Khulasa e Qur'an - surah 6 | surah al anam

Khulasa e Qur'an - surah | quran tafsir

खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (006) अल अनआम


بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ


सूरह (006) अल अनआम


(i) तौहीद

इस सूरह में अल्लाह की हम्द व सना (प्रशंसा) और अज़मत व किबरियाई (बड़ाई) और मुख़्तलिफ़ ख़ुसूसियात का तफ़्सीली बयान है। जैसे:

◆ शिर्क का इंकार और तौहीद (एक ईश्वरवाद) की दावत, 
◆ जाहलियत के उन अंधविश्वास को रद्द किया गया जिनमे लोग पड़े हुए थे।


(ii) रिसालत

नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तसल्ली के लिए अल्लाह तआला ने 18 अंबिया का ज़िक्र किया है

1- नूह अलैहिस्सलाम, 
2- इब्राहीम अलैहिस्सलाम, 
3- लूत अलैहिस्सलाम, 
4- इस्माईल अलैहिस्सलाम, 
5- इस्हाक़ अलैहिस्सलाम, 
6- याक़ूब अलैहिस्सलाम, 
7- यूसुफ़ अलैहिस्सलाम, 
8- अय्यूब अलैहिस्सलाम, 
9- मूसा अलैहिस्सलाम, 
10- हारून अलैहिस्सलाम, 
11- दाऊद अलैहिस्सलाम, 
12- सुलैमान अलैहिस्सलाम, 
13- इल्यास अलैहिस्सलाम,
14- यसा अलैहिस्सलाम, 
15- यूनुस अलैहिस्सलाम, 
16- ज़करिया अलैहिस्सलाम, 
17- यहया अलैहिस्सलाम, 
18- ईसा अलैहिस्सलाम


(iii) आख़िरत

1. आख़िरत के रोज़ अल्लाह तमाम इंसानों को इकठ्ठा करेगा (12)

2. आख़िरत के दिन किसी इंसान से अगर अज़ाब टाल दिया गया तो यह उस पर अल्लाह की बड़ी मेहरबानी होगी। (16)

3. आख़िरत के दिन मुशरिकों से मुतालिबा किया जाएगा कि कहां हैं वह जिन्हें तुम अल्लाह के साथ शरीक करते थे। (22)

4. आख़िरत के दिन जहन्नमी यह चाहेंगे कि काश उन्हें दुनिया मे लौटा दिया जाता ताकि वह अपने रब की आयात को अब नहीं झुठलाते और ईमान वाले बन जाते। (27)

5. दुनिया की ज़िंदगी तो बस खेल तमाशा है और आख़िरत की ज़िंदगी ही असल, बेहतर और ठोस है। (32)


(iv) अल्लाह की अज़मत की निशानियां

दाने और गुठली को फाड़ कर पौधे निकालना, जिंदगी और मौत देना, चांद और सूरज का हिसाब, समुद्र और ख़ुश्की में रहनुमाई के लिए सितारों की तख़लीक़, एक जान से इंसान को पैदा करना और मां के पेट से ज़मीन पर आने तक के मरहले से गुज़ारना, आसमान से पानी नाज़िल करना, हर क़िस्म के पेड़ पौधे उगाना, हरे भरे खेत और तह पर तह चढ़े हुए दाने, खजूर के शगुफ़ों से फलों के गुच्छे के गुच्छे निकालना, अंगूर, जैतून और अनार के बाग़ जो एक दूसरे से मिलते जुलते भी हैं और अलग-अलग भी, दरख़्तों में फल आने और उनके पकने की कैफ़ियत, ज़मीन और आसमान की ईजाद। (95 से 99)


(v) इंसान अल्लाह को इस दुनिया में नहीं देख सकता

"निगाहें उसको नहीं पा सकतीं और वह निगाहों को पा लेता है, वह निहायत बारीक बीं [सूक्ष्मदर्शी] और बाख़बर है"। (103)


(vi) मुशरेकीन के बनाये हुए ख़ुदाओं को गाली न दी जाए

"ऐ ईमान वालो यह लोग अल्लाह के सिवा जिनको पुकारते हैं उन्हें गालियाँ न दो, कहीं ऐसा न हो कि यह शिर्क से आगे बढ़कर जिहालत की बिना पर अल्लाह को गालियाँ देने लगें"। (108)


(vi) रसूल की तसल्ली

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को तसल्ली दी गई है, "ये लोग ज़िद्दी हैं, वह चमत्कार (miracle معجزہ) की मांग करते रहते हैं हालांकि अगर मुर्दे भी अपनी क़बरो से उठ कर उनसे बात करें या संसार की तमाम वस्तुएं उनकी ऑखों के सामने हाज़िर कर दी जाएं फिर भी यह विश्वास नहीं करेंगे, कुरआन के चमत्कार ईमान रखने वालों के लिए काफ़ी है। (111)


(vii) मुशरिकों के अजीब रस्मो रिवाज

◆ यह लोग चौपायों में अल्लाह तआला और जिन को अल्लाह के साथ साझी ठहराते हैं उनका हिस्सा अलग अलग कर देते हैं, शरीको के हिस्से को अल्लाह तआला के हिस्से में मिलने नहीं देते लेकिन अगर अल्लाह तआला का हिस्सा शरीक़ों के हिस्से में मिल जाता तो इसे बुरा नही समझते थे। (135)

◆ मुफ़लिसी या आर यानी बे इज़्ज़ती के खौफ़ से लड़कियों को जान से मार देते थे। (आयत 136) (आज की मुहज़्ज़ब (Civilized) दुनिया में औरत के पेट मे ही मार दिया जाता जाता है। केवल अपने देश भारत में हर साल लगभग दस लाख से ज़्यादा बच्चियों का गर्भपात (Abortion) के ज़रिए क़त्ल कर दिया जाता है)

◆ चौपायों की तीन क़िस्में कर रखी थीं

एक वह जो उनके पेशवाओं (उलेमाओं) के लिए मख़सूस थीं। दूसरे वह जिनपर सवारी करना मना था। तीसरे वह जिन्हें अल्लाह के इलावा किसी और के नाम पर ज़बह किया जाता था। (138)

◆ जानवर के पेट मे जो बच्चा पल रहा होता उसे अपने लिए हलाल और औरतों के लिए हराम समझते लेकिन अगर वह बच्चा मुर्दा होता तो मर्द व औरत दोनों उसमें शरीक होते। (139)


(viii) अल्लाह तआला की नेअमतें

ज़िंदगी, खेतियाँ, चौपाए, बाग़ात (खुजूर, अनार,ज़ैतून वग़ैरह (141)


(ix) सिराते मुस्तक़ीम क्या है?

1, अल्लाह के साथ किसी को शरीक न ठहराया जाय। 
2, माता पिता के साथ अच्छा बरताव (व्यवहार) 
3, अपने बच्चों को ग़रीबी और मुफ़लिसी के डर से क़त्ल न किया जाय। 
4, बुरे और गंदे कामों से दूर रहें। 
5, किसी को नाहक़ क़त्ल न किया जाय। 
6, यतीमों का मॉल न खाया जाए न दबाया जाय। 
7, नाप तौल में पूरा पूरा इंसाफ़ के साथ दिया और लिया जाय। 
8, बात करते वक़्त इंसाफ़ से काम लिया जाय। 
9, अल्लाह तआला के हक़ को पूरा किया जाय। 
10, सिराते मुस्तकीम पर ही चला जाय। 

 (151, 152)


(x) कुछ अहम बातें

(i) शैतान इन्सान और जिन्नात दोनों में होते हैं और जो नबी का विरोध करे वह शैतान है। (112, 113) 
(ii) जिन जानवरों पर ज़बह करते हुए अल्लाह का नाम लिया जाय सिर्फ़ उसे ही खाना हलाल है 119 से 121) 
(iii) खुले छुपे दोनों गुनाहों से बचें (151) 
(iv) अल्लाह जिसे हिदायत देना चाहता है उसका सीना इस्लाम के लिए खोल देता है। (125)


आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही

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