गया वक्त फ़िर हाथ नहीं आता
अल्लाह त'आला की बेशुमार नेमतों में "वक्त" एक अज़ीम नेमत है। वक्त हमारे लिए किसी दौलत से कम नहीं है। एक मोमिन वक्त को बहुत एहमियत देता है। वक्त पर नमाज़, वक्त पर ज़कात, वक्त पर नेकी, वक्त पर तमाम इबादतें, वो वक्त रहते अपने रब को राज़ी करने की कोशिश करता है चाहे तंगी में हो या फराखी में। क्योंकि उसको पता होता है के इस दुनिया में थोड़ा सा वक्त गुज़ार कर उसे अपने रब के पास जाना है और दुनिया में जो वक्त अल्लाह ने उसे दिया था उसका हिसाब अपने रब को देना है। इसलिए एक मोमिन अपने वक्त की कदर करता है और उसे ज़ाया नहीं करता।
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त को वक्त पर किए गए काम बहुत पसन्द है। जिस इंसान को वक्त की क़दर होगी तो वो अपने नामा ए आमल में ज़्यादा से ज़्यादा नेकिया लिखवाएगा और उसे आख़िरत में पछताना नहीं पड़ेगा। नबी ﷺ ने फ़रमाया,
जो वक्त की क़दर नहीं करता वक्त भी उसकी क़दर नहीं करता। ये तो ज़िन्दगी की हकीक़त है के गुज़रा हुआ वक्त कभी वापस नहीं आता। नबी ﷺ की हदीस से हमें वक्त की एहमियत का अंदाज़ा होता है के अगर हम वक्त का सही इस्तेमाल नहीं करेंगे तो हमारी दुनिया और आखिरत दोनो ख़राब हो सकती है।
आज के दौर में सुबह देर से उठना फैशन बन गया है। 9, 10 बजे से पहले तो सुबह ही नही होती। अक्सर लोग अपने दिन की शुरुआत में ही वक्त की ना कदरी कर देते है और सुबह के वक्त बेकार सो कर अपने रब की भेजी गई बरकतों से महरूम रह जाते हैं। रात देर तक जाग कर फजर की नमाज़ तर्क करके अपने रब को नाराज़ कर देते हैं।
जो शख़्स फजर की नमाज़ नहीं पढ़ता उसके चेहरे पर रोनक नहीं होती, उसका दिन सुस्त होता जाता है, उसके दिल पर एक सियाह धब्बा पड़ जाता है जो निफाक़ मिंबा बनता जाता है फ़िर शख़्स अपनी नमाज़ो को वक्त पर अदा नहीं करता, आखिरत में उसे भारी नुक्सान से दोचार होना पड़ता है। ये तो सिर्फ़ सुबह के वक्त की बरबादी की बात हुई, ना जाने कितने बेहतरीन औकात लोग लगुयात में गुज़ार देते हैं।
यह बात तो साइंस ने भी साबित की है के सुबह के वक्त सोने से इंसान की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ता है, उसका जिस्म बहुत सी बीमारियों में मुब्तिला हो जाता है।
जब आदम अलैहिस्सलाम को अल्लाह तआला ने हुक्म दिया के तुम जन्नत से निकल जाओ। तो अल्लाह तआला ने फ़रमाया,
इस आयत से ये बात वाजेह होती है के इंसान की ज़िंदगी इम्तिहान गाह है। और ये वक्त हमारे लिए बहुत बड़ा मौक़ा है अपने रब को राज़ी करने का। वक्त का सही इस्तेमाल ही इंसान को जन्नत तक पहुंचा सकता है। बन्दे को रोज़ ए मेहशर अपने रब के सामने एक एक मिनट का हिसाब देना है।
दौरे हाज़िर की अक्सरियत खसूसन नौजवान तबका अपने कीमती वक्त को मोबाइल, ड्रामे, फिल्में, गाने, और फिजूल बातों में बर्बाद कर रहा है। इंसान अपनी जिंदगी के हर अच्छे काम को कल पर टाल देता है और कोई बुरा काम करना हो तो फोरन कर गुजरता है। जब के उसे पता होना चाहिए के उसके पास बहुत मुख्तसर सा वक्त बचा है और अल्लाह ने उसे जिस मक़सद के लिए दुनिया में भेजा था वो मक़सद पूरा करना है।
हर मुस्लिम को फ़िक्र होनी चाहिए के वक्त का सही इस्तेमाल करके अपने मक़सद (अकामत दीन) की कामयाबी के हुसूल के लिए जिद्दो जेहेद करे वरना बरोज़ मेहशर अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ये न कह दे की,
वो वक्त बहुत क़रीब है जब सूरज मगरिब से निकलेगा उसके बाद तौबा के दरवाज़े बंद कर दिए जायेंगे उसके बाद किसी को मौका नहीं दिया जाएगा के वो अपने रब के हुज़ूर तौबा कर सके।
कोशिश कीजिए के अपने वक्त को ज़्यादा से ज़्यादा नेक कामों में सर्फ करें। वरना बरोज़ कयामत वापिस दुनिया में भेजने का वक्त नहीं दिया जाएगा। जैसा के शायर कहता है,
वक्त का सही इस्तेमाल कैसे करे कुछ नुकात:
1. सब से पहले तो आप अपना दिन कैसे गुजारें उसकी मंसूबा बन्दी कर लीजिए।
2. रोज़ाना फजर के वक्त से कम से कम आधा घंटा पहले उठने की आदत डालिए।
3. कम से कम 2 रकात तहज्जुद पढ़ लें फ़िर कुरआन की तिलावत, फजर की नमाज़ के बाद उसी जगह बैठ कर इतमिनान से ज़िक्र व अज़कार करिए ताके आप ज़हनी तौर पर पर पुरसुकून रह सके।
4. उसके बाद थोड़ी सी वर्जिश कीजिए जिससे आपको रूहानी सुकून के बाद जिस्मानी तंदरुस्ती हासिल होगी। उसके बाद अपने कामों में लग जाए।
5. अगर आप फजर बाद सोते हैं तो फजर के बाद सोने की आदत को तर्क करने की कोशिश कीजिए, केलूला की आदत डालिए। आप ﷺ नमाज़ जोहर के वक्त केलूला किया करते थे हमें भी आप ﷺ की सुन्नतों पर चलना चाहिए।
6. रात के वक्त सारे काम हो जाने के बाद इशा पढ़ कर फ़ौरन सो जाएं क्योंकि बगैर किसी वजह के लगू काम के लिए जागने की हदीस में मुमानियत आई है।
"पूरे दिन का टाइम टेबल बना लीजिए और उसी के मुताबिक़ अपने दिन को गुजारने की कौशिश कीजिए।"
इस से आप के तमाम काम वक्त पर मुकम्मल होंगे और वक्त की अहमियत का एहसास होगा। वक्त की क़दर करने का सबसे आसान तरीक़ा ये है के इंसान अपनी जिंदगी के हर दिन को अपना आख़िरी दिन समझ कर जिए। इससे वो अपनी इबादतों में खुशू इख्तियार करेगा और ज़्यादा से ज़्यादा नेकियां कमाने का मौक़ा हाथ से न जाने देगा। इन शा अल्लाह
इंसान को वक्त रहते अपने रब को राज़ी कर लेना चाहिए वरना कहीं ऐसा न हो के अपने वक्त को फिजूल कामों में बर्बाद कर दे और फ़िर वो वक्त आ जाए जिसका अल्लाह जुल जलाल ने वादा किया है। वो दिन बरहक है जब ये पूरी कायनात फना हो जायेगी और तमाम मखलूकात को अपने रब की तरफ़ लोट कर जाना है। तो जिन्होंने इस वक्त का सही इस्तेमाल करके अपने रब को राज़ी कर लिया वो खूबसूरत बागात में होंगे और जिसने इस वक्त को ज़ाया कर दिया उनके लिए बहुत नुकसान है और अज़ाब जहन्नुम है।
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त से दुआ है के वो हमें हमारे वक्त को अकामत दीन की जद्दोजहद में इस्तेमाल करने की तोफीक अता फरमाए।
आमीन या रब्बुल आलमीन
लेखिका: राहीन फ़िरदौस इशराक कुरैशी
तालिबा: (अरबी अव्वल) मदरसा जामिया अस सालिहात, अरधापुर
2 टिप्पणियाँ
Subhan Allah
जवाब देंहटाएंमाशा अल्लाह बहुत खूब काबिले कद्र पोस्ट
जवाब देंहटाएंकृपया कमेंट बॉक्स में कोई भी स्पैम लिंक न डालें।