नमाज़ियों की आम गलतियाँ और उनकी इस्लाह
पार्ट-6
बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम...
[21] नमाज़ में यहाँ-वहाँ देखना:
عَنْ عَائِشَةَ قَالَتْ: سَأَلْتُ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ عَنِ الْإِلْتِفَاتِ فِي الصَّلَاةِ فَقَالَ: هُوَ اخْتِلَاسٌ يَخْتَلِسُهُ الشَّيْطَانُ مِنْ صَلَاةِ الْعَبْدِ
हज़रत आयशा ؓ से रिवायत है: "कि मैंने नमाज़ में यहाँ-वहाँ मुतवज्जोह होने के बारे में अल्लाह के रसूल ﷺ से पूछा तो आप ने फ़रमाया: ये वो हिस्सा है जो बंदे की नमाज़ में से शैतान उचक ले जाता है।" (बुख़ारी: अल-अज़ान: 751)
عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا قَالَتْ: دَخَلَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ الْكَعْبَةَ مَا خَلَفَ بَصَرُهُ مَوْضِعَ سُجُودِهِ حَتَّى خَرَجَ مِنْهَا
हज़रत आयशा ؓ से रिवायत है, फ़रमाती हैं: “अल्लाह के रसूल ﷺ नमाज़ के लिए काबा में दाख़िल हुए, तो आपकी नज़र सज्दे की जगह पर टिकी रही, यहाँ तक कि आप बाहर तशरीफ़ ले आए।”(इब्न ख़ुज़ैमा, बैहक़ी, हाकिम) [अल-इर्वा: जिल्द 2, सफ़्हा 73] (सहीह)
★ नमाज़ में हमेशा सजदे की जगह पर नजर रखनी चाहिए ताकि दिल की हाजिरी और ख़ुशू-ओ-ख़ुज़ू कायम रहे।
[22] नमाज़ में आँखें बन्द कर लेना:
قَالَ ابْنُ الْقَيِّمِ: وَلَمْ يَكُنْ مِنْ هَدْيِهِ ﷺ تَغْمِيضُ عَيْنَيْهِ فِي الصَّلَاةِ
इब्ने कय्यम (रहिमहुल्लाह) फरमाते हैं: "नमाज़ में आँखें बन्द कर लेना नबी करीम ﷺ का तरीका नहीं था।" (ज़ादुल मआद: जिल्द 1, सफ़्हा 283)
★ सुन्नत तरीका यही है कि नजरें सजदे की जगह पर खुली रहें।
[23] नमाज़ में आसमान की तरफ देखना:
قَالَ ﷺ: إِذَا كَانَ أَحَدُكُمْ فِي الصَّلَاةِ فَلَا يَرْفَعُ بَصَرَهُ إِلَى السَّمَاءِ أَنْ يَلْتَمِعَ بَصَرُهُ
अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: "जब तुम में से कोई शख्स नमाज़ में हो तो वो आसमान की तरफ निगाह उठा कर न देखे। कही ऐसा न हो कि उसकी बीनाई सलब कर ली जाये।" (मुसनद अहमद, नसाई) अन रजुल मिनस-सहाबा [सहीह अल-जामिअ: 749] (सहीह)
★ इससे नमाज़ का अदब और ख़ुशू मुतास्सिर होता है, इसलिए हमेशा नीचे सजदे की तरफ देखना चाहिए।
[24] नमाज़ में बेजा हरकत करना:
قَالَ تعالى: قَدْ أَفْلَحَ الْمُؤْمِنُونَ الَّذِينَ هُمْ فِي صَلَاتِهِمْ خَاشِعُونَ [المؤمنون: 1، 2]
अल्लाह तआला ने फ़रमाया: "इमान वाले कामयाब हो गए। ये वो लोग हैं जो अपनी नमाजों मे खुशु इख्तियार करते हैं।" [सूरह अल-मु’मिनून: 1-2]
عَنْ ابْنِ عَبَّاسٍ {خَاشِعُونَ} خَائِفُونَ سَاكِنُونَ وَكَذَا رُوِيَ عَنْ مُجَاهِدٍ وَالْحَسَنِ وَقَتَادَةَ وَالزُّهْرِيِّ [تفسير ابن كثير]
इब्न अब्बास ؓ से रिवायत है कि: "(खाशिऊन) से मुराद खाइफून और साकिनून हैं। यानी अल्लाह से डरने वाले और सुकून वाले। मुजाहिद, हसन बसरी, कतादा और जुहरी से भी इसी तरह मारवी है।" [तफ़सीर इब्ने कसीर]
عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ أَنَّهُ رَأَى رَجُلًا يُحَرِّكُ الْحَصَى بِيَدِهِ وَهُوَ فِي الصَّلَاةِ فَلَمَّا انْصَرَفَ قَالَ لَهُ عَبْدُ اللَّهِ: لَا تُحَرِّكْ الْحَصَى وَأَنْتَ فِي الصَّلَاةِ فَإِنَّ ذَلِكَ مِنْ الشَّيْطَانِ
अब्दुल्लाह बिन उमर ؓ से रिवायत है कि: "उन्होंने एक शख्स को देखा कि वो नमाज़ ही में हाथ से कंकरीयों को हरकत दे रहा है। हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर ने उससे कहा: नमाज़ में कंकरीयों को हरकत ना दो, क्योकि ये चीज शैतान की तरफ से है।" (नसाई: अत-तब्लीक 1160) [التعليقات الحسان 1944] (सहीह)
★ नमाज़ के दौरान जिस्म या कपड़ों से बार-बार बेवजह खेलना या फ़ालतू हरकतें करना मकरूह-ए-तहरीमी है।
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