Taraweeh ka masnoon tarika | Taraweeh ki dua

Taraweeh ka masnoon tarika | Taraweeh ki dua

तरावीह का मसनून (सुन्नत) तरीक़ा

Table of Contents
1. तरावीह कितनी रकात है?
2. क्या तरावीह और तहज्जुद एक ही है?
3. क्या हर चार रकात के बाद तरावीह की दुआ पढ़ना चाहिए?
4. औरत घर में कैसे तरावीह पढ़े?
5. तरावीह की नियत

दीन ए इस्लाम के अंदर हम किसी भी तरह की इबादत करते हैं सबसे पहले हमको यह देखना है कि वह इबादत अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से साबित है या नहीं अगर साबित है तो वह इबादत है अगर साबित नहीं तो वह बिदअत है क्यूंकि नबी अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया,

"दीन में हर नया काम बिदअत है।" [मुस्लिम 2005]

यानी इबादत में तरीक़ा सिर्फ क़ुरान और हदीस का ही होगा उसके अलावा सब बिदअत है। तरावीह एक इबादत है इसके ताल्लुक़ से हदीस क्या कहती है चलिए देखते हैं-


1. तरावीह कितनी रकात है?

तरावीह की सुन्नत रकात सिर्फ 11 रकात हैं। 

आइये हदीस देखें-

हज़रत आयेशा से सुवाल हुआ रसूलुल्लाह (सल्ल०) (तरावीह या तहज्जुद की नमाज़) रमज़ान में कितनी रकअतें पढ़ते थे? तो उन्होंने बतलाया कि रमज़ान हो या कोई और महीना, आप ग्यारह रकअतों से ज़्यादा नहीं पढ़ते थे। आप (सल्ल०) पहली चार रकअत पढ़ते, तुम उनके हसन और ख़ूबी और लम्बाई का हाल न पूछो, फिर चार रकअत पढ़ते उनके भी हसन और ख़ूबी और लम्बाई का हाल न पूछो, आख़िर मैं तीन रकअत (वित्र) पढ़ते थे। मैंने एक बार पूछा, या रसूलुल्लाह! क्या आप वित्र पढ़ने से पहले सो जाते हैं? तो आप (सल्ल०) ने फ़रमाया, आयशा! मेरी आँखें सोती हैं लेकिन मेरा दिल नहीं सोता। [सहीह बुख़ारी 2013]

तो इस हदीस से हमें पता चलता है कि रमजान हो या गैर ए रमज़ान नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम 11 रकात से ज्यादा तरावीह नहीं पढ़ते थे। 


2. क्या तरावीह और तहज्जुद एक ही है?

जी हाँ, तरावीह और तहज्जुद एक ही है बस इसका नाम बदला हुआ है जैसे की जब कोई इंसान सफर में होता है तो वो ज़ुहर को दो रकात पढ़ेगा जिसको क़सर कहा जाता है लेकिन होती वो ज़ुहर ही है बस उसका नाम बदल दिया जाता है खास वक़्त में। ठीक उसी तरह तरावीह भी है आम दिनों में इसको क़ियाम उल लेल, तहज्जुद, क़ियाम ए रमज़ान कहा जाता है और रमजान में तरावीह कह देतें हैं। 

तरावीह और तहज्जुद के एक होने पर तीन हदीस आपके सामने पेश करते हैं-


1. पहली हदीस:

हज़रत अबू-ज़र (रज़ि०) से रिवायत है कि हमने रमज़ान मुबारक में रसूलुल्लाह ﷺ के साथ रोज़े रखे। आपने हमें रात की नमाज़ नहीं पढ़ाई यहाँ तक कि इस महीने के सात दिन बाक़ी रह गए। आपने हमें रात की नमाज़ (तरावीह) पढ़ाई यहाँ तक कि रात का तिहाई हिस्सा गुज़र गया फिर अगले दिन हमें नमाज़ नहीं पढ़ाई फिर पच्चीसवीं रात हमें नमाज़ पढ़ाई यहाँ तक कि आधा रात गुज़र गई। मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! क्या ही ख़ूब होता अगर आप बाक़ी रात भी नमाज़ पढ़ाते। आपने फ़रमाया: जिस शख़्स ने इमाम के साथ इस के फ़ारिग़ होने तक नमाज़ पढ़ी उसके लिये पूरी रात के क़ियाम का सवाब लिखा जाता है (चाहे इस के बाद वो सो ही जाए)। फिर आपने अगली रात नमाज़ नहीं पढ़ाई यहाँ तक कि इस महीने के तीन दिन बाक़ी रह गए तो आपने हमें सत्ताइसवीं रात नमाज़ पढ़ाई और अपने घर वालों और बीवियों को भी जमा फ़रमाया (और इतनी लम्बी नमाज़ पढ़ाई) यहाँ तक कि हमें ख़तरा हुआ कि हम से कामयाबी रह जाएगी। (जुबैर कहते हैं) मैंने (हज़रत अबू-ज़र से) पूछा : (कामयाबी) से क्या मुराद है? उन्होंने फ़रमाया: सेहरी। [सुनन नसई 1606]

इस हदीस से पता चला की तहज्जुद और तरावीह एक ही नमाज़ है क्यूंकि सहाबा का यह कहना कि हमें ख़तरा हुआ कि हम से कामयाबी रह जाएगी। (जुबैर कहते हैं) मैंने (हज़रत अबू-ज़र से) पूछा : (कामयाबी) से क्या मुराद है? उन्होंने फ़रमाया: सेहरी।

अब सोचे अगर तहज्जुद और तरावीह अलग होती तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सेहरी तक नमाज़ क्यूं पढ़ाते क्यूंकि नबी अलैहिस्सलाम और सहाबा तो सेहरी तक तरावीह पढ़ रहें है तो तहज्जुद पढ़ने का सुवाल पैदा नहीं होता

इस हदीस से जमात से तरावीह पढ़ना भी साबित हुआ। 


2. दूसरी हदीस

मैं उमर-बिन-ख़त्ताब (रज़ि०) के साथ रमज़ान की एक रात को मस्जिद में गया। सब लोग अलग-अलग और मुन्तशिर थे कोई अकेला नमाज़ पढ़ रहा था। और कुछ किसी के पीछे खड़े हुए थे। इस पर उमर (रज़ि०) ने फ़रमाया, मेरा ख़याल है कि अगर मैं तमाम लोगों को एक पढ़नेवाला के पीछे जमा कर दूँ तो ज़्यादा अच्छा होगा चुनांचे आप ने यही ठान कर उबई-बिन-कअब (रज़ि०) को उन का इमाम बना दिया। फिर एक रात जो मैं उनके साथ निकला तो देखा कि लोग अपने इमाम के पीछे नमाज़ (तरावीह) पढ़ रहे हैं। उमर (रज़ि०) ने फ़रमाया, ये नया तरीक़ा बेहतर और मुनासिब है और (रात का) वो हिस्सा जिसमें ये लोग सो जाते हैं इस हिस्से से बेहतर है जिसमें ये नमाज़ पढ़ते हैं। आपकी मुराद रात के आख़िरी हिस्से (की फ़ज़ीलत) से थी क्योंकि लोग ये नमाज़ रात के शुरू ही में पढ़ लेते थे। [सहीह बुख़ारी 2010]

इस हदीस में हज़रत उमर के अल्फाज़ और (रात का) वो हिस्सा जिसमें ये लोग सो जाते हैं इस हिस्से से बेहतर है जिसमें ये नमाज़ पढ़ते हैं। आपकी मुराद रात के आख़िरी हिस्से (की फ़ज़ीलत) से थी क्योंकि लोग ये नमाज़ रात के शुरू ही में पढ़ लेते थे। 

ये अल्फाज़ इस चीज़ को वाज़ेह कर रहें हैं तरावीह और तहज्जुद एक नमाज़ है क्यूंकि हज़रत उमर ने तमाम लोगो को तरावीह पर ही जमा किया था और सी नमाज़ को कह रहें है की में इसको रात के हिससे में पढ़ना बेहतर समझता हु अब रात में तो तहज़जूद ही होती है


3. तीसरी हदीस:

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, "एक रात में दो वित्र नहीं है।" [अबू दाऊद 1439]

इस हदीस से पता चला कि तहज्जुद और तरावीह एक है क्यूंकि एक रात में एक ही बार वित्र है अब तरावीह में भी लोग वित्र पढ़ते हैं और तहज़जूद में भी पढ़ते हैं तो दो बार वित्र पढ़ने के ताल्लुक़ से नबी सल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मना किया। 


3. क्या हर चार रकात के बाद तरावीह की दुआ पढ़ना चाहिए?

हर चार रकात के बाद बाज़ लोग ये दुआ पढ़ते हैं,

سُبْحَانَ ذِي الْمُلْكِ وَالْمَلَكُوتِ، سُبْحَانَ ذِي الْعِزَّةِ وَالْعَظَمَةِ وَالْقُدْرَةِ وَالْكِبْرِيَاءِ وَالْجَبَرُوتِ، سُبْحَانَ الْمَلِكِ الْحَيِّ الَّذِي لَا يَمُوتُ، سُبُّوحٌ قُدُّوسٌ رَبُّ الْمَلَائِكَةِ وَالرُّوحِ، لَا إلَهَ إلَّا اللَّهُ نَسْتَغْفِرُ اللَّهَ، نَسْأَلُك الْجَنَّةَ وَنَعُوذُ بِك مِنْ النَّارِ

लेकिन ये किसी भी सहीह हदीस से साबित नहीं है ना सहाबा से साबित है लिहाज़ा जो काम नबी और सहाबा से साबित ना हो उस काम को छोड़ना बेहतर है क्योंकि इबादत का ताल्लुक दलील से होता है बगैर दलील की कोई इबादत कबूल नहीं। 


4. औरत घर में कैसे तरावीह पढ़े?

(01) फर्ज़ और या नफ़िल औरत का घर में नमाज़ पढ़ना मस्जिद से अफ़ज़ल है और इसमें तरावीह भी शामिल है। 

(02) औरत को क़ुरआन याद है तो वह तरावीह में क़ुरआन पढ़ सकती है हर दो रकात के बाद सलाम फेरे और 11 रकात पूरी करें वित्र भी इसमें शामिल है। 

(03) अगर क़ुरआन याद नहीं तो जो सूरह याद हैं उन्ही के ज़रिये 11 रकात नमाज़ पढ़ लें। 


5. तरावीह की नियत

नियत दिल की केफियत का नाम है ज़ुबान से कहने की ज़रुरत नहीं है बस दिल में ये ख्याल रखें कि में फलां वक़्त कि नमाज़ अदा कर रही हु। 


आपका दीनी भाई 
मुहम्मद रज़ा 

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