Nikah (part 10): Gair islami rasmein

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निकाह के मौके पर कुछ ग़ैर इस्लामी रस्में


(v) मायो की रस्म 

निकाह के दो तीन दिन पहले दुल्हन को मायो बिठाया जाता है। उसे एक कमरे में बिठा देते हैं और निकाह होने तक दुल्हन कमरे में ही रहती है ताकि गैर मर्द की नज़र उस पर न पड़े। बाज़ जगहों पर तो लोग ये कह कर दुल्हन को मायो बिठाते हैं की गैर मर्द की नज़र पड़ गई तो रूप नहीं चढ़ेगा, ये सब फिज़ूल की बातें हैं। इस्लाम हर वक्त गैर मेहरम से पर्दे का हुक्म देता है और मायो जैसी रस्म की शरीयत में कोई जगह नहीं है किसी भी औरत के लिए गैर मेहरम से पर्दे का हुक्म कुछ ख़ास दिन में ही क्यों इस्लाम में परदा तो फर्ज़ है?

हमारे मुआशरे में मायो की जो रस्म चल रही है नाजायज़ है हमे निकाह ऐसे करना चाहिए जैसे रसूल अल्लाह (ﷺ) से साबित है। शरीयत ने निकाह को आसान करने का हुक्म फरमाया है, हर वो अमल जो समाज पर बुरे असरात डालती है नजायज़ और हराम है। 


(vi) मेंहदी

औरत का मेंहदी लगाना मुस्तहब (Optional) है। दीन इस्लाम में मेंहदी लगाने में कोई मनाही नही है चाहे आम हालत हो या फिर निकाह का दिन। 

अब आज कल निकाह के मौके पर मेंहदी को रस्मी तौर पर बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है बकायदा एक प्रोग्राम किया जाता है लडकियां नए नए कपड़े पहनती हैं नाच गाना होता है।

याद रखिए ये सब करना एक खुराफात है दीन में इसकी कोई जगह नहीं है।


(vii) संगीत

घर की औरतों का ये कहना कि कौन सी शादी रोज़-रोज़ होनी है, जिन्दगी में एक बार ही तो ये मौका आता है खुशी का मौका है। और घर के मर्द (बड़े बुजुर्गों) का इन मौकों पर चुप रहना ख़ामोशी से गैर शरीयत रस्मों को हवा देना है और ये मर्दों की लापरवाही ही है कि दीन में बिगाड़ पैदा हो रहा है।  

याद रखें, संगीत (music) और गाने दिलों में रोग पैदा करते हैं, इससे दिल गुनाहों की तरफ़ माइल होते हैं, इससे दिल सख्त हो जाता है, इस लिए इस से बचा जाना चाहिए।

आज हमारी शादियों में बाकायदा एक इवेंट के तौर पर म्यूजिक का प्रोग्राम किया जाता है जिसमें औरत और मर्द एक संग स्टेज सजा कर फिल्मी गानों पर नाच रहे हैं। देवर-भाभी, साली-जीजा और तमाम गैर मेहरम रिश्ते ऊपर से बाहर के दोस्त यार भी हमारी घर की बहन बेटियों के साथ फिल्मी धुन पर थिरक रहे हैं। एक दुसरे को छू (touch) कर रहे हैं और हमे कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा, हम कहां जा रहे हैं?

निकाह के मौके पर सिर्फ़ "डफ" बजाने की इजाज़त दी गई है जो सुन्नत से साबित है इसका जिक्र हम निकाह के पिछले पार्ट में कर चुके हैं। 

हां, औरतें ऐसे गीत गा सकती हैं जिसमें शिर्किया अल्फाज़ इस्तेमाल न हुआ हो। 


(viii) पटाखे और आतिश बाज़ी करना

आज कल शादियों के मौके पर घरों, सड़कों पर पटाखे फोड़ेने का रिवाज़ भी आम हो चला है। लोग अपनी शान शौकत दिखाने के लिए आतिशबाजी करते हैं ये सब फिजूलखर्ची है। 


(ix) ढोलक और डिस्क जॉकी (DJ)

ढोलक और Dj की बात करें तो शादी के मौके पर एक हफ्ते पहले ही घर के दरवाज़े या छत पर लगा दिया जा रहा है, तेज़ कर के पूरे मोहल्ले को परेशान किया जाता है, अज़ान हो रही है कोई फ़र्क नहीं, लोग मस्त हैं। ख़ुद नमाज़ नहीं पढ़ते दूसरे पढ़ रहे उनमें भी खलल पैदा करना कितना बड़ा गुनाह है। काश कि लोगों को इसका ख्याल होता। 

(ix) रतजगा (छोटा खाना)

निकाह के एक दिन पहले औरतें रात भर जाग कर पकवान पकाती हैं और ढोलक पीट-पीट कर गीत गाती हैं, ऐसे में नमाज़ तर्क हो जाती है नमाज़ फर्ज़ है कयामत के दिन नमाज़ का सवाल होगा, इस्लाम ने हमें निकाह का एक ख़ास तरीका बताया है अगर हम मुस्लमान उस तरीके को छोड़ कर बेकार की रस्में करें और फिजूलखर्ची करें तो ये गलत है। इससे निकाह मुश्किल होता जा रहा है और जिंदगी जीना जैसे नापाक, गुनाह। 

सस्ता सौदा: इस दुनियां में आने का मक़सद एक अल्लाह की इबादत है और हम इस मकसद को ही समझ नहीं पा रहे हैं या जानते हुए भी अनजान बने हुए हैं या फिर रास्ता भटक गए हैं। 

एक कहावत है न कि, "सोए हुए को तो जगाया जा सकता है मगर जो सोने का नाटक कर रहा हो उसको कैसे जगाया जाए।" 

हम पैदाइशी मुस्लामन जिन्हें इस्लाम जैसी नेमत मुफ़्त में मिल गई है जिसे हम तक पहुंचाने की खातिर अल्लाह के रसूल रहमतुल-लिल-'आलमीन ने ना जानें कितनी तकलीफ़ और अजी़यतें सहन की और हम क्या क्या कर रहे हैं? 

जिन्हें जन्नत मिलने का वादा किया गया है अल्लाह की फरमाबरदारी और अच्छे अमाल के बदले अल्लाह की मुलाक़ात और दीदार मयस्सर होना है , हमारे जिस्म और जान का हर अमल बेशकीमती है उस जान की क़ीमत हमने बहुत थोड़ी लगाई, यानी उस क़ीमती जान के बदले हमने इस आरज़ी दुनिया को ही अपना ठिकाना समझ लिया है, हम विलासितापूर्ण जीवन Luxurious Life में खोते जा रहे हैं। 

फहस, बेहयाई, नाच गाना, म्यूज़िक, शहवत, झूट दिखावे की जिंदगी, डेली रूटीन का हिस्सा बन चुका है हम कहां जा रहे हैं हराम हलाल में कोई फ़र्क ही नहीं कर पा रहे हैं। करें भी तो कैसे दीन से गफलत हमारा मुकद्दर बनता जा रहा है जैसे गुनाहों को ख़रीद लिया जिनकी लज़्जत यक़ीनन फ़ानी है, अल्लाह तआला ख़ुद फरमाता है :

"जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही ख़रीदी, उनकी तिजारत उनके लिए नफामंद ना हुई और उन्होंने थोड़ी क़ीमत पाई" [कुरान 2:16]

इन शा अल्लाह अगली क़िस्त में दूसरी गैर इस्लामी रस्मों का ज़िक्र करेंगे। 

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हम सब को दीन की सही समझ अता फरमाए। 

आमीन


आप की दीनी बहन
फ़िरोज़ा

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