Tayammum ka Sharai Hukm, Dalail aur Mukammal Tareeqa

Tayammum ka Sharai Hukm, Dalail aur Mukammal Tareeqa


तयम्मुम का शरई हुक्म, दलीलें और मुकम्मल तरीका

इस्लामी शरीयत की बुनियाद चूंकि आसानी और सहूलत पर है, इसलिए अल्लाह तआ़ला ने उ़ज़्र में मुब्तला लोगों के लिए इबादात के अदा करने में हस्बे उ़ज़्र तख़फ़ीफ़ (कमी) कर दी है ताकि वह किसी हर्ज और मशक़्कत के बग़ैर इबादात की अदायगी कर सकें। 

इरशादे बारी तआ़ला है: 

"और (अल्लाह तआ़ला) ने तुम पर दीन (की किसी बात) में तंगी नहीं की।" [क़ुरआन 22 : 78] 

"अल्लाह तआ़ला तुम्हारे हक़ में आसानी चाहता है, सख़्ती नहीं चाहता।" [क़ुरआन 2 : 185] 

और रसूलुल्लाह ﷺ ने भी फ़रमायाः "दीन आसान है।" [सहीह बुखारी: 39]

इसी आसानी और सहूलत के पेशे नज़र शरीयते इस्लामिया ने पानी दस्तयाब (मयस्सर) न होने या उसके इस्तेमाल पर (ताक़त न होने) की स़ूरत में तयम्मुम की सहूलत बहम पहुँचा कर उम्मते मुस्लिमा के लिए बहुत बड़ी आसानी फ़राहम कर दी है।

तयम्मुम के लुग़वी मानी क़स़्द और इरादा करने के हैं जबकि शरई इस़्तिलाह में नमाज़ वग़ैरह को मुबाह (अदा) करने की ग़र्ज़ से चेहरे और हाथों पर मलने के लिए पाक मिट्टी के क़स़्द व इरादे को तयम्मुम कहते हैं।


तय़म्मुम की मशरूइयत:

इरशादे बारी तआ़ला है: 

"और अगर तुम बीमार हो या सफ़र की हालत में हो या तुममें से कोई ज़रूरी हाजत से (फ़ारिग़ होकर) आया हो या तुमने औ़रतों से हमबिस्तरी की हो, फिर तुम पानी न पाओ तो पाक मिट्टी से तयम्मुम कर लो, पस उसे अपने चेहरे और हाथों पर मल लो।" [क़ुरआन 5 : 6]

हज़रत आयशा (रज़ि.) फ़रमाती हैं कि हम एक सफ़र में नबी ﷺ के साथ निकले, जब हम बैदा या ज़ातुल हबीश पहुँचे तो मेरा हार टूट कर गिर गया। रसूलुल्लाह ﷺ ने उसकी तलाश के लिए क़याम फ़रमाया तो दूसरे लोग भी आपके हमराह ठहर गये। वहाँ कहीं पानी न था लोग हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) के पास आये और कहने लगेः आप नहीं देखते कि आयशा (रज़ि.) ने क्या किया? 

रसूलुल्लाह ﷺ और सब लोगों को ठहरा लिया, और यहाँ पानी भी नहीं मिलता और न उनके पास ही है। ये सुन कर हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) आये। उस वक़्त रसूलुल्लाह ﷺ मेरी रान पर सर रखे आराम से लेटे हुए थे। 

हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) कहने लगेः तुमने रसूलुल्लाह ﷺ और सब लोगों को यहाँ ठहरा लिया, हालांकि उनके पास पानी नहीं है और न इस जगह दस्तयाब (मयस्सर) ही होता है। हज़रत आयशा (रज़ि.) फ़रमाती हैं कि हज़रत अबू बक्र (रज़ि.) मुझ पर सख़्त नाराज़ हुए और जो अल्लाह को मन्ज़ूर था (बुरा भला) कहा, और मेरी कोख में हाथ से कचूके लगाने लगे। मैंने हरकत इसलिए न की कि मेरी रान पर रसूलुल्लाह ﷺ का सर मुबारक था। सुबह के वक़्त इस बे' आब मक़ाम पर रसूलुल्लाह ﷺ बेदार हुए तो अल्लाह तआ़ला ने आयते तयम्मुम नाज़िल फ़रमा दी, चुनांचे लोगों ने तयम्मुम कर लिया। उस वक़्त हज़रत उसैद बिन हुज़ैर (रज़ि.) बोले: ऐ आले अबू बक्र! ये कोई तुम्हारी पहली बरकत नहीं है। [सहीह बुख़ारी: 334]

इस आयत और हदीस में तयम्मुम के आग़ाज़ की स़राहत है जिससे मालूम होता है कि पानी की ग़ैर मौजूदगी या इस्तेमाल पर कुदरत न होने की स़ूरत में पाक मिट्टी से तयम्मुम करना जायज है।


वह असबाब जिनके बाइस़ तयम्मुम करना जायज़ है:

जब आदमी पानी इस्तेमाल करने से क़ास़िर हो तो वह तयम्मुम कर सकता है, जैसेः आस पास कहीं पानी मौजूद ही न हो, या किसी बीमारी के बाइस इस्तेमाल न कर सकता हो कि उससे अज़ियत बढ़ जायेगी, या बहुत ज़्यादा सर्दी हो जिसमें पानी इस्तेमाल करने से नुक़सान का अन्देशा हो। 

हज़रत इमरान बिन ह़ुसैन (रज़ि.) से मरवी है कि हम रसूलुल्लाह ﷺ के साथ सफ़र में थे कि आपने लोगों को नमाज़ पढ़ाई, बाद में देखा कि एक आदमी अलग बैठा हुआ है, आपने पूछाः क्या वजह है कि तुमने लागों के साथ नमाज़ नहीं पढ़ी?

उसने कहा कि मैं जनाबत से हूँ और यहाँ पानी नहीं है। 

आपने फ़रमायाः "तेरे लिए पाक मिट्टी से तयम्मुम करना ही काफ़ी था।" [सहीह बुखारी: 344] 

इसी तरह हज़रत जाबिर (रज़ि.) बयान करते हैं कि हम एक सफ़र में निकले तो एक आदमी को पत्थर लगा जिससे उसका सर ज़ख़्मी हो गया, फिर उसे एहतिलाम भी हो गया। उसने अपने साथियों से पूछा कि क्या मेरे लिए रुख़्स़त है? 

उन्होंने कहाः तुम पानी इस्तेमाल करने पर क़ादिर हो, इसलिए तुम्हारे लिए कोई रुख़्स़त नहीं, चुनांचे उसने गुस्ल कर लिया जिसके नतीजे में वह फ़ौत हो गया। 

जब हम रसूलुल्लाह ﷺ के पास आये और आपको उसकी वफ़ात की ख़बर दी तो आपने फ़रमायाः "उन्होंने उसको क़त्ल कर डाला, अल्लाह उन्हें हलाक करे, उन्होंने पूछ क्यों न लिया जबकि उन्हें इल्म न था। बेशक आ़जिज़ (जाहिल) की शिफ़ा सवाल कर लेने में है।" [सुनन अबी दाऊद: 336, व सुनन इब्ने माजा: 572]

हज़रत अ़म्र बिन आ़स़ (रज़ि.) से मरवी है कि ग़ज़्व-ए-ज़ातुल सलासिल में मुझे एक ठण्डी रात में एहतिलाम हो गया, मुझे अन्देशा हुआ कि अगर मैंने गुस्ल किया तो हलाक हो जाऊंगा, चुनांचे मैंने तयम्मुम कर लिया और अपने साथियों को सुबह की नमाज़ पढ़ाई। 

उन्होंने ये वाक़िया रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में ज़िक्र किया तो आपने पूछाः ऐ अ़म्र! क्या तूने जुन्बी होते हुए अपने साथियों की जमाअ़त कराई थी। मैंने बताया कि किसी वजह से मैंने गुस्ल नहीं किया था और मैंने ये भी कहा कि मैंने अल्लाह का फ़रमान सुना है: "अपने आपको क़त्ल न करो, अल्लाह तुम पर बहुत ही मेहरबान है।" [क़ुरआन 4 : 29] तो रसूलुल्लाह ﷺ हँस पड़े और कुछ न कहा। [मुसनद अहमदः 13423 व सुनन अबी दाऊद: 334, 335]


तयम्मुम किन चीज़ों से किया जा सकता है:

इरशादे बारी तआ़ला है: 

"पाक मिट्टी से तयम्मुम कर लो।" [क़ुरआन 5 : 6] 

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमायाः "पाक मिट्टी मुसलमान के लिए तहारत का ज़रिया है अगरचे दस बरस पानी न मिले।" [सुनन अबी दाऊद: 332, 333]

ये आयत और हदीस में स़ईद से तयम्मुम करने का कहा गया है। लुग़ते अरब में स़ईद से मुराद फ़क़त मिट्टी नहीं बल्कि सख़्त ज़मीन है। ये भी कहा गया है कि इससे मुराद पाक ज़मीन है। एक क़ौल ये भी है कि हर पाक मिट्टी को स़ईद कहा जाता है। 

अल्मिस्बाहुल मुनीर में है, स़ईद से मुराद सतह ज़मीन है चाहे वह मिट्टी हो या कोई और चीज। 

इमाम ज़ुजाज जो कि लुग़त के इमाम माने जाते हैं, फ़रमाते हैं कि मैं नहीं जानता कि उस मिट्टी में अहले लुग़त में इख़्तिलाफ़ हो। [अल्मिस्बाहुल मुनीरः 339, 340] 

इमाम इ़ब्ने हज़म रहिमहुल्लाह इसकी बाबत फ़रमाते हैं कि जिस लुग़त में कुर्आ़न नाज़िल हुआ है उसमें स़ईद से मुराद सतह ज़मीन है। [महली इब्ने हज़्मः 2/159] 

इमाम अबू इस्हाक़ इसकी बाबत लिखते हैं कि स़ईद से मुराद सतह ज़मीन है और इन्सान के ज़िम्मे यही है कि सतह ज़मीन पर अपने हाथ मार ले, ये ख़्याल किये बगै़र कि वहाँ मिट्टी है या नहीं क्योंकि स़ईद के मानी मिट्टी नहीं हैं बल्कि सतह ज़मीन को स़ईद कहते हैं, वह मिट्टी हो या कुछ और। बिलफ़र्ज़ अगर ज़मीन सारी की सारी पत्थर ही हो और वहाँ मिट्टी न हो और तयम्मुम करने वाला अगर अपने हाथ उन्हीं पत्थरों पर मार कर अपने चेहरे पर फेर ले तो यही उसके लिए तहारत का ज़रिया होगा। [अर्रोज़तुन्नदिय्याः 1/174-176] 

इमाम इ़ब्ने ख़ुज़ैमा रहिमहुल्लाह ने भी अपनी सही में बाब बाँध कर इसी तरफ़ इशारा किया है कि स़ईद से मुराद सिर्फ़ मिट्टी ही नहीं बल्कि इससे शूरीली ज़मीन भी मुराद है। [सहीह इब्ने ख़ुज़ेमाः 1354] 

इमाम इ़ब्ने कय्यिम रहिमहुल्लाह फ़रमाते हैं कि नबी ﷺ उस ज़मीन से तयम्मुम फ़रमाते थे जिस पर आपने नमाज़ पढ़नी होती थी, वह खुद मिट्टी होती या शूरीली ज़मीन या रेतीली। नबी-ए-अकरम ﷺ से सही सनद से साबित है कि आप ﷺ ने फ़रमायाः "जिस जगह मेरी उम्मत के किसी फ़र्द को नमाज़ (का वक़्त) पा ले, वहीं उसकी मस्जिद और उसे पाक करने वाली चीज़ है।" [मुसनद अहमदः 21855] 

इमाम इ़ब्ने क़य्यिम रहिमहुल्लाह फ़रमाते हैं कि ये नसे सरीह (वाज़ेह दलील) है कि जो शख़्स रेत में हो और नमाज़ का वक़्त आ जाये तो उसके लिए रेत बाइसे तहारत है। नबी करीम ﷺ और सहाब-ए-किराम रज़ि... ने तबूक का सफ़र किया तो दौराने सफ़र में उनका गुज़र रेतीले इलाक़े से भी हुआ और उनके पास पानी इन्तिहाई क़लील था और आपसे ये भी मन्कूल नहीं कि आपने अपने साथ मिट्टी उठाई हो या उसके उठाने का हुक्म दिया हो और न सहाबा ही में से किसी ने ऐसा किया। जबकि क़तई तौर पर मालूम था कि इस रास्ते में मिट्टी से रेत कहीं ज़्यादा है। हिजाज़ वग़ैरह की ज़मीन भी इसी तरह की है। जो इस बारे में तदबीर करे वह यक़ीनन इस बात का क़ायल होगा कि आप रेत से भी तयम्मुम कर लिया करते थे। वल्लाहु आलम ! [ज़ादुल मआदः 1/199, 200] 

इसके अलावा शैख़ मुहम्मद बिन स़ालेह अल्उ़सैमीन रहिमहुल्लाह इस मसले की बाबत फ़रमाते हैं कि राजेह बात ये है कि अगर कोई इंसान ज़मीन पर हाथ मार कर तयम्मुम कर लेता है, चाहे ज़मीन पर गुबार वगैरह हो या न हो। उसका तयम्मुम सही है। देखिये। [मजमूअ़ फ़तावा शैख इ़ब्ने अल्उ़सैमीनः 4/238] 

कुछ हज़रात ने सहीह मुस्लिम की रिवायत وَجُعِلَ التَّرَابُ لِي طَهُورًا और मुसनद अ़हमद की रिवायत وَجُعِلَتْ تُرْبَتُهَا لَنَا طَهُورًا से इस्तिदलाल करते हुए स़िर्फ़ मिट्टी ही से तयम्मुम करने को ज़रूरी क़रार दिया है लेकिन उनका ये इस्तिदलाल महल्ले नज़र मालूम होता है क्योंकि क़ायदा है कि अगर आ़म के अफ़राद में से किसी की तख़्स़ीस कर ली जाये तो उससे बाक़ी अफ़राद का उ़मूम ख़त्म नहीं हो जाता जैसा कि इरशादे बारी तआ़ला है: "उन जन्नतों में लज़ीज़ फल होंगे, और खजूरें और अनार भी।" [क़ुरआन 55 : 68] 

इरशाद है: "जो कोई अल्लाह का, उसके फ़रिश्तों का, उसके रसूलों का और जिब्रईल और मीकाईल का दुशमन है तो बेशक अल्लाह भी काफ़िरों का दुशमन है।" [क़ुरआन 2 : 98] 

पहली आयत में "फल" ज़िक्र करने के बाद खजूर और अनार का ज़िक्र है। इसके ये मानी नहीं कि आम और तरबूज़ फल नहीं हैं, इसी तरह दूसरी आयत में पहले मुत्लक़ मलाइका का ज़िक्र है और बाद में जिब्रईल और मीकाईल का ज़िक्र है। इसके भी ये मानी नहीं कि जिब्रईल और मीकाईल फ़रिश्तों में से नहीं हैं। बिल्कुल वाज़ेह तौर पर यही बात इन दोनों रिवायतों से भी साबित होती है कि आपने उनमें तुराब (मिट्टी) का लफ़्ज़ बोला है। उसके ये मानी नहीं हैं कि उससे मुराद सिर्फ़ मिट्टी ही है और कोई चीज़ नहीं। चूंकि मिट्टी आम है इसलिए इसकी तख़्सीस़ कर दी है। 

मज़ीद तफ्सील के लिए देखिये सुबुलुस्सलामः 1/193, 194, नैलुल अवतारः 1/328, ज़ख़ीरतुल अ़क़बा शरह सुनन नसाईः 5/38-387 इस तफ़्सील से मालूम हुआ कि राजेह मौक़फ़ यही है कि तयम्मुम सिर्फ़ मिट्टी के साथ ख़ास नहीं बल्कि सतहे ज़मीन पर जो कुछ भी हो उससे तयम्मुम किया जा सकता है, ख़्वाह वह मिट्टी हो या रेत वगैरह। वल्लाहु आलम !


तयम्मुम का तरीक़ा:

हज़रत अ़म्मार रज़ि. से मरवी है, वह बयान करते हैं कि मैं सफ़र की हालत में जुन्बी हो गया और पानी न मिलने की वजह से ख़ाक में लोट पोट हो गया, फिर सफ़र से आकर ये हाल रसूलुल्लाह ﷺ के सामने बयान किया तो आपने फ़रमायाः "तुम्हें सिर्फ़ इस तरह कर लेना काफ़ी था।" फिर आपने एक बार ज़मीन पर अपना हाथ मारा, फिर उससे गुबार (धूल) को झाड़ा, उसके बाद अपने हाथ की पुश्त का बायें हाथ से मसह फ़रमाया या अपने बायें हाथ की पुश्त का अपने हाथ से मसह फ़रमाया, फिर उनसे अपने चेहरे पर मसह किया। [सहीह बुखारी: 347] 

इस रिवायत में सिर्फ़ हाथ की पुश्त का ज़िक्र है। बातिने कफ़, यानी हाथ के अन्दर की जानिब मसह का ज़िक्र नहीं है, दीगर रिवायात में इसकी वज़ाहत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने ज़मीन पर हाथ मारा, फिर उसे झाड़ा, फिर बायें हाथ से दायें का और दायें से बायें का मसह किया, उसके बाद चेहरे का मसह किया। [सुनन अबी दाऊद: 321]

हाफ़िज़ इ़ब्ने हजर रहिमहुल्लाह ने अ़ल्लामा इस्माईल के हवाले से जो रिवायत नक़ल की है वह बहुत ही वाज़ेह है। रसूलुल्लाह ﷺ ने हज़रत अम्मार रज़ि.. से फ़रमायाः तुझे इतना ही काफ़ी था कि अपने दोनों हाथ ज़मीन पर मारता, फिर उन्हें झाड़ता फिर दायें हाथ से बायें का और बायें हाथ से दायें हाथ का मसह करता, उसके बाद अपने चेहरे का मसह करता। [फ़तहुल बारी: 5921] 

तहत हदीसः 347 इन रिवायात से मालूम हुआ कि हाथों को सिर्फ़ एक ही दफ़ा ज़मीन पर मारना चाहिए, यानी हाथों पर तयम्मुम करने के बाद मुँह के लिए दोबारा हाथ ज़मीन पर मारने की ज़रूरत नहीं और न कुहनियों वगैरह पर हाथ फेरने की ज़रूरत है। जबकि इमाम तिर्मिज़ी रहिमहुल्लाह ने दो ज़र्बो के क़ायलीन के नाम लिए हैं, जिनमें सहाबा भी हैं और ताबेईन भी और अइम्मा-ए-फ़िक़्ह भी, नीज़ मोत्ता इमाम मालिक में हज़रत अब्दुल्लाह बिन उ़मर रज़ि. के हवाले से ये भी मरवी है कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन उ़मर रज़ि.. तयम्मुम में कुहनियों तक हाथ फेरते थे। [मोत्ता इमाम मालिक: 153]

इमाम शौकानी रहिमहुल्लाह लिखते हैं कि दो मर्तबा हाथ ज़मीन पर मारने वाली तमाम रिवायात में मक़ाल है। अगर ये रिवायात सही होतीं तो इन पर अमल करना मुतअ़य्यन होता क्योंकि इसमें एक बात ज़्यादा है जिसे क़ुबूल करना ज़रूरी होता, इसलिए हक़ बात ये है कि सहीहैन की हज़रत अम्मार की रिवायत ही को काफ़ी समझा जाये जिसमें एक मर्तबा हाथ ज़मीन पर मारने का ज़िक्र है, जब तक कि दो मर्तबा वाली रिवायत सही साबित न हो जाये। [नैलुल अवतारः 1/264] 

इसी तरह हज़रत अब्दुल्लाह बिन उ़मर रज़ि.. का तयम्मुम में कुहनियों तक हाथ फेरना ये उनका अपना अमल है, रसूलुल्लाह ﷺ से साबित नहीं। जिससे ज़्यादा से ज़्यादा जवाज़ की गुंजाइश निकलती है, दलाइल की रू से यही मौक़फ़ राजेह और अक़रब अलस़्स़वाब मालूम होता है कि तयम्मुम में सिर्फ़ एक ज़र्ब है और वह भी सिर्फ़ हाथों और चेहरे के लिए है, इसमें कुहनियाँ शामिल नहीं हैं। वल्लाहु आलम !

तयम्मुम जिस तरह वुज़ू का क़ायम मुक़ाम है उसी तरह गुस्ल का भी, यानी पानी न मिलने की सूरत में जैसे वुज़ू की बजाये तयम्मुम किया जा सकता है ऐसे ही किसी पर गुस्ल वाजिब हो तो वह भी तयम्मुम कर सकता है।

जिन चीज़ों से वुज़ू टूट जाता है उनसे तयम्मुम भी टूट जाता है। इसके अलावा पानी मिलने की सूरत में या जिस उन की वजह से तयम्मुम किया था उसके ख़त्म हो जाने पर तयम्मुम का जवाज़ भी ख़त्म हो जाता है। वरना जब तक तयम्मुम नहीं टूटता उससे मुतअ़द्दद (कई) नमाज़ें पढ़ी जा सकती हैं, जैसे वुज़ू बरक़रार रहे तो कई नमाज़ें पढ़ी जा सकती हैं।

पानी के इस्तेमाल पर क़ुदरत के बावजूद सिर्फ़ इस अन्देशे की वजह से तयम्मुम करना कि वुज़ू या गुस्ल करने से नमाज़ का वक़्त ख़त्म हो जायेगा, दुरुस्त और जायज़ नहीं। शैख़ अल्बानी रहिमहुल्लाह इसकी बाबत लिखते हैं: शरीयत में नस़ क़ुरआन से साबित है कि जब पानी न हो तो आदमी तयम्मुम कर सकता है, इसमें सुन्नते मुतहहरा ने ये इज़ाफ़ा कर दिया है कि अगर कोई बीमार हो या सख़्त सर्दी के बाइस़ पानी का इस्तेमाल मुज़िर (नुक़सानदेह) हो तो इस स़ूरत में भी तयम्मुम किया जा सकता है। मगर ये कहीं साबित नहीं कि इंसान पानी इस्तेमाल करने पर क़ादिर होने के बावजूद तयम्मुम कर ले। 


आख़िर इसकी क्या दलील है?

अगर कहा जाये कि वक़्त निकल जाने का डर हो तो तयम्मुम का जवाज़ हो सकता है तो मैं कहता हूँ कि ये बात बिल्कुल गलत है और ये उ़ज़्र की कोई सही दलील नहीं क्योंकि ये शख़्स जिसे वक़्त निकल जाने का अन्देशा है हालतों से ख़ाली नहीं। ये तो अन्देशा के अपने अमल सुस्ती और ग़फ़लत की वजह से लाहक़ हुआ है, या उसका इसमें कोई इख़्तियार न था, जैसेः वह सो गया था या भूल गया था। तो इस दूसरी हालत में उसकी नमाज़ का वक़्त ही उस वक़्त शुरू हुआ है जब वह बेदार हुआ या उसे याद आया। उसे उसी वक़्त नमाज़ अदा कर लेनी चाहिए जैसे उसे हुक्म दिया गया है। 

इसकी दलील सहीहैन की रिवायत है, नबी ﷺ ने फ़रमायाः "जो शख़्स नमाज़ भूल गया या सोया रहा, उसका कफ़्फ़ारा यही है कि जब उसे याद आये पढ़ ले।" [सहीह बुखारी: 597] 

शारेअ़ अलहकीम रसूलुल्लाह ﷺ ने उस माज़ूर के लिए इजाज़त रवा रखी है कि वह वैसे ही नमाज़ पढ़े जिस तरह उसे हुक्म है। अपने वुज़ू या गुस्ल के लिए पानी इस्तेमाल करे। उसके लिए वक़्त निकल जाने का कोई ख़तरा नहीं। चुनांचे मालूम हुआ कि उस शख्स के लिए तयम्मुम करना जायज़ नहीं। 

उसके बारे में शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिया रहिमहुल्लाह ने भी यही बात इख़्तियार की है और मसाइल मारदीनिया के सफ़ाः 65 पर लिखा है कि जुम्हूर का भी यही मौक़फ़ है। और पहली सूरत में भी यही बात है कि पानी इस्तेमाल करे और पानी इस्तेमाल करके नमाज़ पढ़े अगर बरवक़्त पढ़ ली तो बेहतर और अगर वक़्त निकल गया तो अपने आप को मलामत करे क्योंकि ये उसकी अपनी कोताही का नतीजा है। यही वह बात है जिस पर मुझे शरह सदर और दिली इत्मिनान है अगरचे शैखुल इस्लाम और कुछ दीगर अइम्मा इसके क़ायल हैं कि तयम्मुम करके नमाज़ पढ़ ले। बाद में मैंने शैख़ शौकानी रहिमहुल्लाह की किताबों का मुतालआ़ किया तो वह भी इसी मौक़फ़ की तरफ़ मायल हैं जिसका मैंने ज़िक्र किया है। मज़ीद तफ्सील के लिए देखिये तमाम अल्मिन्नत, सफ़ाः 132, 133, व सबीलुल जरार: 1/311, 312) इस तफ़्सील और दीगर दलाइल की रू से शैख़ अल्बानी रहिमहुल्लाह का मौक़िफ़ ही राजेह मालूम होता है कि पानी के इस्तेमाल पर कुदरत के बावजूद सिर्फ़ इस वजह से तयम्मुम करना कि वुज़ू या गुस्ल करने से नमाज़ का वक़्त निकल जायेगा, दुरुस्त नहीं। 

वल्लाहु आलम!


By Team Islamic Theology

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