Parda rok nahi rehnumai hai

Parda-rok-nahi-rehnumai-hai

पर्दा: रोक नहीं, रहनुमाई है

पर्दा इज्ज़त है, पर्दा हिफाज़त है, पर्दा हया की चादर है। 

पर्दा औरत का ज़ेवर है : रोक नहीं, ज़िम्मेदारी और तवाज़ुन है,पर्दा अल्लाह रब्बुल इज्ज़त की तरफ़ से फर्ज़ है। 

पर्दा शब्द सुनते ही अक्सर हमारे ज़ेहन में एक ही तस्वीर उभरती है, एक औरत, नक़ाब या बुर्क़ा पहने हुए, जैसे वह दुनिया से खुद को छुपा रही हो।

कई लोग यही समझ लेते हैं कि पर्दा करने का मतलब है आज़ादी को छोड़ देना, तालीम से दूर हो जाना या समाज से कट जाना। लेकिन हक़ीक़त यह है कि पर्दा न तो छुपने का नाम है और न ही आगे बढ़ने से रुक जाने का।

असल सवाल यह नहीं है कि पर्दा क्या है, बल्कि यह है कि हम पर्दे को कैसे समझते हैं?

पर्दा सिर्फ औरत की ज़िम्मेदारी नहीं।

जब भी पर्दे की बात होती है, तो सारा बोझ औरतों पर डाल दिया जाता है।

जबकि सारे मर्द और औरत पर पर्दा लाजिम है , इस का हुक्म कुरआन में है और जिस का हुक्म क़ुरआन देता हो वो सीधे-सीधे फर्ज होता है।

क़ुरआन ने सबसे पहले मर्दों को मुखातिब किया।

قُلْ لِّلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا مِنْ أَبْصَارِهِمْ وَيَحْفَظُوا فُرُوجَهُمْ ۚ ذَٰلِكَ أَزْكَىٰ لَهُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا يَصْنَعُونَ

“मोमिन मर्दों से कह दो कि वे अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी पाक़दामनी की हिफ़ाज़त करें। यह उनके लिए ज़्यादा पवित्र है। अल्लाह जानता है जो कुछ वे करते हैं।” [सूरह नूर, आयत 30]

इस आयत से साफ़ हो जाता है कि पर्दा सिर्फ कपड़े का मसला नहीं, बल्कि नज़र और दिल का भी पर्दा है।


औरतों के लिए पर्दे का हुक्म

وَقُل لِّلْمُؤْمِنَاتِ يَغْضُضْنَ مِنْ أَبْصَارِهِنَّ وَيَحْفَظْنَ فُرُوجَهُنَّ وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا مَا ظَهَرَ مِنْهَا…

“और मोमिन औरतों से कह दो कि वे अपनी नज़रें नीची रखें, अपनी पाक़दामनी की हिफ़ाज़त करें और अपनी ज़ीनत ज़ाहिर न करें सिवाय उसके जो ख़ुद-ब-ख़ुद ज़ाहिर हो जाए…” [सूरह नूर, आयत 31] 

आम तौर पर ऐसा समझा जाता है कि बुर्का या नकाब ही पर्दा है, हालांकि ऐसा नहीं है। कोई ऐसी चादर कोई ऐसा लिबास जिस से सारा जिस्म ढक जाए और जिस्मानी नसेब-ओ-फ़राज़ जाहिर ना होता हो तो वो भी पर्दा ही है।


बाहर निकलते समय पर्दा

يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ قُل لِّأَزْوَاجِكَ وَبَنَاتِكَ وَنِسَاءِ الْمُؤْمِنِينَ يُدْنِينَ عَلَيْهِنَّ مِن جَلَابِيبِهِنَّ ۚ ذَٰلِكَ أَدْنَىٰ أَن يُعْرَفْنَ فَلَا يُؤْذَيْنَ

“ऐ नबी! अपनी बीवियों, बेटियों और मोमिन औरतों से कह दो कि वे अपने ऊपर अपनी चादरें डाल लिया करें। यह ज़्यादा क़रीब है कि वे पहचानी जाएँ और उन्हें तकलीफ़ न दी जाए।” [सूरह अल-अहज़ाब, आयत 59]

यहाँ भी साफ़ है कि पर्दा हिफ़ाज़त और पहचान से जुड़ा है, क़ैद से नहीं।


दिल और नज़र का पर्दा

अगर नज़र आज़ाद हो तो दिल भी भटकता है। और जब दिल भटकता है तो इंसान अपने अख़लाक़ से गिरने लगता है। इसीलिए इस्लाम ने सबसे पहले नज़र की हिफ़ाज़त सिखाई। क्योंकि गुनाह की शुरुआत अक्सर वहीं से होती है


एक गौर करने वाली बात यहां बताते चलें

आमतौर से, हमारे मुआशरे मे देखा जाता है की औरतें तो काफी हद तक पर्दा करती हैं मगर मर्द खुद का पर्दा तो छोड़िए उस पर्दा की हुई औरतों के परदे में भी उस को बेपर्दा देखने की कोशिश करता है जो कि हमारे समाज के लिए बहुत ही खतरनाक है।

हालांकि होना ये चाहिए कि मर्द अपनी निगाहों की हिफाजत करे और इस्लाम ने मर्दों को जिस तरीके का पर्दा करने का हुक्म दिया है उस पर अमल करे और साथ ही साथ औरतें भी शरई तरीके से पर्दा करें। 

तब तो पर्दे का निज़ाम क़ायम रह सकता है वरना सिर्फ एक को पर्दा करने के लिए कहना और दूसरे का बेपर्दगी की सारी हदें पार कर जाना कहीं से भी जायज नहीं है।


आज का दौर और पर्दा 

सोशल मीडिया और दिखावे का पर्दा

आज एक नई सोच पैदा हो गई है बाहर तो नक़ाब है, लेकिन सोशल मीडिया पर सब खुला हुआ है। अगर पर्दा सिर्फ रास्ते तक सीमित हो जाए और स्क्रीन पर खत्म हो जाए, तो यह पर्दा अधूरा है। क्योंकि नज़र मोबाइल से भी लगती है, और दिल स्क्रीन से भी प्रभावित होता है।

बाज़ार, कॉलेज और शादियाँ

आज हम एक दोहरा मापदंड अपनाते हैं। अफ़सोस हमारे घर की औरतें और बेटियां हिजाब को ट्रेवलिंग क्लोथ्स  समझती हैं। उन्हें लगता है पर्दा सिर्फ़ कुछ लोगों से है, ससुराल जाते वक्त बुरखा पहन लेती हैं मार्केट जाते वक्त भी बस...  इसके अलावा शादियों और त्यौहारों पर बेगैरती नज़र आती है...

और ऐसा हो भी क्यों नहीं?

घर के मर्द हजरात ख़ामोश जो हैं ...


ख्याल रखें 

जबकि पर्दे की कोई “हद” नहीं है।

जहाँ गैर-महरम मौजूद है,

वहाँ पर्दे की ज़रूरत भी मौजूद है।


क्या पर्दा तालीम से रोकता है?

यह कहना कि “पर्दा करने वाली लड़कियाँ पढ़ी-लिखी नहीं होतीं” एक बहुत बड़ी गलतफ़हमी है। 

  • पर्दा सिर ढकता है, दिमाग़ नहीं। 
  • इल्म अक़्ल से आता है,और अक़्ल पर न नक़ाब का असर होता है न दुपट्टे का।

अगर पर्दा इल्म से रोकता, तो इस्लाम की पहली आयत “इक़रा” नहीं होती।


पर्दा: प्रतिबंध (restriction) नहीं, ताकत (strength)

पर्दा कमज़ोरी नहीं, बल्कि आज के दौर में सबसे बड़ी मज़बूती है, जहाँ हर तरफ़ दिखावे का दबाव है, वहाँ खुद को हया और हद में रखना हिम्मत का काम है।


इस्लाम में बेपर्दा औरतों की क्या सज़ा है?

बे-पर्दा औरतों के बारे में हमारे रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “दो क़िस्म के लोग जहन्नम वाले हैं… औरतें जो कपड़े पहनकर भी नंगी होंगी (यानी बे-पर्दा), न खुद सीधी रहेंगी और न दूसरों को सीधा रहने देंगी… वो न जन्नत में दाख़िल होंगी और न उसकी ख़ुशबू पाएँगी, हालाँकि उसकी ख़ुशबू बहुत दूर से आती है।”


ऐ बिनते हव्वा!

तुम हमेशगी की आग ख़रीद रही हो, जिसका अज़ाब कभी ख़त्म नहीं होगा, सिर्फ़ ऐसे लिबास की ख़ातिर जो न तुम्हें दीन में नफ़ा देता है न दुनिया में, बल्कि तुम्हें ज़िल्लत व रुस्वाई विरासत में देता है और तुम्हें जहन्नम की आग में गिरा देता है, फिर तुम्हें खौलता हुआ पानी, ग़िसाक़, पिघली हुई धात और पीप पिलाई जाएगी!

अगर कोई औरत  बेपर्दा रहती है तो जाहिर है उसने कुरआन का एक हुक्म पूरा करने में कोताही की है जिस को अल्लाह अपनी रहमत से माफ भी कर सकता है और पकड़ भी कर सकता है।

मगर इतना जरूर ख्याल रहे कि पर्दा जिस तरह औरत के लिए फर्ज है उसी तरह मर्द के लिए भी फर्ज है बस दोनों के पर्दा के हुदूद अलग-अलग हैं।

ऐ अल्लाह! हमें ईमान, पर्दा और इफ़्फ़त महबूब बना दे और इन्हें हमारे दिलों में मज़ीन फ़रमा।


By ऐमन रहमान


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

Subscribe

Follow Us

WhatsApp
Chat With Us
WhatsApp
WhatsApp Chat ×

Assalamu Alaikum 👋
How can we help you?

Start Chat