Khulasa e Qur'an - surah 71 | surah nuh

Khulasa e Qur'an - surah | quran tafsir

खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (071) नूह 


بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ


सूरह (071) नूह 


(i) नूह अलैहिस्सलाम की दावत

ए मेरी क़ौम! मैं तुम्हें डराने वाला हूं, अल्लाह की इबादत करो, उसी का तक़वा इख़्तियार करो, मेरी बात मानो अल्लाह तुम्हारी ग़लतियों को माफ़ कर देगा। (2 से 4) 

  

(ii) नूह अलैहिस्सलाम का अपनी क़ौम पर अफ़सोस

मैंने अपनी क़ौम को रात और दिन मुसलसल दावत दी। जब जब मैंने उनको दावत दी उन्होंने अपने कानों में उंगलियां ठूंस लीं, ज़िद पर अड़े रहे और घमंड किया, मैंने उन्हें दिन के उजाले में भी दावत दी और रात के अंधेरे में भी। और कहा अल्लाह से माफ़ी चाहो बेशक अल्लाह माफ़ करने वाला है। अगर ऐसा करोगे तो आसमान से बारिश नाज़िल होगी और तुम्हारे माल और औलाद में बढ़ोतरी होगी, वह तुम्हारे लिए बाग़ात और नहरें बनाएगा। (5 से 12)


(iii) इंसान की तख़लीक़ के मराहिल

धूल, नर्म मिट्टी, गीली, लेसदार, चिकनी, ख़मीरी, बदबु वाली, सुखी, गर्मी से पकी हुई, नुत्फ़ा, अलका, मुज़ग़ा एज़ाम (हड्डी) गोश्त, बचपन, जवानी, अधेड़पन, बुढापा, (14)


(iv) नूह अलैहिस्सलाम की अपनी क़ौम के हक़ में बददुआ

ऐ मेरे पालनहार, मेरी क़ौम ने मेरा कहा न माना, बड़े षड़यन्त्र किए। उन्होंने अपने माबूदों को न छोड़ा और न वद्द, सुवाअ, यग़ूस, यऊक़ और नसर को छोड़ा। उन्होंने बहुत लोगों को भटका दिया और ख़ुद भी भटकते चले गए। ऐ मेरे रब तू इन नाफ़रमान लोगों में से किसी को भी धरती पर जीवित न छोड़। (21से 24, 26)


आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

Subscribe

Follow Us

WhatsApp
Chat With Us
WhatsApp
WhatsApp Chat ×

Assalamu Alaikum 👋
How can we help you?

Start Chat