हैज़ क़ी तारीफ और एहकाम
हैज़ का लुगवी मानी السیلان (बहना) हैं जबकि शरअन हैज़ से मुराद वो खून हैं मखसूस अय्याम (टाइम ऑफ़ पीरियड्स) बग़ैर बीमारी के औरत के रहम से ख़ारिज होता हैं, अल्लाह ताला ने बिनते आदम को इसी जिबलत पर पैदा किया और उस खून को हमल के वक्त बच्चे की गिज़ा बना दिया विलादत के बाद यही खून दूध में बदल जाता है। जब औरत ना प्रेग्नेंट हो और ना ही पीरियड से हो तो इस खून का कोई तसररुफ नहीं रहता, बस यह अपने तयशुदा टाइम मे ख़ारिज होता हैं इसको औरतें पहचान लेती हैं।
हैज़ आने का अरसा
लगभग कम से कम 9 साल की उम्र से लेकर 50 साल तक की औरत को ही आता है।
अल्लाह तआला फरमाता हैं :-
"और तुम्हारी औरतों में से जो हैज़ से मायूस हो चुकी हों उनके मामले में अगर तुम लोगों को कोई शक लाहिक़ है तो (तुम्हें मालूम हो कि) इनकी इद्दत तीन महीने है। और यही हुक्म उनका है, जिन्हें अभी हैज़ न आया हो।" [सूरह तलाक़ 5]
وَالّٰٓيئِ یَئِسْنَ
से मुराद 9 से कम उम्र छोटी बच्चियां है।
وَالّٰٓيئِ یَئِسْنَ
ये मुराद 50 साल की उम्र को पहुंच जाने वाली औरतें।
हायज़ा के लिए हराम और मुबाह एहकाम
1. जिमा (जिस्मानी ताल्लुकात)
हालत ऐ हैज़ मे जिमा करना हराम हैं।
नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने फरमाया,
اِصْنَعُوْا کُلَّ شَیْئٍ إلَّا النِّکَاحَ
"जिमा के अलावा सब कुछ करो।" [मुसनद अहमद 8507]
3. नमाज और रोजा
हायज़ा औरत अपनी मुद्दत ऐ हैज़ में नमाज और रोज़ा छोड़ देगी इनकी अदायगी इस पर हराम है और ना ही यह अमल इससे सही साबित होंगे क्योंकि
नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने फरमाया:-
أَلَیْسَ إِذَا حَاضَتِ الْمَرْأَة لَمْ تُصَلِّ وَلَمْ تَصُمْ
"क्या ऐसा नहीं जब औरत पीरियड से हो जाती है ना नमाज पढ़ती है ना ही रोजा रखती है" [सहीह बुखारी 1951]
हायज़ा औरत जब हैज़ से पाक साफ हो जाए तो रोज़े की क़ज़ा करेगी जबकि नमाज की क़ज़ा नहीं करेगी क्योंकि,
हजरत आयशा रजिअल्लाह ताला अन्हा बयान करती हैं :-
کُنَّا نَحِیْضُ عَلَی عَھْدِ رَسُوْلِ اﷲِ فَکُنَّا نُؤْمَرُ بِقَضَائِ الصَّوْمِ وَلَا نُؤْمَرُ بِقَضَائِ الصَّلَاة
"हम अहद ऐ नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मे हायज़ा हो जाती थी बस हमें रोज़ो की कज़ा का हुक्म दिया जाता था जबकि नमाज की कज़ा का हक नहीं दिया जाता था।" [तिर्मिजी 787]
नमाज और रोज़े में फर्क इसलिए है कि नमाज मुकर्रर है जिसकी कज़ा में तंगी और मशक्कत है इसलिए कज़ा का हुक्म नहीं दिया गया। (अल्लाह बेहतर जानता है)
3. मुसफ (क़ुरआन ) पकड़ना
हायज़ा पर बिला पर्दा मुसफ (क़ुरआन) पकड़ना हराम हैं क्योंकि अल्लाह ताला का फरमान है,
لَا یَمَسُّہُ اِلَّا الْمُطَھَّرُوْنَ}
"जिसे सिर्फ पाक लोग ही छू सकते हैं।" [सूरह वाक़िया 79]
और नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने उमर बिन हज़म रज़ि अन्हु को खत में यह लिखा
لاَ یَمَسُّ الْمُصْحَفَ اِلَّاطَاھِرٌ
"मुसफ को पाक लोग ही छू सकते हैं।" [इरया उल गलील 1/158]
4. मस्जिद में ठहरना
हायज़ा पर मस्जिद में ठहरना हराम है क्योंकि नबी करीम सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम ने फरमाया :-
"मैं हायज़ा और जुनूबी (नापाक) के लिए मस्जिद को हलाल नहीं करता।" [सुनन अबू दाऊद 232]
अल्लाह ताला हमें दीन समझने की तौफीक दे
दुआओं में याद रखें
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