हजरत मुहम्मद ﷺ के अल्लाह के पैग़म्बर होने के सबूत।
यहूदियों की डिमांड पर यूसुफ अलैहिस्सलाम का किस्सा
जब मुहम्मद (ﷺ) के मक्का में क़ियाम के ज़माने के आख़िरी दौर जबकि क़ुरैश के लोग इस मसले पर ग़ौर कर रहे थे कि मुहम्मद ﷺ को क़त्ल कर दें या वतन से निकाल दें या क़ैद कर दें। उस ज़माने में मक्का के कुछ इस्लाम-दुश्मनों ने (यहूदियों के इशारे पर) मुहम्मद (ﷺ) का इम्तिहान लेने के लिये आप (ﷺ) से सवाल किया कि बनी-इसराईल के मिस्र जाने की वजह क्या बनी। चूँकि अरब के लोग इस क़िस्से से अनजान थे, उसका नामो-निशान तक उनके यहाँ की रिवायतों में न पाया जाता था, और ख़ुद मुहम्मद (ﷺ) की ज़बान से भी इससे पहले कभी इसका ज़िक्र न सुना गया था, इसलिये उन्हें उम्मीद थी कि आप (ﷺ) या तो उसका तफ़सील से जवाब न दे सकेंगे, या इस वक़्त टालमटोल करके बाद में किसी यहूदी से पूछने की कोशिश करेंगे, और इस तरह मुहम्मद (ﷺ) का भरम खुल जाएगा।
लेकिन इस इम्तिहान में उन्हें उल्टी मुँह की खानी पड़ी। अल्लाह ने सिर्फ़ यही नहीं किया कि फ़ौरन उसी वक़्त यूसुफ़ (अलैहि०) का ये पूरा क़िस्सा मुहम्मद (ﷺ) की ज़बान पर जारी कर दिया, बल्कि इससे आगे बढ़कर इस क़िस्से को क़ुरैश के उस मामले पर चस्पाँ भी कर दिया जो वो यूसुफ़ (अलैहि०) के भाइयों की तरह मुहम्मद (ﷺ) के साथ कर रहे थे।
इस्लाम मुखलिफो के जवाब में अल्लाह ने यूसुफ़ (अलैहि०) का किस्सा बयान करने के लिए कुरआन में एक पूरी सूरह उतार दी जिसे सूरह यूसुफ कहते है और पूरा किस्सा बयान करने के बाद अल्लाह ने फरमाया:
ذٰلِکَ مِنۡ اَنۡۢبَآءِ الۡغَیۡبِ نُوۡحِیۡہِ اِلَیۡکَ ۚ وَ مَا کُنۡتَ لَدَیۡہِمۡ اِذۡ اَجۡمَعُوۡۤا اَمۡرَہُمۡ وَ ہُمۡ یَمۡکُرُوۡنَ
"ऐ नबी! ये क़िस्सा ग़ैबी [परोक्ष] की ख़बरों में से है जो हम तुमपर वह्य (प्रकाशना) कर रहे हैं, वरना तुम उस वक़्त मौजूद न थे जब यूसुफ़ के भाइयों ने आपस में एक राय होकर साज़िश की थी।"
[कुरआन 12:102]
وَ مَاۤ اَکۡثَرُ النَّاسِ وَ لَوۡ حَرَصۡتَ بِمُؤۡمِنِیۡنَ
"मगर तुम चाहे कितना ही चाहो, इनमें से ज़्यादातर लोग मानकर देने वाले नहीं हैं।"
[कुरआन 12:103]
अल्लाह ने यूसुफ़ (अलैहि०) का क़िस्सा दो अहम मक़सदों के लिये उतारा था-
1. एक ये कि मुहम्मद (ﷺ) की नुबूवत (पैग़म्बरी) का सुबूत, और वो भी मुख़ालिफ़त करनेवालों का अपना मुँह माँगा सुबूत उन्हें दिया जाए और उनके ख़ुद सुझाए गए इम्तिहान में ये साबित कर दिया जाए कि मुहम्मद (ﷺ) सुनी-सुनाई बातें बयान नहीं करते, बल्कि सचमुच मुहम्मद (ﷺ) को वह्य (प्रकाशना) के ज़रिए से इल्म हासिल होता है।
2. दूसरा ये कि क़ुरैश के सरदारों और मुहम्मद (ﷺ) के दरमियान उस वक़्त जो मामला चल रहा था उसपर यूसुफ़ (अलैहि०) के भाइयों और यूसुफ़ (अलैहि०) के क़िस्से को चस्पाँ करते हुए क़ुरैशवालों को बताया जाए कि आज तुम अपने भाई के साथ वही कुछ कर रहे हो जो यूसुफ़ के भाइयों ने उनके साथ किया था। मगर जिस तरह वो ख़ुदा की मशीयत (अच्छा) से लड़ने में कामयाब न हुए और आख़िरकार उसी भाई के क़दमों में आ रहे जिसको उन्होंने कभी इन्तिहाई बेरहमी के साथ कुँए में फेंका था, उसी तरह तुम्हारी कोशिश भी अल्लाह की तदबीर के मुक़ाबले में कामयाब न हो सकेगी और एक दिन तुम्हें भी अपने उसी भाई से रहम और करम की भीख माँगनी पड़ेगी जिसे आज तुम मिटा देने पर तुले हुए हो। ये मक़सद भी सूरा के शुरू में साफ़-साफ़ बयान कर दिया गया है। चुनाँचे फ़रमाया, यूसुफ़ और उसके भाइयों के क़िस्से में इन पूछ्नेवालों के लिये बड़ी निशानियाँ हैं।
हक़ीक़त ये है कि यूसुफ़ (अलैहि०) के क़िस्से को मुहम्मद (ﷺ) और क़ुरैश के मामले पर चस्पाँ करके क़ुरआन ने जैसे एक खुली पेशनगोई (भविष्यवाणी) कर दी थी जिसे आनेवाले दस साल के वाक़िआत ने लफ़्ज़-ब-लफ़्ज़ सही साबित करके दिखा दिया। इस सूरा के उतरने पर डेढ़-दो साल ही बीते होंगे कि क़ुरैशवालों ने यूसुफ़ (अलैहि०) के भाइयों की तरह मुहम्मद (ﷺ) के क़त्ल की साज़िश की और आप (ﷺ) को अल्लाह की तरफ से हुक्म हुआ कि मक्का से निकल जाए और मदीना चले जाए। फिर उनकी उम्मीदों के बिलकुल ख़िलाफ़ मुहम्मद (ﷺ) को भी वतन से निकल जाने के बाद वैसी ही तरक़्क़ी और इक़्तिदार (सत्ता) मिला जैसा यूसुफ़ (अलैहि०) को मिला था। फिर मक्का की फ़तह के मौक़े पर ठीक-ठीक वही कुछ सामने आया जो मिस्र की हुकूमत में यूसुफ़ (अलैहि०) के सामने उनके भाइयों की आख़िरी हाज़िरी के मौक़े पर सामने आया था। वहाँ जब यूसुफ़ (अलैहि०) के भाई इन्तिहाई बेबसी और बेचारगी की हालत में उनके आगे हाथ फैलाए खड़े थे और कह रहे थे कि, हमपर सदक़ा कीजिए, अल्लाह सदक़ा करनेवालों को अच्छा बदला देता है , तो यूसुफ़ (अलैहि०) ने उनसे बदला लेने की ताक़त रखने के बावजूद उन्हें माफ़ कर दिया और कहा, आज तुमपर कोई गिरफ़्त नहीं, अल्लाह तुम्हें माफ़ करे। वो सब रहम करनेवालों से बढ़कर रहम करनेवाला है।
इसी तरह यहाँ जब मुहम्मद (ﷺ) के सामने हारे हुए क़ुरैश सिर झुकाए खड़े हुए थे और मुहम्मद (ﷺ) उनके एक-एक ज़ुल्म का बदला लेने की ताक़त रखते थे, तो आप (ﷺ) ने उनसे पूछा, तुम्हारा क्या ख़याल है कि मैं तुम्हारे साथ क्या सुलूक करूँगा? उन्होंने कहा, आप एक मेहरबान और कुशादादिल भाई हैं, और एक मेहरबान और कुशादादिल भाई के बेटे हैं। इसपर मुहम्मद (ﷺ) ने फ़रमाया, मैं तुम्हें वही जवाब देता हूँ जो यूसुफ़ ने अपने भाइयों को दिया था कि आज तुमपर कोई गिरफ़्त नहीं, जाओ तुम्हें माफ़ किया।
By इस्लामिक थियोलॉजी
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