Shahadat e haqq (haqq ki gawahi)

Shahadat e haqq (haqq ki gawahi)


शहादत ए हक़ (हक़ की गवाही)


अल्लाह ने इंसानों को इस दुनिया में इम्तिहान के लिए भेजा और फिर अल्लाह ने अपने उपर ये चीज लाज़िम करली कि मैं इंसान के सामने सीधा रास्ता बिलकुल वाज़ेह करके दिखा दूंगा और इंसान को पूरा इख्तियार रहेगा कि वह चाहे तो अल्लाह के रास्ते पर चले या उसके खिलाफ चलें, यही अल्लाह की तरफ से इंसान को इख्तियार दिया गया है ताकि उसका इम्तिहान हो सकें। इंसानों को जिंदगी गुजारने का सीधा रास्ते दिखाने के लिए अल्लाह ने पैगम्बर अलैहिस्सलाम को दुनिया में भेजा ताकि वह इंसानों तक अल्लाह का पैगाम पहुंचा दें और पैगंबरों के बाद अल्लाह ने ये ज़िम्मेदारी उन लोगों पर डाली जो पैगंबरों की तालीमात पर ईमान लाएं।
और अल्लाह हिसाब किताब के दिन उन सबसे पूछ गच्छ करेगा जिनपर अल्लाह ने इंसानों को सीधा रास्ता दिखाने की जिम्मेदारी डाली। कुरआन सूरह हज्ज़ में अल्लाह ने इसी जिम्मेदारी का जिक्र किया:


مِلَّۃَ اَبِیۡکُمۡ اِبۡرٰہِیۡمَ ؕ ہُوَ سَمّٰىکُمُ الۡمُسۡلِمِیۡنَ ۬ ۙ مِنۡ قَبۡلُ وَ فِیۡ ہٰذَا لِیَکُوۡنَ الرَّسُوۡلُ شَہِیۡدًا عَلَیۡکُمۡ وَ تَکُوۡنُوۡا شُہَدَآءَ عَلَی النَّاسِ

"क़ायम हो जाओ अपने बाप इबराहीम की मिल्लत पर। अल्लाह ने पहले भी तुम्हारा नाम ‘मुस्लिम’ रखा था और इस (क़ुरआन) में भी (तुम्हारा यही नाम है), ताकि रसूल तुमपर गवाह हो और तुम लोगों पर गवाह।"

[कुरआन 22:78]


यानी हक पहुंचाने में रसूल उन लोगों पर गवाह की हैसियत से खड़े होंगे जिन तक उन्होंने पैगाम पहुंचा दिया था और उन पर ईमान लाने वाले लोग बाकी इंसानों पर गवाह की हैसियत से खड़े होंगे की उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी कहा तक अदा की। आखिरत में अल्लाह तमाम पैगम्बर अलैहिस्लाम और उन पर ईमान लाने वाले को सभी इंसानों पर गवाह की हैसियत से खड़ा करेगा कि उन्होंने लोगों तक हक पहुंचाने की जिम्मेदारी कहा तक अदा की।

और इस गवाही की अहमियत का अंदाजा आप इस बात से कीजिए कि सारे इंसानों के लिए अल्लाह ने पूछ गछ, ईनाम और सजा का जो कानून बयान किया है उसकी सारी बुनियाब इसी गवाही पर है।
क्योंकि अल्लाह किसी ऐसे इंसान को सजा नहीं देगा जिस तक हक पहुंचा ही न हो। और न ही अल्लाह लोगों को ऐसी बात पर पकड़ेगा जिसका उन्हे इल्म ही न हो क्योंकि अल्लाह बहुत हिक्मत वाला, रहमत वाला और इंसाफ वाला है। 

ये शहादत और गवाही जो अल्लाह ने अपने पैगंबरों के जरिए दिलवाई है उसका कुरान में यही मकसद बताया है कि लोगों को खुदा से ये कहने का मोका न मिले कि हम बेखबर थे और आप हमे उस बात पर पकड़ते है जिसके बारे में हमको खबरदार नहीं किया गया था। अल्लाह कुरान में फरमाता है:

رُّسُلًۭا مُّبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَى ٱللَّهِ حُجَّةٌۢ بَعْدَ ٱلرُّسُلِ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًۭا

"ये सारे रसूल ख़ुशख़बरी देनेवाले और डरानेवाले बनाकर भेजे गए थे ताकि उनको [नबी बनाकर] भेजे जाने के बाद लोगों के पास (अपने बेकसूर होने की) अल्लाह के मुक़ाबले में कोई हुज्जत [ठोस दलील] न रहे और अल्लाह हर हाल में ग़ालिब रहनेवाला और हिकमतवाला और गहरी समझवाला है।"

[कुरआन 4:165]


इस तरह अल्लाह ने लोगों का ये इल्जाम (कि हम तक हक नहीं पहुंचा था और न ही हमे सीधा रास्ता पता था) खत्म करने के लिए ये जिम्मेदारी पैगंबरों पर डाल दी। 

अगर पैगंबरों ने लोगों तक हक पहुंचाने की जिम्मेदारी अदा कर दी तो लोग जवाबदेह होंगे कि उन्होंने उस हक को कुबूल क्यों नहीं किया? अगर पैगंबरों से लोगों तक हक पहुंचाने में कोताही हुई तो उनकी पकड़ होगी और यही पैगंबरों का इम्तिहान हुआ करता है दुनिया में।

अल्लाह ने तमाम पैगंबरों के बाद अपनी तरफ से आखिरी पैगम्बर हजरत मुहम्मद ﷺ को सभी इंसानों तक हक पहुंचाने के लिए दुनिया में भेजा ताकि वह सब इंसानों पर गवाह की हैसियत से खड़े हो। 


हजरत मुहम्मद ﷺ की हक पहुंचाने की गवाही

बन्दों तक हक़ पहुँचा देने की गवाही को क़ुरआन साफ़-साफ़ ये बयान करता है-

وَ یَوۡمَ نَبۡعَثُ فِیۡ کُلِّ اُمَّۃٍ شَہِیۡدًا عَلَیۡہِمۡ مِّنۡ اَنۡفُسِہِمۡ وَ جِئۡنَا بِکَ شَہِیۡدًا عَلٰی ہٰۤؤُلَآءِ ؕ 

"जिस दिन हम हर उम्मत (समुदाय) में उन्हीं के अन्दर से एक गवाह उठा खड़ा करेंगे जो उनपर गवाही देगा और (ऐ मुहम्मद ﷺ) तुम्हें उन लोगों पर गवाह की हैसियत से लाएँगे।"

[कुरआन 16:89]


یُّہَا النَّبِیُّ  اِنَّاۤ  اَرۡسَلۡنٰکَ شَاہِدًا وَّ مُبَشِّرًا وَّ  نَذِیۡرًا

"ऐ नबी, हमने तुम्हें भेजा है गवाह बनाकर, ख़ुशख़बरी देनेवाला और डरानेवाला बनाकर।"

[कुरआन 33:45]


आइए समझते है कि नबी ﷺ को गवाह बनाने का क्या मतलब है?

नबी ﷺ को गवाह बनाने का मतलब अपने अन्दर बड़े-बड़े मानी रखता है, जिसमें तीन तरह की गवाहियाँ शामिल हैं-

1. ज़बान की गवाही:

एक ज़बान से दी जानेवाली गवाही, यानी ये कि अल्लाह के दीन की बुनियाद जिन सच्चाइयों और उसूलों पर है, नबी उनकी सच्चाई का गवाह बनकर खड़ा हो और दुनिया से साफ़-साफ़ कह दे कि वही हक़ हैं और उनके ख़िलाफ़ जो कुछ है बातिल है। ख़ुदा की हस्ती और उसकी तौहीद, फ़रिश्तों का वुजूद, वह्य का उतरना, मौत के बाद ज़िन्दगी का होना और जन्नत-जहन्नम का ज़ाहिर होना चाहे दुनिया को कैसा ही अजीब मालूम हो और दुनिया उन बातों के पेश करनेवाले का मज़ाक़ उड़ाए या उसे दीवाना कहे, मगर नबी किसी की परवाह किये बिना उठे और हाँक-पुकारकर कह दे कि ये सब कुछ हक़ीक़त है और गुमराह हैं वे लोग जो इसे नहीं मानते। इसी तरह अख़लाक़ और तहज़ीब और रहन-सहन के जो तसव्वुरात, क़द्रें, उसूल और ज़ाब्ते ख़ुदा ने उसपर ज़ाहिर किये हैं, उन्हें अगर सारी दुनिया ग़लत कहती हो और उनके ख़िलाफ़ चल रही तो तब भी नबी का काम ये है कि उन्हीं को खुल्लम-खुल्ला पेश करे और उन तमाम ख़यालात और तरीक़ों को ग़लत ठहरा दे जो उनके ख़िलाफ़ दुनिया में चल रहे हों। इसी तरह जो कुछ अल्लाह की शरीअत में हलाल है, नबी उसको हलाल ही कहे, चाहे सारी दुनिया उसे हराम समझती हो और जो कुछ ख़ुदा की शरीअत में हराम है, नबी उसको हराम ही कहे चाहे सारी दुनिया उसे हलाल और पाक-साफ़ ठहरा रही हो।

2. अमल की गवाही:

दूसरी अमल से दी जानेवाली गवाही। यानी ये कि नबी अपनी पूरी ज़िन्दगी में उस मसलक का अमली तौर से इज़हार करे जिसे दुनिया के सामने पेश करने के लिये वो उठा है। जिस चीज़ को वो बुराई कहता है, उसके हर छोटे से हिस्से तक से उसकी ज़िन्दगी पाक हो। जिस चीज़ को वो भलाई कहता है, उसकी अपनी ज़िन्दगी में वो पूरी शान के साथ नज़र आए। जिस चीज़ को वो फ़र्ज़ कहता है, उसे अदा करने में वो सबसे बढ़कर हो। जिस चीज़ को वो गुनाह कहता है, उससे बचने में कोई उसकी बराबरी न कर सके। ज़िन्दगी के जिस क़ानून को वो ख़ुदा का क़ानून कहता है, उसे लागू करने में वो कोई कसर न उठा रहे। उसका अपना अख़लाक़ इस बात पर गवाह हो कि वो अपनी दावत में कितना सच्चा और कितना मुख़लिस है और उसका वुजूद उसकी तालीम का ऐसा मुकम्मल नमूना हो जिसे देखकर हर आदमी मालूम कर ले कि जिस दीन की तरफ़ वो दुनिया को बुला रहा है, वो किस मैयार का इन्सान बनाना चाहता है, क्या किरदार उसमें पैदा करना चाहता है और क्या निज़ामे-ज़िन्दगी उससे क़ायम कराना चाहता है।


3. आख़िरत की गवाही:

तीसरी आख़िरत की गवाही, यानी आख़िरत में जब अल्लाह की अदालत क़ायम हो, उस वक़्त नबी इस बात की गवाही दे कि जो पैग़ाम उसके सिपुर्द किया गया था, वो उसने बिना कुछ घटाए-बढ़ाए लोगों तक पहुँचा दिया और उनके सामने अपनी ज़बान और अपने अमल से हक़ खोलकर रख देने में उसने कोई कोताही नहीं की। इसी गवाही पर ये फ़ैसला किया जाएगा कि माननेवाले किस इनाम के और न माननेवाले किस सज़ा के हक़दार हैं। इससे अन्दाज़ा किया जा सकता है कि नबी (ﷺ) को गवाही के मक़ाम पर खड़ा करके अल्लाह ने कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी आप (ﷺ) पर डाली थी और वो कैसी अज़ीम शख़्सियत होनी चाहिये जो इस बुलन्द मक़ाम पर खड़ी हो सके। 

ज़ाहिर बात है कि नबी (ﷺ) से सच्चे दीन (इस्लाम) की ज़बानी और अमली गवाही पेश करने में ज़र्रा बराबर भी कोई कोताही नहीं हुई है, तभी तो आख़िरत में आप (ﷺ) ये गवाही दे सकेंगे कि मैंने लोगों पर हक़ पूरी तरह वाज़ेह कर दिया था और तभी अल्लाह की हुज्जत लोगों पर क़ायम होगी। वरना अगर अल्लाह की पनाह! आप (ﷺ) ही से यहाँ गवाही अदा करने में कोई कसर रह गई हो तो न आप आख़िरत में उनपर गवाह हो सकते हैं और न हक़ का इनकार करनेवालों के ख़िलाफ़ मुक़द्दमा साबित हो सकता है।

हजरत मुहम्मद ﷺ ने जब लोगों तक हक पहुंचा दिया तो उसपर सभी लोगों से गवाही ली। हजरत मुहम्मद ﷺ अपने आखिरी हज के खुतवे में लोगों से कहा:

लोगों ! तुम से मेरे बारे में (ख़ुदा के यहाँ) सवाल किया जाएगा, बताओ, तुम क्या जवाब दोगे? लोगो ने जवाब दिया कि हम इस बात की शहादत देंगें कि आप ﷺ ने अमानत (दीन) पहुंचा दी और आप ﷺ ने हक ए रिसालत अदा फरमा दिया और हमारी खैर ख़्वाही फरमाई। यह सुनकर हजरत मुहम्मद ﷺ ने अपनी शहादत की उंगली आसमान की तरफ उठाई और लोगों की जानिब इशारा करते हुए तीन मर्तबा इरशाद फ़रमाया खुदाया गवाह रहना! खुदाया गवाह रहना! खुदाया गवाह रहना!
[इब्न माजह 3058]


हजरत मुहम्मद ﷺ के बाद अब ये जिम्मेदारी मुसलमानों के उपर आती है तो मुसलमान इसके लिए कितने तैयार है? अगर मुसलमानों ने हक की गवाही का हक अदा न किया तो मुसलमान आखिरत में पकड़े जाएंगे। इसी जिम्मेदारी को मुसलमानों पर डालते हुए अल्लाह ने कुरान में फरमाया:

وَ کَذٰلِکَ جَعَلۡنٰکُمۡ اُمَّۃً وَّسَطًا لِّتَکُوۡنُوۡا شُہَدَآءَ عَلَی النَّاسِ وَ یَکُوۡنَ الرَّسُوۡلُ عَلَیۡکُمۡ شَہِیۡدًا ؕ 

"और इसी तरह तो हमने तुम  [मुसलमानों] को एक ‘उम्मते-वसत’ [उत्तम समुदाय] बनाया है, ताकि तुम दुनिया के लोगों पर गवाह हो और रसूल तुम पर गवाह हो।"

[कुरआन 2:143]


उम्मते-वसत  लफ़्ज़ के अंदर इतने ज़्यादा मानी पाए जाते हैं कि किसी दूसरे लफ़्ज़ से इसके तर्जमे का हक़ अदा नहीं किया जा सकता। इससे मुराद एक ऐसा आला और बेहतरीन गरोह है, जो अदल और इन्साफ़ और मुनासिब और दरम्यानी राह पर चलनेवाला हो, जो दुनिया की क़ौमों के बीच सदर की हैसियत रखता हो। जिसका ताल्लुक़ सबके साथ यकसाँ हक़ और सच्चाई का ताल्लुक़ हो और नामुनासिब और नाहक़ ताल्लुक़ किसी से न हो।        

फिर ये जो कहा कि तुम्हें  उम्मते-वसत  इसलिये बनाया गया है कि  तुम लोगों पर गवाह हो और रसूल तुमपर गवाह हो  तो इससे मुराद ये है कि आख़िरत (परलोक) में जब सारे इन्सानों का इकट्ठा हिसाब लिया जाएगा, उस वक़्त रसूल हमारे ज़िम्मेदार नुमाइन्दे की हैसियत से तुमपर गवाही देगा कि सही फ़िक्र, अच्छे अमल और इन्साफ़ के निज़ाम (व्यवस्था) की जो तालीम हमने उसे दी थी, वो उसने तुम तक बिना कमी-बेशी के पूरी-की-पूरी पहुँचा दी और अमली तौर पर इसके मुताबिक़ काम करके दिखा दिया। इसके बाद रसूल के क़ायम-मक़ाम (नुमाइन्दे) होने की हैसियत से तुमको आम इन्सानों पर गवाह की हैसियत से उठना होगा और ये गवाही देनी होगी कि रसूल ने जो कुछ तुम्हें पहुँचाया था, वो तुमने उन्हें पहुँचाने में और जो कुछ रसूल ने तुम्हें दिखाया था, वो तुमने उन्हें दिखाने में अपनी हद तक कोई कोताही नहीं की।                

इस तरह किसी शख़्स या गरोह का इस दुनिया में ख़ुदा की तरफ़ से गवाही के मंसब पर मुक़र्रर होना ही हक़ीक़त में उसका इमामत और पेशवाई के मक़ाम पर बिठाया जाना है। इसमें जहाँ बुलंदी और बड़ाई है, वहीं ज़िम्मेदारी का बहुत बड़ा बोझ भी है। इसके मानी ये हैं कि जिस तरह अल्लाह के रसूल (ﷺ) इस उम्मत के लिये ख़ुदातरसी (ईशपरायणता) इसका नाम है, रास्तरवी (सदाचार) ये है, अदालत (न्याय) इसको कहते हैं और हक़परस्ती ऐसी होती है। फिर इसके मानी ये भी हैं कि जिस तरह ख़ुदा की हिदायत हम तक पहुँचाने के लिये अल्लाह के रसूल (ﷺ) की ज़िम्मेदारी बड़ी सख़्त थी, यहाँ तक कि अगर वो इसमें ज़रा सी कोताही भी करते तो ख़ुदा के यहाँ पकड़े जाते, उसी तरह दुनिया के आम इन्सानों तक इस हिदायत को पहुँचाने की बहुत सख़्त ज़िम्मेदारी हम पर आती है। अगर हम ख़ुदा की अदालत में वाक़ई इस बात की गवाही न दे सकें कि हमने तेरी हिदायत, जो तेरे रसूल (ﷺ) के ज़रिए से हमको पहुँची थी, तेरे बन्दों तक पहुँचा देने में कोई कोताही नहीं की है, तो हम बहुत बुरी तरह पकड़े जाएँगे और पेशवाई का यही फ़ख़्र हमें वहाँ ले डूबेगा। हमारी पेशवाई के दौर में हमारी वाक़ई कोताहियों की वजह से सोच और अमल की जितनी गुमराहियाँ दुनिया में फैली हैं और जितने फ़साद और फ़ित्ने ख़ुदा की ज़मीन में पैदा हुए हैं उन सबके लिये बुराई के सरदारों और इन्सान रूपी शैतानों और जिन्न रूपी शैतानों के साथ-साथ हम भी पकड़े जाएँगे। हम से पूछा जाएगा कि जब दुनिया में बुराई और ज़ुल्म और गुमराही का ये तूफ़ान बरपा था, तो तुम कहाँ मर गए थे?

मुसलमानों की ये जिम्मेदारी है कि वह दुनिया के सब इंसानों तक हक़ पहुंचा दें (यानी जिंदगी गुजारने का सही तरीका जिसका नाम इस्लाम है) और इस हक़ पहुंचाने की गवाही मुसलमानों को अपनी ज़ुबान और अपने अमल से देनी है। ताकि दुनिया के लोगों को अल्लाह के सामने ये कहना का मौका न मिले कि हम तक हक पहुंचा ही नहीं था।

अगर मुसलमानों ने लोगों तक हक़ पहुंचा दिया तो आखिरत में लोगों से पूछ गच्छ होगी कि आपने इस हक़ का क्या जवाब दिया?

अगर मुसलमान ने लोगों तक हक़ पहुंचाने में कोताही की तो मुसलमान पकड़े जाएंगे।


ये शहादत गाहे उल्फत में क़दम रखना,
लोग आसान समझते है मुसलमान होना।


अल्लाह हमे लोगों तक हक़ खोल खोल कर वाजेह करने वाला बनाएं। ताकि हम हिसाब किताब के दिन अपनी ज़िम्मेदारी से बरी हो जाए।


By- इस्लामिक थियोलॉजी

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