Khulasa e Qur'an - surah 7 | surah al araaf

Khulasa e Qur'an - surah | quran tafsir

खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (007) अल आराफ़


بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ


सूरह (007) अल आराफ़


(i) अल्लाह तआला की नेअमतें

क़ुरआन हक़ीम, ज़मीन में ख़लीफ़ा बनाया जाना, इंसानों की तख़लीक़, इन्सानों को अफ़ज़ल तरीन मख़लूक़ बनाया कि इसे फ़रिश्तों से सज्दा कराया। (2, 10, 11)


(ii) चार वाणियां (निदायें)

इस सूरह में अल्लाह तआला ने इंसान को चार बार या बनी आदम يَا بَنِي آدَمَ कह कर पुकारा है। पहली तीन वाणियों में लिबास का ज़िक्र है। इस मामले में अल्लाह तआला ने मुश्रेकीन (बहुदेववादियों) के नंगे होकर तवाफ़ करने के दावे को अस्वीकार कर दिया कि ऐसा तरीक़ा ख़ुद उनका अपना ईजाद किया हुआ है। चौथी वाणी में रसूल की पैरवी करने का हुक्म दिया गया है। (26 से 28, 35)


(iii) हराम क़रार दिया गया

1. चौराहे या बंद कमरे में की गई गंदगी और बेशर्मी, 
2. गुनाह, 
3. सरकशी, 
4. शिर्क 

(आयत 33)


(iv) अल्लाह तआला की क़ुदरत के दलाएल (तर्क)

1, बुलंद व बाला (बहुत ऊंचाई वाला) आसमान. 
2, अति विशाल और अति व्यापक अर्श. 
3, रात और दिन का निज़ाम (system) 
4, चमकते सूरज, चांद और सितारे. 
5, हवाएं और बादल. 
6, मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन का दोबारा ज़िंदा होना, 
7, ज़मीन से निकलने वाली वनस्पति (Plants) 

(54 से 57)


(v) पांच क़ौमों के क़िस्से

1. क़ौमे नूह, 
2.  क़ौमे आद, 
3. क़ौमे समूद, 
4. क़ौमे लूत, 
5. क़ौमे शुऐब


अंबिया के क़िस्से बयान करने की हिकमतें

1, रसुल को तसल्ली, 2, अच्छे और बुरे लोगों के अंजाम की ख़बर देना, 3, अल्लाह के यहां देर है अंधेर नहीं, 4, रिसालत की दलील कि उम्मी होने के बावजूद पिछली क़ौमों के वाक़यात बताना, 5, इंसान को इबरत व नसीहत कि कहीं आदम की तरह नस्ले आदम को भी शैतान न बहका दे।


(vi) झुठलाने वाले जन्नत में नहीं जा सकेंगे

यक़ीन जानो, जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया और उनके मुक़ाबले में सरकशी की, उनके लिये आसमान के दरवाज़े हरगिज़ न खोले जाएँगे। उनका जन्नत में जाना उतना ही नामुमकिन है जितना सूई के नाके से ऊंट का गुज़रना। मुजरिमों को हमारे यहाँ ऐसा ही बदला मिला करता है। (आयत 40)


(vii) जन्नतियों और जहन्नमियोँ की बात चीत (dialogue)

जन्नती कहेंगे: "क्या तुमने अल्लाह के वादों पर यक़ीन आ गया?"
जहन्नमी इक़रार करेंगे।
जहन्नमी खाना पानी मांगेंगे, 
मगर जन्नती जवाब में उनसे कहेंगे: "अल्लाह ने काफ़िरो पर अपनी नेअमत हराम कर दी है।" 

(आयत 44)


(viii) आराफ़ वाले 

जन्नतियों और जहन्नमियोँ के बीच कुछ लोग होंगे जो असहाबुल-आराफ़ (आराफ़वाले) के नाम से पुकारे जाएंगे। यह वह लोग होंगे जिनकी ज़िन्दगी का न तो सकारात्मक पहलू ही इतना ताक़तवर होगा कि जन्नत में दाख़िल हो सकें और न नकारात्मक पहलू ही ऐसा ख़राब होगा कि दोज़ख़ में झोंक दिये जाएं लेकिन उन्हें इस बात की ख़ुशी होगी कि वह जहन्नम से बच गए। बाद में वह जन्नत में दाख़िल कर दिए जाएंगे। (आयत 46 से 48)


(ix) मूसा अलैहिस्सलाम का तफ़सीली बयान 

(103 से 171)


(x) अल्लाह की बंदगी का तमाम इंसानी रूहों ने इक़रार किया था 

ऐ रसूल ! लोगों को याद दिलाओ वह वक़्त जबकि तुम्हारे परवरदिगार ने बनी-आदम की पीठों से उनकी नस्ल को निकाला था और उन्हें ख़ुद उनके ऊपर गवाह बनाते हुए पूछा था, “क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ?” सभी ने इक़रार किया था, “ज़रूर आप ही हमारे रब हैं, हम इस पर गवाही देते हैं।” यह हमने इसलिये किया कि कहीं तुम क़यामत के दिन यह न कह दो कि “हम तो इस बात से बेख़बर थे। (172)


(xii) बलअम बिन बाऊरा का वाक़िआ

وَاتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ الَّذِي آتَيْنَاهُ آيَاتِنَا فَانسَلَخَ مِنْهَا فَأَتْبَعَهُ الشَّيْطَانُ فَكَانَ مِنَ الْغَاوِينَ

और (ऐ रसूल) तुम उन लोगों को उस शख़्स का हाल पढ़ कर सुना दो जिसे हमने अपनी आयतें अता की थी फिर वह उनसे निकल भागा तो शैतान ने उसका पीछा पकड़ा और आख़िरकार वह गुमराह हो गया।

"कहा जाता है कि बलअम बिन बाऊरा बनी इस्राईल का एक बड़ा आलिम था जिसकी दुआएं क़ुबूल होती थीं उसे अल्लाह तआला की किसी किताब (तौरात) का इल्म मिला फिर उसने उनका इंकार कर दिया और उन आयात को पीठ पीछे फेंक दिया, फिर शैतान उसके पीछे लग गया और वह गुमराह हो गया और बनी इस्राईल को छोड़ कर क़ौमे जब्बारीन से जा मिला। फ़िरऔन के डूबने के बाद जब मूसा अलैहिस्सलाम (कुछ लोगों के मुताबिक़ यूशा बिन नून) बनी इस्राईल का लश्कर लेकर फ़लीस्तीन पर हमला करने के लिए निकले तो वहां के बादशाह ने बलअम से उनके ख़िलाफ़ हिलाकत की बददुआ करने को कहा, बलअम ने बददुआ करने से इंकार कर दिया मगर जब बादशाह ने रिश्वत पेश की तो वह बददुआ पर राज़ी हो गया लेकिन जब बददुआ करनी शुरू की तो बददुआ के बजाय मूसा अलैहिस्सलाम के हक़ में दुआ के अल्फ़ाज़ निकलने लगे। जब बार बार बददुआ करने पर ऐसा ही हुआ तो उसने बादशाह के लोगों को मशविरा दिया कि वह अपनी हसीन और ख़ूबसूरत लड़कियों को तैयार करें और बनी इस्राईल के ख़ेमों में भेज दें ताकि वह बदकारी में मुब्तिला हो जाएं। बदकारी की विशेषता यह है कि वह अल्लाह के क़हर और अज़ाब की वजह बनती है इसलिए बनी इस्राईल अपनी बदकारी के कारण अल्लाह की मदद से महरूम हो जाएंगे। चुनाँचे ऐसा ही हुआ। बनी इस्राईल फ़ितने में पड़ गए जिसकी वजह से उनमें अज़ाब के तौर पर ताऊन (Plague) की बीमारी फूट पड़ी। यह वाक़िआ बाईबल में अध्याय 22 से 25 में बयान हुआ है" अल्लाह तआला ने बलअम बिन बाऊरा की मिसाल कुत्ते से दी है"

وَلَوْ شِئْنَا لَرَفَعْنَاهُ بِهَا وَلَـٰكِنَّهُ أَخْلَدَ إِلَى الْأَرْضِ وَاتَّبَعَ هَوَاهُ ۚ فَمَثَلُهُ كَمَثَلِ الْكَلْبِ إِن تَحْمِلْ عَلَيْهِ يَلْهَثْ أَوْ تَتْرُكْهُ يَلْهَث ۚ ذَّٰلِكَ مَثَلُ الْقَوْمِ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا ۚ فَاقْصُصِ الْقَصَصَ لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ

और अगर हम चाहते तो हम उसे उन्हीं आयतों की बदौलत बुलन्द मरतबा कर देते मगर वह तो ख़ुद ही पस्ती (नीचे) की तरफ़ झुक पड़ा और अपनी नफ़सानी ख़्वाहिश का ग़ुलाम बन बैठा तो उसकी मिसाल उस कुत्ते की सी है कि अगर उसको धुत्कार दो तो भी ज़बान निकाले रहे और उसको छोड़ दो तो भी ज़बान निकाले रहे ये मिसाल उन लोगों की है जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया (ऐ रसूल) ये क़िस्से उन लोगों से बयान कर दो ताकि ये लोग ख़ुद भी ग़ौर करें। (175, 176)


(xii) बनी इस्राईल की सरकशी

एक बुत बनाने मुतालिबा, बछड़े को माबूद बनाना, सब्त के क़ानून की अवहेलना (नाफ़रमानी) (138, 148, 163)


(xiii) बनी इस्राईल पर एहसानात

फ़िरऔन की ग़ुलामी से निकालना, पानी के बारह चश्मे जारी करना, बादल का साया, मन व सलवा, उन्हीं में से एक रसूल। (141, 160)


(xiv) बनी इस्राईल के तीन गिरोह

बनी इस्राईल तीन गिरोह में तक़सीम हो गए थे। (1) जो अल्लाह के हुक्म की खुल्लमखुल्ला ख़िलाफ़ वर्ज़ी करते थे। (2) जो अल्लाह के हुक्म को मानते थे लेकिन पहले गिरोह को समझाते नहीं थे बल्कि ख़ामोशी से तमाशा देखते थे और तीसरे गिरोह से कहते थे कि इन्हें क्यों नसीहत करते हो जिन्हें अल्लाह अज़ाब देने वाला है (3) जो अल्लाह के आदेश का पालन करते थे और पहले गिरोह के सुधार के लिए मुमकिन कोशिश करते थे। यही तीसरा गिरोह महफूज़ रहा बाक़ी दो अज़ाब का शिकार हो गए। (164 से 166)


(xv) जानवरों से गए गुज़रे लोग

"जो लोग आंख, कान और दिल रखने के बावजूद हिदायत क़ुबूल नहीं करते वह चौपाए से भी बदतर हैं"। (आयत 179)


(xvi) क़यामत का इल्म किसी को नहीं 

(ऐ रसूल) तुमसे लोग क़यामत के बारे में पूछा करते हैं कि कहीं उसका कोई वक़्त भी तय है तुम कह दो कि उसका इल्म तो केवल पररवदिगार ही को है वही उसके निर्धारित समय पर उसे ज़ाहिर कर देगा। वह आसमान व ज़मीन में एक कठिन वक्त होगा वह तुम्हारे पास अचानक आ जाएगी तुमसे लोग इस तरह पूछते हैं गोया तुम उनसे ब ख़ूबी वाक़िफ़ हो तुम (साफ़) कह दो कि उसका इल्म केवल अल्लाह ही को है मगर ज़्यादातर लोग नहीं जानते। (आयत 187)


(xvii) क़ुरआन की अज़मत

إِذَا قُرِئَ ٱلۡقُرۡءَانُ فَٱسۡتَمِعُواْ لَهُۥ وَأَنصِتُواْ لَعَلَّكُمۡ تُرۡحَمُونَ 

जब क़ुरआन पढ़ा जाय तो इन्तेहाई खमोशी (pin drop silent) से सुनो। (204)


(xviii) कुछ अहम बातें

◆ अल्लाह के अच्छे नाम हैं उन नामों से पुकारा जाय। (180)

◆ जब दिल में कोई शैतानी वस वसा आये तो फ़ौरन अउज़ुबिल्लाहि मिनश शैतानिर रजीम ज़रूर पढ़ा जाय। (200)

◆ अपने रब का ज़िक्र आजिज़ी के साथ सुबह - शाम, खुले छुपे, सोते बैठते यानी हर हालत में किया जाय। (59)

◆ माफ़ी का तरीक़ा अपनाया जाय, भलाई का हुक्म दिया जाय और बुराई से रोका जाय। (199)


आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही

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