अंबिया के वाक़िआत बच्चों के लिए (पार्ट-13n)
अंतिम नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
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8. ग़ज़वा ए बनी क़ुरैज़ा
1. बनी क़ुरैज़ा का वचन उलंघन (वादा ख़िलाफ़ी)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब मदीना आए थे तो मुहाजिरीन और अंसार के दरमियान एक मुआहिदा लिखा गया था और उसमें यहूदियों को भी दावत दी थी, उनसे भी मुआहिदा किया था और उन्हें उनके दीन और उनकी मिल्कियत पर क़ायम रखा था उनकी शर्त भी मानी थी और अपनी शर्त भी रखी थी कि अगर इस मुआहिदा में शरीक लोगों पर कोई भी हमला करेगा तो तमाम लोगों पर उनकी मदद करना ज़रूरी होगा और ऐसा उनके दरमियान ख़ैर ख़्वाही और नेकी के सिलसिले में ही होगा, गुनाह के सिलसिले में नहीं होगा और अगर कोई यसरिब (मदीना) पर हमला करेगा तो तमाम लोगों को एक दूसरे की मदद करना अनिवार्य होगा।
लेकिन बनी नज़ीर के सरदार हुई बिन अख़तब के चढ़ाने और क़ुरैश की कोशिशों से बनी क़ुरैज़ा मुआहिदा तोड़ने को तैयार हो गए। बनी क़ुरैज़ा के सरदार काब बिन असद अल क़ुरज़ी ने पहले तो गवाही दी कि मैंने तो मुहम्मद में सच्चाई और वफ़ादारी के इलावा कुछ नहीं देखा लेकिन इसके बावजूद भी काब बिन असद ने मुआहिदा को तोड़ ही दिया और जो शर्ते उसके और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दरमियान तय हुई थीं उससे अलग हो गया। जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को उसके मुआहिदा तोड़ने की सूचना मिली तो उन्होंने क़बीला औस के सरदार सअद दिन मुआज़ और क़बीला ख़ज़रज के सरदार सअद बिन उबादह रज़ि अल्लाहु अन्हुमा को अंसार के कुछ लोगों के साथ भेजा ताकि वह ख़बर की सच्चाई के बारे में पता लगाएं, जब वह लोग गए तो उन्होंने उससे भी बुरी हालत में पाया जो सूचना उनके पास पहुंची थी। जब इस सिलसिले में उनसे पूछा गया तो कहने लगे कौन रसूलुल्लाह? कैसा रसूल? हमारे दरमियान और मुहम्मद के दरमियान न कोई मुआहिदा है और न कोई शर्त।
उसके बाद उन्होंने मुसलमानों पर हमले शुरू कर दिए फिर उन्होंने मुसलमानों पर उनके पीछे से हमला करने का प्रोग्राम बनाया और जंग के मैदान में पीछे से हमला इन्तेहाई सख़्त और तबाह करने वाला होता है। अल्लाह तआला ने क़ुरआन में फ़रमाया है:
اِذۡ جَآءُوۡکُمۡ مِّنۡ فَوۡقِکُمۡ وَ مِنۡ اَسۡفَلَ مِنۡکُمۡ مِنۡکُمۡ"
"जब वह ऊपर से और नीचे से तुमपर चढ़ आए।" (सूरह 33 अल अहज़ाब आयत 10)
मुसलमानों के लिए यह समय बड़ा दुखद रहा।
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2, बनी क़ुरैज़ा पर हमला
जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और मुसलमान ख़न्दक़ से मदीना लौटे तो उन्होंने अपने अपने हथियार खोल दिए उसी समय जिब्रील अलैहिस्सलाम आए और कहा या रसूलुल्लाह आपने अपने हथियार उतार दिए हैं रसूलुल्लाह ने फ़रमाया, हां, जिब्रील अलैहिस्सलाम ने कहा लेकिन फ़रिश्तों ने अपने हथियार अभी नहीं उतारे हैं बेशक अल्लाह तआला आपको बनी क़ुरैज़ा पर हमला करने का आदेश देता है, मैं उन्हीं की तरफ़ आगे आगे जा रहा हूं उनके क़िलों में ज़लज़ला पैदा करूंगा। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ऐलान करने वाले को हुक्म दिया कि लोगों में ऐलान कर दो कि जो सुनने और मानने (इताअत करने वाला) है वह अस्र की नमाज़ बनी क़ुरैज़ा में पढ़े।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बनी क़ुरैज़ा के पास पहुंचे और उनका घेराव कर लिया, घेराव पचीस दिन तक बराबर जारी रहा यहांतक कि अल्लाह ने यहूदियों के दिलों में दहशत डाल दी।
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3, सअद पर वह समय आ गया है कि अल्लाह के रास्ते में किसी मलामत करने वाले की परवाह न करे
बनी क़ुरैज़ा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हुक्म पर क़िले से नीचे उतर आए चूंकि वह क़बीला खज़रज के बजाय क़बीला औस के हलीफ़ थे इसलिए उन्होंने बनी क़ुरैज़ा के हक़ में सिफ़ारिश की। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया ऐ औस के लोगो! क्या तुम्हें यह पसंद नहीं कि तुम्हारे दरमियान का कोई एक आदमी फ़ैसला करे। उन्होंने कहा क्यों नहीं या रसूलुल्लाह, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा फिर यह मामला सअद बिन मुआज़ के हवाले है। आपने उन्हें बुला भेजा जब सअद बिन मुआज़ आए तो उनके क़बीले वालों ने कहा, ऐ अबु अम्र अपने हेलीफ़ों (सहयोगियों) के सिलसिले में बेहतर फ़ैसला कीजिए क्योंकि बेहतर फ़ैसले के लिए ही आप को इसका इख़्तियार दिया गया है, जब उनकी ज़िद्द बढ़ गई तो सअद बिन मुआज़ ने कहा "सअद पर वह समय आ गया है जब वह अल्लाह तआला के रास्ते में किसी मलामत करने वाले की परवाह न करे" सअद बिन मुआज़ ने कहा "बेशक मैं फ़ैसला सुनाता हूं कि उनके तमाम लड़ाकू मर्दों को क़त्ल कर दिया जाए, उनके माल व दौलत को मुसलमानों में तक़सीम किया जाए और उनके बच्चों और औरतों को क़ैदी बना लिया जाए। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया सअद तुमने उनके बारे में जो निर्णय लिया है वह अल्लाह के हुक्म के बिल्कुल मुताबिक़ है। (सही मुस्लिम 4592)
ख़ज़रज ने सलाम बिन अबिल हक़ीक़ का क़त्ल किया जो अनेक पार्टियों को अहज़ाब की जंग में चढ़ाकर लाया था और इससे पहले काब बिन अशरफ़ का क़त्ल औस कर चुके थे जो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की दुश्मनी में आगे आगे रहता था और लोगों को उनके ख़िलाफ़ उकसाता था। इस प्रकार मुसलमानों को उन सरदारों से निजात मिल गई जो इस्लाम और मुसलमानों के विरुद्ध साज़िशें और आंदोलन किया करते थे अब मुसलमानों ने सुकून की सांस ली।
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4, ज़ालिम को माफ़ी और महरूम को बख्शिश
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कुछ घुड़सवारों की एक फ़ौज नज्द की जानिब भेजा वह बनी हनीफ़ा के सरदार सुमामा बिन उसाल अल हनफ़ी को अपने साथ क़ैद करके ले आए और मस्जिद के एक स्तंभ से बांध दिया, थोड़ी देर बाद वहां से रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का गुज़र हुआ तो पूछा तुम्हारा अपने बारे में क्या विचार है सुमामा। सुमामा ने जवाब दिया अगर आप मुझे क़त्ल करेंगे तो एक ऐसे व्यक्ति को क़त्ल करेंगे जो ख़ूनी है और अगर आप एहसान करेंगे तो ऐसे व्यक्ति पर एहसान करेंगे जो एहसान मानने वाला है, और अगर आपको दौलत चाहिए तो जितना चाहे मुझसे मांग सकते हैं, यह सुनकर रसूलुल्लाह ने उन्हें वैसे ही बंधा हुआ छोड़ दिया, फिर दूसरी बार गुज़र हुआ तो आपने वही सवाल किया और सुमामा ने वही जवाब दिया जो पहले दिया था। फिर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तीसरी बार आए तो आदेश दिया कि सुमामा को छोड़ दिया जाय, आदेश सुनते ही लोगों ने उन्हें उसी समय छोड़ दिया।
सुमामा मस्जिद के क़रीब खुजूर के एक बाग़ में गए वहां ग़ुस्ल किया फिर लौटे और इस्लाम क़ुबूल कर लिया। उसके बाद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहा या रसूलुल्लाह! अल्लाह की क़सम कल तक मेरे नज़दीक ज़मीन पर आपके चेहरे से ज़्यादा बुरा चेहरा कोई न था लेकिन आज आपका चेहरा मुझे सबसे ज़्यादा महबूब हैं ऐसे ही मेरे नज़दीक आपके दीन से ज़्यादा बुरा कोई दीन नहीं था लेकिन आज आपका दीन ही मुझे सबसे प्यारा और पसंद है। जब आपके सवारों ने मुझे पकड़ा तो मैं मक्का उमरह करने जा रहा था रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें ख़ुशख़बरी सुनाई और उमरह अदा करने के आदेश दिया। जब सुमामा रज़ि अल्लाहु अन्हु क़ुरैश के क्षेत्र में पहुंचे तो लोगों ने पूछा सुमामा क्या तुम बेदीन (अधर्मी) हो गए हो?, सुमामा ने जवाब दिया नहीं! बल्कि मैंने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बात मान ली है और अब अल्लाह की क़सम तुम्हारे यहां मक्का में यमामा से गेहूं का एक दाना भी नहीं आएगा जबतक कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की अनुमति न मिले। मक्का में यमामा से ही ग़ल्ला आता था।
फिर वह अपने क्षेत्र में गए और मक्का को जाने वाला ग़ल्ला रोक दिया। क़ुरैश ने ग़ल्ला मंगाने की बहुत कोशिश की और अंत में उन्होंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को पत्र लिखकर विनती की, इस पत्र में उन्होंने अपने रिश्तेदारी का भी हवाला दिया कि वह पत्र लिख दें कि सुमामा मक्का वालों को ग़ल्ला भेज दें, चुनांचे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें पत्र लिखकर आदेश दिया तब यमन से ग़ल्ला आया।
(सही बुख़ारी 4372)
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किताब: कसास उन नबीयीन
मुसन्निफ़: सैयद अबुल हसन नदवी रहमतुल्लाहि अलैहि
अनुवाद: आसिम अकरम अबु अदीम फ़लाही
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