अल्लाह से धोका और बगावत (मुसलमान ज़िम्मेदार)
5. सुन्नत ए नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से हटकर इमामो की अंधाधुन तकलीद
5.4. क्या बच्चे की शर्मगाह धोने या छूने से वज़ू टूट जाता है?
ये मसला अहले इल्म के दरमियान इख़्तिलाफ़ी है। अगर बच्चे की शर्मगाह को हाथ लग जाए तो क्या वज़ू टूट जाता है या वज़ू नहीं टूटता?
कुछ अहले इल्म कहते हैं टूट जाएगा और कुछ कहते हैं नहीं टूटेगा।
इस मसले में सही नज़रिया यह है कि बच्चे की शर्मगाह को हाथ लग जाने से वज़ू टूट जाता है क्योंकि ये मसला मंसूस (हदीस से साबित)है।
नोट : मंसूस उसको कहते हैं जो क़ुरआन की नस से साबित हो यानी साफ़ साबित हो, उसको नस कहते हैं। जैसे अल्लाह अकेला है ये क़ुरआन से साबित है तो हम कहेंगे कि क़ुरआन की नस से अल्लाह का अकेला होना साबित है, इसी को मंसूस कहते हैं। कोई मसला अगर हदीस की नस से साबित होता है उसको भी मंसूस कहते हैं।
तो बच्चे की शर्मगाह धोए या छुए वज़ू टूट जाता है क्योंकि हदीस में बच्चे या बड़े का ज़िक्र नहीं। हदीस की नस से साबित है कि शर्मगाह को हाथ लगाने से वज़ू टूट जाता है।
हजरत अबू हुरैरा رضی اللہ عنہ से रिवायत है नबी ﷺ ने फरमाया, "तुम में से किसी का हाथ उसकी शर्मगाह को लगे और (हाथ और शर्मगाह के) दरमियान कोई पर्दा व हिजाब न हो तो वज़ू लाज़िम होगा।" [सहीह अल जामे 362]
ये रिवायत सहीह होने के साथ अपने माने में साफ़ है और जनरल है और दलील भी वाजिब होने का तकाज़ा रखती है लिहाज़ा शरीयत ने ये मसला फिक्स कर दिया है कि प्राइवेट पार्ट को हाथ लगाने से वज़ू टूट जाएगा। ये नहीं कहा जाएगा कि बच्चा या बड़ा, बल्कि हदीस में ऐसी कोई राय या रद्द ए अमल नहीं बच्चे और बड़े दोनो के लिए हुक्म है।
और नाकिस ए वज़ू (वज़ू का टूटना) का ताल्लुक इबादत से है जो हदीस की नस से साबित हो रहा है।
जैसे ऊंट का गोश्त खाने से वज़ू टूट जाता है इस पर नस है लेकिन इस पर कयास (पर्सनली) ऊंट के अलावा दीगर हलाल जानवर के गोश्त को नाकिस ए वज़ू नहीं कहेंगे। यहां तक कि ऊंट के ही मामले में ऊंटनी का दूध पीने या ऊंट के गोश्त का मर्क पीने से वज़ू नहीं टूटेगा क्योंकि इस बारे में कोई नस (दलील) नहीं है।
अब आते हैं उन विचारों की तरफ़ जो दीगर आलिमों ने दिए हैं-
पहली बात: कुछ आलिम से कहते हैं कि माँ अपने बच्चो की आम तौर पर नजासत साफ करती हैं जिसकी वजह से न चाहते हुए भी उसका हाथ प्राइवेट पार्ट पर टच होगा अगर इससे वज़ू टूटेगा तो मां को दिक्कत होगी।
जवाब: ये वज़ाहत क़ुबूल नहीं क्यूंकि ये हदीस के ख़िलाफ है जिसमे ये कहा गया बगैर पर्दा के प्राइवेट पार्ट को हाथ लगाने से वज़ू टूट जायेगा ऐसी सूरत में हैं आलिम का क़ौल छोड़ देंगे लेकिन जो मसला हदीस से साबित है उसको नहीं छोड़ेंगे।
दूसरी बात: नबी ﷺ ने बच्चे के ताल्लुक से जो आसानी शरीयत की नज़र में थी उसे बयान कर दिया यहां तक कि आपने आसानी पर अमल करके भी दिखाया है।
लुबाबा बिनते हारिस رضی اللہ عن कहती हैं,
हुसैन बिन अली رضی اللہ عنہ ने नबी ﷺ की गोद में पेशाब कर दिया तो मैने कहा, "अल्लाह के रसूल आप मुझे अपना कपड़ा दे दीजिए और दूसरा कपड़ा पहन लीजिए (ताकि में उसे धो दूँ)
नबी ﷺ ने फरमाया, "बच्चे (male ) के पेशाब पर पानी छिड़का जाता है और बच्ची (फीमेल) का पेशाब को धोया जाता है।" [सहीह इब्ने माजह 427]
इस हदीस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह मकाम जिसके छूने से (बगैर पर्दा) वज़ू टूट जाता है इससे लड़के के पेशाब निकलने पर नबी ﷺ ने कपड़े को नहीं धुला। इस अमल ए नबी में उम्मत की माँओ के लिए आसानी है अगर इसके अलावा शरीयत में आसानी और कोई होती तो नबी ﷺ हमे बताते।
तीसरी बात: किसी औरत या मर्द को पूरे दिन वज़ू में रहने का हुक्म नहीं दिया गया। वज़ू सिर्फ़ नमाज़ के लिए उसकी अदायगी की वक़्त ज़रूरी है। इसमें कोई दिक्कत नहीं है कि जिस औरत ने बच्चे की नजासत साफ़ की हो वो नमाज़ के वक़्त वज़ू करे। बाल बच्चे वाली औरत के हकू में जैसे नमाज़ पढ़ना मशक्कत नहीं होगी तो उसी तरह नमाज़ के वक्त़ वज़ू करना मशक्कत नहीं होना चाहिए।
बहुत सी औरतों को इस्तेहाज़ा की शिकायत होती है उसे हर नमाज़ के वक्त़ खून जदा मकाम और कपड़े को भी धोना है फिर वज़ू करना मशक्कत तो इस जगह भी है मगर फिर भी मुस्तहाज़ा को हर नमाज़ के वक्त़ सफ़ाई और नया वज़ू करना पड़ता है।
हज़रत आयशा رضی اللہ عنہا फ़रमाती हैं, अबू-हबीश की बेटी फ़ातिमा रसूलुल्लाह (ﷺ) की ख़िदमत में हाज़िर हुई और उसने कहा कि मैं एक ऐसी औरत हूँ जिसे इस्तिहाज़ा की बीमारी है इसलिये मैं पाक नहीं रहती तू क्या मैं नमाज़ छोड़ दूँ?
आप (ﷺ) ने फ़रमाया, नहीं ये एक नस (का ख़ून ) है हैज़ नहीं है तो जब तुझे हैज़ आए तो नमाज़ छोड़ दे और जब ये दिन गुज़र जाएँ तो अपने (बदन और कपड़े) से ख़ून को धो डाल फिर नमाज़ पढ़।
हिशाम कहते हैं कि मेरे बाप उरवा ने कहा कि नबी करीम (ﷺ) ने ये (भी) फ़रमाया कि फिर हर नमाज़ के लिये वज़ू कर यहाँ तक कि वही (हैज़ का) वक़्त फिर आ जाए।" [सहीह बुख़ारी 298]
अगर कोई ऐसी लड़की हो जिसके लिए पानी का इंतज़ाम न हो वो तय्यम्मुम कर सकती है।
बने रहें, आगे हम बताएंगे क्या हाइज़ा औरत क़ुरआन पढ़ सकती है?
आपका दीनी भाई
मुहम्मद रज़ा
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