Hijab- Gulami Se Azadi Ka Safar

Hijab - Gulami se Azaadi ka safar

हिजाब- ग़ुलामी से आज़ादी का सफ़र 

मेरे सफ़र की कहानी को शुरू से शुरू करते हैं। जिस शहर में मेरी परवरिश हुई, वो खूबसूरत और वादियों से भरपूर था। पापा इंजीनियर थे, और हमारे होम टाउन से दूर उनकी पोस्टिंग थी। यानी हमारे रिश्तेदारों से हम साल दो साल में मिलते थे। 

शहर में मुस्लिम आबादी ना के बराबर थी, यहां तक के कुरआन और अरबी पढ़ना भी घर में ही सीखा, जितना घर में सीखा जा सकता है। एक इंजीनियर की बेटी होने की वजह से सीबीएसई इंग्लिश मीडियम में पढ़ना कोई ख़ास बात नहीं। यानी तव्वजो दुनियावी तालीम पर रही। स्कूल में कभी सरस्वती वंदना तो कभी म्यूजिक कभी डांस में भाग लेना कोई खराब बात नहीं समझती थी। रामायण, महाभारत, बुद्ध चरित तो हमारे syllabus में थी, सो अगर पास होना है तो पढ़ना ही था। और मुझे अल्लाह ﷻ ने पढ़ने का शौकीन बनाया है। तो अपनी क्लास में सबसे अधिक दिलचस्पी से ये किताबें मैंने ही पढ़ी, इसकी एक वजह यह थी के मेरे लिए वो नयी जानकारी थी और शायद मेरे सहपाठी बचपन से सुनते आ रहे थे तो उन्हें इतनी दिलचस्पी नहीं थी।

ये किताबें मेरी ज़िंदगी का रुख बदलने में मील का पत्थर साबित हुई। जब मैंने गौर से इन्हें पढ़ा तो मुझे जैसे मेरे तार्किक दिमाग़ ने हर पन्ने के साथ यह बताया के बहुत ही उम्दा कहानी लिखी होने के कारण इसे पढ़ने में बहुत मज़ा आता है लेकिन सच्चाई, विज्ञान और तार्किक विश्लेषण करने पर कपोल कथायें हैं। जैसे आज कोई हैरी पॉटर को सत्य बोल कर ग्रंथ बना दे, उसको ईश्वर का अवतार कहने लगे और चार पांच सौ साल के कालांतर में इस के असली मकसद को भुला दिया जाए और एक चरित्र की पूजा होने लगे।


अल्लाह त'आला फरमाता है-

इस तरह अल्लाह एक ही बात से बहुतों को गुमराही में डाल देता है और बहुतों को सीधा रास्ता दिखा देता है। और गुमराही में वो उन्हीं को डालता है जो फ़ासिक़ हैं।

क़ुरआन 2:25

जो मुझे ये एहसास होना शुरू हुआ, मैंने इस्लाम के बारे में तहकीक करना शुरू की। कहीं ऐसा इस्लाम के साथ तो नहीं। उस वक्त जितने स्त्रोत थे उनसे जो कुछ मैंने जाना। अलहमदुलिल्लाह, मुझे इस्लाम पूरी तरह तार्किक और वैज्ञानिक लगा। फ़िर मेरा दिल मुतमइन हो गया कि मैं गुमराही में नहीं और सही रास्ते पर चल रही हू।

मगर मेरे सारे दोस्त नान मुस्लिम, मम्मी पापा के मिलने जुलने वाले भी। और अल्लाह के रसूल (स.अ.व) फ़रमाते हैं: 

“आदमी अपने दोस्त के दीन पर होता है, इसलिए तुम मे से हर शख़्स को देखना चाहिए की वो किस से दोस्ती कर रहा है।“

-तिर्मिज़ी 2378

बस यही मेरे साथ हो रहा था। करिअर की फ़िक्र और एक मुकाम हासिल का का ज़ज्बा, सेक्युलरिज्म और फेमिनिस्म ने कब जहन में घर बना लिया पता ही नहीं चला। बुर्का मतलब जुल्म और दीन की बात करने वालों को कम अक्ल समझना, ये अनजाने ही मेरे दिमाग़ में बैठ चुका था। वक्त गुज़रा और ग्रेजुएशन पूरा होते होते कैरियर बनाने का मौका आ चुका था। कैम्पस प्लेसमेंट के वक़्त जो हालात थे, के ल़डकिया जिनकी कोई खास परफॉर्मेंस नहीं थी, ना बहुत अच्छा रिजल्ट था, इंटरव्यू में सिलेक्ट होती जा रहीं थीं और जिनके परफॉर्मेंस बहुत अच्छा था उनको कम तव्वजो दी जा रही थी। ऐसा क्यूँ? 

हालाँकि मुझे दूसरे शहर जाकर जॉब करने की इजाज़त नहीं थी सो मैंने इंटरव्यू नहीं दिया, मगर एक बात और मेरे दिमाग़ में घर कर गई। वो ये, के जॉब के लिए टैलेंट हो ना हो, खूबसूरत होना और दिखना ज़रूरी है। जो दिखता है वही बिकता है। ख़ैर ग्रेजुएशन ख़तम होते ही एक अच्छा रिश्ता आया तो अल्लाह के हुकुम से मम्मी पापा ने फौरन शादी करने का एलान कर दिया। 

रसूल अल्लाह ﷺ ने हज़रत अली (र•अ) से फ़रमाया तीन चीज़ों में देर ना करो:

  • नमाज़ को जब उस का वक़्त हो जाये, 
  • जनाज़ा को जब आ जाए ( जब जनाज़ा तैयार हो जाए), 
  • और बेवा, कुंवारी, तलाक शुदा औरत ( के निकाह को ) जब तुम्हें उसका कोई कुफु (हमसर) मिल जाये।

तिर्मिज़ी  171

और पता चला के लड़का आज़ाद ख़यालों का है, जॉब वगैरह कैरियर बनाने में उसे ऐतराज़ नहीं। मुझे और क्या चाहिए था। मैंने भी हाँ कर दी।

शादी के कुछ दिन सब ख़ैर से गुजरा, एक दिन मेरे शौहर ने पहली बार मुझे बाजार घुमाने की ख्वाहिश ज़ाहिर की। नयी दुल्हन को और क्या चाहिए। मैं बहुत खुश हुई और फौरन तैयार हो गई। उन्होंने बहुत प्यार से बताया “चलो तुम्हें बुर्का दिला देते हैं”

“बुर्का???” मैं हैरानी से उन्हें ताकने लगी। 

“क्या हुआ? बुर्का तो सब पहनते हैं।”

मैं गुस्से से लाल हो उठी, मुझे गुलामी में जकड़ना चाहते हैं? मुझे तो बताया था के लड़का आज़ाद ख़यालों का है फिर ये क्या? मैंने जाने से इंकार कर दिया और अलग आ कर बैठ गयी। उन्होंने मुझे मनाने के लिये समझाया के हमारे यहां सभी बुर्का पहनते हैं, तुम नहीं पहनोगी तो अच्छा नहीं लगेगा। 

मैंने सवाल किया, “और मेरी जॉब?”

वो बोले, “जॉब करने से कहाँ रोका मैंने? जॉब पे थोड़ी बुर्का पहनते।”

मैंने पूछा “फ़िर?”

बोले, “कहीं जाते हैं तो पहन लेते हैं! वहाँ जाकर उतार देते हैं!”

मैं हैरानी से ताकने लगी। फिर बुर्के का क्या मतलब? अगर सिर्फ रास्ते में पहनना है तो वो पर्दा नहीं travelling cloak है। मैंने उन्हें कह दिया की अगर बुर्के से ढकना था तो किसी घरेलू ल़डकि से शादी करनी चाहिए थी ना कि एक इंजीनियर लडकी से।

आखिर मैं जीत गयी और उन्होंने हार मान ली। मैं एक अच्छे कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी के साथ M. Tech. के भी पेपर दिए। इस बात को 4 साल गुज़र गए।

आज मेरा इंटरव्यू एक बड़े नामी कॉलेज में था। वहाँ काफी तादाद में लोग आए हुए थे इंटरव्यू देने। पोस्ट कम थी और कंपटीशन ज़्यादा। सभी फ़िक्र में थे के किसका सिलेक्शन होगा। तभी मेरी नज़र एक लडकी  पर पड़ी। उम्र में मुझसे कम थी और 700-800 लोगों की भीड़ में एक अकेली हिजाबी। इससे पहले मैंने किसी लडकी को हिजाब लगा कर जॉब करते या स्कूल-कॉलेज जाते, पढ़ते नहीं देखा था। मैंने गौर से उसे देखा। बहुत साधारण और बिना किसी बनावटी श्रृंगार के उसके चेहरे का नूर मुझे मुतासिर कर रहा था। 

मैंने गौर किया क्या बिना बनाव श्रृंगार और खूबसूरती का प्रदर्शन किए भी कोई आज के ज़माने के साथ कदम से कदम मिला कर चल सकता है? जबकि उसकी कोई भी चीज़ दिखाई नहीं दे रही थी मगर उसकी पर्सनैलिटी और कॉन्फिडेंस का मुकाबला कोई भी नहीं कर पा रहा था। वाकई? 

एक पल में मेरे अन्दर का सारा फेमिनिस्म पिघल कर बहने लगा। एक झटके में ये समझ आ गया के हमको खूबसूरत दिखना ज़रूरी है, ये ही आज़ादी है, ये विचार ही असली ग़ुलामी है। एक लडकी को उसके टैलेंट, उसकी प्रतिभा पर नहीं बल्कि उसके सुंदरता पर परखा जाना ही असली पिछड़ापन है। 

हर लडकी को एक कमतरी के एहसास में मुबतिला रखना, के शक़्ल सूरत फिगर ही उसकी पर्सनैलिटी है। उसका असल टैलेंट, उसके दिमाग़, उसकी creativity और जो कुछ उसे सबसे खास बनाता है उनकी कोई वैल्यू नहीं। फिर लड़कियां कभी मेकअप, कभी फिल्टर का सहारा लेकर झूठी खूबसूरती के चक्कर में उलझी हुई हैं। असली ग़ुलामी तो ये है- अपनी ज़िंदगी दूसरों के मुताबिक जीना। 

मेरे सारे गुमान एक एक करके टूटते जा रहे थे। आज समझ आ रहा था के हिजाब ग़ुलामी नहीं बल्कि आज़ादी देता है। अपनी मर्ज़ी के मुताबिक जीने की आज़ादी देने वाला, अपने हुस्न को दूसरों की आँखों की नुमाइश का ज़रिया बनने की गुलामी से आज़ादी देने वाला, हर वक़्त खूबसूरत दिखने की मजबूरी से आज़ादी देने वाला, दुनिया की निगाहों की क़ैद से आज़ादी देने वाला।

मुझ जैसी आज़ाद ख्यालों वाली लडकी को भला क़ैद में रहना मंज़ूर हो सकता है? मैं जो ख़ुद को आज़ाद समझ रही थी, वो दरअसल बेड़ियाँ थी, इस पुरुष प्रधान समाज द्वारा बनाई गई, जिसकी नज़र में औरत के ज़हानत का कोई मर्तबा नहीं, बल्कि औरत सिर्फ एक सजावट का सामान है 100 बरस पहले चूड़ी, बिंदी, पायल में उलझा कर शिक्षा से दूर रखा गया, आज लॉरीयल पेरिस, लेक्मे, बॉडी शॉप, और ब्यूटी पार्लर में उलझा रखा है। 

सिर्फ़ अंदाज़ बदला है, मगर इरादे वही पुराने! 

एक मिनट भी गंवाए बिना मैंने आज़ाद होने फैसला कर लिया। मुझे ग़ुलामी किसी भी हाल मंज़ूर नहीं। इंटरव्यू में मेरी बारी आते आते तक मुझ में बहुत कुछ बदल चुका था। मैंने उस लडकी पर आखिरी नज़र डाली जिसने आज मेरी ज़िंदगी का एक नया मोड़ दिया था, और दिल ही दिल में उसका शुक्रिया किया। 

मैं इंटरव्यू में सफल हुई, और जॉब हासिल की। अपनी नयी नौकरी के पहले दिन मैं तैयार हुई और पहली बार हिजाब बांधा। मुझे इस रूप में देख कर मेरे शौहर चौंक गए! उन्हें यकीन नहीं आया के मुझे आखिर एक दिन में क्या हो गया। उन्होंने सवाल किया, मैंने उन्हें पूरी बात बतायी। वो धीमे से मुस्कुराए। 

जब कॉलेज पहुंची तो साथ वाली मैम का मेरे हिजाब को देखकर हैरानी भरा रवैय्या रहा। हर एक का पहला सवाल था “आपको हिजाब में गर्मी नहीं लगती?”

और मैंने मुस्करा कर जवाब दिया “लगती तो है, मगर फाउंडेशन लगाने से जो पसीना और गर्मी लगती है, और बाल खोलने से जो पसीना बहता है उससे कम।” 

आज मुझे किसी की कोई बात बुरी नहीं लग रही थी, मेरी आज़ादी का पहला दिन जो था।

अल्लाह त'आला फरमाता है 

ऐ ईमान वालो! इस्लाम में पूरे-पूरे दाखिल हो जाओ, और शैतान के क़दमों पर मत चलो, वह तुम्हारा खुला हुआ दुश्मन है__

क़ुरआन 2:208

जी, ये पहला क़दम था जो मैंने अपनी क़ामयाबी की तरफ़ उठाया था, उस जिंदगी की कामयाबी जो हमेशा हमेशा रहने वाली है।  उसके बाद मैं हिदायत क़ुबूल करती गयी और आज जब मुझे देख कर कोई कहता है अरे आप तो बिलकुल बदल गयीं, तो मैं कहती हु शुक्र अल्हम्दुलिल्लाह। अल्लाह जिसे चाहता है इज़्ज़त देता है।  

-फिज़ा खान

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जज़कल्लाहि खैरुन कसीरा 

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