Insan khuda (God) ki rehnumai ka mohtaj Kyu hai?

Insan khuda ki rehnumai ka mohtaj Kyu hai?


Table OF Content

अल्लाह ने ही इन्सान को पैदा किया और उसे बोलना सिखाया


कायनात की हर एक चीज खुदा की रहनुमाई की मोहताज है

अल्लाह ने सिर्फ इस कायनात को बनाया ही नहीं बल्कि इसको चला भी रहा है और ऐसे ही अल्लाह ने इस कायनात की हर एक चीज को बनाया और फिर उसकी कोडिंग भी की। यानी कायनात की हर चीज को बनाने के बाद उसकी रहनुमाई भी की या हर एक चीज को उसके काम करने का तरीका भी बताया। जैसे सूरज, चांद, सितारे, सय्यारे, पेड़ पौधे, और जानवर आदि, को सिर्फ अल्लाह ने बनाया ही नहीं बल्कि इन सबको इनके काम करने का तरीका भी बताया है यानी इन सबकी रहनुमाई भी की है। 

जैसाकि कुरआन में कहा गया है कि:

قَالَ رَبُّنَا الَّذِیۡۤ اَعۡطٰی کُلَّ شَیۡءٍ خَلۡقَہٗ ثُمَّ ہَدٰی
“हमारा रब वो है जिसने हर चीज़ को उसकी सही शक्ल दी, फिर उसको रास्ता बताया।”
[कुरआन 20:50]


यानी दुनिया की हर चीज़ जैसे कुछ भी बनी हुई है, उसी के बनाने से बनी है। 

हर चीज़ को जो बनावट, जो शक्ल-सूरत जो ताक़त और सलाहियत, और जो ख़ूबी और ख़ासियत मिली हुई है, उसी की दी हुई है। 

हाथ को दुनिया में अपना काम करने के लिये जिस बनावट, जो शक्ल-सूरत जो ताक़त और सलाहियत, और जो ख़ूबी और ख़ासियत मिली हुई है, उसी की दी हुई है। 

हाथ को दुनिया में अपना काम करने के लिये जिस बनावट की ज़रूरत थी, वो उसको दी और पाँव को जो सबसे ज़्यादा मुनासिब बनावट चाहिये थी, वो उसको दी। 

इन्सान, जानवर, पेड़-पौधे, जमादात (पत्थर, पहाड़, धातु वग़ैरा), हवा, पानी, रौशनी, हर एक चीज़ को उसने वो ख़ास सूरत दी है जो उसे कायनात में अपने हिस्से का काम ठीक-ठीक अंजाम देने के लिये मतलूब है। फिर उसने ऐसा नहीं किया कि हर चीज़ को उसकी ख़ास बनावट देकर यूँ ही छोड़ दिया हो, बल्कि उसके बाद वही उन सब चीज़ों की रहनुमाई भी करता है। 

दुनिया की कोई चीज़ ऐसी नहीं है जिसे अपनी बनावट से काम लेने और अपनी पैदाइश के मक़सद को पूरा करने का तरीक़ा उसने न सिखाया हो। 

कान को सुनना और आँख को देखना उसी ने सिखाया है। 
मछली को तैरना और चिड़िया को उड़ना उसी की तालीम से आया है। 
पेड़ को फल-फूल देने और ज़मीन को पेड़-पौधे उगाने की हिदायत उसी ने दी है। 

कहने का मतलब ये कि वो सारी कायनात (सृष्टि) और उसकी हर चीज़ का सिर्फ़ पैदा करनेवाला ही नहीं, हिदायत देनेवाला और सिखानेवाला भी है। कुरआन के इस बेमिसाल और बहुत-से मानी समेटे हुए इस मुख़्तसर से जुमले में सिर्फ़ यही नहीं बताया कि हमारा रब कौन है, बल्कि ये भी बता दिया कि वो क्यों रब है और किस लिये उसके सिवा किसी और को रब नहीं बनाया जा सकता। दावे के साथ उसकी दलील भी इसी छोटे-से जुमले में आ गई है। 

कुरआन सूरह नहल आयत 16 में कहा गया है कि:

وَعَلٰمٰتٍ ؕ وَ بِالنَّجۡمِ ہُمۡ یَہۡتَدُوۡنَ 
"उसने ज़मीन में रास्ता बतानेवाली निशानियाँ रख दीं, और तारों से भी लोग रास्ता पाते हैं।"
[कुरआन 16:16]


यानी ख़ुदा ने सारी ज़मीन बिलकुल एक जैसी बनाकर नहीं रख दी, बल्कि हर हिस्से को अलग-अलग ख़ास अलामतों (Landmarks) से अलग किया। इसके बहुत-से दूसरे फ़ायदों के साथ एक फ़ायदा ये भी है कि आदमी अपने रास्ते और अपनी मंज़िल को अलग पहचान लेता है। इस नेमत की क़द्र आदमी को उसी वक़्त मालूम होती है, जब उसे कभी ऐसे रेगिस्तानी इलाक़ों में जाने का मौक़ा मिला हो जहाँ इस तरह के अलग नज़र आनेवाले निशान तक़रीबन न होने के बराबर होते हैं और आदमी हर वक़्त भटक जाने का ख़तरा महसूस करता है। इससे भी बढ़कर समुद्री सफ़र में आदमी को इस शानदार नेमत का एहसास होता है, क्योंकि वहाँ रास्ते के निशान बिलकुल ही नहीं होते। लेकिन रेगिस्तानों और समुद्रों में भी अल्लाह ने इन्सान की रहनुमाई का, फ़ितरी इन्तिज़ाम कर रखा है और वो हैं तारे, जिन्हें देख-देखकर इन्सान पुराने ज़माने से आज तक अपना रास्ता मालूम कर रहा है।


इंसान, खुदा की रहनुमाई का मोहताज क्यों है?


जिस तरह अल्लाह ने कायनात की हर एक चीज की रहनुमाई की है उसे उसके काम करने का तरीका बताया है। वैसे ही अल्लाह ने इंसान की भी रहनुमाई की है। अब सवाल ये पैदा होता है कि अल्लाह ने इंसान की रहनुमाई कैसे की है? इस सवाल को समझने से पहले हम इंसान को समझते है-


इंसान के दो वुजूद होतेहैं- 

  • एक उसका जिस्मानी/माद्दी वुजूद और 
  • दूसरा उसका अखलाकी वुजूद


इंसान का जिस्मानी/माद्दी वुजूद: 

हम देखते है कि अल्लाह ने इस दुनिया में इंसान के जिस्मानी वूजूद की रहनुमाई कर रखी है। जैसे इंसान के शरीर के हर एक अंग को उसके काम करने का तरीका बता दिया है। हमारे शरीर का हर एक अंग की अल्लाह ने कोडिंग कर रखी है और उसके मुताबिक ही वह अंग काम कर रहा है। और इंसान को इस दुनिया में रहने के लिए जिस चीज की भी जरूरत है उस चीज का इंतजाम भी अल्लाह ने कर रखा है। जैसे खाना, हवा, पानी, सूरज आदि और इनके अलावा और भी बहुत कुछ है जिसका इंतजाम अल्लाह ने इंसान के जिस्मानी वूजूद के लिए कर रखा है।


इंसान का अखलाकी वुजूद:

दूसरा वूजूद इंसान का अखलाकी वुजूद होता है जिसमे भी इंसान अल्लाह की रहनुमाई का मोहताज है। जैसे, 

  • इंसान के लिए सही क्या है और गलत क्या है? 
  • इंसान को किस तरीके पर जिंदगी गुजारनी है? 
  • इंसान को क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए? 
  • इंसान को क्यों पैदा किया गया है? 
  • इंसान के साथ मरने के बाद क्या होगा? 

ये सवाल ऐसे है जिनका जवाब इंसान अपनी अकल से नहीं ढूंढ सकता है। इन सब सवालों के जवाब हमे हमारा बनाने वाला ही बता सकता है। और जब अल्लाह ने इंसान के जिस्मानी वुजूद की रहनुमाई का इतना ज्यादा ख्याल रखा है कि दुनिया में जिस चीज की भी उसे जरूरत है उस चीज का इंतजाम अल्लाह ने उसके लिए किया है तो क्या हम अल्लाह से ये उम्मीद कर सकते है कि उसने इंसान के अखलाकी वुजूद के लिए कोई रहनुमाई नहीं की होगी?


जिस ख़ुदा ने तुम्हारी दुनियावी ज़िन्दगी में तुम्हारी रहनुमाई के लिये ये कुछ इन्तिज़ाम किये हैं क्या वो तुम्हारी अख़लाक़ी ज़िन्दगी से इतना बे-परवाह हो सकता है कि यहाँ तुम्हारी हिदायत का कुछ भी इन्तिज़ाम न करे? 

ज़ाहिर है कि दुनियावी ज़िन्दगी में भटक जाने का बड़े से बड़ा नुक़सान भी अख़लाक़ी ज़िन्दगी में भटकने के नुक़सान से कई दर्जे कम है। फिर जिस मेहरबान रब को हमारी दुनियावी भलाई की इतनी फ़िक्र है कि पहाड़ों में हमारे लिये रास्ते बनाता है, मैदानों में रास्ता बतानेवाले निशान खड़े करता है, रेगिस्तानों और समुद्रों में हमको सफ़र की सही दिशा बताने के लिये आसमानों पर चिराग़ रौशन करता है, उससे ये बदगुमानी कैसे की जा सकती है कि, 

  • उसने हमारी अख़लाक़ी कामयाबी के लिये कोई रास्ता न बनाया होगा? 
  • उस रास्ते को नुमायाँ करने के लिये कोई निशान न खड़ा किया होगा? और 
  • उसे साफ़-साफ़ दिखाने के लिये कोई चमकता चिराग़ रौशन न किया होगा?


कुरआन सूरह रहमान की आयत 1 से 4 में कहा गया है कि:

اَلرَّحۡمٰنُ ۙ عَلَّمَ الۡقُرۡاٰنَ خَلَقَ الۡاِنۡسَانَ عَلَّمَہُ الۡبَیَانَ
"रहमान ने, इस क़ुरआन की तालीम दी है।, उसी ने इन्सान को पैदा किया और उसे बोलना सिखाया।"
[कुरआन 55:1-4]


क्योंकि अल्लाह इन्सान का पैदा करनेवाला है, और पैदा करनेवाले ही की ये ज़िम्मेदारी है कि अपनी मख़लूक़ (इन्सानों) की रहनुमाई करे और उसे वो रास्ता बताए जिससे वो अपने वुजूद का मक़सद पूरा कर सके, इसलिये अल्लाह की तरफ़ से क़ुरआन की इस तालीम का उतरना सिर्फ़ उसके रहमान होने ही का तक़ाज़ा है। 

  • ख़ालिक़ अपनी मख़लूक़ की रहनुमाई न करेगा तो और कौन करेगा?
  • ख़ालिक़ ही रहनुमाई न करे तो और कौन कर सकता है? और 
  • ख़ालिक़ के लिये इससे बड़ा ऐब और क्या हो सकता है कि जिस चीज़ को वो वुजूद में लाए, उसे अपने वुजूद का मक़सद पूरा करने का तरीक़ा न सिखाए? 

तो हक़ीक़त में अल्लाह की तरफ़ से इन्सान की तालीम का इन्तिज़ाम होना अजीब बात नहीं है, बल्कि ये इन्तिज़ाम अगर उसकी तरफ़ से न होता तो ताज्जुब के क़ाबिल होता। पूरी कायनात में जो चीज़ भी उसने बनाई है उसको सिर्फ़ पैदा करके नहीं छोड़ दिया है, बल्कि उसको वो बहुत ही मुनासिब बनावट दी है जिससे वो फ़ितरत के निज़ाम में अपने हिस्से का काम करने के क़ाबिल हो सके, और उस काम को अंजाम देने का तरीक़ा उसे सिखाया है। ख़ुद इन्सान के अपने जिस्म का एक-एक रोंगटा और एक-एक ख़लिया (कोशिका Cell) वो काम सीखकर पैदा हुआ है जो उसे इन्सानी जिस्म में अंजाम देना है। फिर आख़िर इन्सान बजाय ख़ुद अपने ख़ालिक़ (पैदा करनेवाले) की तालीम और रहनुमाई से बेनियाज़ या महरूम कैसे हो सकता था? 


अल्लाह ने ही इन्सान को पैदा किया और उसे बोलना सिखाया


बोलना वो ख़ास और नुमायाँ ख़ूबी है जो इन्सान को जानवरों और ज़मीन के दूसरे जानदारों से अलग करती है। ये सिर्फ़ बोलने की ताक़त ही नहीं है, बल्कि इसके पीछे अक़्ल, समझ, सूझ-बूझ, तमीज़ और इरादा और दूसरी ज़ेहनी क़ुव्वतें काम करती हैं, जिनके बिना इन्सान की बोलने की ताक़त काम नहीं कर सकती। इसलिये बोलना असल में इन्सान के समझदार और इख़्तियार रखनेवाली मख़लूक़ होने की खुली निशानी है। और ये ख़ास ख़ूबी जब अल्लाह ने इन्सान को दी है तो ज़ाहिर है कि इसके लिये तालीम देने का तरीक़ा भी वो नहीं हो सकता जो बेसमझ और बेइख़्तियार मख़लूक़ की रहनुमाई के लिये मुनासिब है। 

इसी तरह इन्सान की एक दूसरी ख़ास ख़ूबी ये है कि अल्लाह ने उसके अन्दर एक अख़लाक़ी हिज (नैतिक चेतना Moral Sense) रख दी है जिसकी वजह से वो फ़ितरी तौर पर नेकी और बदी, हक़ और नाहक़, ज़ुल्म और इन्साफ़, सही और ग़लत के बीच फ़र्क़ करता है, और ये ख़ूबी और एहसास इन्तिहाई गुमराही की हालत में भी उसके अन्दर से नहीं निकलता। 

इन दोनों ख़ास ख़ूबियों का लाज़िमी तक़ाज़ा ये है कि इन्सान समझ-बूझ और इख़्तियारवाली ज़िन्दगी के लिये तालीम का तरीक़ा उस पैदाइशी तालीम के तरीक़े से अलग हो जिसके तहत मछली को तैरना और परिन्दे को उड़ना, और ख़ुद इन्सानी जिस्म के अन्दर पलक झपकना, आँख को देखना, कान को सुनना और पेट को हज़म करना सिखाया गया है। इन्सान ख़ुद अपनी ज़िन्दगी के इस मैदान में उस्ताद और किताब व मदरसे और तबलीग़ व नसीहत और तहरीर व तक़रीर और बहस व दलील देने जैसे ज़रिओं ही को तालीम का ज़रिआ मानता है और पैदाइशी इल्म और समझ को काफ़ी नहीं समझता। 

फिर ये बात आख़िर क्यों अजीब हो कि इन्सान को पैदा करनेवाले पर उसकी रहनुमाई की जो ज़िम्मेदारी आती है उसे अदा करने के लिये उसने रसूल और किताब को तालीम का ज़रिआ बनाया है? 

जैसी मख़लूक़ वैसी ही उसकी तालीम। ये सरासर एक अक़्ल में आनेवाली बात है। 'बयान' जिस मख़लूक़ को सिखाया गया हो उसके लिये 'क़ुरआन' ही तालीम का ज़रिआ हो सकता है, न कि कोई ऐसा ज़रिआ जो उन मख़लूक़ात के लिये मुनासिब है जिन्हें बयान नहीं सिखाया गया है।


ख़ुदा जो पूरी कायनात का रहनुमा है और जो हर चीज़ को उसकी हालत और ज़रूरत के मुताबिक़ हिदायत दे रहा है, उसके आलमगीर हिदायत के मंसब का लाज़िमी तक़ाज़ा ये है कि वो इन्सान की शुऊरी ज़िन्दगी के लिये भी रहनुमाई का इन्तिज़ाम करे। और इन्सान की शुऊरी ज़िन्दगी के लिये रहनुमाई की वो शक्ल मुनासिब नहीं हो सकती जो मछली और मुर्ग़ी के लिये मुनासिब है। उसकी सबसे ज़्यादा मुनासिब शक्ल ये है कि एक अक़्ल और समझ रखनेवाला इन्सान उसकी तरफ़ से इन्सानों की रहनुमाई पर मुक़र्रर हो और वो उनकी अक़्ल और समझ को अपील करके उन्हें सीधा रास्ता बताए।


क़ुरआन मजीद में इस बात को अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरीक़ों से समझाया गया है- 

सूरह-92 लैल आयत-12 में फ़रमाया रहनुमाई करना हमारी ज़िम्मेदारी है। 

सूरह-16 नहल आयत-9 में कहा गया, ये अल्लाह के ज़िम्मे है कि सीधा रास्ता बताए और टेढ़े रास्ते बहुत-से हैं।

सूरह-20 ता-हा (आयतें-47 से 50) में ज़िक्र आता है कि जब फ़िरऔन ने हज़रत मूसा (अलैहि०) की ज़बान से पैग़म्बरों का पैग़ाम सुनकर हैरत से पूछा कि आख़िर वो तुम्हारा रब कौन-सा है जो मेरे पास पैग़म्बर भेजता है, तो हज़रत मूसा (अलैहि०) ने जवाब दिया, हमारा रब वो है जिसने हर चीज़ को उसकी ख़ास बनावट दी और फिर उसकी रहनुमाई की। यानी वो तरीक़ा सिखाया जिससे ग़ैर-मुतास्सिब (अपक्षपाती) ज़ेहन इस बात पर मुत्मइन हो जाता है कि इन्सान की तालीम के लिये अल्लाह की तरफ़ से पैग़म्बरों और किताबों का आना बिलकुल फ़ितरत का तक़ाज़ा है।


कुरआन सूरह-16 नहल आयत-9 में कहा गया:

وَ عَلَی اللّٰہِ قَصۡدُ السَّبِیۡلِ وَ مِنۡہَا جَآئِرٌ ؕ وَ لَوۡ شَآءَ لَہَدٰىکُمۡ اَجۡمَعِیۡنَ
"और अल्लाह ही के ज़िम्मे है सीधा रास्ता बताना, जबकि रास्ते टेढ़े भी मौजूद हैं। अगर वो चाहता तो तुम सबको सीधा रास्ता दिखा देता।"
[कुरआन 16:9]


दुनिया में इन्सान के लिये सोच व अमल के बहुत-से अलग-अलग रास्ते मुमकिन हैं और अमली तौर पर मौजूद हैं। ज़ाहिर है कि ये सारे रास्ते एक ही वक़्त में तो हक़ नहीं हो सकते। सच्चाई तो एक ही है और ज़िन्दगी का सही नज़रिया सिर्फ़ वही हो सकता है जो उस सच्चाई के मुताबिक़ हो और अमल के अनगिनत मुमकिन रास्तों में से सही रास्ता भी सिर्फ़ वही हो सकता है जो ज़िन्दगी के सही नज़रिये पर बना हो। इस सही नज़रिये और सही राहे-अमल से वाक़िफ़ होना इन्सान की सबसे बड़ी ज़रूरत है, बल्कि असल बुनियादी ज़रूरत यही है, क्योंकि दूसरी तमाम चीज़ें तो इन्सान की सिर्फ़ उन ज़रूरतों को पूरा करती हैं जो एक ऊँचे दर्जे का जानवर होने की हैसियत से उसके साथ लगी हुई है। ये अगर पूरी न हो तो इसका मतलब ये है कि आदमी की सारी ज़िन्दगी ही नाकाम हो गई।

अब ग़ौर करो कि जिस ख़ुदा ने तुम्हें वुजूद में लाने से पहले तुम्हारे लिये ये कुछ सरो-सामान जुटाकर रखा और जिसने वुजूद में लाने के बाद तुम्हारी हैवानी ज़िन्दगी की एक-एक ज़रूरत को पूरा करने का इतनी बारीकी के साथ इतने बड़े पैमाने पर इन्तिज़ाम किया, क्या उससे तुम ये उम्मीद रखते हो कि उसने तुम्हारी इन्सानी ज़िन्दगी की इस सबसे बड़ी और असली ज़रूरत को पूरा करने का इन्तिज़ाम न किया होगा?

यही इन्तिज़ाम तो है जो नुबूवत के ज़रिए से किया गया है। 

अगर तुम नुबूवत को नहीं मानते तो बताओ कि तुम्हारे ख़याल में ख़ुदा ने इन्सान की हिदायत के लिये और कौन-सा इन्तिज़ाम किया है? 

इसके जवाब में तुम न ये कह सकते हो कि ख़ुदा ने हमें रास्ता तलाश करने के लिये अक़्ल व समझ पहले ही अनगिनत अलग-अलग रास्ते निकाल बैठी है जो सीधे रास्ते की सही खोज में उसकी नाकामी का खुला सुबूत है और न तुम यही कह सकते हो कि ख़ुदा ने हमें राह दिखाने का कोई इन्तिज़ाम नहीं किया है, क्योंकि ख़ुदा के साथ इससे बढ़कर बदगुमानी और कोई नहीं हो सकती कि वो जानवर होने की हैसियत से तो तुम्हारी परवरिश और तुम्हारे फूलने-फलने का इतना तफ़सील से और पूरा इन्तिज़ाम करे, मगर इन्सान होने की हैसियत से तुमको यूँ ही अँधेरों में भटकने और ठोकरें खाने के लिये छोड़ दे।


सवाल: अल्लाह ने सब इंसानों को जबरदस्ती एक ही रास्ते पर क्यों नहीं चला दिया?

जवाब: इसी सवाल का जवाब अल्लाह ने सूरह नहल आयत 16 में दिया है:

وَ لَوۡ شَآءَ لَہَدٰىکُمۡ اَجۡمَعِیۡنَ
"अगर वो (अल्लाह) चाहता तो तुम सबको सीधा रास्ता दिखा देता।"
[कुरआन 16:9]


यानी ये भी हो सकता था कि अल्लाह अपनी इस ज़िम्मेदारी को (जो इन्सानों को राह दिखाने के लिये उसने ख़ुद अपने ऊपर डाली है) इस तरह अदा करता कि सारे इन्सानों को पैदाइशी तौर पर दूसरे तमाम बेइख़्तियार मख़लूक़ की तरह सीधे रास्ते पर लगा देता। मगर वो ऐसा करना नहीं चाहता था। उसकी मर्ज़ी और स्कीम एक ऐसे इख़्तियार रखनेवाली मख़लूक़ को वुजूद में लाने का तक़ाज़ा कर रही थी जो अपनी पसन्द और अपने चुनाव से सही और ग़लत, हर तरह के रास्तों पर जाने की आज़ादी रखती हो। इसी आज़ादी के इस्तेमाल के लिये उसको इल्म के ज़रिए (साधन) दिये गए, अक़्ल व फ़िक्र की सलाहियतें दी गईं। ख़ाहिश और इरादे की ताक़तें दी गईं, अपने अन्दर और बाहर की अनगिनत चीज़ों को इस्तेमाल के इख़्तियारात दिये गए, और अन्दर और बाहर में हर तरफ़ अनगिनत ऐसे असबाब (साधन) रख दिये गए जो उसके लिये हिदायत और गुमराही दोनों का सबब बन सकते हैं। 

ये सब कुछ बे-मतलब हो जाता अगर वो पैदाइशी तौर पर सीधे रास्ते पर चलनेवाला बना दिया जाता और तरक़्क़ी के उन सबसे ऊँचे दर्जों तक भी इन्सान का पहुंचना मुमकिन न रहता जो सिर्फ़ आज़ादी के सही इस्तेमाल ही के नतीजे में उसको मिल सकते हैं। इसलिये अल्लाह ने इन्सान की रहनुमाई के लिये ज़बरदस्ती हिदायत देने का तरीक़ा छोड़कर रिसालत का तरीक़ा अपनाया, ताकि इन्सान की आज़ादी भी बनी रहे, और उसके इम्तिहान का मक़सद भी पूरा हो, और सीधा रास्ता भी सबसे ज़्यादा मुनासिब तरीक़े से उसके सामने पेश कर दिया जाए।


कुरआन सूरह-92 लैल आयत-12 में कहा:

اِنَّ عَلَیۡنَا لَلۡہُدٰی 
"बेशक रास्ता बताना हमारे ज़िम्मे है।"
[कुरआन 92:12]


यानी इन्सान का पैदा करनेवाला होने की हैसियत से अल्लाह ने ख़ुद अपनी हिकमत, अपने अद्ल और अपनी रहमत की बिना पर इस बात का ज़िम्मा लिया है कि उसको दुनिया में बेख़बर न छोड़े बल्कि उसे ये बता दे कि, 

  • सीधा रास्ता कौन-सा है और ग़लत रास्ते कौन-से हैं?
  • नेकी क्या है और बदी क्या? 
  • हलाल क्या है और हराम क्या?
  • कौन-सी रविश इख़्तियार करके वो फ़रमाँबरदार बन्दा बनेगा और कौन-सा रवैया इख़्तियार करके नाफ़रमान बन्दा बन जाएगा?


कुरआन सूरह-44 दुखान आयत 5-6 में कहा:


اَمۡرًا مِّنۡ عِنۡدِنَا ؕ اِنَّا کُنَّا مُرۡسِلِیۡنَ 
"हम एक रसूल भेजनेवाले थे,

رَحۡمَۃً مِّنۡ رَّبِّکَ ؕ اِنَّہٗ ہُوَ السَّمِیۡعُ الۡعَلِیۡمُ
तेरे रब की रहमत के तौर पर, यक़ीनन वही सब कुछ सुनने और जाननेवाला है।"
[कुरआन 44:5-6]


यानी ये किताब (कुरआन) देकर एक रसूल को भेजना न सिर्फ़ हिकमत का तक़ाज़ा था, बल्कि अल्लाह की रहमत का तक़ाज़ा भी था, क्योंकि वो रब है और रुबूबियत सिर्फ़ इसी बात का तक़ाज़ा नहीं करती है कि बन्दों के जिस्म की परवरिश का सामान किया जाए, बल्कि इस बात का भी तक़ाज़ा करती है कि सही इल्म से उनकी रहनुमाई की जाए, हक़ और बातिल (सही और ग़लत) के फ़र्क़ से उनको आगाह किया जाए और उन्हें अंधेरे में भटकता न छोड़ दिया जाए।


यक़ीनन अल्लाह ही सब कुछ सुनने और जाननेवाला है इस मौक़ा-महल में अल्लाह की इन दो सिफ़ात को बयान करने का मक़सद लोगों को इस हक़ीक़त पर ख़बरदार करना है कि सही इल्म सिर्फ़ वही दे सकता है, क्योंकि तमाम हक़ीक़तों को वही जानता है। एक इन्सान तो क्या, सारे इन्सान मिलकर भी अगर अपने लिये ज़िन्दगी का कोई रास्ता तय करें तो उसके हक़ और सही होने की कोई ज़मानत नहीं, क्योंकि सारे इन्सान इकट्ठा होकर भी एक समीअ (सबकी सुननेवाला) और अलीम (सब कुछ जाननेवाला) नहीं बनते। उसके बस में ये है ही नहीं कि उन तमाम हक़ीक़तों को अपने दायरे में ला सके जिनका जानना ज़िन्दगी की एक सही राह तय करने के लिये ज़रूरी है। 

ये इल्म सिर्फ़ अल्लाह के पास है। 

वही समीअ और अलीम है, इसलिये वही ये बता सकता है कि इन्सान के लिये, 

हिदायत क्या है और गुमराही क्या? 

हक़ क्या है और बातिल क्या? 

भलाई क्या है और बुराई क्या?


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

क्या आपको कोई संदेह/doubt/शक है? हमारे साथ व्हाट्सएप पर चैट करें।
अस्सलामु अलैकुम, हम आपकी किस तरह से मदद कर सकते हैं? ...
चैट शुरू करने के लिए यहाँ क्लिक करें।...