ख़वारिज की मज़म्मत
ख़वारिज की मज़म्मत में नबी ﷺ की बहुत सी अ़हादीस साबित हैं। उनमें ख़वारिज के ऐसे घिनौने और क़ाबिले नफ़रीं औस़ाफ़ का तज़्किरा है कि जिनकी वज़ह से वो बेहद घटिया और ख़बीस तरीन मक़ाम के मुस्तहिक़ ठहरते हैं, चुनाँचे यहाँ चंद अ़हादीस तह़रीर की जाती हैं जिनमें उनकी मज़म्मत की त़रफ़ वाज़ेहू इशारा मिलता है।
1. अबू स़ईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि हम रसूलुल्लाह ﷺ के पास थे और आप कुछ तक़्सीम कर रहे थे, इतने में बनू तमीम का एक आदमी जुल् खुवेस़रा आ पहुँचा और कहा कि अल्लाह के रसूल ! अ़दल करो, आप ﷺ ने फ़र्माया, "बर्बादी हो तेरी, जब मैं अ़दल न करूँगा तो कौन करेगा मैं तो हलाक हो गया और बदनसीब ठहरा अगर मैंने अ़दल न किया।"
उ़मर रज़ियल्लाहु अन्हु ने अ़र्ज़ किया ऐ अल्लाह के रसूल ! मुझे इजाज़त दीजिए कि इसकी गर्दन मार दूँ।
आप ﷺ ने फ़र्माया, "जाने दो, क्योंकि इसके साथी होंगे कि तुम अपनी नमाज़ों को उनकी नमाज़ों के आगे और अपने रोज़े को उनके रोज़े के आगे हक़ीर समझोगे, वो क़ुरआन पढ़ेंगे, लेकिन उनके हलक़ से नीचे न उतरेगा, वो इस्लाम से ऐसे निकल जाएँगे कि जैसे तीर कमान से।"
तीरअंदाज़ उसके पैकान को देखता है तो उसमें कुछ भरा हुआ नहीं पाता, पैकान की जुज़ को देखता है तो उसमें भी कुछ नहीं फिर उसकी लकड़ी को देखता है तो उसमें कुछ नहीं, फिर उसके पर को देखता है तो उसमें भी कुछ नहीं और तीर उस शिकार की पेट और खून से निकल चुका होता है। उस गिरोह की निशानी ये है कि उसमें एक काला आदमी होगा, उसका एक बाजू औरत का पिस्तान का सा होगा, या आपने फ़र्माया जैसे गोश्त का लोथड़ा थिलथिलाता हुआ, वो गिरोह उस वक्त निकलेगा जब लोगों में फूट होगी।
अबू स़ईद रज़ियल्लाहु अन्हु का बयान है कि मैं गवाही देता हूँ कि मैंने ये बात रसूलुल्लाह ﷺ से सुनी है और गवाही देता हूँ कि अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु उनसे लड़े और मैं आपके साथ था। आपने उसे (स़िफ़ते मज़्कुरा वाले शख़्स को) ढूँढ़ने का ह़ुक्म दिया और वो मिला और आपके पास लाया गया, मैंने देखा रसूलुल्लाह ﷺ ने उसके बारे में जिस तरह फ़र्माया था वो वैसा ही था। [सहीह मुस्लिम: 2454]
2. अबू सलमा और अ़ता का बयान है कि वो दोनों अबू स़ईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु के पास आए और कहा : क्या आपने "ह़रूरिया" के बारे में रसूलुल्लाह ﷺ से कुछ सुना है?
उन्होंने कहा : मैं नहीं जानता कि ह़रूरिया कौन है, मगर मैंने आप ﷺ को फ़र्माते हुए सुना कि (यख़्रुजु फ़ी हाज़िहिल उम्मति) “इस उम्मत में एक क़ौम निकलेगी।" आप ﷺ ने "मिन्हा" यानी इस उम्मत से होगी, नहीं फ़र्माया। आगे फ़र्माया,
"तुम अपनी नमाज़ के आगे उनकी नमाज़ को ह़क़ीर जानोगे, वो क़ुरआन पढ़ेंगे, उनके ह़ल्क़ों से या गलों से नीचे न उतरेगा, दीन से ऐसे निकल जाएँगे जैसे तीर शिकार से, कि शिकारी देखता है अपनी तीर की लकड़ी को, और उसकी फाल को और उसकी पर को और ग़ौर करता है कि उसके किनाराए अख़ीर को जो उसकी चुटकियों में था कि कहीं उसकी किसी चीज़ में कुछ खून भरा है (तो देखता है कहीं कुछ भी नहीं भरा)" [सहीह मुस्लिम: 2455]
3. सहीह बुखारी में यसीर बिन अ़म्र का बयान है कि मैंने सहल बिन ह़नीफ़ रज़ियल्लाहु अन्हु से कहा : क्या आपने ख़वारिज के बारे में रसूलुल्लाह ﷺ से कुछ कहते हुए सुना है?
तो उन्हों ने कहा कि मैंने आप ﷺ को फ़र्माते हुए सुना है दराँ हाल ये कि आपसे इराक़ की तरफ़ अपने हाथ से इशारा किया। "उससे एक क़ौम निकलेगी, वो क़ुरआन पढ़ेंगे लेकिन उनके हलक़ से नीचे न उतरेगा, वो इस्लाम से ऐसे ही निकल जाएँगे जैसे तीर कमान से।" [सहीह बुख़ारी: 6934]
इन तीनों अ़हादीस में वाज़ेह त़ौर पर ख़वारिज की मज़म्मत मौजूद है, चुनाँचे आप ﷺ ने उनके औस़ाफ़ के बारे में फ़र्माया कि ये गिरोह "मारिक़ा" यानी दीन से ख़ारिज है और ये लोग नामुनासिब मक़ामात पर दीन में तशद्दुद से काम लेते हैं, दीन में दाखिल होते हैं, लेकिन उनमें इस्तिह़काम नहीं होता, बहुत तेज़ी के साथ उससे निकल भी जाते हैं। पहली हदीस में ख़ास तौर पर उनके औस़ाफ़ ये बताये गए हैं कि ये लोग अहले हक़ से क़िताल करेंगे और अहले हक़ उन्हें क़त्ल करेंगे, उनमें एक आदमी का हाथ इस इस तरह का होगा, बहरहाल ये सारी चीजें रसूलुल्लाह ﷺ की पेशीनगोई के मुताबिक़ हूबहू वाक़ेअ़ भी हुई।
मज़्कूरा अ़हादीस में रसूलुल्लाह ﷺ के फर्मान (ला युजाविजु तराक़ियहुम) में दो मअ़नों का एह़तिमाल है:
i. कुरआन उनके ह़लक़ से नीचे नहीं जाएगा, यानी वो उससे इब्रत नहीं ह़ास़िल करेंगे, समझ बूझ कर नहीं पड़ेंगे और उसे ग़ैर मुरादी मअ़नो पर मह़मूल करेंगे।
ii. क़ुरआन उनके हलक़ से नीचे नहीं जाएगा, यानी उनकी तिलावत अल्लाह तआ़ला तक नहीं पहुँचेगी और वो उसका सवाब नहीं पाएँगे। [फ़त्हुल बारी: 6/61833]
इर्शादे नबवी ﷺ के मुताबिक़ उनके औस़ाफ़ मज़्यूमा में ये बात भी दाखिल है कि उनके ईमान का दावा सिर्फ़ ज़बानी होगा, अक़्ल के कमज़ोर कोरे होंगे। वो क़ुरआन पढ़ते हुए अपने अक़्ली कोढ़पन की वजह से अपने मुखालिफ़ आयात को अपने हक़ में समझेंगे।
इमाम बुखारी (रहिमहुल्लाह) ने अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस नक़्ल की है जो कि अपने बारे में फ़र्माते हैं कि जब मैं तुम्हें रसूलुल्लाह ﷺ की कोई हदीस सुनाऊँ तो मुझे ये गवारा है कि आसमान से फेंक दिया जाऊँ लेकिन ये गवारा नहीं कि रसूलुल्लाह ﷺ पर झूठ बाँधू और जब आपस की बातें करूँ तो ये तो जंग चालबाज़ी का नाम है। आप फ़र्माते हैं कि रसूले अकरम ﷺ को फ़मतेि हुए सुना है: "आख़िरी ज़माने में एक क़ौम पैदा होगी।
हाफ़िज़ इ़ब्ने ह़जर (रहिमहुल्लाह) फ़र्माते हैं कि आख़िरी ज़माने से "ख़िलाफ़ते अला मिन्हाजिन् नुबुव्वत" का आख़िरी ज़माना मुराद है, इसलिए कि सुनन में और सही इ़ब्ने हिब्बान वग़ैरह में वारिद हदीस में है कि यानी "मेरे बाद ख़िलाफ़त तीस साल रहेगी उसके बाद रहमत वाली बादशाहत हो जाएगी। और इसके बाद काट खाने वाली बादशाहत होगी।" इस ऐतिबार से ख़वारिज और नहरवान में उनसे जंग का वाक़िया ख़िलाफ़ते अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के आख़िरी दौर यानी 38 हिजरी में पेश आया था। [फ़त्हुल बारी: 12/287]
ख़वारिज नौजवान और कमअक़्लों के, ये लोग बेहतरीन कलाम पढ़ेंगे (यानी क़ुरआन की तिलावत करेंगे), लेकिन इस्लाम से वो इस तरह निकल जाएँगे जैसे तीर शिकार को पार करके निकल जाता है, उनका ईमान उनके हलक़ से नीचे नहीं उतरेगा, तुम उन्हें जहाँ भी पाओ क़त्ल कर दो, क्योंकि उनका क़त्ल क़ियामत में उस शख़्स के लिये बाइसे अ़ज्र होगा जो उन्हें क़त्ल कर देगा।" [सहीह बुखारी: 3611, 5057, 6930; व मुस्लिम: 1066]
बहरहाल ये दोनों अ़हादीस ख़वारिज की मज़म्मत करती हैं और बताती हैं कि उनका ईमान उनकी ज़बानों तक मेहदूद है। हलक़ से नीचे नहीं उतरता, तो ये औसाफ़ किस क़द्र क़बीह और घिनौने हैं आफ़ साफ़ वाज़ेह हैं।
ख़वारिज के क़बीह़तरीन औस़ाफ़ में ये भी हैं कि वो दीन से निकल जाने के बाद उसमें वापस लौटने की तौफ़ीक़ नहीं पाते, वो सारी मख़्लूक में सबसे बदतर हैं। चुनाँचे सहीह मुस्लिम में अबू ज़र्र रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि नबी ﷺ ने फ़र्माया: "मेरी उम्मत से. या फ़र्माया, मेरे बाद मेरी उम्मत में एक क़ौम होगी जो क़ुरआन पढ़ेगी और वो उसके हलक़ से नीचे न उतरेगा, वो दीन से ऐसे ही निकल जाएगी जैसे तीर कमान से, फिर वो लौटकर दीन में न आएगी, वो सारी मख़्लूक़ में सबसे बदतर क़ौम है।" [सहीह मुस्लिम: 2457]
अबू स़ईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस में है कि आप ﷺ ने अपनी उ़म्मत में बाद में पैदा होने वाली एक क़ौम का ज़िक्र किया, जो उस वक्त निकलेगी जब लोगों में फूट पड़ जाएगी, उनकी पहचान सर मुँडाना है। फ़र्माया: "वो सर मुँडाये होंगे, वो सबसे बदतरीन मख़्लुक़ हैं, उन्हें दो गिरोहों में से वो क़त्ल करेगा जो हक़ से ज़्यादा क़रीब होगा।" [सहीह मुस्लिम: 2461]
बज़बाने रिसालत, ख़वारिज दुनिया की बदतरीन मख़्लूक़ क़रार दिये गए हैं, चुनाँचे उ़बैदुल्लाह बिन राफ़ेअ़ रज़ियल्लाहु अन्हु रसूलुल्लाह ﷺ से रिवायत है कि जब हरूरिया निकले तो आप अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के साथ थे, इरूरिया ने कहा: "ला हुक्म इल्ला लिल्लाहि" यानी अल्लाह के सिवा किसी का हुक्म नहीं। तो अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़र्माया, "कलिमा तो हक़ है मगर इससे इरादा बातिल का है।" रसूलुल्लाह ﷺ ने कुछ लोगों से बयान किया था मैं उनकी निशानियाँ जानता हूँ, वो अपनी ज़बानों से हक़ कहते हैं लेकिन वो उसे तजावुज़ नहीं करता। फिर उ़बैदा ने अपनी ह़लक़ की तरफ़ इशारा किया। अल्लाह की मख़्लूक़ में बड़े दुश्मन अल्लाह के यही हैं, उनमें एक शख़्स काला कलूटा है, उसका एक हाथ ऐसा है कि जैसे बकरी के चूचे, या सरे पिस्तान, फिर जब उनको अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने क़त्ल किया तो फ़र्माया देखो, उसे तलाश करो, देखा गया तो वो न मिला, आपने दोबारा फ़र्माया कि फिर जाओ, अल्लाह की क़सम ! मैं झूठ नहीं कहता और न मुझसे झूठ कहा गया, आपने दो या तीन बार यही कहा, फिर उसको एक खण्डर में पाया गया, लोग उसे लाए और उसकी लाश अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के सामने रख दी। उ़बैदुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु फ़र्माते हैं कि जब उन्होंने ये काम किया और अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु ने उनके हक़ में ये फ़र्माया तो मैं वहाँ हाज़िर था। [सहीह मुस्लिम: 2463]
ख़वारिज की बदनसीबी और बज़बाने नबी ﷺ उनकी मज़म्मत का एक पहलू ये भी है कि ये लोग हक़ की मारिफ़त और उसकी पैरवी से मेह़रूम हैं, चुनाँचे सहल बिन ह़नीफ़ रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी ﷺ ने फ़र्माया: "मश्रिक की तरफ़ से एक क़ौम निकलेगी जो सर मुँडाये होंगे।" [सहीह मुस्लिम: 2466]
इमाम नववी (रह.) "यतीही क़ौम" का मतलब बयान करते हैं कि वो क़ौम जादए हक़ से इंहिराफ़ कर जाएगी, इसलिए कि "यतीही" का फ़ेअ़ले माज़ी 'ताह' है जिसका मअ़ना राहे हक़ से हट जाना होता है। वल्लाहु आलम ! [शरहन् नववी अला सहीहून मुस्लिम: 7/175]
एक और मज़्यूम सिफ़त जिसमें वो लतपत हैं और हक़ीक़तन वो उसे अंजाम भी देते हैं वो ये है कि ये लोग मुसलमानों को क़त्ल करना और ईसाईयों व बुतपरस्तों को छोड़ देना, अपना दीन समझते हैं। चुनाँचे सहीह मुस्लिम में अबू स़ईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु की त़वील हदीस में है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़र्माया: "इसकी अस़ल से एक क़ौम निकलेगी जो क़ुरआन पढ़ेंगे और उनके गलों के नीचे नहीं उतरेगा, वो अहले इस्लाम को क़त्ल करेंगे और बुतपरस्तों को छोड़ देंगे, वो इस्लाम से ऐसे ही निकल जाएँगे जैसे तीर कमान से। अगर मैं उनको पाता तो ऐसा क़त्ल करता जैसे क़ौम आ़द का (अज़ाबे-इलाही से) क़त्ल हुआ था एक भी बाक़ी न बचा।" [सहीह बुखारी: 3344, 4667, 7432; व सहीह मुस्लिम: 2468]
चुनाँचे नबी अकरम ﷺ का ये फ़र्मान एक वाज़ेह मुअ़जिज़ा निकला, हूबहू ये बातें वाक़ेअ़ हुई, उन्होंने मुसलमानों के ख़िलाफ़ तलवारें सूतीं और कुफ़्फ़ार व यहूद के ख़िलाफ़ उन्हें म्यान में रखा।
इसी तरह ख़वारिज के क़बीह तरीन औस़ाफ़ में से जो उनके लिये बाइ़से नंगो आ़र हैं, ये हैं कि उनके जुहूर के वक्त आप ﷺ ने उन्हें क़त्ल कर देने की तग़र्गीब दी है और कहा कि अगर खुद मैं उनका दौर पाऊँगा तो आ़द व समूद की तरह क़त्ल करके उनका नामो निशान मिटा दूँगा और फ़र्माया कि जो उनको क़त्ल करेगा बरोज़ क़ियामत अल्लाह के नज़दीक उसे अ़ज्र मिलेगा। चुनाँचे अल्लाह तआ़ला ने ख़लीफ़ए राशिद अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु को उनसे क़िताल करने और उन्हें तहोतैग़ करने का शर्फ़ बख़्शा क्यों कि नबी ﷺ के फ़रमूदा औस़ाफ़ के मुताबिक़ उनका जुहूर अ़ली रज़ियल्लाहु अन्हु के ज़माने में हुआ था, आपने अपनी जिस फौज को शाम की मुहिम के लिये तैयार किया था, आप उसे लेकर ख़वारिज की तरफ़ निकल पड़े और नहरबान में उनसे लड़ाई लड़ी। चंद अफ़राद जो दस से भी कम थे, बच सके। आपने अपनी तरफ़ से उनसे लड़ाई का आगाज़ नहीं किया था, बल्कि जब उन्होंने नाहक़ खून बहाया, मुसलमानों का माल लूटा, क़ौलन व अमलन बदतमीज़ियाँ शुरू कीं तो आपने उनकी सरकशी और मज़ालिम के ख़िलाफ़ जंग शुरू की।
ख़वारिज की मज़म्मत में बस इतनी ही रिवायात काफ़ी हैं, वरना इस बाब में इस कसरत से रिवायतें मौजूद हैं जिन शायद ही हदीस की कोई किताब ख़ाली हो।
By Team Islamic Theology
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