खुलासा ए क़ुरआन - सूरह (005) अल माएदा
सूरह (005) अल माएदा का इब्तिदाई हिस्सा
(i) वादा व इक़रार को पूरा करना اوفوا بالعقود
तमाम् जाएज़ वादा और इक़रार जो मोमिन और रब के दरमियान हो या इंसान और इंसान के बीच हो उसे पूरा करना ज़रूरी है। (01)
(ii) नेकी और भलाई में सहयोग
नेकी के काम में एक दूसरे की मदद करना और गुनाह व दुश्मनी के कामों में किसी भी प्रकार का सहयोग न देने का आदेश। (02)
(iii) हराम चीज़ो से परहेज़
(2) सुअर का मांस,
(3) मुर्दार,
(4) जिस पर अल्लाह का नाम न लिया गया हो,
(5) जो गला घुटने से मरा हो,
(6) चोट खाकर मरा हुआ
(7) जो ऊंची जगह से गिरकर मर जाए,
(8) जो किसी के सींग मारने से मरा हो,
(9) जिसे दरिन्दे ने फाड़ खाया हो,
(10) जो जानवर बुतों (के थान) पर चढ़ा कर ज़िबह किया जाए,
(11) जिसपर क़ुरआ अंदाज़ी के तीरों की फ़ाल निकाली गई हो।
(आयत 03)
(iv) दीन मुकम्म्मल हो गया
क़ुरआन की आख़िरी नाज़िल होने वाली आयत है, अब दीन में कमी ज़्यादती की कोई गुजाइश नहीं है। "आज मैंने तुम्हारे दीन (जीवन विधान) को तुम्हारे लिए मुकम्मल कर दिया है और अपनी नेअमत तुम पर पूरी कर दी है और तुम्हारे लिए इस्लाम को तुम्हारे दीन की हैसियत से पसंद कर लिया है" (03)
(v) तहारत (पाकी)
(2) अद्ल व इंसाफ का हुक्म,
(3) दुश्मनों के साथ भी नाइंसाफी न हो।
(06 से 08)
(vi) हाबील और क़ाबील का वाक़िआ
क़ाबील ने हाबील को क़त्ल कर दिया, क़िसास में क़ाबील भी क़त्ल हुआ। (27 से 31)
(vii) यहूदियों और ईसाईयों की मुज़म्मत
यहूदियों और ईसाइयों की तरफ़ से जो सरकशियाँ हुईं उनपर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को तसल्ली दी गई, मुसलमानों को उनसे दोस्ती रखने से मना किया गया, और दाऊद व ईसा अलैहिमस्सलाम की ज़बानी उन पर लानत का तज़किरा हुआ। और आख़िर में बताया गया कि यह तुम्हारे ख़तरनाक दुश्मन हैं और उनमें से ज़्यादा तर अल्लाह की इताअत से निकल चुके हैं। (57, 78)
(viii) अहले किताब की गुमराही
अहले किताब की गुमराही का सबब यह बयान किया गया है कि उनकी सोसायटी में गुनाह होते रहे लेकिन कोई रोकने वाला न था इसलिए हमारा फ़र्ज़ है कि امربالمعروف ونہی عن المنکر (भलाई का हुक्म देने और बुराई से रोकने) का फ़रीज़ा अंजाम दें और हर हाल में दामने मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वाबस्ता हो जाएं। (59 से 63)
(ix) बदला और क़िसास
बदला और क़िसास इंसाफ़ का तक़ाज़ा है। इसके द्वारा समाज में फैले हुए ज़ुल्म और ना बराबरी को दूर किया जा सकता है। इसीलिए इसे ज़िन्दगी कहा गया है। (45)
(x) चोरी की सज़ा
चोर का हाथ काटने का आदेश यदि चोर एक मिक़दार से ज़्यादा चोरी करे। लेकिन पहले उसकी चोरी के बारे में पता लगाया जाएगा कि उसने चोरी क्यों की? (38)
(xi) यहूदियों, ईसाइयों, मुनाफ़िक़ीन, और अहले ईमान की सिफ़ात का बयान
चारों की अनेक सिफ़ात गिनाई गई हैं और उनके अंजाम के बारे में सूचना दी गई है।
(xii) इस्लाम का आलमगीर (universal) शांति पैग़ाम
जिसने किसी इंसान को नाहक़ क़त्ल किया या ज़मीन में फ़साद फैलाया, उसने मानो तमाम इंसानों को क़त्ल कर दिया और जिसने किसी की जान बचाई उसने मानो तमाम इंसानों को ज़िन्दगी बख़्श दी। (32)
(xiii) हब्शा (Ethiopia) के नसारा की तारीफ़
जब उनके सामने क़ुरआन की तिलावत की जाती है तो उसे सुन कर उनकी आंखों से आंसु टपकने लगते हैं और वह पुकार उठते हैं कि "ऐ पालनहार हमारा नाम भी गवाहों में लिख ले। (83)
(ix) हलाल व हराम के मसाएल
◆ हर चीज़ को ख़ुद से हलाल या हराम न बनाओ। (87)
◆ क़सम तोड़ने पर कफ़्फ़ारा है 10 मिस्कीनों को एक दिन का खाना खिलाना या एक ग़ुलाम आज़ाद करना अगर यह न हो सके तो फिर 3 दिन लगातार रोज़े रखना है। (89)
◆ शराब, जुआ, आस्ताने (वह जगह जहां अल्लाह के इलावा किसी और के नाम पर चढ़ावे चढ़ाये जाते हैं) और पांसा हराम हैं। इस के ज़रिए शैतान लोगों के दिलों में नफ़रत और दुश्मनी पैदा करता है। (90)
◆ अहराम की हालत में पानी के जानवर का शिकार हलाल और ख़ुश्की के जावर का शिकार हराम है और उसका कफ़्फ़ारा उसी जैसा एक जानवर देना होगा या कुछ मिस्कीनों को खाना खिलाना होगा या उसी मिक़दार में रोज़े रखने होंगे। (94, 95)
◆ हरम में दाख़िल होने वालों के लिए अमन है। (97)
◆ चार क़िस्म के जानवर मुशरिकों ने हराम कर रखे थे। बहीरा, सायबा, वसीला, हाम (103)
बहीरा: उस ऊंटनी को कहा जाता था जो पांच बार बच्चे दे चुकी हो और आख़िरी बार नर बच्चा हुआ हो उसका कान चीर कर आज़ाद छोड़ दिया जाता था, फिर न कोई उसपर सवारी करता, न दूध पिया जाता, न उसे ज़बह किया जाता, उसे हक़ था कि जहाँ चाहे चरे जिस घाट से चाहे पानी पिये।
सायबा: उस ऊंट या ऊंटनी को कहते थे जिसे किसी मन्नत के पूरा होने या किसी बीमारी से ठीक होने या किसी ख़तरा से बच जाने पर शुकराने के लिए आज़ाद कर दिया जाता था, या फिर अगर किसी ऊंटनी ने दस मादा बच्चे जन्म दिए हों उसे भी आज़ाद छोड़ दिया जाता था।
वसीला: अगर बकरी का पहला बच्चा नर होता तो वह ख़ुदाओं के नाम पर ज़बह कर दिया जाता था और अगर वह पहली बार मादा जन्म देती तो उसे अपने लिए रख लिया जाता था लेकिन अगर नर और मादा एक साथ जन्म लेते तो मादा को अपने पास रख लेते और नर को ज़बह करने के बजाय ऐसे ही ख़ुदाओं के नाम पर छोड़ दिया जाता था।
हाम: अगर किसी ऊंट का पोता सवारी के क़ाबिल हो जाता तो उस बूढ़े ऊंट को आज़ाद छोड़ दिया जाता था और अगर किसी ऊंट के नुत्फ़े से दस बच्चे पैदा हो जाते तो उसे भी आज़ादी मिल जाती थी।
(x) ईसा अलैहिस्सलाम को दी गई निशानियां
◆ दूध पीने के दिनों में बात करना,
◆ किताब व हिकमत की तालीम,
◆ मिट्टी के परिंदे बनाना और उसमें फूंक मारने पर चिड़िया बनकर उड़ जाना,
◆ अंधे और कोढ़ी को अच्छा करना,
◆ मुर्दों को जिंदा करना।
(110)
(xi) क़यामत का तज़किरा और ईसा अलैहिस्सलाम
क़यामत के दिन अंबिया कराम अलैहिमुस्सलाम से पूछा जाएगा कि जब तुमने हमारा पैग़ाम लोगों को पहुँचाया तो तम्हें क्या जवाब मिला था? इसी तरह ईसा अलैहिस्सलाम पर किये गए एहसानात को अल्लाह तआला याद दिलायेगा। इन्हीं एहसानात में माएदा (दस्तरख़्वान) वाला वाक़िआ भी है कि "हवारियों ने ईसा अलैहिस्सलाम से अर्ज़ किया कि ऐ मरियम के बेटे ईसा! क्या आप का ख़ुदा इस पर क़ादिर है कि हम पर आसमान से (नेअमत भरा) एक ख़्वान नाज़िल फरमाए" (112)
इन एहसानात को याद दिला कर अल्लाह तआला पूछेगा "ऐ ईसा क्या तुमने उनसे कहा था कि तुझे और तेरी मां को माबूद बना लिया जाय। जवाब में ईसा अलैहिस्सलाम कहेंगे " तू पाक है। मैं ऐसी बात कैसे कह सकता हूँ जिसका मुझे हक़ नहीं पहुँचता।
مَا قُلۡتُ لَهُمۡ إِلَّا مَآ أَمَرۡتَنِي بِهِۦٓ أَنِ ٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ رَبِّي وَرَبَّكُمۡۚ
मैंने तो वही कहा था जिसका मुझे हुक्म दिया गया था कि अल्लाह की इबादत करो जो मेरा रब भी और तुम्हारा रब भी। (116, 117)
आसिम अकरम (अबु अदीम) फ़लाही
.webp)
0 टिप्पणियाँ
कृपया कमेंट बॉक्स में कोई भी स्पैम लिंक न डालें।