नमाज़ियों की आम गलतियाँ और उनकी इस्लाह
पार्ट-5
बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम...
[17] नमाज़ में हाथ छोड़ देना या नाफ़ के नीचे बाँधना:
عَنْ وَائِلِ بْنِ حُجْرٍ قَالَ: صَلَّيْتُ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ ﷺ وَوَضَعَ يَدَهُ الْيُمْنَى عَلَى يَدِهِ الْيُسْرَى عَلَى صَدْرِهِ
वाइल बिन हुज्र ؓ फ़रमाते हैं: "मैंने अल्लाह के रसूल ﷺ के साथ नमाज़ पढ़ी। आप ﷺ ने अपना दायाँ हाथ अपने बाएँ हाथ पर सीने पर रखा।" (सहीह इब्न ख़ुज़ैमा: 479) (सहीह)
★ हाथों को बिल्कुल छोड़ देना या नाफ़ के नीचे बाँधना सुन्नत के ख़िलाफ़ तरीक़ा है।
[18] रुकू से क़बल व बाद और तशहहुद से खड़े होकर रफ़उल यदैन न करना:
عَنْ نَافِعٍ أَنَّ ابْنَ عُمَرَ كَانَ إِذَا دَخَلَ فِي الصَّلَاةِ كَبَّرَ وَرَفَعَ يَدَيْهِ وَإِذَا رَكَعَ رَفَعَ يَدَيْهِ وَإِذَا قَالَ سَمِعَ اللَّهُ لِمَنْ حَمِدَهُ رَفَعَ يَدَيْهِ وَإِذَا قَامَ مِنَ الرَّكْعَتَيْنِ رَفَعَ يَدَيْهِ وَرَفَعَ ذَلِكَ ابْنُ عُمَرَ إِلَى نَبِيِّ اللَّهِ ﷺ
नाफ़े से रिवायत है कि: "(अब्दुल्लाह) बिन उमर ؓ जब नमाज़ में दाख़िल होते तो तकबीर कहते और रफ़उल यदैन करते। फिर जब रुकू करते तो रफ़उल यदैन करते, और जब 'समिअल्लाहु लिमन हमिदह' कहते तब भी रफ़उल यदैन करते और जब दो रकअत के बाद (अत्तहिय्यात से) खड़े होते तब भी रफ़उल यदैन करते। और इब्न उमर ؓ ने इस (अमल) को नबी करीम ﷺ की तरफ़ मन्सूब किया है।" (बुख़ारी: अल-अज़ान 739)
★ इन मौक़ों पर रफ़उल यदैन न करना सुन्नत की पैरवी में कमी की अलामत है।
[19] इमाम के पीछे सूरह अल-फ़ातिहा न पढ़ना:
قَالَ ﷺ: لَا صَلَاةَ لِمَنْ لَمْ يَقْرَأْ بِفَاتِحَةِ الْكِتَابِ
अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया: "जिसने सूरह अल-फ़ातिहा न पढ़ी उसकी नमाज़ नहीं।" (बुख़ारी: अल-अज़ान 756 - मुस्लिम: अस-सलाह 34 - (394)) - अन उबादा
★ इमाम के पीछे सूरह फ़ातिहा छोड़ने से नमाज़ ना-मुकम्मल रह जाती है, इसलिए हर हाल में सूरह फ़ातिहा की तिलावत लाज़िम है।
[20] इमाम व मुक़्तदी का जहरी नमाज़ में सिर्रन आमीन कहना:
عَنْ وَائِلِ بْنِ حُجْرٍ أَنَّهُ صَلَّى خَلْفَ رَسُولِ اللَّهِ ﷺ فَجَهَرَ بِآمِينَ
वाइल बिन हुज्र ؓ फ़रमाते हैं कि: "उन्होंने अल्लाह के रसूल ﷺ के पीछे नमाज़ पढ़ी तो आप ﷺ ने जहेर से आमीन कही।" (अबू दाऊद: बितहक़ीक़ अल-अल्बानी 933) (हसन सहीह)
عَنْ ابْنِ جُرَيْجٍ عَنْ عَطَاءٍ قَالَ:
قُلْتُ لَهُ: أَكَانَ ابْنُ الزُّبَيْرِ
يُؤَمِّنُ عَلَى إِثْرِ أُمِّ الْقُرْآنِ؟ قَالَ نَعَمْ
وَيُؤَمِّنُ مَنْ وَرَاءَهُ حَتَّى أَنَّ لِلْمَسْجِدِ لَلَجَّةً
इब्न जुरैज अता (रहिमहुल्लाह) से रिवायत करते हैं, फ़रमाते हैं: "मैंने उनसे (यानी हज़रत अता से) पूछा: क्या इब्न ज़ुबैर ؓ उम्मुल क़ुरआन (यानी सूरह अल-फ़ातिहा) के इख़्तिताम पर आमीन कहते थे? उन्होंने फ़रमाया: हाँ, और जो उनके पीछे होते वो भी आमीन कहते यहाँ तक कि मस्जिद गूँज उठती।" (मुसन्निफ़ अब्दुर रज़ाक़: 2640) [रवाहु अल-बुख़ारी तलीक़न किताब सिफ़त अस-सलाह: 29 - बाब जहर अल-इमाम बित-तामीन, तमाम अल-मिन्ना सफ़्हा 178, अज़-ज़ईफ़ा जिल्द 2 सफ़्हा 368-369 व सह्हहु अल-अल्बानी]
★ आमीन को आहिस्ता या ख़ामोशी से कहना सुन्नत-ए-नबवी के ख़िलाफ़ है।
By Team Islamic Theology

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