Islam mein khudkushi ki haqeeqat

Islam mein khudkushi ki haqeeqat


इस्लाम में ख़ुदकुशी की हक़ीक़त

क्या इस्लाम में आत्महत्या (suicide) हराम है?

बिस्मिल्लाहीर्रहमाननिर्रहीम

لَا یُکَلِّفُ اللّٰہُ نَفۡسًا اِلَّا وُسۡعَہَا
"अल्लाह किसी जान पर उसकी ताक़त से बढ़कर ज़िम्मेदारी का बोझ नहीं डालता।" 
[अल क़ुरआन 2:286]

ये दुनियां फ़ानी है और जिसने भी जन्म लिया है उसे मरना है ,ये ज़िन्दगी बहुत क़ीमती है और अल्लाह ने हमें एक मक़सद के लिए पैदा किया है ज़रा सोचें इसको देने वाला वो ख़ालिक़ है जिसने सारी कायनात को बनाया है, जब हमने ख़ुद अपने आप को नहीं बनाया तो हमें यह हक़ कैसे हासिल हो सकता है कि हम इस ज़िंदगी को अपने हाथों ख़त्म कर दें  ख़ुदकुशी करना बहुत ही बड़ा गुनाह है और इसकी सज़ा जहन्नम है। इसको ख़त्म करने का हक़ सिर्फ़ अल्लाह को है ।

फ़रमान ए बारी तआला है:

ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلْمَوْتَ وَٱلْحَيَوٰةَ لِيَبْلُوَكُمْ أَيُّكُمْ أَحْسَنُ عَمَلًۭا ۚ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْغَفُورُ
"जिसने मौत और ज़िन्दगी को बनाया ताकि तुम लोगों को आज़मा कर देखे कि तुममें से कौन बेहतर अमल करनेवाला है, और वो ज़बरदस्त भी है और दरगुज़र करनेवाला भी।" 
[अल क़ुरआन 67:2]

और दूसरी आयात में फ़रमाया, 

وَلَا تَقْتُلُوٓا۟ أَنفُسَكُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًۭا
"और आत्म हत्या न करो। वास्तव में अल्लाह तुम्हारे लिए अति दयावान् है।" 
[अल क़ुरआन 4:29]

उलेमा कहते हैं कि इंसान की ज़िन्दगी में दुःख, परेशानी मुश्किलें, नफ़ा और नुक़सान अल्लाह की तरफ़ से आते हैं, ये अल्लाह की जानिब से आज़माइश होती है, कई बार अल्लाह अपने बन्दों को मुश्किल में डालकर उसके ईमान का इम्तेहान लेता है, वो उसे किसी बड़े काम और ज़िम्मेदारी के लिए तैयार करता है। उसे वक़्त और हालात से लड़ना सिखाता है, मज़बूत बनाता है ऐसे में अगर कोई मुश्किलों से डरकर, हिम्मत और उमीदों का दमन छोड़कर ख़ुदकुशी कर लेता है, तो ये बड़ा गुनाह है। ये ख़ुदा की दी हुई ज़िन्दगी को ठुकराने जैसा अमल है. ऐसे लोग हमेशा जहन्नम की आग में जलेंगे।

इंसान को ख़ुदकुशी जैसे हराम काम से दूर रहना चाहिए। लोगों को हर हाल में अल्लाह से उम्मीद रखना चाहिए । यही ईमान का तक़ाज़ा है। नबियों की ज़िंदगी हमारे लिए नमूना है, नबी करीम ﷺ पर कितनी ही तकलीफ़ें और परेशानियां आई मगर आप ﷺ ने सब्र से काम लिया, यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का वाकिया याद करें 

इस्लाम  ख़ुदकुशी की इजाज़त नहीं देता क्योंकि ये गुनाह ही नहीं बल्कि हराम अमल है। ख़ुदकुशी करने वाले की दुनिया तो ख़राब होती है इससे बढ़कर उसकी आख़िरत भी बर्बाद हो जाती है, कोई इंसान कितना भी परेशान हो, बीमार हो, मायूस हो लेकिन उसको ख़ुदकुशी करने की इजाज़त नहीं है।

क्योंकि अल्लाह तआला कुरआन में इरशाद फ़रमाते हैं:

وَأَنفِقُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَلَا تُلْقُوا۟ بِأَيْدِيكُمْ إِلَى ٱلتَّهْلُكَةِ ۛ وَأَحْسِنُوٓا۟ ۛ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُحْسِنِينَ
"अल्लाह की राह में ख़र्च करो और अपने हाथों अपने आपको हलाकत में न डालो।  एहसान का तरीक़ा अपनाओ कि अल्लाह एहसान करनेवालों को पसन्द करता है।" 
[अल क़ुरआन 2; 195]

बाज़ दफ़ा इंसान की ज़िंदगी में परेशानी  (बीमारी, माली तंगी, कारोबारी नुक़सान, औलाद की कमी और औलाद में कमी और भी कई ज़ेहनी बेचैनी पेश आ जाती हैं तो बंदा उसपर सब्र कर ले तो अल्लाह उसके सब्र करने की वजह से उसके गुनाहों को ख़त्म कर देता है और उसकी नेकियों को दोगुना कर देता है जैसा कि अल्लाह ने क़ुरआन में फ़रमाया:

اُولٰٓئِکَ یُؤۡتَوۡنَ اَجۡرَہُمۡ مَّرَّتَیۡنِ بِمَا صَبَرُوۡا وَ یَدۡرَءُوۡنَ
"ये वो लोग है जिन्हें इनके सब्र के बदले में दोहरा बदला दिया जाएगा।" 
[अल क़ुरआन 28:54]


इंसान ख़ुदकुशी (आत्महत्या) क्यों करता है?

1. इंसान की ज़िंदगी का बे मक़सद हो जाना या यूं कहें जीने की इच्छा ख़त्म हो जाना:

आज के ज़माने पर नज़र डालें तो ख़ुदकुशी की घटनाएं आम बात हो गई हैं वजह ये है कि इंसान इस आरज़ी दुनियां को ही सब कुछ समझ लेता है, और बुलंदियों को छू लेने की महत्वाकांक्षा में जब अड़चने आती हैं तो वो इसे बर्दाश्त नहीं कर पाता फिर उसे लगता है कि अब जीने का कोई मतलब नहीं रहा और वो ख़ुद को ख़त्म कर लेना चाहता है।

जबकि अल्लाह तआला फ़रमाता है;

وَمَا ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَآ إِلَّا لَعِبٌۭ وَلَهْوٌۭ ۖ وَلَلدَّارُ ٱلْـَٔاخِرَةُ خَيْرٌۭ لِّلَّذِينَ يَتَّقُونَ ۗ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
"और (यह) दुनियावी ज़िदगी तो खेल तमाशे के सिवा कुछ भी नहीं जबकि आख़िरत का घर परहेज़गारो (डरने वालो) के लिए , उसके बदले वहाँ (कई गुना) बेहतर है तो क्या तुम (इतना भी) नहीं समझते।"
[क़ुरआन 6:32]


2. अवसाद (Depression) : 

ऐसे मामलों में इंसान अपने आस पास सब कुछ बिखरा हुआ पाता है। एक समय आता है वो गुमनामी और ख़ालीपन में चला जाता है फिर अंतिम विकल्प उसे मौत में नज़र आता है। आत्महत्या के अधिकांश मामलों में, लोग मरना नहीं चाहते, वे बस अपना दर्द ख़त्म करना चाहते हैं। मगर ऐसे हालात में भी क़ुरआन इंसान को आशावान रहने और सब्र करने को कहता है।

مَن كَانَ يُؤْمِنُ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۚ وَمَن يَتَّقِ ٱللَّهَ يَجْعَل لَّهُۥ مَخْرَجًۭا 
"जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखता हो, जो कोई अल्लाह से डरते हुए काम करेगा अल्लाह उसके लिये मुश्किलात से निकलने का कोई रास्ता पैदा कर देगा।"
[अल क़ुरआन 65:2]

وَيَرْزُقْهُ مِنْ حَيْثُ لَا يَحْتَسِبُ ۚ وَمَن يَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ فَهُوَ حَسْبُهُۥٓ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ بَـٰلِغُ أَمْرِهِۦ ۚ قَدْ جَعَلَ ٱللَّهُ لِكُلِّ شَىْءٍۢ قَدْرًۭا
"और उसे ऐसे रास्ते से रिज़्क़ देगा जिधर उसका गुमान भी न जाता हो। जो अल्लाह पर भरोसा करे उसके लिये वो काफ़ी है। अल्लाह अपना काम पूरा करके रहता है। अल्लाह ने हर चीज़ के लिये एक तक़दीर मुक़र्रर कर रखी है।"
[अल क़ुरआन 65:3]


3. पछतावा (regret):

पछतावा ऐसी आग है जो इंसान को अंदर ही अंदर खोखला बना देता है कई बात इंसान अपने माज़ी में की गई ग़लतियों और कोताहियों पर शर्मिंदा होता है और ख़ुद को पश्चाताप की आग में जलाता रहता है और ये आग उसे ख़ुदकुशी के दहाने पर ले जाती है जबकि इस बारे में अल्लाह बंदे के लिए आसनी चहता है।

अल्लाह ने इंसान को तौबा करके माफ़ी मांगने का रास्ता दिया है।  

ईरशाद ए बारी ताला है,

إِلَّا مَن تَابَ وَءَامَنَ وَعَمِلَ عَمَلًۭا صَـٰلِحًۭا فَأُو۟لَـٰٓئِكَ يُبَدِّلُ ٱللَّهُ سَيِّـَٔاتِهِمْ حَسَنَـٰتٍۢ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا
"ये और बात है कि कोई (इन गुनाहों के बाद) तौबा कर चुका हो और ईमान लाकर अच्छे काम करने लगा हो। ऐसे लोगों को अल्लाह भलाइयों से बदल देगा। और वो बड़ा माफ़ करनेवाला और रहम करनेवाला है।"
[अल क़ुरआन 25:70]

वजह और भी बहुत सारी हैं जिसका ज़िक्र यहां संभव नहीं लेकिन एक मूल वजह को बयान करना ज़रूरी है। 

इंसान इस दुनिया में अकेला ज़रूर आता है लेकिन वह अकेला नहीं रहता बल्कि उसका तअल्लुक़ चार लोगों से होता है रिश्तेदार, दोस्त, पड़ोसी और हुकूमत, और इन सब की अपनी अपनी ज़िम्मेदारी है, हुकूमत की अपनी ज़िम्मेदारियां हैं कि वह अवाम का ख़्याल रखे इसी तरह रिश्तेदार, दोस्त और पड़ोसियों की भी ज़िम्मेदारी होती है कि एक दूसरे  के हालात से बेखबर न रहें बल्कि एक दूसरे के हालात से बाख़बर रहें और उनकी हर मुमकिन मदद करें और बहैसियत मुसलमान यह ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक मौक़ा पर फ़रमाया

"मोमिन मोमिन के लिए इमारत की तरह है जिसका एक हिस्सा दूसरे हिस्से को मज़बूत करता है।" [सहीह बुख़ारी 481]

एक जगह और फ़रमाया:

"एक मुसलमान दूसरे मुसलमान का भाई है  इसलिये उस पर ज़ुल्म न करे और न ज़ुल्म होने दे। जो शख़्स अपने भाई की ज़रूरत पूरी करे अल्लाह तआला उसकी ज़रूरत पूरी करेगा। जो शख़्स किसी मुसलमान की एक मुसीबत को दूर करे अल्लाह तआला उसकी क़ियामत की मुसीबतों में से एक बड़ी मुसीबत को दूर फ़रमाएगा।" [सहीह बुख़ारी 2442]

अगर कोई शख़्स ख़ुदकुशी करता तो ख़ुशी ख़ुशी नहीं करता, हालात से मायूस होकर करता है जहाँ सारी उम्मीदें दम तोड़ देती हैं तब ख़ुदकुशी की जानिब क़दम बढ़ाता है। ऐसे हालात में इन चारों की ज़िम्मेदारी है कि उसकी खोज ख़बर लें मायूसी का कारण जानें समाज से दूरी की वजह पता करें उसके चेहरे के उतार चढ़ाव को पढ़ें और आर्थिक मदद की ज़रूरत हो तो आर्थिक मदद करें, उसे सब्र व तसल्ली की ज़रूरत हो तो सब्र की तलक़ीन करें, तसल्ली दें और उसे बावर कराएं कि तुम इस दुनिया में अकेले और तन्हा नहीं हो बल्कि हमसब तुम्हारे साथ हैं और अमल से साबित करें कि वह उसके दुख दर्द की इस घड़ी में दिल व जान से शरीक है। अगर ऐसा हो कि पड़ोसी के हुक़ूक़ रसूलुल्लाह के आदेश के मुताबिक़ अदा किये जायें, दोस्त वाक़ई दोस्ती के मफ़हूम को समझकर हक़ अदा करे तो खुदकुशी की शरह में बहुत गिरावट आएगी लेकिन आज के इस माद्दी दौर में हर शख़्स अपनी ज़िम्मेदारियों से फ़रार अख़्तियार करना चाहता है इसलिए लोग ख़ुदकुशी  करके हराम मौत मर रहे हैं। याद रहे मिसाल के तौर पर अगर भूख से मजबूर होकर कोई ख़ुदकुशी करता है तो उसकी हराम मौत तो होगी ही लेकिन कल क़यामत के दिन पड़ोसी, दोस्त, रिश्तेदार और हुकूमत भी अल्लाह के हुज़ूर जवाबदेह होंगे और उन्हें भी अपनी अपनी सफ़ाई पेश करनी होगी।


आइए हम इस्लाम में ख़ुदकुशी की सज़ा क्या है, ये जान लें।


इस्लाम में ख़ुदकुशी (आत्महत्या/suicide) की सज़ा:

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की इतनी नसीहतों के बाद भी कोई शख़्स बुज़दिल हो जाय अपने रब पर भरोसा न रखे सब्र न करे, उसके फ़रमान की ख़िलाफ़वर्ज़ी करे, अपनी ज़िम्मेदारियों से मुंह मोड़ ले, ज़िंदगी का असल मक़सद भूल कर मौत को गले लगा ले तो फिर अल्लाह की सख़्त नाराज़गी से बच नहीं सकता उसकी सज़ा अल्लाह उसे देगा

फ़रमाया,

وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ عُدْوَٰنًۭا وَظُلْمًۭا فَسَوْفَ نُصْلِيهِ نَارًۭا ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرًا
"और जो शख़्स जोरो ज़ुल्म से नाहक़ ऐसा करेगा (ख़ुदकुशी करेगा) तो (याद रहे कि) हम बहुत जल्द उसको जहन्नम की आग में झोंक देंगे यह ख़ुदा के लिये आसान है।"
[अल क़ुरआन 4:30]

साथ ही हदीस में मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आत्महत्या करने वालो को सख़्त अंजाम से आगाह किया है। 

अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:

"एक शख्स को जख्म लगा, उस ने (जख्म की तकलीफ़ की वजह से) खुद को मार डाला।"

इस पर अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि:

“मेरे बंदे ने जान निकालने में मुझ पर जल्दी की, इसकी सज़ा में, मैं इस पर जन्नत हराम करता हूं।” [सहीह बुख़ारी:1364]

हज़रत अबू हुरैरह ؓ रज़ि बयान करते हैं कि नबी ﷺ ने फ़रमाया:

जिसने अपने आप को पहाड़ से गिरा कर ख़ुदकुशी कर ली, तो वो जहन्नम की आग में होगा और उसमें हमेशा पड़ा रहेगा, और जिसने ज़हर पी कर ख़ुदकुशी कर ली, तो वो ज़हर उसके साथ में होगा और जहन्नम की आग में वो उसे उसी तरह हमेशा पीता रहेगा, और जिसने लोहे के किसी हथियार से ख़ुदकुशी कर ली तो उसका हथियार उसके हाथ में होगा और जहन्नम की आग में हमेशा के लिए वो उसे अपने पेट में मारता रहेगा। [सहीह बुख़ारी 5778]

और एक रिवायत में नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया :

"जिसने इस्लाम के सिवा किसी और मज़हब की झूठ – मूठ (भी) क़सम खाई तो वो वैसा ही हो जाता है, जिस की उसने क़सम खाई है और जिसने किसी चीज़ से ख़ुदकुशी कर ली तो उसे जहन्नम में उसी (चीज़) से अज़ाब दिया जाएगा और मोमिन पर लानत भेजना उसे क़त्ल करने के बराबर है और जिसने किसी मोमिन पर कुफ़्र का इल्ज़ाम लगाया तो ये उसके क़त्ल के बराबर है।" [सहीह बुख़ारी 6105]

तमाम मुश्किलें अल्लाह की तरफ़ से होती है और मुश्किलो में अल्लाह की बहुत बड़ी भलाई होती है। अल्लाह तआला अपने हर बंदे को आज़माता है ताकि उसे बेहतर बना सके ठीक उसी तरह जैसे कुम्हार मिट्टी के मटकों को आग में इसलिए डालता है ताकि वो और मज़बूत हो जाये और आसानी से न टूट जाए।

इसलिए क़ुरआन में अल्लाह ने एक नहीं दो बार फ़रमाया:

 فَاِنَّ مَعَ الۡعُسۡرِ یُسۡرًا ۙ- اِنَّ مَعَ الۡعُسۡرِ یُسۡرً
"हक़ीक़त ये है कि मुश्किल के साथ आसानी है। यक़ीनन मुश्किल के साथ आसानी है।"
[अल क़ुरआन 94:5-6]

इंसान को कभी भी अपने आप को अकेला महसूस नहीं करना चाहिए और न ही किसी से डरना चाहिए क्योंकि हमारा रब हम से बहुत मुहब्बत करता है और वो हमेशा हमारे साथ रहता है।

क़ुरआन में अल्लाह का इरशाद है कि:

قَالَ لَا تَخَافَاۤ اِنَّنِیۡ مَعَکُمَاۤ اَسۡمَعُ وَ اَرٰی 
कहा, “डरो मत, मैं तुम्हारे साथ हूँ, सब कुछ सुन रहा हूँ और देख रहा हूँ।”
[अल क़ुरआन 20:46]

ऊपर बयान की गई कुरान की आयतों और अहादीस की रोशनी में हमने देखा कि इस्लाम आत्महत्या करने से मना फ़रमाता है, उसके बाद ख़ुद को और दूसरों को तकलीफ़ में डाल कर किया गया ऐसा अमल करने वालो को कठोर सज़ा के लिए आगाह किया गया है।

अल्लाह तआला हमें सब्र करने वालो में से बनाये और मुश्किलों में साबित क़दम रहने की तौफ़ीक़ आता फ़रमाये।

आमीन।


आपकी दीनी बहन 
फ़िरोज़ा 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

क्या आपको कोई संदेह/doubt/शक है? हमारे साथ व्हाट्सएप पर चैट करें।
अस्सलामु अलैकुम, हम आपकी किस तरह से मदद कर सकते हैं? ...
चैट शुरू करने के लिए यहाँ क्लिक करें।...