माहे रजब की बिदअतें और ग़लत रसमें
माहे रजब
रजब इस्लाम के चार पवित्र महीनों में से एक है। यह महीना इबादत, तौबा और नेकी की तरफ लौटने की याद दिलाता है। रजब कोई खास इबादत या तयशुदा नमाज़ का महीना नहीं है, लेकिन यह दिल को नर्मी देकर इंसान को अपनी हालात सुधारने का मौका देता है। सहाबा और सलफ इस महीने को नेकियों की शुरुआत समझते थे, ताकि शाबान और रमज़ान में इबादत और बेहतर हो सके।
बिदअतें और ग़लत रसमें
रजब इस्लाम का एक पवित्र महीना है, लेकिन समय के साथ इसमें कई तरह की मनघढ़ंत बातें और नयी रसमें जोड़ दी गई हैं। ऐसा ज़्यादातर उन लोगों की वजह से हुआ जिन्होंने दीन में अपनी तरफ से चीज़ें मिलाईं और लोगों को गलत रास्तों की तरफ ले गए।
अहले सुन्नत के उलमा हमेशा इस बात पर ज़ोर देते हैं कि दीन में किसी भी तरह की नई इबादत या रसम शामिल करना सही नहीं है। क्योंकि बिदअत का मतलब है कि इंसान कुरान और सुन्नत की असली शिक्षा से हटकर अपनी तरफ से रास्ता बना ले। यह तरीका नबी करीम ﷺ की हिदायत के खिलाफ है।
बिदअत के बारे में साफ चेतावनी दी गई है कि इसमें कोई सवाब नहीं मिलता, बल्कि इसका अंजाम बहुत सख़्त बताया गया है।
रजब के महीने में कई तरह की नई रसमें और गलत प्रथाएं की जाती हैं। आपसे गुज़ारिश है कि खुद भी इन बातों से दूर रहें और अपनी क्षमता के अनुसार समाज को भी इन ग़लतियों से बचाने की कोशिश करें।
नबी करीम ﷺ का फरमान है:
"فَإِنَّ كُلَّ مُحْدَثَةٍ بِدْعَةٌ، وَكُلَّ بِدْعَةٍ ضَلَالَةٌ"
दीन में हर नया काम बिदअत है। हर बिदअत गुमराही है, और हर गुमराही का ठिकाना जहन्नम है।
[सहीह मुस्लिम-किताबुल-जुमुआ, हदीस 867]
रजब की कुछ मशहूर और फैली हुई बिदअतें
1. बिदअत: रजब के महीने में बहुत ज्यादा उमरा करना।
हकीकत: हज़रत आयशा رضی اللہ عنھا फ़रमाती हैं: “रसूलुल्लाह ﷺ ने रजब के महीने में कभी उमरा नहीं किया।” [सहीह बुखारी 1776]
2. बिदअत: रजब के महीने में खास तौर पर रोजे रखना।
हकीकत: रजब के रोजों के बारे में जितनी भी खास फज़ीलत वाली रिवायतें मशहूर हैं, वे सब कमजोर, बनावटी या मनगढ़ंत हैं।
3. बिदअत: रजब की 27वीं रात को खास तौर पर इबादत करना, “शब-ए-मेराज की नमाज” पढ़ना, महफिलें सजाना या इस रात को निश्चित तौर पर इस्रा व मेराज की रात मानकर उसके किस्से बयान करना।
हकीकत: इस्रा और मेराज किस रात, किस महीने और यहां तक कि किस साल हुआ—इस बारे में इतिहासकारों के बीच काफी मतभेद है। [अर-रहीकुल-मख्तूम, पृष्ठ 197]
इसीलिए इस घटना को 27 रजब से जोड़कर एक निश्चित रात तय कर लेना सही नहीं है। और अगर यह मान भी लिया जाए कि यही रात है, तब भी इस रात में कोई खास इबादत, तयशुदा नमाज, या महफिलें जमाने की कोई दलील नहीं।
नबी करीम ﷺ, सहाबा, ताबेईन और इमामों में से किसी ने भी 27 रजब को इस तरह की खास इबादतें नहीं कीं और न ही उनकी तालीम दी।
4. बिदअत: रजब की पहली तारीख को “हज़ारी नमाज़” पढ़ना।
हकीकत: इस अमल के लिए शरीयत में कोई दलील मौजूद नहीं है।
5. बिदअत: रजब की पंद्रहवीं तारीख को “उम्मे दाऊद की नमाज़” पढ़ना।
हकीकत: इसके लिए भी शरीयत में कोई दलील नहीं मिलती।
6. बिदअत: रजब के शुक्रवार की पहली रात “बारह रकअत वाली नमाज़” पढ़ना।
हकीकत: इस अमल की भी शरीयत में कोई साबित दलील नहीं है।
7. बिदअत: सलातुर-रग़ाइब पढ़ना।
हकीकत: इस नमाज़ के बारे में जितनी भी रिवायतें मशहूर हैं, वे सब मनगढ़ंत और गैर-सहीह हैं।
8. बिदअत: “मुआजन रजब” यानी 22 रजब को कुछ लोग इसे “इमाम जाफर सादिक की नज़र” के तौर पर खीर पकाते हैं।
हकीकत: इस अमल की शरीयत में कोई दलील नहीं है।
9. बिदअत: 22 रजब को “कोंडे भरना।”
हकीकत: यह रिवाज करीब 1906 में रामपुर (भारत) में अमीर मीनाई लखनवी के परिवार में शुरू हुआ था। यह कोई दीनी या सुन्नती अमल नहीं है।
इतिहास में यह भी मिलता है कि 22 रजब वही दिन है जिस दिन हज़रत अमीर मुआविया رضی اللہ عنہ का इंतकाल हुआ। बाद में कुछ समूहों ने इसे अपने तौर पर अलग पहचान दे दी, जबकि सहाबा और ताबेईन के दौर में ऐसा कोई रिवाज मौजूद नहीं था।

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