Allah se dhokha aur bagawat (part-2) | 3. nikah ka paigham

Allah se dhokha aur bagawat (part-2) | Paigham dalwana


अल्लाह से धोका और बगावत (मुसलमान ज़िम्मेदार)

2. निकाह के मोके पर मुस्लिमों के किरदार (पार्ट 02)

2.3. निकाह कभी कभी आता हैं एक दिन में कुछ नहीं होगा


निकाह एक अज़ीम सुन्नत है जिससे दो ज़िन्दगियो का आगाज़ होता है दो इंसान यानी ज़ोजा और खाविंद मिलते हैं साथ साथ दो परिवार भी मिल जाते हैं चलिए हम इसकी बुनियाद पर चलते हैं-


i. पैग़ाम डलवाना: यहाँ से निकाह की शुरुआत होती है लड़की वाले या लड़के वाले एक बिचौलिया (MIDIATOR) को मुन्तखब करते हैं की बेहतर सा रिश्ता देखना, जहाँ जहेज़ ज़्यादा मिले और लड़की खूबसूरत वेल ग्रेजुएट हो और माँ बाप का ख़्याल रख ले घर का काम कर ले।

यानी शुरुआत से ही लड़के वाले भीख माँगना शुरु कर देतें हैं। वो बिचौलिया यही कोशिश में रहता हैं रिश्ता ढूंढ़ कर बिल आख़िर, वो आ ही जाता हैं फिर उसकी वज़ाहत सुनें कहता है लड़का देख कर आया हूँ या लड़की देख कर आया हूँ।

बिचौलिया: लड़का हैंडसम है, खाता है, कमाता है, जॉब करता है, लेकिन बीड़ी पीता है।

पेरेंट्स: अरे बीड़ी तो आम हैं कोई एब नहीं।

बिचौलिया: उनकी डिमांड बस ये लड़की अच्छी हो बस जहेज़ नहीं चाहिए।

पेरेंट्स: अरे जहेज़ नहीं देंगे तो लोग कहेगें बताओ इनके पास जहेज़ भी नहीं था, जहेज़ हम देंगे।

बिचौलिया: वह कह रहें हैं, लड़की को सोना, चांदी हम किसी दिन घर आकर पहना देंगे।

पेरेंट्स: अरे घर नहीं बल्कि बा क़ायदा कैमरा होना चाहिए वरना लोग कहेंगे की बताओ लड़की को कुछ पहनाया भी नहीं।

बिचौलिया: वह कह रहें है हम सुन्नत तरीके से निकाह करेंगे और न बारात न तमाशा सिर्फ वलीमा और निकाह और इस महीने ही निकाह कर लेंगे।

पेरेंट्स की बेटियां और बेटे: अरे अरे अरे सुन्नत! देखें सुन्नत एक अलग बात है और निकाह का खास मौक़ा है, सालो बाद ये रस्मे आती हैं, एक दिन अगर सुन्नत छोड़ दें, तो अल्लाह हमें कुछ कहेगा भी तो नहीं।

देखें पहले हम लाल ख़त भेजेंगे, फिर भात लेंगे, फिर मंगनी होगी, फिर बारात, निकाह, क़ुबूल नामा, जूता चुराई, वलीमा, दसियारी आदि मोहल्ले वाले भी देखेंगे क्या शादी हुई थी हमारी बहन की।

और इसी असना में ये सारी खुराफ़ात शुरु हो जाती है और शैतान के बहकावे में आकर तमाम रस्मे कर देते हैं ये सोचकर की ये अच्छा काम है यानी सुन्नत का जनाज़ा निकाल देते हैं। इज़्ज़त की धज्जियाँ उड़ा देते हैं, बे हयाई यहाँ तक होती है कि घर कि औरते खुले आम बेनिकाब हो जाती हैं। घर में शादी होने तक डांस गाना और बूढी औरतों कि कथाये शुरू हो जाती है। नमाज़ का ना पता होता ना, दीन का। उसके बाद भी कहते हैं हम मुस्लिम हैं।

अब्दुल्लाह बिन देलमी रहीमल्लाह बयान करते हैं, "मुझे यह बात पता चली है कि दीन में सबसे ज्यादा सुन्नत को तर्क करना आएगा। एक एक सुन्नत करके दीन इस तरह रुख़सत हो जायेगा जैसे कोई रस्सी एक एक धागा करके जाती है।" [सुनन दारमी 97]

हस्सान बयान करते हैं "जो भी क़ौम अपने दीन में नयी नयी बिदअत ईजाद करती हैं अल्लाह तआला उनमे से इस बिदअत जैसी सुन्नत को उठा लेता हैं और फिर उसे दोबारा उन लोगो के पास क़यामत तक नहीं लौटाता।" [सुनन दारमी 98]

यही हाल हैं क़ौम का नबी अलैहिस्सलाम की सुन्नत को नया काम और नये काम को सुन्नत समझा जा रहा है। लेकिन याद रखो तुम दीन में कितना भी फ़साद डाल दो। बहुत से अल्लाह के बन्दे हैं जो इस दीन की हिफाज़त करते रहेंगे तुमने इस्लाम को तमाशा बनाया उन्होंने इस तमाशे को ख़त्म किया।

तुम लोग इस्लाम में आसानीयाँ देखते हो हालांकि इस्लाम को अगर क़ुरआन हदीस से देखा जाए तो खुद आसान हैं।

बड़ी ही अफ़सोस की बात है जहाँ दीन में आसानी और शॉर्टकट ढूंढ़ते हैं वही इस आसानी वाली सुन्नत निकाह को कठिन बना दिया। ना जाने कौन कौनसी रस्मे निकाह में बना दी और दुनिया को ये बावर कराया की इस्लामिक शादी बड़ी धूम धाम से होती हैं। याद रखो क़ौम ए मुस्लिम क़यामत के दिन जब अल्लाह के सामने खड़े होंगे तो क्या हम यें जवाब दे सकेंगे कि सिर्फ एक ही दिन तो मज़े किये थे?

अल्लाह ना करें अगर अल्लाह ने ये कह दिया कि तो जाओ एक दिन जहन्नम का अज़ाब चखो! 

वल्लाहि क्या बनेगा हमारा? 


अहम बात ज़रा गौर करें: निकाह करना नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत हैं और एक पाक रिश्ता हैं सोचो हम अपने नबी के पाकिज़ा अमल को कैसे दुनिया के सामने मायूब कर रहें हैं और ऐसी खुराफ़ाती शादी के बाद हम उम्मीद कैसे रख सकते हैं की हमारी औलाद नेक हो और माँ बाप का कहना मानती हो अरे जब बुनियाद (निकाह ) ही खुराफ़ाती हुआ है तो औलाद कैसे नेक होगी?

तो मेरे क़ौम के लोगो इन कल्चर से बचो। ये सब ग़ैर क़ौमी रस्मे हैं। हमें निकाह सुन्नत के मुताबिक़ करना चाहिए और समाज का मुंह तोड़ जवाब देना चाहिए। सोचो जब आप नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत को जिंदा करोगे तो अल्लाह तुम्हारा साथ देगा। भले ही पूरा समाज आपके खिलाफ खड़ा हो जाए क्योंकि कयामत के दिन तुम्हारा समाज काम नहीं आएगा बल्कि नबी की सुन्नत और तालीम काम आएगी। 

इसलिए जहेज़, और दूसरी रस्मो से बचें।


अल्लाह हमें दीन की समझ दे। 

आमीन 

बने रहें, इन शा अल्लाह अगली क़िस्त में अगले मोज़ू पर बात करेंगे। 


आपका दीनी भाई
मुहम्मद रज़ा

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