इस्लाम में IVF का हुक्म
तमहीद (मुक़द्दमा)
بسم اللہ الرحمن الرحیم
औलाद इंसान के लिए अल्लाह तआला की अज़ीम नेमतों में से एक नेमत है। औलाद की ख़्वाहिश इंसानी फ़ितरत का हिस्सा है और निकाह के बाद बहुत-से मियाँ-बीवी अपने घर को बच्चों की आमद से आबाद देखने की तमन्ना रखते हैं। लेकिन बाज़ औक़ात मुख़्तलिफ़ तिब्बी असबाब की बिना पर हमल ठहरने में मुश्किल पेश आती है।
ऐसी सूरत में आज के तिब्बी साइंस ने मुख़्तलिफ़ तरीक़े ईजाद किए हैं, जिनमें से एक IVF है। इस तरीक़े के ज़रिए उन मियाँ-बीवी की मदद की जाती है जिन्हें फ़ितरी तौर पर हमल ठहरने में मुश्किल पेश आ रही हो।
लेकिन एक मुसलमान के लिए सिर्फ़ किसी तिब्बी तरीक़े का मौजूद होना काफ़ी नहीं, बल्कि यह जानना भी ज़रूरी है कि शरीअत की नज़र में वह तरीक़ा जायज़ है या नहीं।
इसी सिलसिले में यह जानना ज़रूरी है कि IVF क्या है, इसका तिब्बी तरीक़ा क्या है, इस्लाम में इसका क्या हुक्म है और उलमा-ए-अहले-सुन्नत ने इस सिलसिले में क्या रहनुमाई फ़रमाई है।
IVF क्या है? — तफ़सीली तआर्रुफ़
IVF का पूरा नाम इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (In Vitro Fertilization) है। यह एक तिब्बी अमल है जिसमें औरत के ओवम (अंडे) और मर्द के स्पर्म (मनी के शुक्राणु) को जिस्म के बाहर एक लैबोरेटरी में मिलाया जाता है, ताकि फ़र्टिलाइज़ेशन हो सके।
इसके बाद बनने वाले एम्ब्रियो (इब्तिदाई जनीन) को औरत के रहिम में मुन्तक़िल किया जाता है, ताकि वह रहिम में परवरिश पा सके और हमल ठहरने का इमकान पैदा हो।
IVF का इस्तेमाल आम तौर पर उन मियाँ-बीवी के लिए किया जाता है जिन्हें मुख़्तलिफ़ तिब्बी वुजूहात की बिना पर हमल ठहरने में मुश्किल पेश आती है।
इस अमल में चंद मराहिल शामिल होते हैं:
ii. शौहर के स्पर्म हासिल किए जाते हैं।
iii. ओवम और स्पर्म को लैबोरेटरी में मिलाया जाता है।
iv. फ़र्टिलाइज़ेशन के बाद बनने वाले एम्ब्रियो की निगरानी की जाती है।
v. मुनासिब एम्ब्रियो को औरत के रहिम में मुन्तक़िल किया जाता है।
इस तरह IVF एक तिब्बी ज़रिया है जिसके ज़रिए हमल ठहरने की कोशिश की जाती है। अलबत्ता, इससे हमल ठहरने की गारंटी नहीं होती।
यहाँ एक अहम बात समझना ज़रूरी है कि IVF और आर्टिफ़िशियल इनसेमिनेशन (Artificial Insemination) एक ही अमल के दो नाम नहीं हैं। IVF में फ़र्टिलाइज़ेशन लैबोरेटरी में होता है, जबकि आर्टिफ़िशियल इनसेमिनेशन में स्पर्म को मुनासिब तिब्बी तरीक़े से औरत के प्रजनन तंत्र में दाख़िल किया जाता है।
शरई हुक्म समझने के लिए इन दोनों के दरमियान फ़र्क़ को मद्देनज़र रखना ज़रूरी है।
इस्लाम में औलाद की अहमियत (क़ुरआन की रौशनी में)
इस्लाम में औलाद को अल्लाह तआला की नेमत क़रार दिया गया है। क़ुरआन-ए-करीम में मुख़्तलिफ़ मक़ामात पर औलाद का ज़िक्र मिलता है और यह बताया गया है कि औलाद अता करना अल्लाह तआला की मशीयत और हिकमत के तहत है।
i. पहली आयत: अल्लाह तआला जिसे चाहता है औलाद अता फ़रमाता है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
لِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ ۚ يَهَبُ لِمَن يَشَاءُ إِنَاثًا وَيَهَبُ لِمَن يَشَاءُ الذُّكُورَ
“आसमानों और ज़मीन की बादशाही अल्लाह ही के लिए है। वह जो चाहता है पैदा करता है। जिसे चाहता है बेटियाँ अता फ़रमाता है और जिसे चाहता है बेटे अता फ़रमाता है।” [सूरह अश-शूरा: 42:49]
इस आयत से मालूम होता है कि औलाद अता करना अल्लाह तआला के इख़्तियार में है। किसी को बेटे मिलते हैं, किसी को बेटियाँ और किसी को अल्लाह तआला अपनी हिकमत से औलाद नहीं देता।
इसलिए औलाद में ताख़ीर या औलाद न होने की सूरत में किसी को हक़ीर समझना, उसे ताने देना या उसके बारे में बदगुमानी करना दुरुस्त नहीं।
ii. दूसरी आयत: औलाद अल्लाह की मशीयत के तहत है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
أَوْ يُزَوِّجُهُمْ ذُكْرَانًا وَإِنَاثًا ۖ وَيَجْعَلُ مَن يَشَاءُ عَقِيمًا ۚ إِنَّهُ عَلِيمٌ قَدِيرٌ
“या उन्हें बेटे और बेटियाँ दोनों अता फ़रमाता है और जिसे चाहता है बाँझ रखता है। बेशक वह सब कुछ जानने वाला, हर चीज़ पर क़ुदरत रखने वाला है।” [सूरह अश-शूरा: 42:50]
यह आयत इंसान को याद दिलाती है कि औलाद का मिलना या न मिलना अल्लाह तआला की हिकमत और मशीयत के तहत है।
इसका मतलब यह नहीं कि इंसान इलाज न करवाए, बल्कि यह कि इलाज करते हुए भी उसका भरोसा अल्लाह तआला पर रहे और वह शरीअत की हुदूद का ख़याल रखे।
iii. तीसरी आयत: हज़रत ज़करिय्या अलैहिस्सलाम की दुआ
अल्लाह तआला हज़रत ज़करिय्या अलैहिस्सलाम की दुआ का ज़िक्र फ़रमाता है:
رَبِّ لَا تَذَرْنِي فَرْدًا وَأَنْتَ خَيْرُ الْوَارِثِينَ
“ऐ मेरे रब! मुझे अकेला न छोड़ और तू सबसे बेहतर वारिस है।” [सूरह अल-अंबिया: 21:89]
यह दुआ औलाद की ख़्वाहिश रखने वालों के लिए एक अहम क़ुरआनी मिसाल है। हज़रत ज़करिय्या अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला से दुआ की और उसी की रहमत से उम्मीद रखी।
इसलिए औलाद की ख़्वाहिश रखने वाले मियाँ-बीवी को दुआ, सब्र और जायज़ असबाब इख़्तियार करने के साथ अल्लाह तआला से ख़ैर माँगनी चाहिए।
इस्लाम में IVF का हुक्म क्या है?
IVF के बारे में शरई हुक्म समझने के लिए यह देखना ज़रूरी है कि इसमें किसका स्पर्म और किसका ओवम इस्तेमाल किया जा रहा है और एम्ब्रियो किस औरत के रहिम में रखा जा रहा है।
आम सुन्नी फ़िक़्ही रहनुमाई के मुताबिक़, अगर शौहर और बीवी दोनों के अपने प्रजनन कोशिकाओं का इस्तेमाल किया जाए और बनने वाले एम्ब्रियो को उसी बीवी के रहिम में रखा जाए, तो तिब्बी ज़रूरत के वक़्त यह अमल कुछ शराइत के साथ जायज़ हो सकता है।
इसके बरख़िलाफ़, किसी तीसरे मर्द के स्पर्म, किसी दूसरी औरत के ओवम या किसी तीसरी औरत के रहिम को शामिल करने से नसब और वालिदैन की शनाख़्त से मुतअल्लिक़ संगीन शरई मसाइल पैदा होते हैं।
इस सिलसिले में उलमा ने तिब्बी ज़रूरत के साथ-साथ नसब की हिफ़ाज़त, औरत के सतर की हिफ़ाज़त और अमल के दौरान ग़लती या धोखे के इमकान को भी अहमियत दी है।
शैख़ मुहम्मद इब्न सालेह अल-उसैमीन रहिमहुल्लाह का फ़तवा, शैख़ मुहम्मद इब्न सालेह अल-उसैमीन रहिमहुल्लाह से उस सूरत के बारे में पूछा गया जिसमें औरत का ओवम हासिल करके उसे शौहर के स्पर्म के साथ लैबोरेटरी में फ़र्टिलाइज़ किया जाए और फिर उसी औरत के रहिम में मुन्तक़िल कर दिया जाए।
आप रहिमहुल्लाह ने इस सिलसिले में तफ़सील बयान फ़रमाई।
आपके नक़्ल किए गए फ़तवे के मुताबिक़, अगर इस अमल की कोई तिब्बी ज़रूरत न हो, तो आप इसे जायज़ नहीं समझते थे। इसकी वजहों में ओवम हासिल करने के लिए ऑपरेशन, औरत का सतर खुलने और मुमकिन तिब्बी नुक़सान का अंदेशा शामिल था।
लेकिन अगर इसकी ज़रूरत हो, तो आपने तीन बुनियादी शराइत बयान फ़रमाईं:
पहली शर्त: फ़र्टिलाइज़ेशन शौहर के स्पर्म से ही किया जाए। किसी दूसरे मर्द के स्पर्म का इस्तेमाल न किया जाए।
दूसरी शर्त: शौहर से स्पर्म हासिल करने का तरीक़ा भी जायज़ हो।
तीसरी शर्त: फ़र्टिलाइज़ेशन के बाद बनने वाले एम्ब्रियो को उसी शौहर की बीवी के रहिम में रखा जाए। किसी दूसरी औरत के रहिम में उसे रखना जायज़ नहीं।
आपके नक़्ल किए गए हवाले के मुताबिक़, यह फ़तवा मजमूअ फ़तावा अश-शैख़ इब्न उसैमीन, 17/27–28 में दर्ज है।
इस फ़तवे से यह बात वाज़ेह होती है कि शैख़ इब्न उसैमीन रहिमहुल्लाह ने IVF को हर सूरत में एक जैसा हुक्म नहीं दिया, बल्कि तिब्बी ज़रूरत और अमल में शामिल शरई शराइत के मुताबिक़ इसकी तफ़सील बयान फ़रमाई।
IVF में एहतियात की ज़रूरत - नसब की हिफ़ाज़त
IVF के मसले में एक अहम पहलू नसब की हिफ़ाज़त है। शरीअत में बच्चे के नसब और वालिदैन की शनाख़्त को बहुत अहमियत हासिल है।
अगर लैबोरेटरी में स्पर्म या ओवम की अदला-बदली हो जाए या किसी दूसरे शख़्स के प्रजनन कोशिकाओं का इस्तेमाल हो जाए, तो इससे नसब से मुतअल्लिक़ संगीन मसाइल पैदा हो सकते हैं।
इसी वजह से कुछ उलमा ने इस अमल में बहुत ज़्यादा एहतियात बरतने की ताकीद फ़रमाई है।
शैख़ इब्न उसैमीन रहिमहुल्लाह का दूसरा जवाब
शैख़ इब्न उसैमीन रहिमहुल्लाह से आर्टिफ़िशियल इनसेमिनेशन के बारे में भी सवाल किया गया।
आप रहिमहुल्लाह ने इस अमल में ग़लती, धोखे और स्पर्म की अदला-बदली के इमकान की तरफ़ तवज्जोह दिलाई और फ़रमाया कि यह मामूली मामला नहीं है, क्योंकि इसमें नसब के इख़्तिलात का ख़तरा हो सकता है।
आपने इस मामले में आम तौर पर फ़तवा देने के बजाय ख़ास केस की तफ़सील जानने और मर्द, औरत तथा डॉक्टर के बारे में मालूमात होने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।
हवाला: मजमूअ फ़तावा अश-शैख़ इब्न उसैमीन, जिल्द 17, सवाल नंबर 9 - जैसा कि आपके भेजे गए नक़्ल में दर्ज है।
यहाँ यह फ़र्क़ याद रखना ज़रूरी है कि आर्टिफ़िशियल इनसेमिनेशन और IVF अलग-अलग तिब्बी अमल हैं। इस फ़तवे में बयान की गई एहतियात को IVF पर लागू करते हुए दोनों अमलों के फ़र्क़ को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
शैख़ इब्न बाज़ रहिमहुल्लाह का फ़तवा
शैख़ अब्दुल अज़ीज़ इब्न बाज़ रहिमहुल्लाह से आर्टिफ़िशियल इनसेमिनेशन के जायज़ होने के बारे में सवाल किया गया।
आपके भेजे गए नक़्ल के मुताबिक़, आपने इस मसले में तफ़सील की ज़रूरत बयान फ़रमाई और मियाँ-बीवी के अपने प्रजनन कोशिकाओं से संबंधित कुछ सूरतों तथा किसी तीसरे शख़्स के प्रजनन कोशिकाओं के इस्तेमाल के दरमियान फ़र्क़ किया।
नक़्ल के मुताबिक़, आपने उस सूरत को जायज़ बताया जिसमें तिब्बी ज़रूरत की वजह से शौहर का स्पर्म उसकी अपनी बीवी के रहिम में दाख़िल किया जाए, बशर्ते कि ज़रूरी शरई एहतियात बरती जाए।
इसके बरख़िलाफ़, किसी दूसरे मर्द का स्पर्म इस्तेमाल करने को आपने नाजायज़ क़रार दिया।
आपने लैबोरेटरी में स्पर्म और ओवम की अदला-बदली या ग़लती से दूसरे लोगों के प्रजनन कोशिकाओं के मिल जाने के इमकान की वजह से भी एहतियात की ताकीद फ़रमाई।
आपके भेजे गए नक़्ल में यह भी बयान है कि इस मसले में फ़िक़्ह काउंसिल के कुछ उलमा ने मुख़्तलिफ़ राय रखी और शैख़ इब्न बाज़ रहिमहुल्लाह ने ख़तरात की वजह से फ़ैसला देने से एहतियात बरती।
हवाला: फ़तावा नूर अला अद-दर्ब, 21/432 - आपके भेजे गए नक़्ल के मुताबिक़।
IVF कब जायज़ हो सकता है?
आम सुन्नी फ़िक़्ही रहनुमाई के मुताबिक़, तिब्बी ज़रूरत के वक़्त IVF कुछ शराइत के साथ जायज़ हो सकता है।
i. पहली शर्त: स्पर्म शौहर का हो
IVF में इस्तेमाल होने वाला स्पर्म उसी शौहर का होना चाहिए जिसका निकाह उस औरत से क़ायम है।
किसी दूसरे मर्द के स्पर्म का इस्तेमाल करना आम सुन्नी फ़िक़्ही राय के मुताबिक़ जायज़ नहीं है।
ii. दूसरी शर्त: ओवम बीवी का हो
फ़र्टिलाइज़ेशन के लिए इस्तेमाल होने वाला ओवम उसी बीवी का होना चाहिए। किसी दूसरी औरत के ओवम का इस्तेमाल करने से नसब और मातृत्व से मुतअल्लिक़ शरई मसाइल पैदा होते हैं।
iii. तीसरी शर्त: एम्ब्रियो उसी बीवी के रहिम में रखा जाए
फ़र्टिलाइज़ेशन के बाद बनने वाले एम्ब्रियो को उसी बीवी के रहिम में मुन्तक़िल किया जाना चाहिए जिसका ओवम इस्तेमाल हुआ हो।
किसी तीसरी औरत के रहिम में एम्ब्रियो रखना सरोगेसी के मसले से जुड़ता है, जिसके बारे में आम सुन्नी फ़िक़्ही राय मनाही की है।
iv. चौथी शर्त: निकाह क़ायम हो
यह अमल शौहर और बीवी के दरमियान क़ायम निकाह के दौरान होना चाहिए। निकाह ख़त्म होने के बाद बचे हुए एम्ब्रियो के इस्तेमाल जैसे मसाइल में अलग शरई तफ़सील और फ़तवे की ज़रूरत हो सकती है।
v. पाँचवीं शर्त: तिब्बी ज़रूरत और एहतियात
IVF के लिए ऐसी सूरत में किसी माहिर और भरोसेमंद डॉक्टर से मशवरा किया जाए जहाँ इसकी तिब्बी ज़रूरत हो। स्पर्म, ओवम और एम्ब्रियो की शनाख़्त तथा हिफ़ाज़त के लिए मुनासिब इंतिज़ाम होना चाहिए।
vi. छठी शर्त: सतर की हिफ़ाज़त
इलाज के दौरान औरत के सतर की हिफ़ाज़त की जाए और ज़रूरत के मुताबिक़ शरई हुदूद का ख़याल रखा जाए।
आख़िरी ख़ुलासा: IVF, औलाद और शरीअत की रहनुमाई
इस पूरी बहस से यह बात समझ में आती है कि इस्लाम औलाद की चाहत को ग़लत नहीं ठहराता। औलाद अल्लाह तआला की एक बड़ी नेमत है, लेकिन उसका मिलना या न मिलना अल्लाह की मशीयत और हिकमत के तहत है। कोई औलाद देता है, किसी को बेटियाँ अता फ़रमाता है, किसी को बेटे और किसी को अपनी हिकमत से बे-औलाद रखता है। इसलिए औलाद न होने की सूरत में किसी मर्द या औरत को ताना देना, उसे कमतर समझना या उसके दिल को दुखाना दुरुस्त नहीं।
IVF यानी In Vitro Fertilization एक तिब्बी तरीका है, जिसके ज़रिए मर्द के शुक्राणु और औरत के अंडाणु को जिस्म के बाहर मिलाकर बनने वाले भ्रूण को औरत के रहम में रखा जाता है। शरीअत के मुताबिक़ इसकी गुंजाइश कुछ शर्तों के साथ हो सकती है, जैसे शुक्राणु शौहर का हो, अंडाणु उसी बीवी का हो और भ्रूण उसी बीवी के रहम में रखा जाए। इसमें नसब के मिल जाने, किसी तीसरे शख़्स के शुक्राणु या अंडाणु के इस्तेमाल और दूसरी शरई ख़िलाफ़-वर्ज़ियों से पूरी तरह बचना ज़रूरी है। इस सिलसिले में भरोसेमंद आलिम और माहिर डॉक्टर से मशवरा करना चाहिए, क्योंकि हर मरीज़ की तिब्बी सूरत-ए-हाल एक जैसी नहीं होती।
लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि IVF हर जोड़े के लिए ज़रूरी या एकमात्र रास्ता नहीं है। अगर बीवी के अपने अंडाणु इस्तेमाल नहीं हो सकते या औलाद हासिल करने के लिए IVF मुमकिन नहीं, तो शौहर और बीवी को अपनी तिब्बी हालत, आपसी रिश्ते, जज़्बात और ज़िम्मेदारियों को सामने रखकर फ़ैसला करना चाहिए। कुछ हालात में शौहर दूसरी शादी के बारे में भी सोच सकता है, क्योंकि इस्लाम ने कुछ शर्तों के साथ एक से ज़्यादा निकाह की इजाज़त दी है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا تَعْدِلُوا فَوَاحِدَةً
“फिर अगर तुम्हें डर हो कि तुम इंसाफ़ नहीं कर सकोगे, तो एक ही पर इक्तिफ़ा करो।” [सूरह अन-निसा, 4:3]
इस आयत से मालूम होता है कि एक से ज़्यादा निकाह की इजाज़त के साथ इंसाफ़ की ज़िम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। इसलिए दूसरी शादी का फ़ैसला केवल औलाद की चाहत की बुनियाद पर नहीं, बल्कि शरीअत की हुदूद, दोनों बीवियों के हुक़ूक़, नफ़क़े, वक़्त की तक़सीम और दूसरी ज़िम्मेदारियों को समझकर करना चाहिए। पहली बीवी की इज़्ज़त, उसके जज़्बात और उसके शरई हुक़ूक़ को नज़रअंदाज़ करना दुरुस्त नहीं।
अगर मियाँ-बीवी आपस में मशवरा करके IVF, किसी दूसरे तिब्बी इलाज या दूसरी शादी के बारे में कोई फ़ैसला करते हैं, तो उन्हें जल्दबाज़ी के बजाय इल्म, समझदारी और ज़िम्मेदारी से काम लेना चाहिए। लोगों के ताने और समाज का दबाव किसी शरई हुक्म का बदल नहीं हो सकते। जो रास्ता शरीअत के मुताबिक़ जायज़ हो, उसे अपनाने वाले को महज़ लोगों की बातों की वजह से शर्मिंदा नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन किसी जायज़ काम को अपनाने का मतलब यह भी नहीं कि उससे जुड़ी ज़िम्मेदारियों और दूसरों के हुक़ूक़ को भुला दिया जाए।
आख़िर में, औलाद का होना या न होना इंसान की क़ीमत का पैमाना नहीं है। न बे-औलाद औरत को ताना देना जायज़ है और न किसी मर्द को केवल इस वजह से बुरा ठहराना कि वह शरीअत की हुदूद के अंदर कोई जायज़ रास्ता इख़्तियार करना चाहता है। हर मामले के हालात अलग होते हैं, इसलिए फ़ैसला कुरआन और सुन्नत की रहनुमाई, भरोसेमंद अहल-ए-इल्म के मशवरे और तिब्बी हक़ीक़त को समझकर करना चाहिए।
याद रखिए: औलाद अल्लाह की नेमत है, इलाज एक ज़रिया है और शरीअत की रहनुमाई हमारे लिए रास्ता है। हमें किसी के हालात का मज़ाक़ उड़ाने के बजाय उसके साथ रहम, इज़्ज़त और इंसाफ़ का मामला करना चाहिए।
وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِالصَّوَابِ
और अल्लाह तआला ही सबसे बेहतर जानता है कि सही बात क्या है।
Team Islamic Theology

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