। साइन लैंग्वेज से या किसी तरजुमान ( ट्रांसलेटर) से ज़ुल-क़रनैन को उनकी ज़ुबान का इल्म हो गया हो। अल्लाह ही बेहतर जानता है।
ज़ुल-करनैन एक फातेह और बहादुर बादशाह था लेकिन याजूज माजूज की कौम से लड़ाई मुमकिन नहीं थी। अल्लाह की ज़मीन पर अल्लाह की बादशाहत है वहीं क़यामत में भी उनकी गर्दनों में कीड़े पैदा करके उनका खात्मा करेगा।
उस क़ौम पर अल्लाह ने अपनी रहमत की और वक़्ती तौर पर उनको बंद करा दिया। जब उन लोगों ने कहा कि ऐ ज़ुल-क़रनैन! याजूज और माजूज इस सर-ज़मीन में बिगाड़ फैलाते हैं। तो क्या हम तुझे कोई टैक्स इस काम के लिये दें कि तू हमारे और उनके बीच एक बन्द तामीर कर दे?”
उसने कहा, “जो कुछ मेरे रब ने मुझे दे रखा है, वो बहुत है। तुम बस मेहनत से मेरी मदद करो, मैं तुम्हारे और उनके बीच रोक बनाए देता हूँ।"
इतना बड़ा कारनामा करने के बाद वो अपनी सारी क़ुववत अल्लाह से जोड़ देता है। यही ईमान वालों की सिफत है कि वो कभी नहीं भूलते हैं कि ज़मीन पर ताक़त और सारे असबाब व वसाईल resources अल्लाह के अता किया हुए होते हैं ज़ुल क़रनैन ने उनका इस्तेमाल भी अल्लाह के बंदों के लिए किया था।
बादशाह भी अल्लाह की बंदगी में ही असल इज्ज़त पा सकता है। बेशक इज़्ज़त भी एक अल्लाह की नेअमत है जो अल्लाह की तरफ़ से होती है।
अहम बात ये भी है कि बादशाह खुद लोगों की मदद से दीवार बनाने में शामिल है। जिससे क़यामत के करीब आने तक ही लोगों की हिफ़ाज़त हो रही है।
ज़ुल-क़रनैन ने कहा, “ये मेरे रब की रहमत है। मगर जब मेरे रब के वादे का वक़्त आएगा तो वो उसको धूल में मिला देगा, और मेरे रब का वादा सच्चा है।”
जैसा कि सूरह अबिंया 96 में अल्लाह फ़रमाता है:
"यहाँ तक कि जब याजूज और माजूज खोल दिये जाएँगे और हर बुलन्दी से वो निकल पड़ेंगे।"
तागूती निज़ाम में लीडरशिप की तमन्ना
तागूत के निज़ाम में ज़्यादातर वही लागू होगा जो अल्लाह के हुक्म के खिलाफ होगा और उससे फसाद ही फैलेगा एक लीडर को अपने इनफिरादी (individual) अमल की जवाबदेही के साथ अपनी रियाआ को भी तौहीद का पाबंद बनाना होता है लेकिन ये जबरन नहीं होता।
फिर जिसे इक़्तेदार मिलता है उसकी सबसे पहली ज़िम्मेदारी ज़ुल्म का खात्मा और फ़हाशी ख़त्म करना और इंसाफ़ क़ायम करना है। ये अहम मुद्दा होता है।
क्या वो ऐसा कर सकते हैं?
या कर पाते हैं?
एक लीडर इंसाफ़ का मामला भी अल्लाह की शरीयत के साथ तय करता है क्योंकि उसको अल्लाह की शरीयत का इल्म भी होता है।
क्या हर लीडर को कुरआन का सही इल्म और फहम है?
इसलिए सिविल सर्विस में जाने का शौक रखने वाले भी ज़्यादातर रुतबे के पीछे भागते है ।
ये रूतबा, पैसा, शोहरत चन्द रोज़ का सामान है।
क्योंकि हर उरूज को ज़वाल है
ज़मीन पर रहने वाला बादशाह जो कुछ सालों के लिए बादशाह बनता है वो अपने हुक्म को लागू करता है और चाहता है कि जनता माने। चाहे उसके बनाए कानून में कितना ही झोल हो।
अल्लाह की बनाई जमीन पर कानून किसका चलना चाहिए??
एक अच्छा और आदिल बादशाह जनता की सेहत से भी खिलवाड़ नहीं करता।वो सबसे पहले जड़ ख़त्म करता है।
रसूल अल्लाह ने भी फ़रमाया है ;
"शराब बुराईयों की जड़ है।" [सुनन नसाई 5667]
अगर किसी शहर या मुल्क में इसका बनना ही बन्द नहीं तो अपराधिक मामलों में कमी की उम्मीद करना भी बेवकूफी है। शराब, जुआ, रेप, फहाशी चोरी-डकैती, क़त्ल जैसे अपराध अगर हो जाए तो अमन पसंद मुल्क में सख्त से सख्त सज़ा होती है ताकि अपराधिक मामले कम हो।
अल्लाह फ़रमाता है:
"शैतान तो ये चाहता है कि शराब और जुए के ज़रिए से तुम्हारे बीच दुश्मनी और बुग़्ज़ व हसद डाल दे और तुम्हें ख़ुदा की याद से और नमाज़ से रोक दे। फिर क्या तुम इन चीज़ों से बाज़ रहोगे?" [सूरह माइदा:91]
इंसाफ़ मांगने के लिए जनता इंतेजार करते करते मर जाये और अपनी कमाई खर्च करके भी इंसाफ़ नहीं पाए। ग़रीब तबके का exploitation (शोषण) होता रहे और एक सीएम,डी. एम.,एस. डी. एम., विधायक,चेयरमैन खुद को असहाय दिखाये तो वो इस ओहदे पर सिर्फ ताक़त के ग़लत इस्तेमाल करने के लिए बैठे हैं और वो ये भी भूल गए हैं कि उनकी ताक़त permanent नहीं है ,जो इस संसार को बनाने वाला है ,जिसकी बादशाहत आसमान और दुनिया में हमेशा से क़ायम है और कभी खत्म होने वाली नहीं।
और दुनिया कायम होने के बाद से सारे ही power हासिल करने वाले बन्दों का लेखा-जोखा भी उस एक अल्लाह के पास है। चाहे वो एक छोटे से गांव का प्रधान हो या बड़े मुल्क कोई भी बादशाह।
तौहीद और बादशाहत
ज़ुल-क़रनैन को अल्लाह ने जो ताक़त अता की थी उससे उसमें तक़ब्बुर नहीं आया था।
इसने अपनी ताक़त, सलाहियत और हुकूमत को अल्लाह की फरमाबरदारी में इस्तेमाल किया।
"Absolute power corrupts absolutely."
ताक़त मिलते ही इंसान का ग़ुरूर बढ़ जाता है और वो मादा परस्त भी हो जाता है। इस क़िस्से में ताक़त हुकूमत के लिए है और हुकूमत तो सारी अल्लाह ही की है अगर कोई भी बादशाह अपने ज़ुल्म से बादशाहत करता है या तौहीद के खिलाफ जाकर कोई कारनामा करता है तो बिगाड़ ही होगा।
तौहीद यही है कि हुक्म एक ही का और एक ही के लिए, एक तरीके से चलेगा। हिदायत और ताक़त अल्लाह की तरफ़ से होती है। ताक़त ,इक्तेदार के साथ हिदायत न हो तो ज़मीन पर नाइंसाफी और फ़साद फैल जाता है।
इस क़िस्से में हमें एक बादशाह की जो सिफात मिलती हैं वो इंसाफ़ और भलाई है और इसके लिए बादशाह का कोई दरबार का भी ज़िक्र नहीं है बल्कि एक के बाद एक मुहिम के तहत सारे मामलात हल होते हैं। अल्लाह ने ज़रूरी हिदायत का ज़िक्र क़ुरआन में किया है। बेशक अल्लाह हिकमत वाला है।
इस्लाम में इक्तेदार और ज़िम्मेदारी
इस्लाम में खुद इक्तेदार मांगना पसंदीदा नहीं कि मुझे वोट करें और कुर्सी के लिए जनता से बड़े-बड़े वादे करें।
हज़रत अबू बक्र सिददीक रज़ि को जब ख़िलाफत दी गई तो उन्होंने ख़ुत्बा दिया:
"अल्लाह की कसम मैंने कभी भी एक रात या दिन के लिए भी हुकमरानी की ख्वाहिश नहीं की न ही मैंने अल्लाह से इसके लिए ज़ाहिरी या बातिनी तौर आरज़ू की।न ही ये मेरे लिए काबिले तस्कीन है।"
हम देखते हैं कि लोगों को ज़रा सा इक़्तेदार मिलते ही सबसे पहले उनके पास आम लोगों के लिए वक़्त की कमी देखी जा सकती है।अपना फ़ायदा अपना विकास।
अपना मकान, बंगला, जायदाद, कार। पब्लिक की परेशानी ज्यों की त्यों रहती है। हद ये है कि लाखों की सैलरी वाला कुछ हज़ार कमाने वाले से या दिहाड़ी मजदूर से भी रिश्वत ले लेता है।
ज़रूरी नहीं कि बादशाह या बहुत बड़ी हुकूमत ही Corrupt हो। एक छोटे लेवल पर मुहल्ले के मेम्बर, चेयरमैन, विधायक का किसी को इक्तेदार मिल जाए तो वो कितना इंसाफ़ लाने की जद्दोजहद करता है ये बताने की ज़रूरत नहीं है।
एक ईश्वर का निज़ाम में जिसके हाथ में सत्ता हो उसमें नशें की फैक्ट्री और सूदी कारोबार सिरे से ही बंद होता है। और जिसने दुनिया बनाई उसका निज़ाम भी खूबसूरत और इंसाफ़ पर होता है।
लोगों ने उन्हें खुद अपना ख़लीफा चुना।
जिस तरह अल्लाह वालिदैन से उनके बच्चों की परवरिश के बारे में सवाल करेगा, शौहर से बीवी के मुतल्लिक़ सवाल होगा तो हुकूमत हो या ख़िलाफत उनकी ज़िम्मेदारी और भी बड़ी है उनसे भी सवाल होगा। वो अपने आमाल, अपनी फैमिली के साथ अपनी रिआया के साथ इंसाफ, हुसने सुलूक के जवाबदेह हैं।
साधारण सुविधाएं (Basic amenities) सहूलियत ज़रूर देती हैं मगर ज़हनी सुकून नहीं। अगर किसी जगह सड़कें अच्छी हो, बिजली सप्लाई 24 घंटे हो लेकिन अपराध होते रहते हो तो वो एक आइडियल लीडरशिप नहीं है।
अगर ताक़त यानि हुकूमत मिलने के बाद कोई बेकसूरों पर ज़ुल्म करता है तो इसका ज़ुल्म इसका दिल सख्त कर देता है।
एक ईश्वर का नाम या उसका प्रचार भी उस बादशाह को बर्दाश्त नहीं तो फिरऔन और नमरूद जैसे बादशाह का हश्र भी क़ुरआन में यूंही बयान नहीं किया अब जिसने तौबा की वो दुनिया में ही अज़ाब से बच जायेगा और आख़िरत में भी बच जायेगा।
अल्लाह माफ करने वाला है। नेक बादशाह दुनिया में भी ऐश और आराम करता है और आख़िरत मे उससे बढ़कर नेअमतें पाएगा।इसके बरअक्स अगर कोई ज़ालिम हुक्मरान है तो दुनिया में भले ही वो कुछ सालों ऐश में रहे मगर आख़िरत के सख्त अज़ाब से बचने वाला नहीं।
दज्जाल का इस किस्से से ताल्लुक
दज्जाल के फ़ितने से नेक लोग उसी तरह बच जायेंगे जिस तरह शैतान के हथकंडे से बच जाते हैं। अल्लाह वक़्ती तौर पर उसको इतनी ताक़त देगा कि लोग उसको ख़ुदा मान बैठेंगे। लेकिन दज्जाल का भी खात्मा हो जाएगा।
रसूल अल्लाह का फ़रमान है:
"दज्जाल काना होगा और तुम्हारा रब (आंखों वाला है) काना नहीं है उस दज्जाल की दोनों आंखों के दरमियान लिखा हुआ होगा लफ़्ज़ काफ़िर।" [सहीह बुखारी 7408]
जब एक बीमारी सारी दुनिया में फैल जाती है लोग बेबस हो जाते हैं तब लोगों को इस पूरी कायनात की ताक़त और बादशाहत का अंदाजा लोगों को होता है। जिसको कभी ज़वाल नहीं ,कभी ज़वाल नहीं। तब हम पहचान जाते हैं कि वो अल-मलिक ٱلۡمَلِك है।
हक़ीक़ी बादशाह, पुरी कायनात का मालिक और हुक्मरान, हर चीज़ पर पूरा का पूरा अधिकार रखने वाला।
अल्लाह ही हक़ीक़ी (वास्तविक) बादशाह है।
अल्लाह हमें सही दीन की समझ अता फरमाए और नेक लोगों का साथ नसीब फ़रमाए।
आमीन या रब्बुल आलामीन।
तबस्सुम शहज़ाद
2 टिप्पणियाँ
وَ لَا تَہِنُوۡا وَ لَا تَحۡزَنُوۡا وَ اَنۡتُمُ الۡاَعۡلَوۡنَ اِنۡ کُنۡتُمۡ مُّؤۡمِنِیۡنَ
जवाब देंहटाएंहिम्मत न हारो, ग़म न करो, तुम ही ग़ालिब रहोगे अगर तुम इमानवाले हो।
Quran 3:139
beshaq In Sha ALLAH
जवाब देंहटाएंकृपया कमेंट बॉक्स में कोई भी स्पैम लिंक न डालें।